लगता है पुलिस को अपराधियों की हत्या की छूट दे दी गई है। नागरिकों की शिकायत नहीं सुनना आम है। मीडिया को गुलामी से मुक्ति ही नहीं है। अदालत पर दबाव स्पष्ट है। फिर भी, बांटों और राज करो में विश्वास करने वाली सरकार एकता दिवस मना रही है। असंवेदनशील और निर्दयी सरकार।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे कई अखबारों में ऑडिशन के बहाने बंधक बनाए गए 17 बच्चों को सुरक्षित बचा लिए जाने और आरोपी को ‘ढेर’ कर दिए जाने की खबर है। हिन्दी के दो अखबारों अमर उजाला और देशबन्धु में यह खबर मुठभेड़ की तरह छपी है। अंग्रेजी अखबारों की खबरों से पता चलता है कि मामला पैसों के भुगतान से जुड़ा हो सकता है। इस कारण मुझे यह मामला मुख्य आरोपी और अब मार दिए गए रोहित आर्य के मजबूर होने और दबाव बनाकर पैसे निकलवाने की कोशिश का लगता है। वैसे भी, खबरों के अनुसार उसने कहा था, मैंने आत्महत्या करने की जगह एक प्लान बनाया और कुछ बच्चों को यहां बंधक बनाया (देशबन्धु)। इस घटना की खबर के साथ आज एकता दिवस मनाने की खबर है। जब सरकार मामूली अपराधी को भी जिन्दा पकड़ने पर गंभीर नहीं है, मुठभेड़ और बुलडोजर न्याय आम है, आम आदमी के पास न्याय पाने के साधन नहीं हैं, अक्सर अपराधी सरकार के करीबी होते हैं और वोट चोरी से जीतने की आरोपी सरकार के सत्ता से जाने का कोई समय नहीं है और पांच साल से जेल में बंद धर्म विशेष के आरोपियों की जमानत नहीं होने देने के लिए सरकार एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, आतंकवाद और नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर लगभग मनमानी कर रहे हैं तो मुंबई जैसा अपराध ऐसा नहीं था कि जांच, कार्रवाई और सुधार के सुराग को बचाया नहीं जाता।
वैसे भी, मजबूरी में आत्महत्या के ढेरों मामले हैं। हाल में महाराष्ट्र के सातारा जिले में एक महिला डॉक्टर की आत्महत्या का मामला सामने आया था। राहुल गांधी ने इसे संस्थागत हत्या और इसे सरकार की असंवेदनशीलता का उदाहरण कहा है। दूसरी ओर, कोलकाता में डॉक्टर की हत्या पर हंगामा मचाने वाली सरकार (और उसका विशालकाय गोदी मीडिया) डबल इंजन वाले राज्यों में वैसे ही मामलों पर शांत रहती है। खबर यही है कि महिला की शिकायत नहीं सुनी गई तो वह आत्म हत्या को मजबूर हुई। काम से पैसे न मिलने या भुगतान अटक जाने से आत्महत्या के और भी मामले हैं। पहला चर्चित मामला अर्नब गोस्वामी का ही था। इस मामले में उसकी गिरफ्तारी भी हुई, सुप्रीम कोर्ट ने हफ्ते भर में जमानत दे दी भुगतान का क्या हुआ पता नहीं। हाल में सुधीर चौधरी से भुगतान नहीं मिलने की एक शिकायत सोशल मीडिया में घूम रही थी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास पैसे फंसे होने की शिकायत करने पर दूसरे मामले में फंसा दिए जाने की खबर इंडियन एक्सप्रेस में छपी थी। ज्यादातर मामले परिचितों को ठगने-लूटने के हैं और लगता है कि आरोपी के सरकार के कृपापात्र मालदार होने की उम्मीद में जिन लोगों ने मोटा काम किया वे फंसे। कितनों ने आत्महत्या की, कितने जेल में हैं और कितने जूझ रहे हैं उसका रिकार्ड तो नहीं है पर मामले पर्याप्त हैं। रोहित आर्य का मामला ऐसा ही लगता है और उन लोगों के समझने के लिए है जिन्होंने मंदिर के लिए हिन्दुओं की सरकार चुनी है और कांग्रेस का विरोध करते रहे हैं क्योंकि “वह भ्रष्ट है, वोट बैंक की राजनीति करती है और घुसपैठियों को संरक्षण देती है”। अब साफ हो चुका है कि ये सब चुनावी मुद्दे हैं लेकिन मीडिया अभी अपनी कमाई में फंसा है। जब वास्तव में फंसेगा या जो फंसे वो सच जानते हैं। हालांकि यह अलग मुद्दा है।
