आनंद स्वरूप वर्मा-
मित्रों, मुझे आज एम्स में एक महीने हो गए। अगस्त से अब तक चौथी बार इसमें आना हुआ है। बड़े दुर्लभ मामलों में एम्स इतने लंबे समय तक मरीज को अस्पताल में रखता है। इस बीच मैंने अपने प्रकाशक सेतु प्रकाशन के मालिक अमिताभ राय से अनुरोध किया कि वह मुझे कुछ अग्रिम राशि का भुगतान कर दें। उनके लिए मैंने दो-तीन किताबें पहले की हैं और अभी Mass Psychology of Fascim शीर्षक पुस्तक का अनुवाद कर रहा हूं।
पहले अकेले ही कर रहा था लेकिन लगातार देर होने की वजह से प्रकाशक से अनुमति लेकर मैंने इसके कुछ अध्याय प्रमोद मलिक से करवाया।
प्रमोद जी वर्षों तक जनसत्ता कोलकाता संस्करण में कार्यरत थे और अभी विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक चैनलों से होते हुए दिल्ली में news24 में काम कर रहे हैं। पुस्तक का अनुवाद पूरा हो चुका है लेकिन इसको रिवाइज करने का जब समय आया तभी मेरी तबीयत खराब हो गई और मुझे अस्पताल आना पड़ा।
इस पुस्तक का कुल पारिश्रमिक मुझे लगभग ढाई लाख मिलेगा। अभी जब भी मैं पैसे के लिए फोन करता हूं वह या तो फोन उठाते नहीं है और जब उठाते हैं तो यही कहते हैं कि बहुत जल्दी कुछ करुंगा। पिछले वर्ष सितंबर से यही सिलसिला चल रहा है।
इस पोस्ट के माध्यम से मैं अपने और सेतु प्रकाशन के भी शुभचिंतकों से अनुरोध करता हूँ कि वे अमिताभ राय पर दबाव डालें ताकि मेरी समस्या आंशिक तौर पर हल हो सके। यह पोस्ट मुझे बहुत मजबूर हो कर लिखना पड़ा है।
आनंद स्वरुप जी के पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियां भी नीचे पढ़िए…
दयाशंकर राय- जो भी मित्र तीसरी दुनिया की राजनीति , साहित्य और संस्कृति के विशेषज्ञ लेखक और पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा जी को जानते हैं वे उनके कद्दावर, स्वाभिमानी और किसी भी व्यक्ति की मदद के लिए तैयार रहने वाले उनके स्वभाव और व्यक्तित्व से वाकिफ़ हैं। पिछले साल भर से वे किडनी और फेफड़े की गंभीर समस्या को लेकर चार बार एम्स में भर्ती हो चुके हैं और डॉक्टर भी 82 साल की उम्र में उनकी अद्भुत जिजीविषा से चकित हैं जो उनके इलाज में मददगार साबित हो रही है..! पर इस बार एम्स में उनका कुछ ज्यादा लंबा खिंच गया क्योंकि शरीर में पानी भर जाने से पैरों में काफी सूजन आ गई है। जाहिर है इलाज भी आज के वक्त में बहुत खर्चीला है..! लेकिन वर्मा जी जैसा व्यक्ति यह सब किसी से कह नहीं सकता..! इधर वे सेतु प्रकाशन से छपने वाली किताब mass psychology of fascism का अनुवाद कर रहे हैं और अपनी सेहत की स्थिति को देखते हुए उन्होंने सेतु प्रकाशक के संचालक अमिताभ राय से कुछ अग्रिम भुगतान के लिए आग्रह किया पर अमिताभ जी का रवैया टालमटोल वाला है या कई बार फोन नहीं उठता..! जबकि अमिताभ जी जैसे जहीन व्यक्ति से तो यह कतई अपेक्षित है कि वर्मा जी की सेहत को देखते हुए वे आगे बढ़कर उन्हें अग्रिम भुगतान करें..! आनंद भाई का सेहतमंद रहना इस वक्त के देश के हालात को देखते हुए बहुत जरूरी है ताकि वे अपनी सृजनात्मक और नवोन्मेषी बौद्धिक सक्रियता से नई पीढ़ी को रास्ता दिखा सकें. ! उम्मीद की जानी चाहिए कि अमिताभ जी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संवेदनशीलता का परिचय देंगे..! नीचे का यह यह पोस्ट वर्मा जी की वाल से ली गई है जिसे उन्होंने वाकई बहुत मजबूरी में ही लिखा होगा..!
