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सुख-दुख

लेखक और संपादक आनंद स्वरूप वर्मा को लेकर एक सुकून भरी खबर है!

आनंद स्वरूप वर्मा

दया शंकर राय-

थोड़ी और बेहतर सुकूनदायी खबर है सभी मित्रों के लिए कि पिछले 16-17 रोज से एम्स में भर्ती लेखक और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा जी आनंद स्वरूप वर्मा जी की सेहत में उल्लेखनीय सुधार है। वे चार -पांच रोज पहले ही वार्ड में शिफ्ट हो गए थे।

कल ही पत्रकार मित्र वीरेंद्र सेंगर जी उनसे मिलने गए थे और अच्छी बात है कि कल की रिपोर्ट में उनका क्रेटनीन लेबल घटकर 3.6 पर आ गया था। आनंद भाई देश-दुनिया की खबरों को लेकर फिक्रमंद हैं खासकर इस्राइल के कारनामों को लेकर..!

अब संक्रमण लगभग खत्म होने की ओर है पर डॉक्टर पूरी तरह मुतमइन होने पर ही उन्हें रिलीज करेंगे। उनकी उम्र को देखते हुए वे कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते और यही ठीक भी है।

चाहते तो हम भी हैं और शुभकामनाएं कि आनंद भाई जल्द से जल्द घर पहुंचे पर खतरे की किसी भी आशंका से बाहर निकल कर ही। और बिलकुल सामान्य होने में शायद अभी चार-पांच रोज और लगे।


दिगंबर-

साथी आनंद स्वरूप वर्मा पहले से काफी बेहतर हैं। आज मिला तो उनका ठहाका तो नहीं, लेकिन निरंतर मुस्कान देखकर ही मन हर्षित हो गया।

वे आईसीयू से वार्ड में आ गए हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वहां उनके प्रशंसकों की रैली हो। साथी, हम कुछ दिन और धीरज रखें, ताकि उनसे उनके साथ कंप्यूटर के सामने वाली मुद्रा में गपास्टिक हो। आज उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।


रवीन्द्र पटवाल-

आनंद स्वरूप वर्मा जी के जीवन को सुनना हाल के वर्षों में कुछ अच्छा पढ़ने सुनने के लिए सबसे अच्छा काम होगा।

इस चार घंटे की बातचीत को आप चाहें तो टुकड़ों में सुन सकते हैं, लेकिन हर साहित्य प्रेमी, व्यवस्था में बदलाव की चाह रखने वाले युवाओं, पत्रकारिता में हाथ पांव मारने की तैयारी कर रहे लोगों सहित दस बीस साल काट चुके लोगों और यहां तक कि पॉलिटिकल एक्टिविस्ट के लिए भी काफ़ी प्रेरणादाई हो सकती है।

इरफान ने अपने जीवन में इतने सारे अनुभवों को बटोर कर हमें और आने वाली पीढ़ी को दे दिया है, उसका मूल्यांकन भी आज तो नहीं लेकिन बाद में होगा।

गोरखपुर में अखबार के संपादक राही जी की संगत के चलते पहले से बेहद कुशाग्र वर्मा जी के जीवन में जो निर्णायक मोड़ आया, उससे लेकर बीबीसी और अमृत प्रभात के लखनऊ संस्करण के संपादन पद के ऑफर को लात मारने वाले आनंद स्वरूप वर्मा की याददाश्त, समकालीन तीसरी दुनिया के अभिनव प्रयोग से IPF जैसे संयुक्त मोर्चे की शुरुआत को साकार करने में भूमिका निभाने जैसे विराट व्यक्तित्व के मालिक बनने के लिए वर्मा जी का जिंदगी में एक अदद सुरक्षित नौकरी से हमेशा भागना कितना काम आया, इसे सुनकर समझा जा सकता है।

संभव है कि इस पॉडकास्ट को सुनकर समकालीन तीसरी दुनिया को एक बार फिर से शुरू करने पर कई लोग विचार करें, या अफ्रीका के किसी देश में विशेषज्ञता हासिल कर कैसे विशिष्ट ज्ञान के स्रोत के तौर पर व्यक्तित्व बन सकता है। कुल मिलाकर आपको काफ़ी कुछ मिलेगा, ये तो पक्का है।

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