अस्तांचल की ओर ‘मुलायम’ समाजवाद!

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले पांच वर्षो में कई बदलाव देखने को मिले। इस दौरान कई दोस्तियों में दरारें पड़ गईं तो कई दुश्मनों को दोस्त बनते भी भी देखा गया। सियासत की चकाचैंध में किसी ने नई पारी शुरू की तो मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को उसी बेटे अखिलेश यादव के चलते हासिये पर भी जाना पड़ गया, जिसे उन्होंने 2012 के विधान सभा चुनाव में न केवल सियासत का पाठ पढाया था,बल्कि अपनी जगह उसी बेटे की सीएम के रूप में ताजपोशी भी करा दी थी।
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अखिलेश यादव को तिहाड़ जेल भेजने की तैयारी!

Dayanand Pandey

तो क्या उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव हरियाणा के पूर्व मुख्य मंत्री ओमप्रकाश चौटाला की दुर्गति प्राप्त करने वाले हैं? खबर है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा की गई नियुक्तियों में अनियमितता की सी बी आई द्वारा की जा रही जांच में सी बी आई लोक सेवा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष अनिल यादव और शिक्षा आयोग के अध्यक्ष अनिरुद्ध यादव के साथ ही अखिलेश यादव से भी पूछताछ की तैयारी सी बी आई ने कर ली है। Continue reading

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दिवाली पर भतीजे से चचा को मिला सियासी अंधेरा!

अजय कुमार, लखनऊ

दीपावली खुशियां बांटने का त्योहार है। हर तरफ खुशियांे का आदान-प्रदान देखा जा सकता है,लेकिन सियासी दुनियां यह सब बातें मायने नहीं रखती हैं। इसी लिये दीपावली के दिन एक भतीजे ने चाचा की जिंदगी में ‘सियासी अंधेरा’ कर दिया। बात समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव की हो रही है। पिछले वर्ष तो भतीजे ने चाचा की दीवाली ‘काली’ की ही थी,इस बार भी ऐसा ही नजारा देखने को जब मिला तो लोग आह भरने को मजबूर हो गये।

कहा यह भी जाने लगा कि खुशिंयों के मौके पर ऐसा दर्द तो गैर भी नहीं देता हैं, जैसा चाचा को भतीजे से मिला है। इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि बार-बार अपमान का घूंट पीकर भी समाजवादी पार्टी के प्रति किसी तरह का दुराव नहीं रखने वाले शिवपाल के लिये अब पार्टी में कोई स्थान नहीं बचा रह गया है। उन्हें अब मुलायम के सहारे के बिना ही अपनी राजनैतिक जंग जीतनी होगी, यह काम वह अलग पार्टी बनाकर या किसी और दल में शामिल होकर कर सकते हैं। अन्यथा शिवपाल की सियासत तारीख के पन्नों में समा जायेगी। शिवपाल खेमा इन दोनों हालातों का आकलन करने में जुटा है।

आगरा में जो सुलह होते दिखाई दे रही थी,उस पर अगर किसी ने पानी डालने का काम किया है तो निश्चित ही इसमें सबसे पहला नाम अखिलेश यादव का ही लिया जायेगा,जिनकी जिद्द संगठन पर भारी पड़ रही है। करीब सवा साल से चली आ रही अखिलेश यादव व उनके चाचा शिवपाल में तल्खी में अभी आगरा सम्मेलन के बाद चचा की हार्दिक बधाई व आशीर्वाद से कम होती दिखी थी। तब अखिलेश ने कहा था कि उनका रिश्ता ऐसा है कि उन्हें आशीर्वाद मिलेगा ही। तब ऐसा लगा था कि परिवार में एका हो जाएगी लेकिन हाल ही में लोहिया की पुण्यतिथि पर दोनों में दूरी साफ दिखी।

लोहिया ट्रस्ट में शिवपाल की मौजूदगी के चलते अखिलेश यादव ने ट्रस्ट में आयोजित पहले से तय कार्यक्रम में जाने से परहेज किया। इस मौके पर अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव के साथ नजर आये और उनके पैर छूकर आशीर्वाद भी लिया। उधर, मुलायम  पहले ही अलग पार्टी न बनाने का ऐलान कर साफ कर चुके हैं कि वह अखिलेश के संग ही हैं। इससे शिवपाल खेमे को झटका लगा। अब तक शिवपाल खेमे को उम्मीद थी कि नेताजी के कहने पर सपा में शिवपाल को सम्मानजनक स्थान मिलेगा, लेकिन कार्यकारिणी में न रखे जाने से साफ हो गया कि दूरियां बरकरार हैं।

शिवपाल यादव ने अपनी अनदेखी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अब अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और वे जैसे चाहें पार्टी को चलाएं.जब शिवपाल से पूछा गया कि नई कार्यकारिणी में उनके लोगों को महत्व नहीं दिया गया है तो उन्होंने कहा, “ अभी बहुत लंबा समय है अपने समर्थकों से बातचीत करके ही कोई फैसला लेंगे। यह और बात थी कि बड़े होने का फजै निभाते हुए उन्होेंने दीपावली के मौके पर भतीजे अखिलेश और प्रदेशवासियों को बधाई जरूर दी। बता दें दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद अखिलेश यादव ने अपनी नई कार्यकारिणी का गठन कर दिया है। इस कार्यकारिणी में न तो शिवपाल को और न ही उनके किसी समर्थक को कोई स्थान मिला है।

समाजवादी पार्टी ने 55 सदस्यों वाली कार्यकारिणी सूची 16 अक्टूबर 2017 को जारी कर दी थी। अखिलेश यादव (44) पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। रामगोपाल यादव को प्रमोट कर चीफ जनरल सेक्रेटरी बनाया गया है। मुलायम सिंह और शिवपाल यादव का नाम लिस्ट में शामिल नहीं है। कार्यकारिणी में प्रमुख महासचिव रामगोपाल के अलावा 9 लोगों को महासचिव की जिम्मेदारी दी गई। इनमें आजम खां, बलराम यादव, सुरेन्द्र नागर, नरेश अग्रवाल, रवि प्रकाश वर्मा, विशंभर प्रसाद, अवधेश प्रसाद समेत अन्य नेताओं के नाम शामिल हैं। वहीं, मुलायम के करीबी संजय सेठ को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। कार्यकारिणी में 37 मेंबर हैं, जबकि जया बच्चन समेत 6 विशेष आमंत्रित मेंबर हैं। सपा संरक्षक के तौर पर मुलायम का नाम लिस्ट में शामिल नहीं करने पर सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा, मुझे इस तरह की किसी पोस्ट की जानकारी नहीं है। हमारी पार्टी के संविधान में ऐसी कोई पोस्ट है भी नहीं। मुझे नहीं पता कि वो (मुलायम) संरक्षक हैं या नहीं। बता दें कि सपा में 4 नवंबर, 1992 को पार्टी बनने के बाद से ही मुलायम प्रेसिडेंट रहे थे।

गौरतलब हो, पिछले साल भी लखनऊ में सपा परिवार के बीच ऐसा नजारा दिखा था। तब अखिलेश सरकार थी। मुलायम परिवार का झगड़े का असर सैफई में दीपावली के त्योहार पर देखा गया था। इस बार की दीवाली पर कुछ इसी तरह के हालात बनते दिख रहे हैं। अखिलेश यादव दीवाली मनाने सैफई पहुंच गए हैं। मुलायम भी दिवाली पर इटावा में रहेंगे। रामगोपाल यादव व मुलायम सिंह यादव सैफई में दिवाली मनाएंगे। शिवपाल भी सैफई में होंगे। अलग-अलग वक्त पर पहुंचने वाले परिवार के यह सदस्य इस बार एक साथ मुलाकात करेंगे या नहीं या यह देखने वाली बात होगीा। पिछली दिवाली पर सैफई में अखिलेश यादव की सिर्फ रामगोपाल यादव से ही मुलाकात हुई थी।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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यूपी से सपा का साफ रहना पिछड़े वर्ग के हित में है! वजह बता रहे वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र

Satyendra PS : यूपी से सपा का सफाया जारी रहना पिछड़े वर्ग के हित में है। पिछड़े वर्ग की एकता के लिए जरूरी है कि अहीरों में 30 साल के सपा के शासन ने जो ठकुरैती भर दी है वो निकल जाए, वो अपने को पिछड़ा वर्ग का समझने लगें। मुलायम सिंह ने जब संघर्ष किया तो उसमें बेनी प्रसाद, आजम खां, मोहन सिंह, जनेश्वर मिश्र जैसे लोग उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। धीरे धीरे करके एक एक नेता को ठिकाने लगाया गया। उसके बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और ब्लाक अध्यक्ष तक यादव यादव हो गया। इतना ही नहीं, हेलीकाप्टर, जहाज, कार से लेकर साइकिल तक यादव हो गया।

ठहरिए जरा, इतना ही नहीं हुआ। 2 साल पहले मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने पूछा कि सपा क्यो हारेगी ? तो उन्हें मैंने कहा था कि हर थाना यादव हो गया है और किसी यादव के खिलाफ एफ आई आर नहीं लिखा जाता। यह मैंने Akhilesh Yadav के ट्विटर हैंडल पर भी कहा था कि आपके समर्थन में प्रतिक्रिया देने वाले सिर्फ यादव क्यो हैं, पता नहीं वह फेसबुक ट्विटर पढ़ते हैं या नहीं, लेकिन इस उम्मीद में लिख दिया था कि शायद किला बचा लें। चलिए यह भी ठीक। लेकिन गांव मोहल्ले तक के दूधिये भी यदुवंशी क्षत्रिय हो गए हैं और वो अन्य पिछड़े वर्ग, दलितों पर हमले बोल रहे हैं ( क्षत्रिय ब्राह्मण के समानांतर खड़े होने की औकात तो हुई नहीं है)। ऐसे में यह जरूरी है कि सपा सत्ता से बाहर रहकर संघर्ष करे और अपने पतन की समीक्षा करे। 

यह एक विचार है, जिसके पक्ष या विपक्ष में प्रतिक्रिया दी जा सकती है।

बिजनेस स्टैंडर्ड दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पी सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

CB Singh सपा ने नव सामंतवाद का नया इतिहास लिखा। हमारा समर्थन इसलिए था कि जो आगे बढ़ रहें है उनका नेतृत्व स्वीकार कर उनका साथ देना चाहिए क्योंकि सामंतवाद के खिलाफ लड़ने में ये कारगर होगा। लेकिन सत्ता मिलते ही नवसामंतवाद का नया इतिहास लिखना शुरु कर दिये।

Satyendra PS यादव सबसे मजबूत कड़ी है ओबीसी की जंजीर का। वो ठाकुर हो गया और उसने खुद को पिछड़े वर्ग से अलग कर लिया।

Piyush Ranjan Yadav अभी सैफई राजवंश के कुँवर साहब के बोल सुनिए वे 2022 में सत्ता पाने का ही दावा ठोंक रहे है और वो भी तब जब सिवाय यादवों के पिछड़ों में कोई जनाधार नहीं बचा रह गया है। उन कामों के उदाहरण देकर बो और उनके चपरकनाती अपनी पीठ ठोंकते है जिन्हें जनता चुनाव में सिरे से खारिज कर चुकी है। हार की हताशा बर्दाश्त नहीं हो रहीं है।

Kanwal Kishor Prajapati आपके विचार से अक्षरसः सहमत।

Dharmendra Rawat Very well explained sir

Vikas Yadav गैर यादवों की बोलती बन्द हो गयी, अब क्यों नही सवाल कर रहे हैं।

Satyendra PS गैर यादव ओबीसी bjp के साथ खुश हैं। उनकी बोलती खुली हुई है। सपा शासन में बोलती बंद थी। कम से कम सपा के रणनीतिकारों को यह समझना चाहिए।

Piyush Ranjan Yadav पिछड़ों और दलित में क्रमशः यादव व जाटव को छोड़कर शेष वर्ग क्रमशः स पा और ब स पा को 2014 में ही छोड़ गया था। 2017 के यूपी विधानसभा के चुनावों ने उसी trend को जारी रखा।

Satyendra PS अभी भी जारी है वो ट्रेंड।

डॉ सुनील पटेल शास्त्री पिछडो को चाहे जितने सूरज दिखाओ, उन्हें अमावस ही पसंद आती है।