मुझे लगता है कि रोहित आर्य का मामला सरकार की नीति स्पष्ट नहीं होने के साथ-साथ भिन्न विभागों में तालमेल नहीं होने और सब कुछ चलताऊ अंदाज में किए जाने का नतीजा है। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत सरकार के रूप में नरेन्द्र मोदी की सरकार बेहद अयोग्य, अक्षम और गैर पेशेवर ढंग से काम करती देखी जा रही है। भविष्य के लिए यह गंभीर संकेत है। आज की खबर का यह शीर्षक सोशल और डिजिटल मीडिया पर कल शाम में पढ़ने के बाद से ही मेरी चिन्ता यह जानने की थी कि 17 बच्चों को ऑडिशन के बहाने अपने पास बुला पाने वाला क्या इतना बड़ा अपराधी था कि उसे जिन्दा नहीं पकड़ा जा सका। अगर था तो समाज में सामान्य ढंग से कैसे रह पा रहा था और बच्चों के अभिभावकों को शंका भी क्यों नहीं हुई। आज लिखना शुरू करने से पहले मैंने सभी अखबारों में इस खबर को ध्यान से, एक से ज्यादा बार पढ़ा है और यह समझने की कोशिश की है कि यह अपराध था भी या नहीं। था तो क्या इतना गंभीर कि अपराधी को मारकर भी बच्चों को छुड़ाया जाए। खास कर तब जब हम अपहृत लोगों को छुड़ाने के लिए न सिर्फ आतंकियों को छोड़ चुके हैं, बाकायदा उनके आकाओं तक पहुंचाने को मजबूर किए जा चुके हैं। फिर भी हाल में उसी आतंकी गिरोह से गलबहियां करते देखे गए और अब एक मामूली अपराधी को मार दिया। उसके घोषित उद्देश्य की भी चिन्ता नहीं की। उसने यह सब क्यों किया होगा इसे जानने-समझने की गुंजाइश ही नहीं रखी।
यह सब तब हुआ जब मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को जिन्दा पकड़ने के बावजूद सरकारी कार्रवाई की प्रशंसा नहीं हुई, पकड़ने वाले को कोई नहीं जानता। सम्मान वगैरह हुआ या नहीं याद नहीं है। लेकिन उसे बिरयानी खिलाने की कहनी गढ़कर तब की सरकार और व्यवस्था का मजाक उड़ाने वाले को भाजपा ने पहले लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया। हार जाने पर राज्य सभा के लिए मनोनीत करके सम्मानित और पुरस्कृत किया गया है। वह भी, कसाब को फांसी दिलाने के नाम पर जो औपचारिकता ही थी। फिर भी इसके लिए उज्जवल निकम को वेतन-भत्ते सब मिले ही होंगे। तब की भारत सरकार ने इस मामले में नियमानुसार कार्रवाई की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा की हकदार बनी। वरना तभी किसी सुरक्षा कर्मी ने मार दिया होता जैसा अक्सर होता है या बाद में मरवा दिया जाता जैसे हिरासत में तमाम नागरिक मरते हैं। हिन्दुओं का भला करने के नाम पर सत्ता में आई अब की हिन्दू सरकार ने एक ऐसे हिन्दू अपराधी को मार दिया (या मारने दिया) जिसने कहा था, मेरी बहुत साधारण और नैतिक मांगें हैं। मेरे कुछ सवाल हैं जिनका जवाब चाहता हूं। मैं कुछ लोगों से बात करना चाहता हूं….।
ऐसे व्यक्ति को बातचीत में उलझाकर बच्चों को छुड़ाना तालिबानियों के कब्जे से विमान यात्रियों को बचाने के मुकाबले बहुत आसान होगा। वहां भी यात्रियों को बचाने की कोशिश की गई थी, आतंकियों को छोड़ने से पहले समय खरीदा गया था और जो कुछ भी हुआ, सोच समझ कर किया गया होगा या ऐसा ही लगता है। इसके मुकाबले कल की कार्रवाई कुछ घंटे में कर दी गई। यहां मुझे पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट की याद आती है जो जिस आरोप में जेल में हैं उसमें उन्हें सजा तब हुई जब उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर सीधे आरोप लगाए। खुद गवाह होने का शपथ पत्र दिया। तेजस्वी (लालू परिवार) के खिलाफ यह मामला तब शुरू हुआ जब वे