अस्तांचल की ओर ‘मुलायम’ समाजवाद!

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले पांच वर्षो में कई बदलाव देखने को मिले। इस दौरान कई दोस्तियों में दरारें पड़ गईं तो कई दुश्मनों को दोस्त बनते भी भी देखा गया। सियासत की चकाचैंध में किसी ने नई पारी शुरू की तो मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को उसी बेटे अखिलेश यादव के चलते हासिये पर भी जाना पड़ गया, जिसे उन्होंने 2012 के विधान सभा चुनाव में न केवल सियासत का पाठ पढाया था,बल्कि अपनी जगह उसी बेटे की सीएम के रूप में ताजपोशी भी करा दी थी।

मुलायम अचानक अखिलेश को राजनीति में लेकर आये और सीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया, ऐसा करते समय उन्हें अपने भाई शिवपाल की जरा भी याद नहीं आई जो स्वंय भी सीएम बनने का सपना देख रहे थे,जिसके वह हकदार भी थे,कौन नहीं जानता है कि अगर समाजवादी पार्टी को बुलंदियों तक पहुंचाने में मुलायम का हाथ था तो शिवपाल भी नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हनुमान की तरह हमेशा चलते रहे थे। संघर्ष के दिनों में शिवपाल ने न जाने कितने किलोमीटर साइकिल दौड़ाई होगी।

तब पार्टी के पास साधनों का अभाव था और जगह-जगह रैली और पार्टी के अन्य कार्यो के लिये शिवपाल को साइकिल से ही दौड़ना पडता था। परंतु शिवपाल ने कभी उफ नहीं की, तब भी नहीं जब अखिलेश ने उन्हें 2017 के विधान सभा चुनाव से पूर्व पूरी तरह से हासिये पर डाल दिया, जिन शिवपाल की चुनाव के समय तमाम प्रत्याशियों को टिकट वितरण में पार्टी के अंदर तूती बोलती थी,उनको भी तब प्रत्याशी बनाया गया,जब अखिलेश को यह लगने लगा कि चचा का टिकट काटने से पार्टी को चुनावी जंग में नुकसान हो सकता है। शिवपाल ही नहीं इससे पहले मुलायम के खास रहे अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा,नरेश अग्रवाल, अरविंद पाल, समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य अशोक बाजपेयी, बुक्कल नबाव, सरोजनी बाजपेयी, यशवंत सिंह आदि तमाम नेता भी अखिलेश से नाराज होकर पार्टी से किनारा कर चुके थे।

लोग भूले नहीं हैं किस तरह से अखिलेश ने नेताजी को अध्यक्ष पद से हटाकर स्वयं अपनी ताजपोशी कर ली थी,जिससे नाराज होकर नेताजी इस कार्यक्रम में ही नहीं शामिल हुए थे। बात 2012 के विधान सभा चुनाव के पहले की है, तभी से समाजवादी पार्टी में खटास पैदा होना शुरू हो गई थी। मुलायम ने जब अपना उत्ताराधिकारी चुनने का मन बनाया तो उस समय पार्टी की कमान को लेकर शिवपाल यादव और अखिलेश यादव दो दावेदार थे। मुलायम ने अखिलेश को राज्य की कमान और प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद शिवपाल को संतुष्ट करने के लिए राज्य का प्रभारी बनाया था। इसे दोनों के बीच शक्ति का बंटवारा माना जा रहा था। शिवपाल की पार्टी में पुराने और नए दोनों समाजवादियों के बीच अच्छी पैठ थी। वहीं, अखिलेश नई टीम पर भरोसा करते हैं।

