
संजय कुमार सिंह
देशबन्धु में आज भारत अमेरिका व्यापार समझौते के लिए तेज करेंगे प्रयास शीर्षक से एक खबर है। इसके साथ ही स्वदेशी का प्रचार करने के बावजूद कश्मीर के सेव व्याापरियों की दिक्कत से जुड़ी एक खबर छपी है। इसके अनुसार, जब उधमपुर-श्रीनगर-बारामुल्ला लाइन को पूरा घोषित किया गया था, तो इसे सेब अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव बताया गया था। विशेष माल ढुलाई गलियारे, रेफ्रिजरेटेड वैगन और पूरे भारत की मंडियों तक निर्बाध पहुंच का वादा किया गया था। लेकिन हकीकत में, इस सीजन में रेलवे की सेब ढोने की क्षमता एक अच्छी तस्वीर के अलावा और कुछ नहीं है। खबर के अनुसार अभी ट्रेन से प्रतिदिन 23 टन सेब कश्मीर से ले जाया जाता है जबकि कश्मीर में हर साल 20 लाख टन से ज्यादा सेब का उत्पादन होता है। इस हिसाब से कश्मीर घाटी के 16 लाख टन सेब कश्मीर से बाहर ले जाने में 190 साल लगेंगे। अभी तक यह ट्रकों से जाता था लेकिन अब ट्रक उपलब्ध न होने से परेशानी है। खबर यह छपी थी कि रेल लाइन बन जाने से सुविधा होगी। खबरों के अनुसार, भारी बारिश से श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बंद है। इस कारण कश्मीर का सेब उद्योग संकट में है। 4000 से ज़्यादा ट्रकों के फंसे होने से 1200 करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ है। पहले की सरकारें काम करती थीं और नहीं करती थीं तो खबर छपने पर करती थीं। अब सरकार अपना प्रचार करती और करवाती है। इसमें सेब सड़ जाएंगे तो देश भर में सेब नहीं मिलेंगे लेकिन दुनिया खुश दिखेगी कि जीएसटी कम हुआ है। शीर्ष अधिकारी या मंत्री अगर रेल सेवा की घोषणा, प्रचार, खबर छपवाने और कतरन बटोरकर भेजने का काम करेगा तो उसका काम कौन करेगा और नहीं करेगा तो सेब सड़ेंगे। जनता को पता नहीं चलेगा और जिसे नुकसान होगा उसे अगले साल मुफ्त राशन मिलने लगेगा।
आज मेरे लगभग सभी अखबारों में लीड या सेकेंड लीड अमेरिका से जुड़ी खबर है। इनमें बताया गया कि ट्रम्प ने प्रधानमंत्री को जन्मदिन की बधाई दी और प्रधानमंत्री ने इसके लिए ‘मित्र’ को धन्यवाद दिया। हिन्दुस्तान टाइम्स ने तो शीर्षक में ही बताया है कि बधाई देने-लेने की कॉल में मोदी और ट्रम्प ने रिश्तों के साथ यूक्रेन पर बात की। कुल मिलाकर, जैसा दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – भारत, अमेरिका चाहते हैं कि व्यापार सौदा जल्दी हो क्योंकि दिल्ली में वार्ता ‘सकारात्मक’ है। लगभग यही शीर्षक द हिन्दू में है। हालांकि, यहां खबर सिंगल कॉलम की है। कहने की जरूरत नहीं है कि ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ का नारा लगा चुके हमारे प्रधानमंत्री चीन तब गये जब ‘ना घुसा था, ना घुसा हुआ है’ के भारतीय सीमा से वापस जाने की खबरें कई बार छपवा ली गईं। युद्ध विराम कराने के दावे करके ट्रम्प ने नाक में दम कर रखा था फिर भी यह बोला नहीं गया कि झूठ बोल रहा है। ऐसे में यह चिन्ता स्वाभाविक है कि चीन के साथ संबंध का क्या होगा तथा दौरे के बाद क्या अंतर पड़ा है। आपको याद होगा कि 27 जनवरी 2025 को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की बैठक में “सिद्धांत रूप में सहमति” हुई कि दोनों देशों के बीच सीधी विमान सेवाएँ फिर शुरू की जाएँ। 