Vikas Yadav हारेगी या जीतेगी वो बात अलग है। सचाई आपको भी अच्छी तरह से पता है।

Satyendra PS सच्चाई तो यही है कि ओबीसी बीजेपी के साथ फ़िलहाल खुश हैं।

Vikas Yadav सुनील जी हर व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं। कौन खुद को क्या समझता है उसका व्यक्तिगत मामला है। क्या हिन्दू कुर्मी समाज नहीं बना क्या चुनाव में।

डॉ सुनील पटेल शास्त्री पहली बात जाति व्यक्तिगत मामला नही है।दूसरी बात मैने सब पिछडो पर टिप्पणी की। कुछ सच्चाई आप भी जानते हैं, पर स्वीकार नही कर पा रहे हैं।

Satyendra PS कुर्मी तो लम्बे समय से सपा से खार खाए हैं। उसके अलावा भी जो ओबीसी हैं, सपा से कटे हुए हैं।

Vikas Yadav कटना भी जरूरी है।।सब हिस्सा यादव खा जा रहे है और दलित पिछडो का उत्पीड़न कर तो कटेगा ही ना।।

Satyendra PS लेकिन 10 साल बाद बड़े दुख में रहेंगे। तब तक सपा और ओबीसी के नेतृत्वकर्ता यादव की भी अच्छे से तबीयत हरी हो जाएगी। फिर शायद पिछड़ा वर्ग बने 1989 और 1991 वाला।

Vikas Yadav अब कौन सा समय आएगा वो तो वक्त ही बताएगा फिलहाल रामराज्य मजा लीजिये।।

Piyush Ranjan Yadav एकदम सहमत। यादवी वर्चस्व से पिछड़ों को इकठ्ठा होने की मुहीम को धक्का लगा और वह सब बिखर गए। यादवों में भी कवरियाँ घोषी बाद दवा कर चलाया गया। यादव भी जिंदाबाद करने के लिए था सत्ता कुर्सी सब सैफई राजवंश के पास या उनके पालतुओं के पास बनी रही जो सवाल न पूछ सकें।

Vikas Yadav 1989 और 1991 का पिछड़ा वर्ग का सपना छोड़ दीजिये।।जो है उसी को बचा ले वही बहुत है।।

Satyendra PS Piyush Ranjan Yadav ji हमको तो कांग्रेस का चांस लग रहा है कि वो अगर बढ़िया से ओबीसी खेल गई तो अच्छा रिकवर करेगी। राजस्थान मध्य प्रदेश में तो गुज्जर कुर्मी खेल ही रही है। यूपी में भी बाबा लोग योगी जी से भरे बैठे हैं, ओबीसी को भी अगर ठीक रणनीति बनाई तो खींच लेगी।

Piyush Ranjan Yadav सर गुजरात के चुनाव परिणाम के बाद कुछ कह पाना सम्भव हो पायेगा।

Satyendra PS हां, गुजरात अहम है। उसका असर राजस्थान एम पी पर भी पड़ सकता है। यूपी में तो अभी जमीन में धंसे हैं।

Surendra Pratap Singh कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसका बुरा दौर न आया हो आज अगर सपा और बसपा जैसे दल बुरे दौर में दिख रहे हैं तो उन्हें इसे आत्म चिंतन के लिए प्रयोग में लेना चाहिए | इन दलों में जरूर ऐसा कुछ बुरा हो रहा है जिसे रोका जाना अत्यंत आवश्यक है |

Pradeep Yadav बहुत सटीक…इन्हें sc bc और अल्पसंख्यक की लड़ाई लड़नी थी या खुद क्षत्रिय बनने चल पड़े

Dhananjai Yadav Gair yadav..ke naam par ..sarkar bani….aur bante hi..aukat bata di bjp..ne sabki…..ab koi nahi pucha ki thane me kitne ..thakur ..jile me kitne ..thakur ..sp dm hai……puchne ki himmat hai.kya….mansik ghulamo ki…

Satyendra PS हाँ। यह वैसे ओपन सेक्रेट है। यूपी के चुनाव के बारे में मेरा अंदाजा यही था कि सपा 2 नम्बर पर रहेगी बसपा और बीजेपी में मुकाबला है कि कौन पहले और कौन तीसरे पर रहेगा। ओबीसी वोट छोड़कर मायवती मुसलमान वोट की ओर भागीं और गच्चा खा गईं। ऐसा कि दलित भी उनके हाथ से निकल गया।

Raghubir Singh Apka vishlezhan sabi hai yadav kaise kdhstriya ho jayrnge jab vizhvamitta kdhsttiiya she Brahman nAhin ho paya

Satyendra PS अभी तो 5 साल यही जश्न चलेगा कि अहीर साफ हुए। उसके बाद अहीर भी औकात में आएंगे कि वो ओबीसी हैं।
फिर सत्ता में आ सकते हैं।

Dhananjai Yadav Ahir satta me rahe ..na rahe..lekin koi saaf nahi kar..payega…Satyendra PS ..sir..

Deepak Pandey सपा के लिए मुझे व्यक्तिगत तौर पर अखिलेश की बजाय शिवपाल ज्यादा उपयुक्त लगते हैं।

Alok Mall समसामायिक विश्लेषण

Satyendra PS यह गफलत निकलनी जरूरी है धनन्जय भाई, तभी लोगों को औकात समझ मै आएगा कि 30 साल में मुलायम ने क्या दिया है। 30 साल पहले जो अंडा थे और अब राष्ट्रवादी बच्चा बनकर उभरे हैं उन्हें दुनिया देखना जरूरी है।

Dhananjai Yadav Aapki baat bahut hud tak sahi..hai…tabhi bhugat bhi ..rahe..hai…..sapa ko…agar ..badhana hai..satta me aana hai…to..obc ko apne sath ..jodna hi hoga……warna result samne hai….

Satyendra PS Deepak Pandey यही तो प्राब्लम है। मुलायम तक ठीक था। जैसे जैसे सपा शिवपाल, रामगोपाल, अखिलेश , धर्मेंद्र, और पता नही कौन कौन होती गई, उसकी दिक्कत बढ़ गई। मुलायम के बाद शिवपाल ही क्यों ? आजम खां या बेनी प्रसाद या गायत्री प्रजापति क्यो नहीं?

Pradeep Yadav नेता सपा को यादवमय होने से बचाये रहे….समस्त obc जातियां 2012 में नेता के आश्वासन पर साथ आने को तैयार हुईं….नेताजी के किनारे लगते ही सपा को यादवमय कर दिया गया और इसका प्रोपगेंडा वास्तविकता से भी अधिक हुआ लिहाजा मंडल राजनीति पूरे देश में चारो खाने चित हुयी

Deepak Pandey बहुत सही सवाल किया है आपने। अन्य परिवार के लोगों और मौजूदा नामों को छोड़ दूं तो शिवपाल उनमें सबसे बेहतर हैं। उन्हें केवल परिवार की वजह से तौला नहीं जा सकता। ग्राउंड पर उनकी दूसरो की अपेक्षा बेहतर पकड़ है।

Veer Bhadra Pratap Singh मुझे ऐसा लगता हैं कि यादव हमेशा गलत के खिलाफ खडा़ हो जाता है इसलिए ज्यादा बदनाम हैं….

Satyendra PS Pradeep Yadav भाई विपक्ष तो लाभ उठाने के लिए बैठा ही रहता है। खासकर ऐसी स्थिति में, जब मानसिक, राजनीतिक, बौद्धिक रूप से कमजोर वर्ग वोटर हो। कम से कम नेतृत्व के लेवल पर अगर ओबीसी की एकता होती तो नीचे भी कुछ असर पड़ता।…See more

Pradeep Yadav ठीक कह रहे हैं भैया

Kamal Sharma यादव कुल की ठकुराई निकलने पर ही अक्‍ल आएगी क्‍योंकि इस समय अक्‍ल नहीं भैंस बड़ी है इनके लिए।

Satyendra PS भैंस तो हमेशा बड़ी रहेगी। चाहे जो सत्ता में आए

Sunil Rawat ठीक कह रहे हैं सर सपा और बसपा की सोच हो गई थी कि बाकी सब कहां जायेगा ।

Nikesh Singh वो भी समाजवादी पार्टी करने लगे थे जिन्हें समाजवाद तक का मतलब मालूम नहीं

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पुत्रमोह में फंसे मुलायम अंतत: अखिलेश के ही हुए!

अजय कुमार, लखनऊ

आगरा में समाजवादी पार्टी का अधिवेशन अखिलेश यादव को नई उर्जा दे गया। वह न केवल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये बल्कि उन्हें पिता मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद भी मिल गया जिन्होंने ऐन वक्त पर अलग राजनैतिक दल बनाने का अपना इरादा बदल दिया। सूत्र बताते हैं कि जब आगरा में सपा को अधिवेशन हो रहा था, उसी समय लखनऊ में मुलायम के नेतृत्व में नई पार्टी बनाने की नींव एक तरह से रख ली गई थी, जिसकी रूपरेखा 25 सितंबर को तय कर ली गई थी, लेकिन अखिलेश की चतुराई से ऐसा हो नहीं सका। अन्यथा अखिलेश के लिये बड़ी मुश्किल खडी हो जाती।

खैर, इसके पीछे तमाम किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन नेताजी के नई पार्टी बनाने से कदम पीछे खींचने की सबसे बड़ी वजह एक बार नेताजी का पुत्र मोह ही रहा। मुलायम को करीब से जानने वालों को पता है कि नेताजी कहें कुछ भी लेकिन दुनिया में वह अखिलेश से अघिक किसी को प्यार नहीं करते हैं। किसी रिश्ते को तवज्जो नहीं देते हैं। वह अखिलेश को फलता-फूलता देखना चाहते हैं। इसके लिये हर जतन करते हैं। बस, फर्क इतना भर है कि अखिलेश अपने बनाये रास्ते पर चलना चाहते हैं जबकि पिता मुलायम चाहते हैं कि बेटा उसी मार्ग पर आगे बढ़े जिस मार्ग को उन्होंने वर्षो की ‘तपस्या’ के बाद तैयार किया है। नेताजी का पुत्र मोह ही था जो उनका पर्यावरण इंजीनियर बेटा अखिलेश सियासत के मैदान में कूदा। नेताजी ने पहले बेटे को सांसद बनाया, फिर उसकी पत्नी डिपंल यादव को लोकसभा में भेजा। नेताजी के करीबी बताते हैं कि वह दिन में कई बार अखिलेश से फोन पर बात करते थे, अगर एक बार भी अखिलेश फोन नहीं उठाते तो वह बेचैन हो जाते थे। यह सिलसिला लगातार चलाता रहा। पुत्र मोह में ही मुलायम ने परिवार के विरोध की परवाह न करते हुए अखिलेश को सीएम की कुर्सी तक सौपी थी,जबकि वह चाहते तो स्वयं या फिर शिवपाल यादव को जो अपने आप को सीएम पद का प्रबल दावेदार समझ रहे थे, को यह मौका दे सकते थे। अखिलेश को सीएम बनाये जाने से शिवपाल की नाराजगी किसी से छिपी नहीं रह पाई थी। अखिलेश ने सीएम की कुर्सी संभालते ही प्रदेश के विकास को अपना सियासी हथियार बना लिया।

मुलायम पुत्रमोह में फंसे रहे तो अखिलेश ने भी एक आज्ञाकारी बेटे की भूमिका निभाने में कभी कोताही नहीं की। 2012 में विधान सभा चुनाव जीतने के बाद नेताजी की मर्जी के अनुसार अखिलेश ने मंत्रिपरिषद का गठन किया। इस वजह से अखिलेश के कई करीबी नेता जो मंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, नाराज भी हो गये थे। नेताजी की खास आईएएस अनीता सिंह को प्रमुख सचिव बनाया, जिनको पांच साल तक नहीं हटाया। अखिलेश को पता था कि मुलायम अपने सभी काम अनीता सिंह के माध्यम से ही कराते हैं,लेकिन सीएम रहते अखिलेश ने कभी इस इसमें दखलंदाजी नहीं की। मुलायम ही नहीं, चचा शिवपाल यादव भी अखिलेश राज में अपने आप को सुपर सीएम समझते थे। वह सभी विभागों में सीधा दखल देते थे। मुलायम सिंह शिवपाल यादव और आजम खान का  ही नहीं प्रमुख सचिव अनीता सिंह का भी अखिलेश राज में सिक्का चलता था। इसी लिये विपक्ष हमेशा साढ़े चार मुख्यमंत्री की बात कहता रहता था। यह सब 2014 लोकसभा चुनाव तक तो चलता रहा, परंतु जब आम चुनाव के नतीजे आये और समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई तो नेताजी से लेकर शिवपाल यादव तक ने हार का ठीकरा अखिलेश के सिर फोड़ दिया। अखिलेश ने तेवर बदल लिये। वह फ्रंट मोर्चे पर आ गये। उन्होंने सबसे साथ-साथ नेताजी की भी सुनना बंद कर दिया।

