
संजय कुमार सिंह
आज ज्यादातर अखबारों में युद्ध, हमले और भारतीयों को सुरक्षित निकालने तथा वार्ता की कोशिश की खबरों के बीच मैं सिर्फ देसी खबरों की चर्चा करूंगा। इसमें गाय ले जा रहे भोपाल निवासी जुनैद और अरमान को, गाय ले जा रहे हो तो मारोगे ही कहकर पीट-पीट कर मार देने और उसके वायरल वीडियो के संबंध में जुनैद के मृत्यु पूर्व बयान की खबर और मुख्य आरोपी ध्रुव चतुर्वेदी की खबर (इंडियन एक्सप्रेस) शामिल है। इसके अलावा कुछ खबरें ऐसी भी हैं जो विपक्षी पार्टियों को बदनाम करने की वाशिंग मशीन राजनीति के तहत छपी और छपवाई गई लगती हैं। ऐसी खबरों में सतपाल मलिक ने सहायकों के जरिये रिश्वत ली (हिन्दुस्तान टाइम्स), मुवक्किल को सलाह देने के लिए एक वरिष्ठ अधिवक्ता को ईडी का नोटिस और इसका विरोध करने पर नोटिस वापस लेने (द टेलीग्राफ) तथा क्लास रूम घोटाले में मनीष सिसोदिया से एसीबी की पूछताछ (अमर उजाला और द हिन्दू) जैसी खबरें शामिल हैं। आज सबसे दिलचस्प टाइम्स ऑफ इंडिया का पहला पन्ना है। लीड, सेकेंड लीड सभी अखबारों से अलग है। लीड का शीर्षक है, “11 साल में भारत निराशा से आशावाद की ओर गया है : गृहमंत्री”। यह केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया की बातचीत पर आधारित खबर है और अखबार ने बताया है कि यह अंदर के पन्ने पर है।
इस इंटरव्यू में यह उम्मीद जताई गई है कि सरकार को वक्फ मामले में अनुकूल फैसले का पूरा यकीन है क्योंकि कानून पूरी तरह संविधान के अनुकूल है। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि वे न्यायमूर्ति वर्मा से संबंधित विवाद का उपयोग एनजेएसी जैसी संस्था बनाने के लिए एक मौके के रूप में कर रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा को ‘जल्दी ही’ एक नया पार्टी प्रमुख मिलेगा और यकीन जताया कि बिहार, बंगाल और तमिलनाडु चुनावों में जीत मिलेगी। इनमें बिहार विधानसभा का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को पूरा होने वाला है जबकि बंगाल का 10 मई 2026 को और पश्चिम बंगाल का 7 मई 2026 को। जाहिर है, भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह अभी से चुनावी तैयारियों में लग गये हैं। दूसरी ओर, पार्टी का अध्यक्ष नहीं है। कार्यवाहक अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री के वेतन-भत्ते ले रहे है और गृहमंत्री चुनाव प्रचार कर रहे हैं। इसमें अर्ध सैनिक बलों के विमान का उपयोग तो कर ही सकते हैं। आप जानते हैं कि इंदिरा गांधी गांधी का चुनाव किसलिये खारिज हो गया था और तब लगी इमरजेंसी अभी चल रही अघोषित इमरजेंसी से बुरी बताई जाती है। 07 अप्रैल 2025 की जागरण डॉट कॉम की एक खबर के अनुसार, भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कमर कस ली है। गृह मंत्री अमित शाह अप्रैल से बिहार बंगाल और तमिलनाडु में हर महीने दो-दो दिन का चुनावी दौरा करेंगे। 10 अप्रैल को तमिलनाडु से शुरुआत करते हुए वह भाजपा की चुनावी तैयारियों की समीक्षा करेंगे। बिहार में 30 अप्रैल और बंगाल में 14 अप्रैल को उनके दौरे तय हैं। शाह गठबंधन की रणनीति पर भी काम करेंगे।