12 अगस्त 2025 की रिपोर्ट्स कहती हैं कि डायरेक्ट फ्लाइट्स अगले महीने (सितंबर 2025) से फिर से शुरू होने की संभावना है। लेकिन ये रिपोर्ट्स “शायद”, “तैयारियाँ कर ली गयी हैं” जैसे शब्दों में हैं। नागरिक उड्डयन सचिव ने अलग से कहा है कि बातचीत प्रारंभिक चरण पर है और कोई निश्चित तारीख तय नहीं हुई है। यही हाल व्यापार का है। जो रोक लगी थी वह कितना प्रभावी है, किसके लिए लाभप्रद और किसके लिए नुकसानदेह ऐसी कोई चर्चा तो गोदी मीडिया के जमाने में हुई नहीं पर चीन से संबंध खराब होने पर जो ऐप्प प्रतिबंधित किये गये थे और प्रचारकों को लग रहा था कि चीन घुटने पर आ जायेगा वह अभी तक प्रतिबंधित है। दूसरी ओर मित्र देश अमेरिका और ‘फ्रेंड’ के टैरिफ के दबाव में हमारे प्रधानमंत्री स्वेदशी की माला जपने लगे थे।
आज अमर उजाला की खबर है, भारत और अमेरिका के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने लगी है। ऐसे में चीन के साथ संबंध सामान्य हो गये या नहीं, बहुत स्वाभाविक सवाल है लेकिन अखबारों में इसका जवाब नहीं मिलना। कैसी है राम जाने। इसे बताने की जिम्मेदारी कोई अखबार खुद क्यों ले और दबाव कौन डालेगा या डाल सकता है? बाजार में उपलब्ध, ‘छोटी आंखों वाले गणेश जी’ तथा दीवाली के लिए सस्ती और उपयोगी लाइट ही नहीं सजावट के लिए प्लास्टिक के तिरंगे आदि देखकर प्रतिबंधित चीनी ऐप्प की याद आती है। इससे पहले कि ट्रम्प चच्चा से फिर दोस्ती हो और चीन फिर कुछ पंगा करे उसे भाई वाला प्यार दिया जा रहा है कि नहीं पता नहीं है। जो भी हो, 29 जून 2020 को भारत सरकार ने कुल 59 चीनी ऐप्स को प्रतिबंधित किया था। ये प्रतिबंध सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम विशेषकर धारा 69ए के अंतर्गत किया गया था। इसके बाद और भी ऐप्स पर प्रतिबंध लगे। 119 ऐप्स की एक सूची भी आई थी। रिपोर्ट्स कहती हैं कि अब तक कुल 267 ऐप्स विभिन्न बैन लिस्ट में हैं। इनमें मेरा पसंदीदा था, टिकटॉक और कैम स्कैनर। मुझे टिकटॉक की जरूरत नहीं थी, कैम स्कैनर जैसे कई ऐप्प हैं। दूसरी ओर, महामहिम के चीन दौरे के बाद भी ऐप्प प्रतिबंधित हैं। लगता है चीन ने कहा भी नहीं। रोना-गिड़गिड़ाना तो बहुत दूर। ऐसा कुछ होता तो गोदी वालों ने आसमान सर पर उठा लिया होता। इस चक्कर में टिक टॉक अभी भी भारतीय गूगल प्ले स्टोर या ऐप्पल ऐप्प स्टोर पर शायद ही मिले। हालांकि, कुछ ऐप्स ने नाम बदल लिया होगा या कंपनी की स्वामित्व संरचना बदल गई हो। जरूरत के ऐप्प लोग उपयोग कर ही रहे हैं भले वे अलग नाम से हों या बदले रूप में। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोई 36 ऐप्स (मूल या क्लोन) 2025 के शुरुआत में किसी न किसी रूप में देखे गए थे।
स्क्रॉल इन की एक खबर के अनुसार, प्रतिबंध के बाद ऐप्प नए डाउनलोड के लिए तो स्टोर से हटा दिये गये थे लेकिन जिनके पास पहले से ये ऐप्स इंस्टॉल थे उन्होंने उपयोग जारी रखा। उदाहरण के लिए कई राज्य सरकारों, पुलिस विभाग आदि में कैम स्कैनर का उपयोग देखा गया है, क्योंकि पुराने इंस्टॉल किये गए ऐप्स काम करते रहे हैं। लेकिन कैम स्कैनर पर से प्रतिबंध को अभी भी औपचारिक रूप से नहीं हटाया गया है। (खबर तो नहीं ही मिली)। प्रतिबंध अभी भी बरकरार