अखिलेश जिद्दी बचपन से ही थे। मगर बचपन की बात और होती है। सीएम की कुर्सी पर रहकर जिद्द कराना उनको भारी पड़ने लगा बाप-चचा के इगो को ठेस लगी तो कुछ लोग घर के झगड़े की आग में घी डालने का काम करने लगे। इसमें अमर सिंह से लेकर मां साधना सिंह, शिवपाल यादव, प्रो0 रामगोपाल यादव सहित तमाम नाम उछले। इसके बाद क्या हुआ, किसी से छिपा नहीं है। अखिलेश ने अपना घर बदला तो मां साधना से मनमुटाव की खबरें आने लगी। जिद्दी अखिलेश ने उन चचा को भी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जिनकी गोद में बैठकर वह कभी खेला करते थे। अखिलेश, बाप के आदेश की नाफरमानी नहीं कर सकते थे, इसलिये उन्होंने पिता मुलायम सिंह यादव से सियासी दूरी बना ली। वह सरकारी फैसलों पर उनसे राय-मशविरा करने में कतराने लगे। इस वजह से पिता-पुत्र के बीच दूरियां बढ़ती हीं गईं। समाजवादी पार्टी के नेता भी नहीं समझ पा रहे थे कि वह किसी ओर जायें। इसका अंजाम यह हुआ कि अखिलेश ने बगावत कर दी और लखनऊ में सपा को राष्ट्रीय अधिवेशन बुला कर अपने आप को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करके नेताजी को संरक्षक बना दिया। चचा शिवपाल यादव को सरकार के बाद संगठन से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

तब लगा कि पूरे ड्रामें का पटाक्षेप हो चुका है। मगर नेताजी ने हार नहीं मानी। उन्हें बेनी प्रसाद वर्मा, भगवती सिंह, रेवती रमण जैसे नेताओं के अलावा भाई शिवपाल का साथ मिला हुआ था तो तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय और आजम खान जैसे नेता दोंनो तरफ मेलजोल बढ़ाये हुए थे। सबसे अधिक हिचकोेले शिवपाल यादव की सियासत मार रही थी। अखिलेश ने उन्हें किनारे कर दिया था और मुलायम सिंह भाई के साथ होते हुए भी पुत्र मोह से उबर नहीं पा रहे थे। इसी के चलते कई बार शिवपाल की फजीहत भी हुई। शिवपाल लगातार इस प्रयास में थे कि नेताजी के साथ मिलकर नया सेक्युलर मोर्चा बना कर अखिलेश को चुनौती दी जाये। आगरा अधिवेशन से पहले इसकी रूप रेखा भी बन गई थी,लेकिन ऐन वक्त पर पिता मुलायम से बात करके अखिलेश ने डेमेज कंट्रोल कर लिया। वह पिताश्री को आगरा अधिवेशन का निमंत्रण देने गये तो बाप-बेटे के बीच की दूरियां काफी कम हो गईं।

सूत्र बताते हैं मुलायम जो शुरू से अखिलेश को सियासत में एडजेस्ट करने में लगे थे उनके सामने अखिलेश ने अपने दिल की बात खुलकर रखी और कहा मैं तो 2000 में इजीनियर बनने के बाद नौकरी करना चाहता था, लेकिन आपने मुझे सांसद बना दिया। मुझे ही नहीं डिंपल को भी लोकसभा भेज दिया। मु.ख्यमंत्री की कुर्सी भी मैंने नहीं मांगी थी,आप चाहते तो स्वयं सीएम बन सकते थे या फिर किसी और अथवा चचाा शिवपाल को यह जिम्मेदारी सौंप सकते थे,परंतु आपने ऐसा नहीं किया। अब मेरे पास सियासत करने के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं बचा है। न मैं नौकरी कर सकता हॅू न ही कोई व्यवसाय। अखिलेश ने कहा, आपने मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी तो मैं पार्टी को मजबूती देने के लिये प्रदेश के विकास में लग गयां। आपनंे कई बार सार्वजनिक मंचों से हमारी क्लास ली मैंने कभी मुंह नहीं खोला। दीपक सिंघल को न चाहते हुए भी चचा के कहने पर मैंने मुख्य सचिव बनाया,जिसकी चर्चा अब जरूरी नहीं है। वह बोले एक्सप्रेस वे बनाने की बात आई तब भी आप नाराज हो गये कि इतना बढ़ा प्रोजेक्ट कैसे पूरा होगा। मैंने यह समय से पहले कर दिखाया।

अखिलेश ने अपना पक्ष रखा तो इस बात पर आश्चर्य भी जताया कि आप ही अपने फैसलों से पलटले रहे। पहले बिहार में गठबंधन किया, फिर तोड़ दिया। हम बीजेपी और मोदी का विरोध कर रहे थे, आप उनके करीब जाते दिखते रहे। कभी घर के शादी समारोह में बुलाया तो कभी उनके कान में फुसफुसा कर बात की, जिसका जबाव हमें देना पड़ता। कांग्रेस से गठबंधन पर मुलायम सवाल उठाते रहे हैं, इस पर अखिलेश ने कहा गठबंधन में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता है। आपने भी तो 1993 में बीएसपी के साथ गठबंधन किया था जिसके उस समय मात्र 11 विधायक थे। अखिलेश ने कहा सार्वजनिक मंच से गलत बयानी से हमारे वोटरों के बीच भी गलत मैसेज जा रहा था। ऐसे ही तमाम मुद्दों पर जब पिता-पुत्र के बीच गलत फहमियां दूर हुई ंतो मुलायम ने यह मान लिया कि उनका बाकी का जीवन तो बैठ कर भी कट सकता है,लेकिन बेटे को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता है। इसी के बाद नेताजी ने आगरा न पहुंच कर भी अखिलेश को बधाई दी,जिसका अच्छा मैसेज गया। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि शिवपाल भी मान गये हैं कि अखिलेश को किराने करके समाजवादी राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। लगता है इस प्रकार से समाजवादी पार्टी के ड्रामें का पटाक्षेप हो गया है। पुत्रमोह में फंसे पिता मुलायम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनके लिये अखिलेश के जैसा कोई नहीं है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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प्रिंसिपल ने थप्पड़ मारने के बाद अखिलेश यादव को एक सप्ताह तक बनाया था मुर्गा!

आगरा : समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन गुरुवार को आगरा में संपन्न हुआ। अखिलेश को 5 साल के लिए पार्टी का निर्विरोध नेशनल प्रेस‍िडेंट चुना गया। समापन भाषण में उन्होंने बचपन से जुड़ा एक क‍िस्सा भी सुनाया। गलती किसी और की, थप्पड़ पड़ा अखिलेश को। अखिलेश ने कहा कि मेरा बचपन यहीं बीता है। यहीं पास में मिलिट्री स्कूल में पढ़ाई करता था। हमारे प्रिंसिपल कर्नल एसके शर्मा बहुत सख्त थे।

एक बार खाने की मेस में एक थाली एक्स्ट्रा लग गई थी ज‍िसे हमारे सीनियर साथी खा ल‍िए। सभी ने कहा जब सर पूछेंगे तो कह देंगे सबने मिलकर इस थाली का खाना खा लिया। उसी समय प्रिंसिपल साहब का इंस्पेक्शन हुआ। उनके पूछते ही मेरे मुंह से निकला गया कि मैंने खा लिया। इस पर उन्होंने मेरे गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। इतना ही नहीं एक सप्ताह ऑफिस के बाहर मुर्गा बने रहने की सजा भी दी। मैंने सप्ताह भर सजा झेली।

कुछ समय बाद सीनियर साथियों ने प्रिंसिपल को बताया कि‍ थाली किसी और ने खाई थी आपने सजा इसे दे दी। प्रिंसिपल ने मुझ पर खुश होते हुए बधाई दी। प्रिंस‍िपल ने कहा जो दूसरों की सजा खुद झेल लें ऐसे युवा आज कल नहीं मिलते हैं। बता दें अखिलेश यादव उस समय धौलपुर मिलिट्री स्कूल में पढ़ाई करते थे। अखिलेश के इस किस्से पर कार्यकर्ताओं ने जमकर तालियां बजाईं।

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पूर्व आईएएस ने गोरखपुर त्रासदी का ‘अखिलेश यादव’ कनेक्शन बताया

Surya Pratap Singh : गोरखपुर त्रासदी का ‘अखिलेश यादव’ कनेक्शन… अब यह साफ़ हो गया है कि ‘ऑक्सिजन’ की कमी से 48 घंटे में 30 मासूमों की मृत्यु हुई…. यह भी सही है कि दुःख की घड़ी में सरकार के किसी भी प्रतिनिधि को बिना जाँच पूर्ण हुए ‘अधिकारियों’ के बहकाबे पर यह नहीं कहना चाहिए था कि बच्चों की मौत ऑक्सिजन की कमी से नहीं हुई.. इस बयानों ने पीड़ित परिवारों का अवसाद को कम नहीं, अपितु और बढ़ा दिया। साथ ही इस ‘बालसंहार’ के तीन खलनायक- प्राचार्य आर. के. मिश्रा / उनकी पत्नी, डॉ. कफ़ील खान व ऑक्सिजन सप्लाई कर्ता पुष्पा सेल्स के मालिक मनीष भंडारी है, यह भी लगभग स्पष्ट हो चुका है।

अब जानिए इन तीनों खलनायकों का ‘अखिलेश यादव’ कनेक्शन। डॉ. आर. के. मिश्रा की प्राचार्य पद पर नियुक्ति/ प्रोन्नति व डॉ. कफ़ील खान की नियुक्ति वर्ष 2015 में आज़म ख़ान की सिफ़ारिश पर अखिलेश यादव ने ही की थी। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफ़ील खान की पत्नी एक दाँतो की डॉक्टर है और चलाती है ‘बच्चों का नर्सिंग होम’…. वस्तुतः बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफ़ील ही नियम विरुद्ध इस नर्सिंग होम को भी संचालित करता है और इसमें BRD अस्पताल से चोरी गया वेंटिलेटर भी लगा रखा है। कफ़ील खान सरकारी अस्पताल को अपने नर्सिंग होम में मरीज़ पहुँचाने का प्लेटफ़ॉर्म के रूप में इस्तेमाल करता था। डॉक्टर आर. के. मिश्रा प्राचार्य व डॉक्टर कफ़ील खान की दुरभि संधि थी……दोनों मिलकर सभी ख़रीदारी करते थे।

अब बताता हूँ कि पुष्पा सेल्स के मालिक कौन हैं ..उत्तराखंड निवासी मनीष सिंह भंडारी पुत्र श्री चंद्रशेखर सिंह भंडारी, अखिलेश यादव की पत्नी के रिश्तेदार हैं और मज़े की बात है कि यह फ़र्म BRD अस्पताल के साथ-२ प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेज व अस्पतालों में ‘लिक्विड ऑक्सिजन’ अपने एकाधिकार के साथ सप्लाई करती है, जब कि इस फ़र्म की कोई मैन्युफ़ैक्चरिंग सुविधा/फ़ैक्टरी नहीं है…. ये एक ट्रेडर/दलाल है जो अन्य मैन्युफ़ैक्चरिंग कम्पनीयों से ख़रीद कर लिक्विड ऑक्सिजन सप्लाई करती है। सरकार यदि सीधे ऑक्सिजन बनाने वाली कम्पनी से लिक्विड ऑक्सिजन ले तो खाफ़ी सस्ती पड़ेगी …. लेकिन ऐसा केवल कमिशन के चक्कर में नहीं किया जाता है। यह भी बता दूँ कि पुष्पा सेल्स के जिस लम्बित भुगतान को समय से न देने की बात की जा रही है। यह भुगतान भी पिछले साल ‘अखिलेश यादव’ के कार्यकाल का है।

प्रदेश में सरकारी अस्पतालों व मेडिकल कालेजों की ख़स्ता हालत जे लिए ‘अखिलेश यादव’ व ‘मायावती’ भी बराबर के ज़िम्मेदार हैं… यद्यपि अब इनको ठीक करने के ज़िम्मेदारी से वर्तमान सरकार बच नहीं सकती। अखिलेश सरकार में भी प्रत्येक वर्ष अगस्त माह में encephalitis से ४००-५०० बच्चों की मृत्यु होती रही है अतः अखिलेश यादव यदि आज बड़ी-२ बातें करे, तो इसे अपने निक्कमेपन को छुपाना व बेशर्मी ही कही जाएगी।