इंटरव्यू और उसके तथ्यों से अलग यह संयोग या प्रयोग है कि कल के अखबारों में छपी खबर के अनुसार अमित शाह ने कहा है कि, ‘इस देश में जो लोग अंग्रेजी बोलते हैं, उन्हें जल्द ही शर्म आएगी। ऐसे समाज का निर्माण दूर नहीं है। हिंदी समेत ‘भारतीय भाषाओं के भविष्य’ पर कहा, ‘अपना देश, अपनी संस्कृति, अपना इतिहास और अपने धर्म को समझने के लिए कोई भी विदेशी भाषा पर्याप्त नहीं हो सकती। अधूरी विदेशी भाषाओं के जरिए संपूर्ण भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। मैं अच्छी तरह जानता हूं, यह लड़ाई कितनी कठिन है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि भारतीय समाज इसे जीतेगा। एक बार फिर स्वाभिमान के साथ हम अपने देश को अपनी भाषाओं में चलाएंगे और दुनिया का नेतृत्व भी करेंगे।’ मेरे आठ अखबारों में यह खबर कल सिर्फ द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर थी। इसमें इमरान अहमद सिद्दीक ने लिखा था, कई भाषाविदों और शिक्षाविदों ने अमित शाह की इस टिप्पणी को असंवेदनशील कहा और बताया कि यह अज्ञानता के कारण है तथा यह तर्क दिया कि हिन्दी के लिए सरकार का यह कथित अभियान भारत की दीर्घकालिक भाषाई विविधता को खत्म कर देगा। वैसे तो शाह ने सभी भारतीय भाषाओं की बात की और हिन्दी का जिक्र नहीं किया लेकिन भाजपा के आलोचकों का तर्क है कि अंग्रेजी की उपेक्षा से देशवासियों के पास संपर्क भाषा नहीं रह जायेगी और इससे जो खाली जगह पैदा होगी उसे भरने के लिए हिन्दी ही बचेगी। अखबार ने यह भी लिखा था कि उनके मंत्रालय ने समाचार एजेंसी एएनआई से उनके भाषण का वह वीडियो हटवा दिया जो उसने एक्स यानी एक्स (ट्वीटर) पर पोस्ट किया था।
इसके बाद आज अमित शाह का इंटरव्यू टाइम्स ऑफ इंडिया में है और इसकी सूचना को लीड बनाया गया है तो मामला रेखांकित करने लायक है। खासकर इसलिये कि अमित शाह के बयान के लिए उनकी खूब आलोचना हुई है। वैसे भी, अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आयेगी तो अंग्रेजी अखबार को इंटरव्यू (हिन्दी में ही) क्यों देना? दूसरी ओर, राहुल गांधी ने कहा है कि अंग्रेजी सशक्तिकरण करती है, शर्मनाक नहीं है। यह दि एशियन एज का शीर्षक है और पांच कॉलम में छपा है। अखबार ने अपने उपशीर्षक में बताया है, अमित शाह की टिप्पणी पर पलटवार किया कहा आरएसएस-भाजपा नहीं चाहते कि गरीब बच्चे सवाल करें। यह खबर आज देशबन्धु के अलावा किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। यहां शीर्षक है, ‘अंग्रेजी भाषा शर्म नहीं शक्ति : राहुल’। जाहिर है, अमित शाह जो चाहें कह सकते हैं। कहने के बाद उसे छपने लायक नहीं समझा तो हटवा दिया और हटाया भी गया। इस तरह खबर होने के बावजूद खबर नहीं छपी और राहुल गांधी ने कहा कि अंग्रेजी भाषा शर्म नहीं शक्ति है तो वह नहीं छपा जबकि इसका उल्टा होता है यानी राहुल गांधी कुछ कहें और भाजपा उसपर पलटवार करे तो खूब छपता है। यह सब तब जब भाजपा प्रचार पर भारी खर्च करती है। आज देशबन्धु में खबर है कि एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रचार पर 1494 करोड़ रुपये खर्च किये।