मुलायम को इन दोनों की जरूरत थी लेकिन, ये एक दूसरे के खिलाफ हो गए। नतीजा यह हुआ कि समाजवादी पार्टी को विधान सभा चुनाव में करारी हार मिली और अखिलेश के कई करीबी नेता तो चुनाव हार गये, लेकिन शिवपाल यादव चुनाव जीतने में सफल रहे। मगर अखिलेश ने चचा को कोई तवज्जो नहीं दी। बात संगठन पर किसकी कितनी पकड़ है इसकी कि जाये तो मुलायम सिंह यादव के समय से ही शिवपाल सिंह यादव की सपा संगठन पर मजबूत पकड़ मानी जाती रही थी। उस समय तो वह कई बड़े फैसले बदलवाने में भी सक्षम माने जाते थे और टिकट बंटवारे से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक में उनकी सुनी जाती थी। बड़े विभागों का मंत्री रहने के दौरान भी उन्होंने अपने लोगों का पूरा ध्यान रखा था। ऐसे में शिवपाल से लाभान्वित होने वाले लोगों की बड़ी संख्या सपा में है और वह कुनबे की कलह शुरू होने के बाद से अलग पार्टी के गठन का दबाव बनाए हुए थे। सपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, एटा, फरुखाबाद जैसे जिलों में तो शिवपाल की गहरी पैठ है ही अन्य जिलों में भी उनके समर्थकों की बड़ी संख्या है। शिवपाल फैंस एसोसिएशन के जरिये उन्होंने युवाओं की बड़ी संख्या भी खुद से जोड़ रखी है। मोर्चा ने अपने पदाधिकारी खड़े किए तो सपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

समाजवादी पार्टी में करीब दो साल से हासिये पर पड़े शिवपाल अपनी सियासत बचाने के लिये हाथ-पैर मार थे, मगर उनके साथ समस्या यह थी कि मुलायम कभी उनके साथ नजर आते तो कभी पुत्र मोह में अखिलेश के साथ खड़े हो जाते। इसी वजह से शिवपाल अलग पार्टी का गठन भी नहीं कर पा रहे थे। मई 2017 में शिवपाल ने अलग पार्टी बनाने का मन बना लिया था,वह इसकी घोषणा करते इससे पहले ही मुलायम ने उन्हें रोक दिया, लेकिन दो साल बाद लोकसभा चुनाव से ठीक पहले शिवपाल ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा गठन की घोषणा कर ही दी। निश्चित ही इससे समाजवादी पार्टी की मुश्किल बढेगी तो बीजेपी की राह आसान हो सकती है।

समाजवादी पार्टी के धुरंधर और माहिर नेताओं में शामिल शिवपाल ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा का गठन ऐसे समय में किया है, जबकि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये सपा-बसपा के बीच गठबंधन की बिसात बिछाई जा रही थी। सपा और बसपा के गठजोड़ की संभावनाएं भले ही प्रबल हैं, लेकिन उसमें भी किंतु, परंतु और असमंजस जैसे शब्द शामिल हैं। शिवपाल ने सेक्युलर मोर्चा के जरिये सपा में हाशिये पर चल रहे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए एक विकल्प तैयार कर दिया है। इससे सपा को प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूप में नुकसान पहुंचना तय है। उन्होंने अन्य छोटे दलों के लिए दरवाजे खोलकर उन्हें भी राजनीतिक सौदेबाजी के लिए ताकत दे दी है जो प्रस्तावित महाठबंधन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करेगा।

मोर्चा के गठन की टाइमिंग पर भी गौर करना जरूरी है। शिवपाल ने यह फैसला तब लिया है जबकि उनके मित्र अमर सिंह बीजेपी के साथ गलबहियां करते नजर आ रहे थे तो शिवपाल भी कई बार सीएम योगी सहित कई बीजेपी नेताओं से दोस्ती बढ़ाते दिख चुके थे। इसी लिये तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इसके पीछे बीजेपी की साजिश बता रहे हैें,लेकिन इससे अखिलेश की परेशानियां कम होने वाली नहीं हैं। शिवपाल ने कह भी दिया है कि वह सपा में उपेक्षित महसूस कर रहे नेताओं कार्यकर्ताओं के सहारे और अन्य छोटे-छोटे दलों को जोड़कर अपनी ताकत बढ़ायेंगे। हालांकि अभी शिवपाल ने यह नहीं बताया है कि उनका मोर्चा चुनाव में उतरेगा या नहीं। न ही शिवपाल ने अपनी विधान सभा की सदस्यता से त्यागपत्र दिया है।

बहरहाल, इस ‘‘जंग’ में पिता मुलायम सिंह यादव (नेताजी) भी बेटे अखिलेश यादव के खिलाफ बताये जा रहे हैं।मगर शिवपाल यादव तो यही कह रहे हैं कि इस मोर्चा को मुलायम का भी समर्थन है। उधर अखिलेश ने शिवपाल के कदम को भाजपा की साजिश और समाजवादी पार्टी का ही भविष्य उज्जवल होने की बात कह चाचा की चुनौती को परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है।