उपमुख्यमंत्री बन गए। इस उदाहरण से मैं बताना चाहता हूं कि किसी के कहने पर या वैसे भी गलत कार्रवाई करने पर बाद में भी फंसाया जा सकता है। सरकार कमाने का मौका दे तो कमाने नहीं लगना चाहिए बाद में ब्लैकमेल किया जा सकता है या होना पड़ सकता है। इसलिए कोशिश होनी चाहिए कि ऐसा कोई सही काम भी नहीं किया जाए जिसे बाद में गलत साबित किया जा सके। अखबारों की खबरों (अमर उजाला) के अनुसार रोहित आर्य को एक अन्य व्यक्ति की मदद से काबू कर लिया गया। बाद में उसने भागने की कोशिश की और पुलिस की गोली से मारा गया। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार – एक अधिकारी ने कहा उसे सीने में गोली लगी। पड़ोस के अस्पताल पहुंचने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आर्य ने गुरुवार दोपहर बच्चों को कथित तौर पर एक कमरे में बंद कर दिया और वीडियो रिकॉर्ड किया जिसमें कहा, “मैं रोहित आर्य हूं, मुझे कुछ लोगों से बात करनी है।” एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि उसने धमकी दी कि अगर उसे अपनी बात रखने नहीं दिया गया तो वह “सब कुछ जला देगा” और खुद को तथा बच्चों को नुकसान पहुंचाएगा। बाद में पुलिस को एक एअर गन मिली जिससे उसने बच्चों को धमकाया था। उसने कुछ केमिकल भी जमा कर रखे थे। वीडियो में आर्य ने कहा, मेरी कुछ नैतिक और जायज मांगें हैं। मैं कुछ लोगों से बात करना चाहता हूं और उनसे सवाल पूछना चाहता हूं। मुझे जवाब चाहिए।” पुलिस ने बताया कि उसने स्टूडियो की सीढ़ियों और दीवार पर मोशन सेंसर लगाए थे। ये सेंसर एक मोबाइल फोन से जुड़े हुए थे। इस पुलिसिया कहानी को छोड़ भी दें तो लगता नहीं है कि उसके पास गंभीर हथियार थे और परेशान होने के तात्कालिक कारण। वैसे भी, किसी के पास हथियार हैं यह दावा कर देने भर से पुलिस कांपने लगेगी तो काम कब करेगी? पुलिस प्रशिक्षण की पुरानी जरूरत पर इस सरकार ने कुछ नहीं किया है सो अलग। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आर्य को सामाजिक उद्यमी लिखा है। न भी हो तो वह अपराधी नहीं था उसके स्टूडियो में हथियार और बम होने की आशंका नहीं थी, वह बातचीत करना चाहता था और यह भी कहा था कि आत्महत्या करने की बजाय उसने कुछ बच्चों का अपहरण कर लिया है। जाहिर है, वह आत्महत्या के लिए मजबूर लगता है और उसने बच्चों के अपहरण से अपनी समस्या दूर करने की कोशिश की होगी।
देश में जो हालात चल रहे हैं उसमें कोई अपनी समस्या दूर करने के लिए क्या करे? सरकारी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं है, विदेशी चंदे पर रोक से किसी के पास काम करने के लिए पैसे नहीं हैं और पुलिस कार्रवाई नहीं करती है यह कई मामलों से स्पष्ट हो चुका है। ऐसे में पुलिस को संवेदनशील बनाने, हत्या जैसी कार्रवाई मजबूरी में ही करने जैसे आदेश देने की बजाय सरकार भी लाचार और मजबूर लग रही है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पवई पुलिस स्टेशन के सीनियर इंस्पेक्टर जीवन सोनावणे ने बताया कि आर्य महाराष्ट्र के पूर्व शिक्षा मंत्री दीपक वसंत केसरकर से बात करना चाहते थे। आर्य का एक प्रोजेक्ट था। महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग में उसके पैसे फंसे थे और भुगतान लंबित था। इसके लिए उसने विरोध प्रदर्शन भी किया था। केसरकर, शिवसेना के सदस्य हैं, 2022 से 2024 के बीच इस पद पर थे। हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज, द हिन्दू और नवोदय टाइम्स में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