CM योगी कर्मशील हैं अतः पूर्व वर्षों के हालत के क्रम में स्वमँ BRD मेडिकल कॉलेज दिनांक ९ अगस्त, २०१७ को गए थे, लेकिन शासन/प्रशासन के अधिकारियों ने सही बात उनके सामने नहीं रखी कि ऑक्सिजन की कमी है या पैसा चाहिये… मुख्यमंत्री का स्वमँ अस्पताल जाकर समीक्षा करना दर्शाता है कि वे encephalitis से होने वाली सम्भावित बाल मौतों को रोकने के प्रति गम्भीर थे जबकि अखिलेश यादव अपने कार्यकाल में कभी इस अस्पताल में encephalitis के बचाव के लिए समीक्षा करने नहीं पहुँचे…. इनके पाँच वर्ष के कार्यकल में encephalitis से लगभग ५,००० बच्चों की मौत हुई थी।

मुझे लगता है कि स्थानीय व शासन में बैठे अधिकारियों की लापरवाही व मंत्रियों की असंवेदनशील बयानबाज़ी ने सरकार की किरकिरी करायी…. और कर्मयोगी CM योगी के लिए असमंजसता/ Embarrassment की स्थिति पैदा कर दिया। मैं CM योगी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, केवल अपना independent मत व्यक्त कर रहा हूँ…. बाक़ी आप जो समझें। अतः पूर्व CM अखिलेश यादव द्वारा अब कुछ अनाप-सनाप कहने और दोषारोपण करने से पूर्व अपने गरेबान में झाँकने की अधिक ज़रूरत है। इस प्रदेश के बीमार ‘चिकित्सा’ व्यवस्था के लिए अखिलेश यादव ही ज़्यादा दोषी है और ऊपर लिखित 3 खलनायकों की ‘तिगड़ी’ का भी सीधा सम्बन्ध अखिलेश यादव से है। जय हिंद-जय भारत !!

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव से मुलाकात के लिए वरिष्ठ पत्रकार ने फोन किया तो उधर से सोनू भैया बोले- ‘एक हफ्ते बाद आओ!’

Shambhu Nath Shukla : एक बार नेता जी (मुलायमसिंह यादव) कहीं जा रहे थे गेट से उनकी गाड़ी निकली कि दो पत्रकार लपक कर उनकी गाड़ी के सामने आ गए और बोले- नेताजी आपसे बात करनी है. नेता जी गाड़ी से उतरे और कहा- ‘अंदर चलौ, कपिल सिब्बल ते मिलन जात ते, अब नहीं जात, तुमहीं से बात करे लेत हैं’. पत्रकार नेता जी की बात से शरमा गए, बोले- नहीं नेता जी आप जाओ. पर नेता जी ने कहा नहीं अब हम नहीं जात. यह नेता जी की अदा थी जो सबको उनका मुरीद बनाती थी.

अब उनके सुपुत्र माननीय अखिलेश यादव से कल मिलना चाहता था लेकिन उनके सलाहकार ‘सोनू भैया’ ने फोन पर ही कहा- ”एक हफ्ते बाद आओ”. और हां, स्वयं अखिलेश यादव साहेब ने अपना फोन तक नहीं उठाया. मुझे उनसे कोई काम नहीं था. बस शिष्टाचार के नाते मिलना चाहता था. क्योंकि मेरी भी एक अदा है कि मैं कभी रूलिंग पार्टी के नेता से नहीं मिलता. लेकिन भई, अखिलेश के तो घर पर भी जाना असंभव. ऐसा आवास बना है कि चिड़िया भी पर न मार सके. मगर नेता जी दूर से ही पुकार लेते थे.

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कालिदास मार्ग के सारे अवरोध हटवा दिए हैं और उनके बंगले के सामने हजारों फरियादी अपनी अर्जी लिए खड़े थे. औद्योगिक विकास प्राधिकरण मंत्री श्री सतीश महाना भी कालिदास मार्ग पर रहते हैं, वे तपाक से मिले और बाहर तक छोड़ने आए. वे पिछले सात दफे से अनवरत जीत रहे हैं. अब अखिलेश यादव को कौन समझाए कि हवा में राजनीति न करें. अपने पिता के चरणों में बैठ कर राजनीति सीखें. इन अंपुओं-चंपुओं के बूते वे सर्वमान्य नेता बनने का ख्वाब छोड़ दें. कुल 47 के बूते वे राज्यसभा में किसी एक को ही भेज पाएंगे. ये 47 ही हैं कोई एके-47 नहीं. और 47 में बहुत लोग कब छोड़ जाएं खुदा जाने!

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव की जान को ‘मीडिया’ से हो सकता है खतरा! (देखें वीडियो)

ये आगरा गए अखिलेश यादव की मीडिया से खड़े-खड़े बातचीत का वीडियो है. मीडिया वालों की संख्या और बाइट पाने के लिए उनमें मची धमा चौकड़ी इशारा कर रही है कि अगर समय रहते कुछ नहीं किया गया तो अखिलेश यादव समेत कई वीवीआईपीज की जान को खतरा हो सकता है. मीडिया के वेश में कोई भी आतंकी संगठन या बदमाश या असमाजाकि तत्व या विरोधी पार्टी के लोग घुसपैठ कर जानमाल का नुकसान कर सकते हैं.

सिक्योरिटी एजेंसी के लोग भी इन मीडिया वालों के सामने सिर्फ बेचारे बने रहने की भूमिका में दिख रहे हैं. ये वीडियो आंख खोलने के लिए काफी है कि अब मीडिया के नाम पर इतनी बड़ी संख्या को एक साथ किसी वीवीआईपी के करीब नहीं आने देना चाहिए. इस वीडियो में अखिलेश साफगोई से ढेर सारे सवालों के जवाब अपने अँदाज में देते हैं. उनकी सहजता ही है कि वह इतने सारे मीडिया वालों और उनके सवालों की बौछार से परेशान न होकर सब कुछ बेहद धैर्य के साथ हैंडल करते हैं.

अगर सिक्योरिटी एजेंसीज ने मीडिया की भयंकर बढ़ती संख्या और अफरातफरी के लिए कुछ बेसिक रुल रेगुलेशन नहीं बनाए तो इसका फायदा समाजविरोधी और देश विरोधी तत्व उठा सकते हैं. वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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आक्रामकता अखिलेश यादव और सपा के लिए नुकसानदायक है!

अजय कुमार, लखनऊ
ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी मे मुलायम युग खत्म होने के बाद नये नेतृत्व ने राजनैतिक विचारधारा को तिलांजलि देकर आक्रमण को अपना सियासी हथियार बना लिया गया है। हर मुद्दे पर हंगामा खड़ा करना अगर समाजवादी मकसद बन जायेगा तो इससे न तो प्रदेश का भला होगा न ही पार्टी को फायदा पहुंचेगा। आश्चर्य तो इस बात का है कि विधान सभा चुनाव के समय भी सपा नेतृत्व ने इसी तरह की आक्रमकता दिखाई थी और उसको इसका जर्बदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा था, सत्ता तो गई ही, हार भी शर्मनाक हुई। मगर सपा नेतृत्व इससे सबक लेने को तैयार ही नहीं है। कभी-कभी तो यही नहीं लगता है कि राहुल गांधी तो नाहक ही बदनाम हैं।

अखिलेश यादव भी परिपक्वता के मामले में राहुल के समकक्ष ही खड़े  नजर आते हैं। राहुल की ही तरह से अखिलेश के पास भी न तो कोई विजन है न हीं किसी विषय पर गंभीर चर्चा करने की योग्यता। वह जनता की नब्ज पहचानते हैं। हर समय ठिठोली करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है। दुख तो इस बात का है अखिलेश अपने पिता से कुछ सीखने को ही तैयार नहीं हैं। जब से अखिलेश अपने आप को मुलायम से भी बड़ा नेता समझने लगे हैं तभी से अखिलेश के पतन का ग्राफ भी नीचे की ओर खिसकता जा रहा है।

सपा में मुलायम युग की समाप्ति के बाद लगता है कि पार्टी मुट्ठी भर लोगों का ऐसा समूह बन गया है जो सिर्फ उद्ंडता करना ही आता हो, जिसका नेतृत्व अखिलेश यादव कर करते हैं। अखिलेश यादव और उनकी टीम के सदस्य यही नहीं समझ पा रहे हैं कि योगी सरकार के हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही प्रदेश सभी समस्याओं से मुक्त हो जायेगा। मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि किसी सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिये उसे कम से कम छह माह का समय दिया जाना चाहिए लेंकिन अखिलेश ने पिता की नसीहत को अनदेक्षा करके अपनी सरकार के समय के पाप को धोने के लिये योगी सरकार पर कीचड़ उछालने का रास्ता चुनना ही बेहतर समझा।

पहले दिन से ही अखिलेश ने किसी न किसी बहाने से योगी सरकार को घेरना शुरू कर दिया। अखिलेश ने यह सिलसिला ईवीएम(वोटिंग मशीन) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के साथ शुरू किया था जिस पर वह  धीरे-धीरे झूठ का आवरण उढा़ते चलो गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सही कह रहे हैं कि प्रदेश के जमीनी हालात बदले इसके लिये एक वर्ष का समय सरकार को दिया जाना चाहिए। दो माह में किसी सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है,इसी लिये सरकार को घेरने के लिये अखिलेश टीम ने कानून व्यवस्था को ही मुद्दा बना दिया।

अखिलेश जानते हैं कि कानून व्यवस्था के नाम पर वह हंगामा भले ही खड़ा कर लें, मगर अब जुर्म करने वाले आजाद नहीं घूम पा रहे हैं। उन्हें सरकारी संरक्षण भी नहीं मिल रहा है। इसी तरह से किसानों का कृषि ऋण माफ करने में आने वाली व्यवाहारिक दिक्कत को भी अखिलेश समझने को तैयार नहीं है। 36.359 हजार करोड़ के कृषक ऋण माफ करने का फैसला योगी सरकार ने पहली कैबिनेट बैठक में ही ले लिया था। ये फैसला सियासी दांव के तौर पर तो बहुत अच्छा था, मगर अर्थशास्त्र के नजरिए से बेहद घातक कदम है. इससे बैंकिंग सेक्टर पर भारी बोझ पड़ना तय था। इसी लिये रिजर्व बैंक कायदे कानून का हवाला देकर अपनी असमर्थता जताने लगा।

किसानों के कर्ज माफी की घोषणा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान की थी,लेकिन केन्द्र सरकार ने इसके लिये योगी सरकार को कर्ज देने से इंकार कर दिया था, इसके बाद बैंक बांड के माध्यम से योगी सरकार ने बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया था,जिसमें बैंकों ने पेंच फंसा दिया,लेकिन यह इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी अखिलेश द्वारा बनाई और दिखाई जा रही है। सरकारी कामकाज में कभी-कभी देरी हो जाती है। अच्छा होता कि अखिलेश दूसरों पर कीचड़ उछालने की बजाये अपनी हार के कारणों पर मंथन करते। परिवार में हो रहे सिरफुटव्वल को रोकते।

इसी तरह से उत्तर प्रदेश की 17 वीं विधानसभा के पहले ही दिन सदन में जिस तरह का आचरण समाजवादी नेताओं ने किया, उसकी चौतरफा निंदा हो रही है। पहले दिन संयुक्त अधिवेशन में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान विपक्षी विधायकों ने न केवल पोस्टर-बैनर लहराए, बल्कि सपा विधायाकों ने तो दो कदम आगे बढ़कर सीटियां तक बजाने का कारनामा कर डाला। सपा विधायक नहीं नहीं रुके। राज्यपाल पर कागज के गोले फेंके गये। यह सब तब हुआ जब सदन की कार्यवाही का दूरदर्शन से सीधा प्रसारण हो रहा था। सपा विधायक मेजों पर चढ़कर राज्यपाल पर कागज के गोले फेंक रहे थे और उनके मार्शल उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे थे। यह सब अखिलेश यादव की उपस्थिति में हुआ।

उदंडता का यह सिलसिला दूसरे-तीसरे और आगे के दिनों में भी चलता रहा। वैसे यह पहली बार नहीं जब किसी विधानसभा में हंगामा अपनी हदें पार कर गया दिखा हो। शायद ही विधान सभा का कोई सत्र ऐसा जाता होगा जब विपक्ष के हंगामे के कारण काम बाधित न होता हो। 1998 में तो खून-खराबा तक देखने को मिला था। विधायकों ने मेजों पर लगे माइक उखाड़ कर एक-दूसरे पर हमला किया था। कभी-कभी तो लगता है कि राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान हंगामा खड़ा करना विपक्ष का मकसद बन गया है।