अमित शाह के आज के इंटरव्यू के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड बताती है कि जज यशवंत वर्मा के घर पर कैश होने (या देखे जाने) की सूचना सबसे पहले पुलिस प्रमुख ने केंद्रीय गृहमंत्री की दी थी। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट को सूचना दी गई थी। इस खबर का आप चाहे जो मतलब निकालिये मैं ये समझता हूं कि घटना स्थल और सबूतों को सुरक्षित रखने और सील करने की जरूरत इस स्तर पर भी नहीं समझी गई। कायदे से सूचना नीचे से आई होगी और नीचे वालों ने आगे की कार्रवाई के बारे में पूछा ही होगा और नहीं भी पूछा हो तो इतना गंभीर मामला होने के कारण पुलिस प्रमुख और फिर गृहमंत्री के बीच बातचीत में सबूतों को सहेजने, घटना स्थल को सील करने के बारे में चर्चा होनी ही चाहिये थी। फिर भी ऐसा नहीं किया गया तो यह उनका निर्देश हो न हो, उनकी भी लापरवाही है। ऐसे में बिना उचित जांच उस जांच रिपोर्ट पर (जज के खिलाफ) कार्रवाई का कोई मतलब नहीं है जिसमें कहा गया है कि सीधे जोड़ने वाले सबूत नहीं हैं। वह भी तब जब भिन्न मामलों में सीधे जोड़ने वाले सबूतों का संज्ञान नहीं लिया गया है। इसमें यह भी दिलचस्प है कि सरकार निचले स्तर के कर्मचारियों के बनाये 14 मार्च के वीडियो पर 20 जून को कार्रवाई के लिए सोच रही है जबकि 20 जून को ही अखबारों में खबर छपी है कि चुनाव आयोग (यानी सरकार) ने चुनावी वीडियो और तस्वीरों को सुरक्षित रखने के नियमों में बदलाव किया है और अब सीसीटीवी फुटेज केवल 45 दिनों तक ही सुरक्षित रखे जाएंगे।
इस तरह जो वीडियो नियमानुसार जनहित में सरकारी खर्च पर बनाये ही जाते (रहे) हैं वो जरूरत पूरी होने के बाद 45 दिन में नष्ट कर दिये जायेंगे (संभाल कर रखना इतना मुश्किल या गैर जरूरी है) लेकिन जो वीडियो मौके की नजाकत को देखते हुए (एक मामले में स्वीकार किया जा चुका है कि वसूली के लिए बनाये गये थे) किसी पुलिस या दमकल वाले ने वैसे ही बना लिया उसे 45 दिन से ज्यादा सुरक्षित रखा गया है और उसी पर कार्रवाई करने का विचार है। सीसीटीवी के मामले में चुनाव आयोग को मिसयूज का डर है और जहां जज साब ने कहा है कि नकद उनकी जानकारी में नहीं है वहां वीडियो के मिसयूज की संभावना मुद्दा ही नहीं है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह फैसला हाल में हुए दुरुपयोग को देखते हुए लिया गया है। आयोग ने इस बात का उल्लेख किया कि चुनावी चुनाव प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कानून के मुताबिक अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल ‘इंटरनल मैनेजमेंट टूल’ के तौर पर किया जाता है। बता दें कि पहले अलग-अलग तरह कि रिकॉर्डिंग तीन महीने से लेकर एक साल तक सुरक्षित रखे जाते थे।
आइये, अब टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के शीर्षक को भी देख लें। इसके अनुसार 11 साल में भारत निराशा से आशावाद की ओर बढ़ चला है। कहने की जरूरत नहीं है कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने और शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को बुलाये जाने से पहले अगर देश में निराशा का माहौल था तो इसलिए कि देश में भ्रष्टाचार की शिकायत थी, निर्भया मामले से कानून व्यवस्था की स्थिति खराब लग रही थी और यह प्रचारित किया गया था कि स्विस बैंकों में भारी भ्रष्टाचार के पैसे जमा हैं। उन्हें वापस भारत लाया जा सकता