हैं, विशेष रूप से टिक ट़ॉक और कैम स्कैनर जैसे उपयोगी ऐप्स पर। अगर खुद परेशान होकर, अपना नुकसान सह कर चीन को सबक सिखाने की नीति थी तो अपना भला करने की नीति भी नोटबंदी और जीएसटी जैसी ही होनी है। इसी लिये पूरा उद्योग जगत तारीफ कर रहा है। और आज अखबारों में विज्ञापन छपवाकर जन्म दिन की बधाई देने वालों में भाजपा के वो सहयोगी भी हैं जिन्होंने पुराने सहयोगी के दो टुकड़े कर दिये। पुराने वाले को छोड़ नए वाले अब ज्यादा बड़े सहयोगी हैं। और इन्हें बड़ा बनाने में गिरोह का पूरा सहयोग मिला जिसकी अलग कहानी है।

द टेलीग्राफ में अमेरिका की एक खबर है, सिंगल कॉलम की। इसका शीर्षक है, मोदी को जन्मदिन पर ट्रम्प का फोन आया। एक खबर नये बने सरकारी कार्यालय, कर्तव्य भवन की है। इसका शीर्षक ही है, निजता की चिन्ता। फोटो भी देखने लायक है इसलिए लगा दे रहा हूं। बसंत कुमार मोहंती की खबर इस प्रकार है, औपनिवेशिक लाल बलुआ पत्थर से बने नॉर्थ ब्लॉक को सेंट्रली एसी, ‘कर्तव्य भवन’ में स्थानांतरित करना केंद्र सरकार के कर्मचारियों के कुछ वर्गों को रास नहीं आ रहा है। कई कर्मचारियों ने शिकायत की है कि जगह का “अनियमित” आवंटन निजता और कार्यकुशलता को कमज़ोर कर रहा है। केंद्र सरकार के अधिकारियों के एक निकाय, केंद्रीय सचिवालय सेवा मंच (सीएसएसएफ) ने पिछले महीने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय (एमओएचयूए) को पत्र लिखकर स्थापित मानदंडों का उल्लंघन करते हुए अधिकारियों को “मनमाने ढंग से” कार्यालय स्थान आवंटित करने के बारे में बताया था। अधिकारियों ने कहा कि सरकार ने उनकी चिंताओं को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर समझा।
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के अनुसार दिल्ली सरकार ने आवारा (अभिभावक नाराज न हों, दूसरा शब्द बता दें तो उसी का उपयोग करूंगा) कुत्तों के प्रबंध के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिये हैं। कल सोशल मीडिया पर मिड-डे में प्रकाशित एक लेख की चर्चा थी। इसे वरिष्ठ पत्रकार और “भीमा कोरेगांव: चैलेंजिंग कास्ट” के लेखक अजाज अशरफ ने लिखा है। इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, ऐक्टिविस्ट के मुकाबले कुत्तों के लिये न्याय पाना आसान है। मुझे भी भाजपा राज में अरनब गोस्वामी को जिस रफ्तार से बेल मिली उसके बाद दूसरा मामला वनतारा का ही नजर आया है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट में कुत्तों को जो सम्मान मिला है और उनके साथ आदर का जो व्यवहार हुआ वह न्यायिक इतिहास में पंच परमेश्वर के बाद आधुनिक पंच की कहानी के रूप में दर्ज होने योग्य है। बशर्ते कोई (किसी भी भाषा में) उस तरह लिख सके और उसे पाठ्य पुस्तकों में छपवा सके। छपे हुए लेख के साथ हाइलाइट किया हुआ अंश है, आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने जिस तत्परता से याचिकाओं की समीक्षा की, वह दिल्ली दंगों के मामले में पाँच साल से लटके 18 आरोपियों में से नौ की ज़मानत याचिकाओं के बिल्कुल विपरीत है। एक और अंश हैं, मुसलमान बदकिस्मत हैं, क्योंकि उनके खिलाफ ‘सरकार’ द्वारा गढ़े गए सबूतों के अनगिनत उदाहरण हैं। इनमें सबसे हालिया मामला बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में दोषी ठहराए गए 11 लोगों को अब रिहा कर दिया जाना है। अखबार में लेख के साथ छह लोगों की तस्वीर छपी है। ये हैं – उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, अतहर खान, गुलफिशा खातून और खालिद सैफी। ये उन नौ आरोपियों में से छह हैं जिनकी 2020 के दिल्ली दंगा मामले में ज़मानत याचिकाएँ 2 सितंबर को फिर खारिज कर दी गईं। जानने वाले बताते हैं कि अगली तारीख पर भी जमानत नहीं होनी है क्योंकि नोटिस जारी नहीं हुए हैं। जो भी हो, जब पांच साल जमानत नहीं मिली है तो कारण हर बार कुछ न कुछ रहा ही होगा और इसपर भी विवाद हो चुका है पर वह भी अभी मुद्दा नहीं है।
मुद्दा यह है कि देश के पहले स्वयंभू, नॉन बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री के घोषित और आधिकारिक जन्म दिन, 17 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में इसी मुद्दे पर एक विस्तृत पड़ताल छपी है। शीर्षक के अनुसार, दिल्ली दंगे के मामलों में जो 93 लोग बरी किये गये हैं उनमें से 17 में अदालतों ने ‘गढ़े हुए सबूतों’ पर सवाल किये हैं और पुलिस को फटकार लगाई है। 12 मामलों में जजों को बनावटी गवाह मिले। यह नागरिकों के अधिकारों का ‘गंभीर हनन’ है। विनीत भल्ला और निर्भय ठाकुर की बाईलाइन वाली खबर के अनुसार शिकायतें पुलिस के “निर्देश/कहने” पर लिखी गई; गवाह “काल्पनिक” हैं; सबूत “गढ़े हुए” हैं; गवाह का बयान जाँच अधिकारी के दिये “अतिरिक्त तथ्यों” से भरा है; आरोपी को घटनास्थल पर देखने का एक कांस्टेबल का “कृत्रिम दावा”; आरोपी की पहचान “संदेह के घेरे में”; और आरोपी पर “थोपे गए” मामले। यह सिलसिला चलता ही जा रहा है। नवोदय टाइम्स में अमेरिका की तीन खबरें हैं। पहली तो व्यापार समझौते पर सकारात्मक बातचीत की है, दूसरी ट्रम्प के दावे को इशाक ने खारिज किया है शीर्षक से । इशाक, पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री हैं। इनका नाम है, इशाक डार। खबर के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य कार्रवाई रुकवाने में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मध्यस्थता दावे को उन्होंने खारिज किया है। डार ने अल-जजीरा को दिए साक्षात्कार में पहली बार स्वीकार किया कि भारत ने कभी भी दोनों देशों के बीच के मुद्दे में किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने जब अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के समक्ष युद्धविराम का मुद्दा उठाया था, तो उन्होंने कहा था कि भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि पाकिस्तान के साथ सभी मुद्दे पूरी तरह से द्विपक्षीय हैं। नवोदय टाइम्स के पहले पन्ने पर अमेरिका की तीसरी खबर फोन पर बधाई देने की है। इंडियन एक्सप्रेस में यह लीड का शीर्षक है और यहां यह खबर सिंगल कॉलम की है। बधाई की खबर सिंगल कॉलम ही होनी थी, इंडियन एक्सप्रेस ने इसके साथ यह जोड़ दिया है कि ट्रम्प ने फोन तब किया जब व्यापार वार्ता शुरू हो गई। उपशीर्षक वही है जो अमर उजाला में टॉप पर है- रूस-यूक्रेन युद्धविराम पर समर्थन के लिए शुक्रिया : ट्रम्प। नई ऊंचाई पर ले जाएंगे भारत-अमेरिका साझेदारी : मोदी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