ऐसी स्थितियां लोगों के सामने चुने गए प्रतिनिधियों की विपरीत छवि सामने रखती हैं और जाहिर है इससे उन लोगों की उम्मीदों को धक्का पहुंचता है जो अपने अमूल्य मतों से उन्हें चुनते हैं। राज्यपाल के पद की अपनी मर्यादा है और उनके सम्मान की रक्षा पूरे सदन का दायित्व है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष ने अपनी भूमिका का निर्वहन जिम्मेदारी से नहीं किया। इस तरह की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में एक सहज सवाल भी खड़ा होता है कि सत्ता में रहते हुए जो तौर-तरीके गलत कहे जाते हैं, विपक्ष की भूमिका में आखिर उन्हें ही जायज क्यों मान लिया जाता है। किसी राज्यपाल को बोलने से रोकने के लिए हंगामा करके आखिर क्या संदेश देने की कोशिश की जाती है।

किसी न किसी दल को इसको बदलने की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, निश्चित ही सदन को शांतिपूर्वक चलाने की जितनी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की है, उतना ही दायित्व विपक्ष का भी है। अगर विपक्ष तर्कसंगत बहस करेगा, जनता से जुड़ी समस्याओं को सदन में उठायेगा तो जनता को उसका साथ मिलेगा और सरकार को भी विपक्ष द्वारा उठाये गये मुद्दों का ईमानदारी से जबाव देना पड़ेगा। अन्यथा विपक्ष योगी सरकार के सामने बौना ही नजर आयेगा।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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अखिलेश यादव ने भी पिता के नक्शे कदम पर पत्रकारों को ख़रीद कर कुत्ता बना लिया है!

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव आज एक प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से एक चैनल के एक रिपोर्टर से बदसुलूकी की, तू-तकार किया, तुम्हारा नाम क्या है जैसे बेहूदे सवाल पूछे और अंत में बोले कि तुम्हारा तो ड्रेस ही भगवा है। आदि-आदि। और सारे उपस्थित पत्रकार अपनी रवायत के मुताबिक ही ही करते रहे तो टीवी के परदे पर यह देखना मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी। यह तो दलाल पत्रकारों की मामूली तफसील है। ऐसा पहले अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव भी करते रहे हैं।

अखिलेश की कोई प्रेस कांफ्रेंस या कवरेज करने का दुर्भाग्य तो मुझे नहीं मिला है लेकिन उन के पिता मुलायम सिंह यादव की तमाम प्रेस कांफ्रेंस, कवरेज और उन के साथ हवाई और सड़क यात्राएं तो की हैं। पहले तो नहीं पर बाद के दिनों में मुलायम के तेवर भी यही हो चले थे। अव्वल तो वह पत्रकारों को, मीडिया मालिकों को पूरी तरह ख़रीद लेते थे तो कोई अप्रिय सवाल उन से करता नहीं था। अगर गलती से कोई पत्रकार ताव में आ कर कोई अप्रिय सवाल कर भी देता था तो मुलायम भड़क कर पूछते थे, तुम हो कौन? किस अखबार से हो? किस चैनल से? और उस पत्रकार को पब्लिकली बुरी तरह बेज्जत कर उस की नौकरी भी खा जाते थे। उन का हल्ला बोल तो हाकरों की पिटाई तक में तब्दील हो गया था। मुलायम सिंह यादव तो प्रेस क्लब में बैठ कर पत्रकारों से पूरी हेकड़ी से पूछते थे, तुम्हारी हैसियत क्या है?

बाद के दिनों में मायावती ने भी यही सब किया। मायावती ने तो फिर सवाल सुनने ही बंद कर दिए। लिखित वक्तव्य पढ़ कर उठ जाती हैं। लेकिन अगर मायावती के मुख्य मंत्री रहते उन के खिलाफ कोई गलती से भी संकेतों में भी लिख दे तो वह फौरन उस की नौकरी खा जाती थीं। कई पत्रकारों की नौकरी खाई है मायावती और मुलायम ने। मायावती तो कहती थीं, मीडिया मालिक से कि या तो अखबार बंद करो या इसे निकाल बाहर करो। एक बार एक पत्रकार को मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस में ही घुसने से रोक दिया था तो सभी पत्रकार बायकाट कर गए थे। लेकिन तब वह मुख्य मंत्री नहीं थीं। लेकिन पत्रकार चूंकि कुत्ते होते हैं सो फिर जाने लगे। अखिलेश यादव ने भी पिता के नक्शे कदम पर पत्रकारों को ख़रीद कर कुत्ता बना लिया। अब वह भले सरकार में नहीं हैं लेकिन उन को लगता है कि यह कुत्ते तो उन के ही हैं। सो कुत्तों को लात मारने की उन की आदत अभी गई नहीं है। जाते-जाते जाएगी। पर जाएगी ज़रुर। बहुतों की जाते देखी है मैंने।

एक समय था कि ज़रा-ज़रा सी बात पर बड़े से बड़े नेताओं को हम पत्रकारों ने इसी लखनऊ में उन की अकड़ उतार कर उन के हाथ में थमा दी है। किस्से अनेक हैं। पर वह समय और था, दिन और था, हम लोग और थे। अब दौर और है, लोग और हैं और हम जैसे पत्रकार इसीलिए मुख्य धारा से दूर हैं। क्यों कि मीडिया मालिकों, पक्ष-प्रतिपक्ष के नेताओं, अधिकारियों और इस समाज को भी सिर्फ़ कुत्ते और दलाल पत्रकार ही रास आते हैं। लिखने पढ़ने वाले , खुद्दार और समझदार पत्रकार नहीं। इस सिस्टम पर अब बोझ हैं खुद्दार पत्रकार।

दयानंद पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ

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पत्रकार के सवाल पर अखिलेश यादव क्यों इतना तमतमा गए?

कल प्रेस कान्फ्रेस के दौरान अखिलेश यादव उस समय भड़क गये जब एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे सवाल किया, ”आपके चाचा शिवपाल जानना चाहते हैं कि आप अपने वादे के मुताबिक पिता मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद कब सौंप रहे हैं।” इस सवाल पर वे इतना तमतमा गये कि संबंधित पत्रकार का नाम पूछ कर उसे भवगा पार्टी वाला कह दिया। अखिलेश यहीं नहीं रुके। तैश में यह तक कह गये, ’जब देश बर्बाद हो जायेगा तो तुम जैसे पत्रकार कहीं नहीं रहोगे।’

परिवार के सवाल पर उन्हें अक्सर आग बबूला होता देखा जाता है।

मैंने 48 वर्ष के पत्रकारिता जीवन में कभी किसी नेता को इतना तैश में नहीं देखा। मुलायम सिंह यादव से 90 के दशक में तमाम तीखे सवाल पत्रकारों द्वारा पूछे जाते थे। अयोध्या कांड के दौरान एक बार उनसे पूछा था, ‘मुल्ला मुलायम की छवि से बाहर कब आइयेगा।’ किसी प्रकार का रियेक्ट करने के बजाये उन्होंने बड़े शांत स्वर में जबाव दिया था, ‘अगर गोली न चलवाता तो उपद्रवी मस्जिद ढहा देते।’

प्रेस कांफ्रेस के बाद मुलायम सिंह ने मुझे अलग बुलाकर कहा था, ‘ऐसे सवाल हमेशा पूछा करो, कम से कम मुसलमानों में तो मैसेज ठीक जायेगा।’ हालांकि मन से वह कतई यह नहीं चाहते थे कि आगे से कोई उनसे ऐसा तीखा सवाल पूछे। आज अखिलेश की तमतमाहट तमाम पत्रकारों को नागवर लगी। एक सफल नेता बनने के लिये संयम जरूरी है।

अजय कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ
मो-9335566111

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क्या अखिलेश यादव बन पाएंगे नेता?

किसी से भी पूछ लीजिए ….नेता जी कौन…जवाब मिलेगा मुलायम सिंह यादव। कम से कम समाजवादी पार्टी के संदर्भ में तो यही बात सौ फीसदी सच है …कल भी थी और कल भी रहेगी लेकिन अखिलेश यादव का क्या?..सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री या फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी …इसके अतिरिक्त और क्या ….आप जरुर ये सोचेंगे कि इसके अतिरिक्त अब और कौन सी बात कही जा सकती है? क्या हम नेता अखिलेश यादव कह सकते हैं?….क्या हम अखिलेश यादव को नेता कह सकते हैं?..शायद नहीं …बल्कि यकीनन नहीं।

समाजवादी पार्टी में कल भी एक ही नेता था और आज भी एक ही नेता है क्यों नेता बनने के लिए पुलिस की मृगछाला पहननी पड़ती है। लाठियों से जब पीठ का श्रंगार होता है तब जाकर एक नेता तैयार होता है। संघर्ष की तपिश में जब कोई युवा खड़ा होता है , तब जाकर एक नेता तैयार होता है ….जब जनता के बीच किसी का भरोसा बढ़ता है तब जाकर एक नेता तैयार होता है तो कम से कम अखिलेश इन बातों पर खरे उतरते हों….इस सवाल के जवाब में उत्तर ना ही मिलेगा क्योंकि चुनावों में इतनी बुरी हार ने अखिलेश के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए है।

हो सकता है कि सियासी तौर सपा की हार को लेकर सौ तर्क गढ़े जाएं लेकिन नेतृत्व करने वाला ही जीत या हार का जिम्मेदार होता है और इस लिहाज से अखिलेश ही जिम्मेदार है इस हार के। ये सर्व विदित तथ्य है कि सियासत में अखिलेश का आगमन उनके अपने संघर्ष की वज़ह से नहीं बल्कि मुलायम सिंह यादव के पुत्र  होने की वजह से हुआ और आज पार्टी की जो दशा हुई वो अखिलेश यादव की वज़ह से हुई ..कारण कई हो सकते हैं और होने भी चाहिए लेकिन इन हजारों कारणों के केन्द्रबिन्दु में अखिलेश यादव ही आते हैं। इसलिए अब सवाल सीधा है कि अखिलेश यादव को नेता बनना है या पूर्व मुख्यमंत्री के पदनाम से ही काम चलाना है।

हार सिर्फ हार नहीं होती …हार वो दहकती ज्वाला है जिसमें सोना तपकर कुन्दन होता है और नेतृत्व निखरता है। अब सही मायनों में अखिलेश की अग्निपरीक्षा है। सत्ता के सहवास में तो सभी साथ होते है लेकिन विपक्ष के वनवास में आप सब को साथ रख पाएं …अपने आंदोलन को धार दे पाएं ..जनता को यकीन दिला पाएं …यही नेता के नेतृत्व की अग्निपरीक्षा है जो अखिलेश को अब देनी है। अब सही मायनों में अखिलेश के नेता बनने की ज़मीन तैयार हो चुकी है। उड़नखटोला पर सवार अखिलेश ये रुतबा ये सम्मान ये ओहदा अपने पिताजी से उपहार में मिला था लेकिन अब जो वो हासिल करेंगे उस पर उनका ही नाम लिखा होगा। सरकारें सत्ता चरित्र से ही चलती है। जिस तरह से लक्ष्मी का चरित्र नहीं बदलता ….ठीक उसी तरह से सरकारों का चरित्र नहीं बदलता ..सत्ता का चरित्र नहीं बदलता और यही अटल सच ही विपक्ष को सत्ता में आने का मौका देता है।

आज अखिलेश मंथन में लगे हैं…ट्विवट कर रहे हैं…बयान दे रहे हैं जो रस्मी प्रतिक्रिया से ज्यादा और कुछ भी नहीं। क्या अखिलेश इस बात का विरोध करने के लिए मुहूर्त का इंतज़ार करेंगे कि समाजवादी पेंशन के तहत जिस बुर्जुग महिला को पांच सौ रुपए मिलते थे ..सरकार ने एक झटके में बंद कर दिया। अब उस बुर्जुग का क्या होगा जिसके लिए पांच सौ रुपए ही उसकी जिंदगी थे। क्या अखिलेश इस बात का विरोध करने के लिए नैतिक साहस जुटा पाएंगे कि सरकार के कई फैसलों से जो हजारों लोग बेरोज़गार होंगे ..और जो अराजकता राज्य में फैलेगी ..उसका जिम्मेदार कौन? ऐसी कई बातें है ..ऐसे कई फैसले है जिस पर निर्णय सिर्फ अखिलेश को लेना है ..यही रणनीति ही उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाएगी और यही फैसले ही उन्हें जनता के बीच नायक सिद्ध करेगी। लेकिन सवाल फिर वहीं कि क्या अखिलेश ऐसा कर पाएंगे? अखिलेश हार के मंथन में लगे हुए हैं। लेकिन हार की समीक्षा कुछ लाइन में ही सिमट जाएगी । कुछ सवाल के जवाब अपने आप हार की कहानी बयां कर देंगे।

क्या अखिलेश मोदी के जैसे कुशल वक्ता है?

