श्याम मीरा सिंह-
इस वीडियो का थमनेल देखिए। इससे भी अधिक हास्यास्पद इस वीडियो का कंटेंट है। इस वीडियो में एंकर महिला- अनिरुद्धाचार्य को बार-बार- संत, संत नाम से बोलती है। और पूरी वीडियो में आधा-आधा काटकर कथित संत का पक्ष लेती है। महिला एंकर ने एक भी जगह नहीं बताया कि विवाद- वर्णाश्रम व्यवस्था के सवाल को लेकर हुआ।
अनिरुद्धाचार्य को उस वर्णाश्रम व्यवस्था में महानता नज़र आ रही थी। इसलिए अखिलेश ने कहा कि हम आपकी बात नहीं मानते। इस शुरुआत का जिक्र पूरी वीडियो में कहीं नहीं हैं। वहीं ये एंकर अखिलेश यादव को पूरे पूर्वाग्रह के साथ लानत-मज़ामत करती है।
इसलिए मीडिया में हर वर्ग का व्यक्ति होना चाहिए। जब एक ही वर्ग के लोग मीडिया में होते हैं। साहित्य में होते हैं, संपादक पदों, रिपोर्टरों, एंकरों के पदों पर जब एक ही वर्ग के लोग होते हैं तो वे ऐसे ही नैरेटिव बनाते हैं। दूसरे पक्ष को देखने की नज़र उनमें नहीं होती। या वे इतने चालाक होते हैं कि सिर्फ़ अपने वर्ग के हितों की ही रक्षा करते हैं।
अगर इसी न्यूज़ रूम में अगर अन्य वर्ग के लोग भी होते, तो हेडलाइन कुछ और होती, कंटेंट कुछ और होता, नैरेटिव कुछ और होता। देश के नेरेटिव पर इनका एकतरफ़ा कंट्रोल है। साहित्य में, प्रकाशनों में, किताबों के छपने-छपाने में, टीवी में, अख़बारों में, पैनलों में, मंचों पर। लेफ्ट-राइट, सेंट्रल सब जगह।
किसी भी वर्ग या जाति इकतरफ़ा वर्चस्व वह चाहें यादव हों, ठाकुर हों, जाट हों या ब्राह्मण हों। ये देशविरोधी है। समाजविरोधी है। ये गठबंधन इंसानियत विरोधी है। सभी समाज का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। जमीनों में, दुकानों में, व्यापार में, कॉर्पोरेट में, न्यायपालिका में, जमींदारी में, सब जगह। इस देश को पूरी तरह रिकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है। जमीनों, व्यापार, नौकरियों, न्यायपालिका, मीडिया, कॉर्पोरेट में अब देश के हर वर्ग को जगह मिलनी चाहिए। अन्यथा इस देश में ऐसे ही अन्याय, श्रम चोरी, उत्पीड़न अनवरत चलता रहेगा।