यूं तो शिवपाल और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव में 13 सितम्बर 2016 को शीतयुद्ध शुरू हुआ था। तब अखिलेश यादव सपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हटाये गये तो फिर शिवपाल को अखिलेश ने अपने मंत्रिमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। देखते-देखते चाचा-भतीजे के बीच सियासी जंग इतनी तेज हुई कि उसने समाजवादी पार्टी ही नहीं परिवार को भी चपेट में ले लिया। अखिलेश के साथ उनके बड़े चाचा राम गोपाल यादव खड़े थे तो शिवपाल के साथ मुलायम। समाजवादी परिवार की सियासी रार तब खूब परवान चढ़ी जब अखिलेश ने पहली जनवरी 2017 को पार्टी का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया। इसमें मुलायम को हटा अखिलेश यादव सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये।

इतना ही नहीं, परिवार की रार चुनाव आयोग की दहलीज पर भी पहुंची, मगर वहां भी मुलायम की बजाय अखिलेश को ही जीत मिली और उन्हें समाजवादी पार्टी के साथ ही चुनाव निशान साइकिल भी हासिल हुई। मगर इस जीत के बावजूद यूपी विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी सपा 229 सीटों से मार्च 2017 में 47 सीटों पर सिमट गयी। सपा की इस पराजय ने अखिलेश और शिवपाल के बीच दूरियां और बढ़ा दीं। बीते दो साल में कई मौकों पर चाचा-भतीजे में दूरियां मिटाने की कोशिश हुई। मगर अखिलेश यादव ने बतौर सपा अध्यक्ष चाचा शिवपाल को इस दरम्यान कोई तवज्जो नहीं दी।

बात आगे की कि जाये तो अभी तो शिवपाल ने सेक्युलर मोर्चे को सिर्फ सपा के असंतुष्टों को एक मंच पर लाने के तौर पर ही खड़ा किया है, लेकिन भविष्य में यह मोर्चा राजनीतिक दल बनाकर चुनाव मैदान में आता हैं तो सपा के वोटों में बिखराव का सबब भी बन सकता है। जिसका 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव मे सर्वाधिक लाभ भाजपा को मिल सकता है। हालांकि, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. चंद्रमोहन इस बात से इतिफाक नहीं रखते हैं और अपनी बात को दूसरे तरीके से पेश करते हुए कहते हैं कि शिवपाल के फैसले से एक बात साफ हो गई कि अखिलेश यादव का नेतृत्व जनता ने नकार दिया और अब परिवार भी उन्हें स्वीकार नहीं कर रहा है। अमर सिंह के बाद शिवपाल के कदम से जाहिर है कि अखिलेश यादव अहंकारी हैं और उनमें लड़कपन है।

वहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हरिश्चंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि समाजवादी पार्टी अपना परिवार तो नहीं संभाल पा रही है तो गठबंधन क्या संभालेगी। उधर, भाजपा के प्रति शिवपाल का अक्सर नरम रहने वाला रुख भी चर्चा का विषय बना हुआ है। पिछले दिनों वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले थे और अपने आइएएस दामाद अजय यादव की प्रतिनियुक्ति उत्तर प्रदेश में बढ़ाने का आग्रह किया था। सरकार ने इसका प्रस्ताव केंद्र को भेजने में देरी न की थी। वैसे कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि समाजवादी पार्टी जिस तरह से अस्तित्व में आई थी, उसी तरह से वह इतिहास में समाने जा रही है क्योंकि छल-प्रपंच और धोखे की बुनियाद पर खड़ी कोई ‘इमारत’ मजबूत हो ही नहीं सकती है। इसीलिये तो घर की फूट में मुलायम के समाजवाद का सूरज अस्तांचल की ओर जा रहा है।

अखिलेश जो समाजवाद ला रहे हैं उसमें गरीब-गुरबा कोई फिट नहीं होता है। दबे-कुचलों की बात करने की जगह सत्ता के लिये सियासत की जाती है। समाजवाद संघर्ष से पैदा होता है जिसकी कूबत अखिलेश में नहीं है। अखिलेश बयानबाजी तो अच्छी कर लेते हैं, लेकिन लोहिया, चौधरी चरण सिंह, मधु लिमये, जनेश्वर मिश्र, मुलायम सिंह यादव, शिवपाल आदि पुराने नेताओं की तरह संघर्ष करते हुए कभी नहीं दिखते।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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