क्या अखिलेश के पास शब्द कोश में मोदी के शब्द है?

क्या अखिलेश के पास इस बात का जवाब है कि जब आपने पूरे परिवार से लड़ाई दागियों के मुद्दे पर लड़ी तो क्या आपके अपने खेमें में सब दूध के धुले रहें  हैं?

क्या जनता इस बात को नहीं समझती कि लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे का फीता काट दिया लेकिन लोग उसका इस्तेमाल बहुतायत  में नहीं कर पा रहे थे?

आपने जो मेट्रो का इतना गुणगान किया वो आज तक नहीं चली?

क्या वाकई आपने भ्रष्टाचार से कई स्तरों पर समझौता नहीं किया?

ये कुछ ऐसे सवाल है जिनका जवाब जनता के पास तो है लेकिन अखिलेश जी के पास तर्क है जवाब नहीं। सच यही है कि एक बार अगर गायत्री को हटा दिया तो हटा दिया लेकिन आपने तो उस वक्त भी उसको नहीं हटाया जब वो भागा भागा फिर रहा था। उत्तर प्रदेश की सियासत जातिवाद से मुक्त नहीं तो फिर आपने अपने ऊपर यादव का तमगा क्यों लगा लिया  कि एक वक्त तो ऐसा हुआ कि  एक कांस्टेबल से लेकर डीजीपी तक यादव हो गए..सत्ता का यादवीकरण हो गया।

ये कथा अनन्त हो सकती है लेकिन अब आगे की सुधि लेना चाहिए । एक सजग नागरिक होने के नाते और एक पत्रकार होने के नाते मेरा इस बात में पुख्ता यकीन है कि अगर विपक्ष कमजोर होगा तो सत्ता पक्ष के निरंकुश होने का खतरा बढ़ जाता है और इसलिए हमारी निगाहें अखिलेश यादव की तरफ है कि वो अब सियासत की शुरुआत संघर्ष के साथ सड़कों पर करें और सत्ता पर दबाव बनाएं रखें। हां मुझे थोड़ा शक इसलिए है कि सियासत की सड़क पर कई ऐसे गढ्ढे हैं जो होते तो हैं पर दिखते नहीं …कुछ अनकहे समझौते भी होते हैं ….पत्नी को पुन सांसद अगर बनाना है तो फिर शायद चुप रहना भी मजबूरी हो सकता है । ..बहराल…सकारात्मक उम्मीद और सोच है हमारी …युवा शक्ति का चेहरा कम से कम अखिलेश है ..इस बात से हम इन्कार नहीं करते …और अगर अखिलेश ने मेहनत की तो वाकई अखिलेश सही मायने में अपने पिता के छाया से मुक्त होकर नेता अखिलेश की पदवी पर पदारुण होंगे।

लेखक मनीष बाजपेई वर्तमान समय में के न्यूज में एग्जीक्यूटिव एडीटर के पद पर कार्यरत हैं . किसी भी प्रतिक्रिया के लिए उनके मेल आईडी bajpai.friend@gmail पर सम्पर्क किया जा सकता है. उनसे उनके व्हाट्सअप नम्बर 9999087673 के जरिए भी सम्पर्क किया जा सकता है.

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अखिलेश यादव लिफाफा प्रेमी पत्रकारों, भ्रष्ट अफसरों और चाटुकार नेताओं की गिरफ्त में थे!

Manoj Kumar Mishra : उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों से पूर्व चाटुकारों से घिरे अखिलेश यादव जनता की नब्ज और जमीनी हकीकत समझ ही नहीं पाये। एक के बाद एक रणनीतिक चूक करते हुए वो बार बार ये हवाई दावे करते रहे कि “जनता अपना मन बना चुकी है” और अपने ही भ्रमजाल से बाहर नहीं निकल सके।

पूरे पांच साल अखिलेश स्वप्नलोक की दुनिया में थे। जनता से पूरी तरह कटे अखिलेश “लिफाफा प्रेमी” पत्रकारों, भ्रष्ट अधिकारियों और चाटुकार नेताओं के गिरफ्त में थे। इन सब ने मिल कर उनके दिमाग में ऐसी छवि गढ़ी कि उन्हें उन्हें खुद के विकास पुरुष और विजनरी नेता होने का भ्रम होने लगा। चचा रामगोपाल ने पीएम मटेरियल बता बता के बता बता के इतना हवा भर दिया कि तो खांटी राजनीतिज्ञ पिता मुलायम सिंह के सीने पर सवार हो गए और उन्ही के धोबी पाट से चचा शिवपाल को चित कर दिया।

फिर क्या था अब तो उन्हें खुद के अन्दर चाणक्य भी नज़र आने लगा और जिस राहुल को पूरे भारत का बच्चा बच्चा उपहास का पात्र समझता था उसका साथ उन्हें रास आने लगा। वो सत्ता में रहते हुए सतत अध्ययन, कठोर मेहनत और जनता के सीधे संपर्क में रहते हुए उसके फीड बैक के महत्व को कभी समझ ही नही सके, बस लखनऊ में बैठे बैठे शिलान्यास और उद्घाटन के पत्थरों का अनावरण कर हवाई किले बनाते रहे।

आज जनता ने जब अपना मन बता उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दिया तो भी वो यथार्थ को स्वीकार न कर अपरिपक्व, बचकाने बयान बाजी पर उतर आये हैं।

उम्र अभी अखिलेश के साथ है, उन्हें हर विषय पर गहन अध्ययन करना चाहिये, चिंतन करना चाहिए ,जनता की अपेक्षा और नब्ज को समझने के बाद ही उन्हें अपनी भावी रणनीति और सड़क पर आंदोलनों की रूपरेखा तय करनी चाहिए। अपने बयानों में भी उन्हें बेहद समझदारी और सतर्कता बरतनी होगी वरना जल्द ही केजरीवाल और राहुल की तरह उपहास का पात्र बनने में उन्हें भी समय नहीं लगेगा।

लखनऊ के युवा उद्यमी मनोज कुमार मिश्रा की एफबी वॉल से.

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एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को!

यूपी में रक्तहीन क्रांति पर भड़ास एडिटर यशवंत की त्वरित प्रतिक्रिया- ‘मीडियाकर्मियों का अंतहीन उत्पीड़न करने वाले अखिलेश राज का खात्मा स्वागत योग्य’

Yashwant Singh : यूपी में हुए बदलाव का स्वागत कीजिए. सपा और बसपा नामक दो लुटेरे गिरोहों से त्रस्त जनता ने तीसरे पर दाव लगाया है. यूपी में न आम आदमी पार्टी है और न कम्युनिस्ट हैं. सपा और बसपा ने बारी बारी शासन किया, लगातार. इनके शासन में एक बात कामन रही. जमकर लूट, जमकर झूठ, जमकर जंगलराज और जमकर मुस्लिम तुष्टीकरण. इससे नाराज जनता ने तीसरी और एकमात्र बची पार्टी बीजेपी को जमकर वोट दिया ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके.

प्रचंड बहुमत से यूपी में सत्ता पाने वाली भाजपा ने अगर अगले दो साल में शासन करने का ढर्रा नहीं बदला, सपा-बसपा वाली लूट मार शैली से इतर एक नया सकारात्मक कल्चर नहीं डेवलप किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में थउंस जाएगी यानि ढेर हो जाएगी. मैंने निजी तौर पर अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अपील किया था क्योंकि इन महोदय के राज में एक पत्रकार जिंदा जला दिया गया, पत्रकार ने मरने से पहले जलाने वाले मंत्री का नाम भी लिया लेकिन उस मंत्री को सत्ता से बेदखल नहीं किया गया. आपको यह भी याद होगा कि अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनाते हुए मुझे कुछ भ्रष्ट पतित संपादकों और मीडिया हाउसों के इशारे पर उठवा कर अवैध तरीके से 68 दिनों तक जेल में बंद करवाया था.

मेरे बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को भी जेल में डलवाया गया. बाद में आफिस और घरों पर छापे डलवाए गए. खैर, हम लोग तो जेल से जश्न मनाते हुए निकले और ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिख डाला. पर फकीर का श्राप आह तो पड़ता ही है. एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को! मैंने सपा को वोट न देकर किसी को भी वोट देने की अपील की थी. ढेर सारे लखनवी चारण पत्रकारों और ढेर सारे मीडिया हाउसों के ‘अखिलेश जिंदाबाद’ वाली पेड न्यूज पत्रकारिता के बावजूद अखिलेश यादव को जनता ने दक्खिन लगा दिया.

बीजेपी वाले जश्न बिलकुल मनाएं, लेकिन ध्यान रखें कि जनता ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी है. अब शासन का नया ढर्रा विकसित करना होगा और जंगलराज-लूटराज से यूपी को मुक्ति दिलानी होगी. हम सबकी नजर यूपी की नई भाजपा सरकार पर रहेगी. फिलहाल मोदी और शाह की करिश्माई जोड़ी को बधाई… ये लोग सच में इस लोकतंत्र में वोटों की राजनीति-गणित के शहंशाह साबित हो रहे हैं. जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्ट स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : YASHWANT FB POST

ये है वो खबर जिसे भड़ास की तरफ से यूपी चुनाव से ठीक पहले एक अपील के रूप में जारी किया गया था…

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अखिलेश यादव जी, कहां हैं हत्यारे?

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्यकाल लगभग समाप्ति के दौर में है। अगली सरकार के लिए जद्दोजहद अंतिम चरण मे है। अखिलेश यादव पूरे पांच वर्ष तक सूबे की सत्ता पर निष्कंटक राज करते रहे लेकिन इस दौरान उन्होंने एक बार भी डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान हत्याकाण्ड को लेकर किए गए वायदों को याद करने की कोशिश नहीं की। बताना जरूरी है कि अखिलेश यादव ने (डॉ. सचान हत्याकाण्ड के दो दिन बाद 24 जून 2011) पत्रकारों के समक्ष डॉ. सचान की मौत को हत्या मानते हुए सीबीआई जांच की मांग की थी। डॉ. सचान के परिवार से भी वायदा किया था कि, उन्हें न्याय दिलाने के लिए किसी भी हद तक जाना पड़े, वे और उनकी समाजवादी पार्टी पीछे नहीं हटेगी। लगभग छह साल बाद की तस्वीर यह बताने के लिए काफी है कि अखिलेश यादव ने अपना वायदा पूरा नहीं किया। डॉ. सचान का परिवार पूरे पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से न्याय की आस लगाए बैठा रहा। शायद डॉ. सचान की आत्मा भी मुख्यमंत्री  से यही पूछ रही होगी कि, कहां हैं हत्यारे!!

