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मध्य प्रदेश

प्रधानमंत्री पर परोक्ष प्रहार से घबराये मीडिया ने अशोक वाजपेई का भाषण ही ब्लैक आउट कर दिया!

दूसरे दिन रविवार सुबह भास्कर, टाइम्स समेत किसी भी प्रमुख अख़बार ने उनके इवेन्ट को कवर करने की हिम्मत नहीं दिखाई…

पुर्नेंदु शुक्ला-

मौजूदा दौर में असहमति और प्रतिरोध के सबसे ”सशक्त स्वर” प्रखर कवि अशोक वाजपेई ने कल भोपाल में एक कार्यक्रम में मौजूदा दौर में बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा पर चिंता व्यक्त की और कहा कि आज हमारे समाज में हर जगह झूठ का बोलबाला है और धर्म के नाम पर लोगों को एक दूसरे से लड़ाया जा रहा है…उन्होंने इस तनाव पूर्ण स्थिति के लिए जिम्मेदार कट्टरपंथी लोगों, नेताओं और विशेषकर प्रधानमंत्री पर परोक्ष किन्तु जबरदस्त प्रहार किया कि दूसरे दिन रविवार सुबह भास्कर, टाइम्स समेत किसी भी प्रमुख अख़बार ने उनके इवेन्ट को कवर करने की हिम्मत नहीं दिखाई…

उन्होंने जैसा जोरदार वक्तव्य दिया वैसा जबरदस्त हस्तक्षेप अर्से बाद भोपाल के किसी कार्यक्रम में देखने को मिला जिसके लिए यह शहर एक ज़माने में सांस्कृतिक राजधानी माना जाता था…

दीपेंद्र स्मृति व्याख्यानमाला में कला, समय और समाज पर बोलते हुए वाजपेई जी ने कहा- हमारे समाज में इस समय झूठ का बोलबाला है, प्रधानमंत्री पद पर आसीन शीर्ष नेता द्वारा भी बड़े आत्म विश्वास के साथ बार-बार झूठ परोसा जा रहा है…ये बड़े-छोटे नेता समाज में विद्वेष, साम्प्रदायिकता और उन्माद फ़ैलाने को ही अपनी लोकतान्त्रिक उपलब्धि मान रहे हैं और ऐसा मानने में उन्हें कोई शर्म या पश्चाताप नहीं है. वैसे तो धर्म के प्रति यह विद्रूपता व असहिष्णुता दोनों प्रमुख समुदायों में है लेकिन हिन्दी पट्टी के उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्य में तो कोई त्यौहार घ्रणा, वैमनस्य और हिंसा के बिना सम्पन नहीं होते…यह स्थिति बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण है और हम सभी के लिए भर्त्सना योग्य भी है.

उन्होंने इस निराशाजनक माहौल से उबरने के लिए अपने सुधि श्रोताओं से अपना भरसक अवदान देने की विनम्र अपील भी की और इस सन्दर्भ में बड़े आदर से महात्मा गाँधी के तीनों प्रमुख आन्दोलन का जिक्र किया.उनका कहना था कि हममे से प्रत्येक व्यक्ति बापू के सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और असहयोग में से किसी न किसी मार्ग पर चल कर समाज को अपना छोटा ही सहीं पर महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है “अवज्ञा’. इसके लिए जरूरी नहीं कि वो लाठी उठाएं बल्कि हर व्यक्ति जो जहाँ हैं अपनी तरह से लोकतान्त्रिक तरीके से अवज्ञा के अधिकार का प्रभावी उपयोग कर अपना प्रतिरोध तो दर्ज करा ही सकता है.

इसके अलावा दो अन्य प्रसंग में भी उन्होंने गाँधी जी को याद किया और इस उदाहारण के माध्यम से आज के नेताओं के बौनेपन की ओर इशारा किया. हमारे महान नेताओं और स्वतंत्रता सेनानी- महात्मा गाँधी, तिलक, नेहरू, पटेल,राजेन्द्र प्रसाद, अरविंदो, विनोबा भावे किसी ने कभी धर्म की राजनीति नहीं की, धर्म के नाम पर किसी को बरगलाया नहीं, ना ही कभी धार्मिक उन्माद फ़ैलाने का प्रयास नहीं किया साथ ही किसी ने धर्म के विरुद्ध भी कोई कार्य नहीं किया.

ये सभी नेता हिन्दू धर्म के बड़े ज्ञाता जरूर थे. सुविज्ञ गाँधी, तिलक, अरविंदो और बिनोबा ने तो ‘गीता’ पर अच्छी खासी टीका -पुस्तक भी लिखी है.

वाजपेई ने बापू के प्रसंग पर चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी जनता का साथ छोड़ कर सन्यास लेने की बात नहीं की और ना ही हिमालय पर जाकर या किसी गुफ़ा में ध्यान लगाने जैसी नौटंकी करने का विचार नहीं किया.

[यहाँ उनका संकेत स्पष्ट था].

महात्मा अंतिम दिनों तक बिरला भवन में संध्या प्रार्थना सभा में आम लोगों के साथ हमेशा उनके बीच रहने की बात करते थे.

बाजपेई जी ने एक मराठी महिला साहित्यकार की उस टिप्पणी की भी चर्चा की जो उनके द्वारा सार्वजनिक मंच से की गई थी…दरअसल उक्त विदुषी महिला ने प्रधानमंत्री मोदी के खुद को ‘बायोलाजिकल’ बताने वाले बयान पर आपत्ति व्यक्त करते हुए इसे जन्म देने वाली ‘माँ’ का अपमान बताया.

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