है और यह 100-50 दिनों में संभव है तथा इतना है कि हर व्यक्ति को 15 लाख मिलेंगे। जाहिर है इससे निराशा ही होनी थी। अब जब लोगों को पता है कि यह सब झूठ या असत्य है तो आशावाद कैसे है यह अमित शाह से पूछा और बताया जाना चाहिये। पता नहीं वह सब इंटरव्यू में है कि नहीं पर आज ही देशबन्धु में खबर है कि स्विस बैंकों में भारतीयों के 37600 करोड़ जमा हैं। खबर के अनुसार, ग्राहकों के खातों में जमा धन में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
नरेन्द्र मोदी का कहना था कि भारत में अवैध तरीके से कमाये धन स्विस बैंकों में शेल कंपनियों के जरिये जाते हैं और उन्हीं के जरिये वापस भारतीय कंपनियों में निवेश कर दिये जाते हैं। स्विस बैंकों का मामला इससे अलग हो सकता है लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। मुझे यह बताना है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने 2019 तक छह लाख शेल कंपनियां बंद करा दी थीं। 2022 की एक खबर के अनुसार ऐसी कंपनियों की संख्या आठ लाख थी। नवंबर 2024 की एक खबर के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-2020 और वित्त वर्ष 2023-2024 के बीच पूरे भारत में कुल मिलाकर 2,33,566 कंपनियां बंद कर दी गईं। इसके बावजूद स्विस बैंक में भारतीयों का जमा बढ़ा है तो नरेन्द्र मोदी ने 2014 से पहले जो कहा और 11 साल के शासन में जो किया उसपर चर्चा करने की जरूरत है। सिर्फ दावे तो पहली ही नजर में झूठे या असत्य लगते हैं। फिर भी टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को इतनी प्रमुखता दी है। इस तथ्य के बावजूद कि शेल कंपनियां बंद करने और निवेश रोकने के तमाम उपायों और दावों के बावजूद अदाणी के यहां 20,000 करोड़ रुपये के निवेश का अभी तक पता नहीं चला है। इसपर सवाल करने वालों को कितना परेशान किया गया और अदाणी को संरक्षण देने की आरोपी पूर्व सेबी प्रमुख को कैसे बचाया और कैसे क्लीन चिट दिलाई गई – आप जानते हैं। आज की दूसरी खबरों के अनुसार प्रधानमंत्री इन सब चिन्ताओं, तथ्यों और खबरों से दूर व मुक्त चुनाव प्रचार में लगे हैं। बिहार चुनाव से पहले बिहार को छह हजार करोड़ की सौगात की घोषणा हो चुकी है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड के अनुसार नरेन्द्र मोदी ने बिहार में चुनाव की तैयारियों के क्रम में राजद और कांग्रेस को निशाना बनाया है। दि एशियन एज का शीर्षक है, बिहार में गरीबी, जंगल राज के लिए मोदी ने राजद, कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया। उड़ीशा में भाजपा सरकार के एक वर्ष पूर्ण होने पर हां रोड शो कर रहे हैं और सुशासन की स्थापना का वर्षगांठ कहा है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से और द हिन्दू में फोटो के साथ चार कॉलम में छपी बड़ी सी खबर के अनुसार दावा किया है कि उड़ीशा आने के लिए अमेरिका जाने के ट्रम्प के निमंत्रण को ठुका दिया। द टेलीग्राफ ने लिखा है, व्हेन लॉर्ड ट्रम्प्ड डोनाल्ड (जब भगवान जगन्नाथ ने डोनाल्ड ट्रम्प को हरा दिया)। नवोदय टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, मुझे तो महाप्रभु की धरती पर आना था इसलिए ट्रम्प का न्योता ठुकरा दिया।