भ्रष्ट अधिकारियों और अपराधियों से पटी यूपी में लगभग छह वर्ष पूर्व एक चर्चित हत्याकांड (डॉक्टर योगेन्द्र सिंह सचान) को अंजाम दिया गया। इस हत्याकांड को जिस सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, वह तो काबिले गौर है ही साथ ही जिस तरह से यूपी की सरकारों ने तमाम सुबूतों और जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए चंद दिनों में ही पूरे मामले को दफन कर दिया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं। यहां तक कि निष्पक्ष जांच एजेंसी का दावा करने वाली सीबीआई की भूमिका कथित हत्यारों और कथित भ्रष्टों के तलवे चाटते नजर आयी। इस हत्याकांड को जिस तरह से अंजाम दिया गया और जिस तरह से दफन कर दिया गया, उससे इतना जरूर साबित हो जाता है कि यूपी के अपराधियों में यदि दम है तो बड़े से बड़ा मामला चंद दिनों में ही दफन किया जा सकता है।

गौरतलब है कि परिवार कल्याण विभाग के तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी बी.पी.सिंह की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजे गए तत्कालीन उप मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान की जिला जेल अस्पताल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी थी। इस हत्याकांड में आरोपियों की फेहरिस्त तैयार होती उससे पहले ही हत्याकांड का पटाक्षेप कर दिया गया। इस हत्याकांड से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू ऐसे थे जिन्हें कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, फिर भी जिंदा मक्खी निगली गयी। आखिर वह कौन सी वजह थी, जिसने न्यायिक जांच रिपोर्ट तक को मानने से इनकार कर दिया? यदि न्यायिक जांच झूठी थी तो सरकार ने न्यायिक जांच अधिकारी राजेश उपाध्याय के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की? गौरतलब है कि दंड प्रक्रिया संहिता में इस बात का प्राविधान है कि हिरासत में होने वाली मौत की जाँच अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जाएगी। दूसरी ओर यदि सीबीआई की रिपोर्ट में संदेह था तो दोबारा अधिकारी बदलकर जांच क्यों नहीं करवायी गयी? शरीर पर मौजूद गहरे घाव किस धारदार हथियार से बनाए गए थे? इसकी जांच को भी नजरअंदाज कर दिया गया। साफ जाहिर है कि अरबों के घोटाले में संलिप्त बड़ी मछलियों को बचाने के फेर में छोटी मछलियों को शिकार बनाया गया।

देश के सर्वाधिक चर्चित घोटालों में से एक एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ डॉ योगेन्द्र सिंह सचान (उप मुख्य चिकित्साधिकारी) की लाश जिला कारागार (लखनऊ) के प्रथम तल पर स्थित निर्माणाधीन ऑपरेशन थिएटर के शौचालय में पायी जाती है। डॉ. सचान का शव कमोड सीट पर सिस्टन की ओर मुंह किए हुए था। सिर कमोड के सिस्टन पर टिका हुआ था। शरीर पर गहरे घाव थे, जिस वजह से उनका पूरा शरीर खून से लथपथ था। गले में बेल्ट का फंदा लगा हुआ था। दोनों पैर जमीन पर टिके हुए थे। मौका-ए-वारदात की पूरी तस्वीर यह साबित करने के लिए काफी थी कि डॉ. सचान ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी हत्या की गयी थी। जेल कर्मी भी दबी जुबान से हत्या के बाबत कानाफूसी करते रहे। पूरे जेल का माहौल ऐसा था, जैसे सभी को मालूम हो कि डॉ. सचान की हत्या किसने करवायी और किसने की?

डॉ. सचान की निर्मम हत्या किए जाने सम्बन्धी सारे सुबूत पुलिस और जांच एजेंसियों के पास थे, इसके बावजूद तत्कालीन बसपा सरकार के कार्यकाल में सरकार ने दावा किया कि डॉ. सचान ने जेल में आत्महत्या कर ली। उस वक्त भी यही सम्भावनाएं व्यक्त की जा रही थीं कि एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ पुख्ता दस्तावेज डॉ. सचान के पास थे। यदि वे जीवित रहते और उन्हें जेल होती तो निश्चित तौर पर कई बडे़ नेताओं को जेल हो जाती। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर भी शिकंजा कसा जा सकता था। दूसरी ओर डॉ. सचान के परिजन सरकार के दावों से संतुष्ट नहीं थे, परिणामस्वरूप न्यायिक जांच शुरु की गयी। जांच का दायित्व (न्यायिक जांच अधिकारी, मुख्य न्यायिक मजिस्टेªट, लखनऊ) राजेश उपाध्याय को सौंपा गया। महज एक पखवारे में ही तमाम दस्तावेजों के साथ जांच रिपोर्ट शासन के पास भेज दी गयी। निष्पक्ष तरीके से अंजाम दी गयी जांच रिपोर्ट ने तत्कालीन सरकार के दावों की कलई खोल दी। जांच रिपोर्ट (11 जुलाई 2011) में डॉ. सचान की मौत को आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या करार दिया गया। जांच रिपोर्ट पटल पर आते ही सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया। लगने लगा था कि डॉ. सचान की मौत का रहस्य तो उजागर होगा ही साथ ही एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ तमाम मगरमच्छ कानून के जाल में आ जायेंगे। तथाकथित दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई होती इससे पहले ही सूबे में चुनाव का बिगुल बज गया। चुनाव नतीजों ने सूबे की सत्ता बदल दी। एनआरएचएम घोटाले की पृष्ठभूमि तैयार करने और डॉ. सचान हत्याकाण्ड पर लीपा-पोती करने वाली बसपा सरकार का पतन हो गया। बसपा की धुर-विरोधी  अखिलेश यादव की सरकार ने सूबे में कदम रखा तो विभागीय कर्मचारियों से लेकर सूबे के चिकित्सकों में घोटाले पर से पर्दा उठने की उम्मीद जागृत हुई। परिजनों की फरियाद पर मामले को सीबीआई के सुपुर्द किया गया।

डॉ. सचान हत्याकाण्ड से जुडे़ कथित हत्यारों और हत्या की साजिश में शामिल शातिरों के हाई-प्रोफाइल सम्पर्कों का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि तमाम सुबूतों और न्यायिक जांच को दर-किनार करते हुए सीबीआई ने निर्मम हत्याकांड केा आत्महत्या बताकर पूरे प्रकरण को ही दफन कर दिया। डॉ. सचान का परिवार चिल्लाता रहा कि डॉ. सचान दिमागी रूप से काफी मजबूत थे, वे आत्महत्या नहीं कर सकते, लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी। अन्ततः हैरतअंगेज तरीके से डॉ. सचान हत्याकांड से जुड़ी फाइल बंद कर दी गयी।

न्यायिक जांच के दौरान कई पहलू ऐसे नजर आए जो यह साबित करने के लिए काफी थे कि डॉ. सचान ने आत्महत्या नहीं बल्कि उनकी हत्या की गयी थी। इस चर्चित हत्याकांड में तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा का नाम विपक्ष ने जमकर उछाला। सड़क से लेकर संसद तक कथित आरोपी मंत्रियों के नाम उछाले गए। तत्कालीन बसपा सरकार और तत्पश्चात अखिलेश सरकार की बेशर्मी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उसने तमाम दस्तावेजों को नजरअंदाज करते हुए इस केस में रुचि दिखानी ही बंद कर दी। ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे दोनों ही सरकारों ने कथित हत्यारों और लुटेरों को बचाने की ठान रखी हो।

उस वक्त विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि डॉ. सचान की मौत सरकार में गहरे तक जड़ें जमा चुके भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की साजिश का एक हिस्सा है। विपक्ष के आरोप पर सरकार की तरफ से तत्कालीन कैबिनेट सचिव शंशाक शेखर (अब स्वर्गीय) ने बचाव करते हुए कहा था कि विरोधी दल प्रदेश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। सरकार पूरे मामले की गहनता से जांच करवा रही है। सही तथ्य जल्द ही आम जनता के समक्ष होंगे।

11 जुलाई 2011 को सौंपी गयी न्यायिक जांच रिपोर्ट और डॉ.सचान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ लिखा था कि उनकी मौत गले में बेल्ट बंधने की वजह से नहीं बल्कि ज्यादा खून बहने से हुई थी। इतना ही नहीं लखनऊ जेल में वारदात के वक्त जेल में निरुद्ध एक कैदी के बयान ने सरकार की नीयत पर उंगली उठायी। कैदी का कहना था कि (सचान की हत्या के दिन) लखनऊ जेल में घटना वाले दिन जो हुआ, वह शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा। अमूमन जेल में शाम का खाना साढ़े छह बजे मिलता है घटना वाले दिन चार बजे ही खाना बांट दिया गया था। खाना समाप्त होते ही सारे कैदियों को वापस बैरकों में भेज दिया गया था। एक खबरिया चैनल में एक कैदी के बयान (जेल से रिहा होने के बाद) को आधार मानें तो, सबसे कहा गया था वे एक-दूसरे से बात नही करेंगे। इसके तुरन्त बाद ही पूरी जेल में शोर-शराबा शुरू हो गया। जोर-जोर से आवाजें आने लगी थीं कि मार दिया गया, मार दिया गया। हैरत की बात है कि सरकार की साजिश को उजागर करती इस रिपोर्ट की न तो सच्चाई जानने की कोशिश हुई और न ही उस कैदी से बयान लिए गए जिसने खबरिया चैनल में घटना का जिक्र किया था।

प्रारम्भिक जांच में डॉ. सचान के शरीर पर आठ स्थानों पर गंभीर चोट के निशान पाए गए थे। हाथ की नसें कटी हुई पायी गयी थीं। जांघ, गर्दन, छाती, कंधे और पेट पर जख्म के निशान पाए गए थे। डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह और प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे के बयान को भी संजीदगी से लेने के बजाए उनके बयान को झूठा करार दिया गया। इस सम्बन्ध में न्यायिक जांच रिपोर्ट कुछ और ही कहती है। न्यायिक जांच रिपोर्ट में जिला कारागार, लखनऊ के वरिष्ठ अधीक्षक से पूछताछ के आधार पर कहा गया है कि जिस डॉ. सचान की हत्या हुई थी, उस दिन तत्कालीन मजिस्टेªट जेल के अन्दर ही नहीं आए थे। जेल के अन्दर उनके पी.ए. आए थे। इस बात की पुष्टि जेल के फार्मासिस्ट संजय कुमार सिंह ने भी की थी। इन परिस्थितियों में डिप्टी जेलर और प्रधान बंदी रक्षक के झूठ बोलने का प्रश्न ही नहीं उठता। न्यायिक जांच के दौरान आत्महत्या से सम्बन्धित कोई नोट नहीं पाया गया। सामान्यतः यह देखने में आया है कि, शिक्षित व्यक्ति जब कभी आत्महत्या करता है तो कोई न कोई सुसाइड नोट अवश्य लिखता है लेकिन डॉ. सचान के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। फोरेंसिंक मेडिसिन एवं टॉक्सीकोलॉजी विभाग (छत्रपति शाहूजी महाराज, चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ में लेक्चरर) के डॉ. मौसमी ने भी अपने बयान में कहा था कि मृतक के शरीर में जितनी गहरी चोटें 8 स्थानों पर आयी हैं, इतनी गहरी चोटें आत्महत्या करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं लगा सकता। मृतक स्वयं एक डॉक्टर था, एक डॉक्टर से आत्महत्या से पूर्व इतनी सारी गहरी चोटें लगाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। हैरत की बात है कि फोरेंसिक मेडिसन के चिकित्सक की रिपोर्ट को भी नजरअंदाज कर दिया गया। डॉ. मौसमी तो यहां तक कहते हैं कि दोनों हाथों की ब्लीडिंग प्वाइंट पर एक ही तरह की चोटें आयी हैं। इस तरह की चोटें अर्धविक्षिप्त व्यक्ति से भी करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

इस सम्बन्ध में पोस्टमार्टम करने वाली टीम में शामिल डॉ. दुबे के बयान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डॉ. दुबे ने बयान दिया था कि मैंने इससे पहले लगभग 100 से ज्यादा पोस्टमार्टम किए होंगे लेकिन आज तक कोई भी केस ऐसा नहीं मिला जिसमें किसी आत्महत्या करने वाले ने अपने शरीर की इतनी सारी नसें काटी हों। डॉ. सचान की गर्दन पर लिंगेचर मार्क हत्या की पुष्टि के लिए काफी है। गर्दन पर ‘लिंगेचर मार्क’ मौत के बाद की चोट है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि लिंगेचर मार्क मृत्यु के बाद का है, लिहाजा यह साबित हो जाता है कि डॉ. सचान की हत्या करने के बाद उसे आत्महत्या दिखाने की गरज से किसी अन्य व्यक्ति ने ही उनके गले में फंदा लगाया होगा।

इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस पूरे हत्याकांड को अंजाम देने में जेल प्रशासन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पोस्टमार्टम के अनुसार डॉ. सचान की मौत 22 जून 2011 को सुबह 10 बजे के आस-पास हुई थी। जिला कारागार में नियमतः सुबह 6 बजे पहली गिनती होती है। उसके बाद रात 8 बजे तक चार बार बंदी रक्षकों की ड्यूटी बदलती है और हर बार कैदियों की गिनती की जाती है। घटना वाले दिन जेल प्रशासन यह तो कहता है कि गिनती के वक्त एक बंदी हर बार कम नजर आया लेकिन वह कौन था, इसके बारे में जानने की किसी ने कोशिश नहीं की, या फिर जान-बूझकर डॉ. सचान की अनुपस्थिति को नजरअंदाज किया जाता रहा। जांच के दौरान यह बात सामने आयी कि घटना वाले दिन सुबह साढे़ सात बजे एक सिपाही डॉ. सचान को रिमाण्ड के नाम पर अपने साथ ले गया था। आमतौर पर सिपाही जेल अस्पताल के भीतर आकर कैदियों को रिमाण्ड पर ले जाने के लिए पुकार लगाता है लेकिन डॉ. सचान को रिमाण्ड पर ले जाने के लिए जिस सिपाही ने पुकार लगायी थी, वह सिपाही अस्पताल गेट के बाहर ऐसे खड़ा था, जिसका चेहरा जेल अस्पताल में भर्ती किसी कैदी ने नहीं देखा।