धीरेश सैनी- बहुत अफ़सोस की बात है। सेतु प्रकाशन तो खड़ा ही प्रगतिशील लेखकों के सहयोग से हुआ है। मंगलेश डबराल भी कितना सक्रिय थे! बहुत से स्टूडेंट्स बताते हैं कि यूपी में तो कई लेखक कॉलेजों में इनकी किताबों के कार्यक्रमों में पहुँचते हैं। अब लेखकों की ही ज़िम्मेदारी बनती है कि वे खुलकर स्टैंड लें। यह आपकी न्यायपूर्ण बात का समर्थन ही नहीं, उनकी लेखकीय गरिमा का भी मामला है।
पुष्पराज शांता शास्त्री- आदरणीय आपके स्वास्थ्य के बारे में जानकर अच्छा नहीं लगा।कोई आपस में भी अब किसी के दुःख की बात नहीं करता है।आपको अपने पारिश्रमिक के लिए इस तरह का पोस्ट लिखना पड़ा,यह दुखद है।आपके स्वास्थ्य के मसले पर संपूर्ण प्रगतिशील हिन्दी समाज को एकजुट होना चाहिए।मैं जल्दी ही दिल्ली आकर आपसे मिलता हूँ।सादर अभिवादन।
कात्यायनी- सेतु प्रकाशन समूह का यह व्यवहार निहायत घृणित और निन्दनीय है। दिल्ली के सभी साथियों को मिलकर अमिताभ राय पर दबाव बनाना चाहिए। यह अकल्पनीय है कि वर्मा जी जैसे व्यक्ति के साथ कोई ऐसा व्यवहार करे और वह भी ऐसी परिस्थिति में। अगर अमिताभ राय तत्काल उनके पारिश्रमिक का भुगतान नहीं करते हैं तो सेतु प्रकाशन का सामूहिक बहिष्कार किया जाना चाहिए और उसके दफ्तर पर धरना भी दिया जाना चाहिए।
प्रकाश उपाध्याय- Very painful experience. Exploitation in every field and by various bourgeois class is still prevalent in the society of 21 st. Century. I hope justice will be done to Vermaji by the gentleman in question. May God or Goddess give wisdom to the publisher and do justice to the Writer, who is struggling with his life in the hospital.
ईश मिश्रा- मुझे लगा घर आ गए होंगे। पिछली मुलाकात में आपने बताया था कि 1-2 दिन में डिस्चार्ज कर देंगे। जल्दी ही एम्स में मुलाकात करता हूं। सेतु प्रकाशन के मालिक को तुरंत कुल तय पारिश्रमिक का कम-से-कम 75% भुगतान तुरंत कर देना चाहिए। उनका नंबर शेयर करिए सब लोग फोन कर करके उन पर दबाव बनाएं।
संजय झा- आदरणीय अभिताभ राय से निवेदन है कि आदरणीय आनंद स्वरूप वर्मा जी का जो पारिश्रमिक है उसे जल्द भुगतान करें ताकि इंसानियत जिंदा रह सके। पैसे के अभाव में उनकी इलाज में कोई भी कोताही हुई तो उसकी पूरी जिमेबार्री अमिताभ राय नामक व्यक्ति की होगी। और सेतु प्रकाशन इसके लिए जिम्मेवार होगा। आदरणीय वर्मा जी देश के प्रख्यात संपादक और अनुवादक हैं, वे हम सबके मार्गदर्शक रहे हैं, इसलिए उनके साथ भुगतान की देरी देश के लेखक, पत्रकार, रचनाकारों का अपमान है, जिसे बर्दास्त नही किया जा सकता है।
रंजीत वर्मा- कहने को ये किताबों के प्रकाशक हैं वास्तव में ये किताबों के सौदागर हैं। लेखक का सुख दुःख, जीना मरना इनके लिए कोई मायने नहीं रखता। इन्हें लेखन से प्रेम है अगर वह बिकाऊ है तो लेकिन किसी भी हाल में लेखक से नहीं। इनकी नज़र में लेखक की अहमियत बँधुआ मज़दूर से ज्यादा की नहीं होती जिन्हें वे न्यूनतम मजदूरी देना भी जरूरी समझें! खैर छोड़िए इन बातों को। आप अच्छे लग रहे हैं। अगर यह आज की तस्वीर है तो कहा जा सकता है कि आप स्वस्थ हो रहे हैं। सबसे अच्छी और सुकून देने वाली बात यही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सेतु प्रकाशन को छोड़ा जाए। न्यूनतम मजदूरी लड़ कर लेनी होगी।