गौरतलब है कि रिमाण्ड पर ले जाने से पूर्व बाकायदा लिखा-पढ़ी होती है। इस सम्बन्ध में जब न्यायिक जांच अधिकारी ने पर्ची के सम्बन्ध में पूछा तो कहा गया कि पर्ची प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे के पास है। इस सम्बन्ध में प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे (इनकी जिम्मेदारी कैदियों की प्रत्येक गणना के समक्ष अपनी उपस्थिति में ही करायी जाती है) ने न्यायिक जांच अधिकारी को जो बयान दिया वह बेहद चौंकाने वाला था। बकौल बाबू राम दुबे, ‘किसी ने अफवाह फैला दी है कि डॉ. सचान को अदालत रिमाण्ड पर भेजा गया है। जब मैं शाम 5 बजे आया, उस वक्त अफवाह फैल गयी थी कि डॉ. सचान अदालत गए हैं। बाबू राम दुबे के अनुसार घटना वाले दिन दोपहर करीब 11 बजे कैदियों की गिनती की गयी थी, उस वक्त सभी बंदी मौजूद थे। 11.30 बजे तक डॉ. सचान को तो उसने स्वयं जेल के अन्दर ही देखा था।

न्यायिक जांच अधिकारी का दावा है कि बाबू राम दुबे का यह बयान पूरी तरह झूठ पर आधारित था। बाबू राम दुबे ने बयान दिया था कि डॉ. सचान उसने जेल परिसर में ही देखा था जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. सचान की मौत 10 बजे ही हो गयी थी। रही बात ड्यूटी की तो घटना वाले दिन सुबह 8 बजे से 12 बजे तक की ड्यूटी पर बंदी रक्षक पहीन्द्र सिंह तैनात था। साफ जाहिर है कि प्रधान बंदी रक्षक का बयान पूरी तरह से झूठ पर आधारित था।

डॉ. सचान को डायरी लिखने की आदत शुरू से ही थी। लखनऊ जेल में भी वे डायरी लिखते थे। मौत के बाद जब उनकी वस्तुओं को खंगाला गया तो उनकी डायरी मिली। डायरी का पहला पेज फटा हुआ था। इसी आधार पर पुलिस ने सचान का सुसाइड नोट मिलने का दावा किया था सुसाइड नोट डॉ. सचान के शव के पास से बरामद नहीं हुआ। पुलिस ने सुसाइड नोट के सन्दर्भ में बताया था कि इस नोट में सिर्फ इतना लिखा है कि मैं निर्दोष हूं और मेरी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार न माना जाए। सुसाइड नोट पर सचान के दस्तखत न होने के कारण इसकी पुष्टि नहीं की जा सकी।

दूसरी ओर पत्नी का दावा है कि उनके पति की हत्या की गयी थी। गौरतलब है कि डॉ. सचान की पत्नी स्वयं एक चिकित्सक हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद उन्होंने दावे के साथ कहा था कि रिपोर्ट में अंकित चोटों और रिपोर्ट के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचती हूं कि यह हत्या का मामला है। मेरे और मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को घटनास्थल नहंी दिखाया गया, जिससे हम लोग उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष निकाल सकते। डॉ. सचान की पत्नी ने न्यायिक जांच अधिकारी के समक्ष बयान दिया था कि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनके पति ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी साजिशन हत्या की गयी है। घटना के अगले दिन उन्हें कोर्ट आना था, शायद कुछ लोगांे को आशंका हो गयी होगी कि कहीं उनका नाम न उजागर हो जाए, लिहाजा उनकी कोर्ट में पेशी से एक दिन पहले ही जेल में हत्या कर दी गयी। डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान के बडे़ भाई डॉ. आर.के. सचान डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में प्रमुख अधीक्षक के पद पर रह चुके हैं। न्यायिक जांच अधिकारी को दिए गए बयान में उन्होंने दावे के साथ कहा है कि मेरे भाई डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान की हत्या की गयी है, उसने आत्महत्या नहीं की। मैं किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं ले सकता, परन्तु विभाग में बैठे उच्च लोगों का हाथ हो सकता है। इन लोगों में उच्च अधिकारी से लेकर सम्बन्धित विभाग के मंत्री भी हो सकते हैं। डॉ. योगेन्द्र की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, उनकी हत्या का कारण विभाग का पैसा हो सकता है। डॉ. योगेन्द्र के बड़े भाई का यह बयान तत्कालीन सरकार के जिम्मेदार लोगों की तरफ इशारा करता रहा लेकिन बसपा की धुर-विरोधी सपा सरकार ने भी पूरे पांच वर्ष तक मामले के वास्तविक दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटायी।

हत्या को आत्महत्या का अमली जामा पहनाने में गोसाईंगज (लखनऊ) पुलिस ने भी पूरी कोशिश की। कारागार में रात्रि आठ बजे डॉ. सचान की लाश मिलती है। तत्काल घटना की सूचना शीर्ष अधिकारियों को दे दी जाती है। वायरलेस पर मैसेज भेजने में डेढ़ घंटे का समय लगाया जाता है। वायरलेस पर सूचना मिलते ही गोसाईंगज पुलिस रात्रि लगभग दस बजे जेल परिसर में पहुंचती है। चूंकि रात काफी हो गयी थी और जेल के टॉयलेट में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं थी लिहाजा टार्च की रोशनी और ड्रैगेन लाइट से लाश का मुआयना किया जाता है। रोशनी पर्याप्त न होने का हवाला देते हुए फ्रिंगर प्रिंट भी नहीं लिया जाता। फोटोग्राफी जरूर की जाती है। गोसाईगंज पुलिस घटना वाले स्थान को सील कर अगले दिन आने की बात करती है, इसी बीच डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह के कहने पर पुलिस टॉयलेट में दोबारा सर्च करती है। हैरत की बात है तो चन्द मिनट पहले तक पर्याप्त रोशनी न होने का बहाना कर पुलिस अगले दिन आने की बात करती है, वहीं डिप्टी जेलर के कहने पर सर्च के दौरान उसे डेªनेज के अन्दर से शेविंग करने वाला आधा ब्लेड उसे मिल जाता है। उस ब्लेड के एक तरफ खून लगा था जबकि दूसरी तरफ खून नहीं था। इसके अलावा मौके से कोई अन्य वस्तु नहीं मिली जो यह साबित कर सके कि उसी हथियार से डॉ. सचान ने आत्महत्या की होगी। गौरतलब है कि छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ की ओर से फोरेेंसिक विशेषज्ञों ने शपथ पत्र में लिखा है, ‘‘डॉ. सचान के शरीर पर 8 चोटें किसी शार्प वेपैन से आयी हैं और एक लिंगेचर मार्क हैं। लिंगेचर मार्क को मरने के बाद की चोट बतायी गयी। यह भी दावा किया गया कि जिस धारदार हथियार से डॉ. सचान को चोटें आयी हैं, वह धारदार हथियार भारी होगा, क्योंकि घाव पर इकीमॉसिस मौजूद थे। इसका मतलब है कि चोट किसी भारी धारदार हथियार से पहुंचायी गयी थीं, दाढ़ी बनाने वाले ब्लेड से चोटें नहीं पहुंचायी जा सकती थीं’’। फोरेंसिक विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद पुलिस को मिले ब्लेड (दाढ़ी बनाने वाला) का कोई महत्व नहीं रह जाता। तहसीलदार (मोहनलालगंज) जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने भी अपने शपथ पत्र में कहा है कि उनकी उपस्थिति में घटना स्थल से कोई भी धारदार हथियार नहीं मिला।

इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद जेलर बी.एस.मुकुन्द, डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह, प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे और बंदी रक्षक पहीन्द्र सिंह की भूमिका संदिग्ध बतायी गयी थी। हैरत की बात है कि न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद भी नामजद कथित दोषियों को पर्याप्त सजा नहीं दी गयी। कहा तो यहां तक जा रहा है कि यदि किसी एक को सजा मिलती तो निश्चित तौर पर पूरा मामला स्वेटर के धागे की तरह खुलता चला जाता। यहां तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा समेत कई मंत्री-विधायक सलाखों के पीछे नजर आते। यहां तक कि कई सफेदपोश नौकरशाह भी गिरफ्त में होते।

यूपी की राजधानी लखनऊ की अति सुरक्षित मानी जाने वाली जिला जेल में एक हाई-प्रोफाइल हत्याकांड को अंजाम दिया जाता है। हत्यारे हत्या करने के बाद पटल से गायब हो जाते हैं। चूंकि मामला हाई-प्रोफाइल एनआरएचएम के घोटालेबाजों से जुड़ा हुआ था लिहाजा तत्कालीन बसपा सरकार ने चन्द दिनों में ही हाई-प्रोफाइल हत्याकांड को आत्महत्या में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिना जांच किए सरकार की तरफ से आधिकारिक जानकारी भी दे दी गयी कि डिप्टी सीएमओ ने आत्महत्या कर ली। चिकित्सक का परिवार आत्महत्या की बात मानने को कतई तैयार नहीं था। चूंकि अभिरक्षा में कैदी की मौत होने पर न्यायिक जांच की प्रक्रिया है, लिहाजा जांच हुई। रिपोर्ट शासन के पास आयी तो सभी का चौंकना स्वाभाविक था। न्यायिक जांच में डिप्टी सीएमओ की मौत को तमाम सुबूतों के साथ हत्या करार दिया गया। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई से करवायी गयी। कथित हत्यारों की पहुंच का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता कि तमाम सुबूतों और न्यायिक जांच रिपोर्ट के बावजूद सीबीआई ने डिप्टी सीएमओ की मौत को आत्महत्या में तब्दील कर दिया। स्थिति यह है कि जिन्हें जेल में होना चाहिए था, वे आराम फरमा रहे हैं, जिनके नाम शक के आधार पर दर्ज किए गए थे वे आज भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं।

आगे है…

अदालत ने भी माना हत्या

क्या कहती है सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट?

क्या है एनआरएचएम घोटाला…?

हत्याकांड पर अखिलेश सरकार की रहस्यमयी चुप्पी

डॉ. योगेन्द्र सचान के बेटे का दावा

बलि का बकरा बने डॉ. शुक्ला-सचान!

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अखिलेश यादव पितृ हंता मुगल शासकों सरीखे! (देखें वीडियो)

आगरा में भाजपा प्रत्याशी का नामांकन कराने कलेक्ट्रेट आए सांसद राम शंकर कठेरिया ने यूपी के सीएम अखिलेश यादव की तुलना पिता के हत्यारे मुगल शासकों से कर दी. सांसद कठेरिया ने मुगल शासकों को उदाहरण देते हुए हुए बोले कि मुगल काल में शासक लोग सत्ता पाने के लिए अपने पिता तक की हत्या कर देते थे और राजपाठ पर कब्जा कर लेते थे. ठीक इसी तरह सीएम अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह को अपमानित करते हुए उनकी राजनीतिक हत्या कर पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद हथिया लिया.

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खुला पत्र : अखिलेश यादव जी, अवाम की नज़र में आपकी छवि एक कायर नेता की हो गई है

माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी के नाम खुला पत्र…..

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध…

माननीय मुख्यमंत्री जी, आज दैनिक अमर उजाला में आपका एक वक्तव्य पढ़ा आपने एक कार्यक्रम दौरान अपने संबोधन में कहा है कि…”हम वैसे ही काम कर रहे हैं जैसे गार्जियन की इच्छा”… अखिलेश जी, 2017 में अगर उत्तर-प्रदेश में फ़ासिस्ट ताक़तों की फिरकापरस्त हुक़ूमत मुसल्लत हुयी और उत्तर-प्रदेश की सेक्युलर अवाम को फ़िरक़ा परस्तो के हाथों में सौपा गया तो जितनी ज़िम्मेदारी आपके चाचा शिवपाल जी,आपके पिता जी मुलायम सिंह यादव जी की होगी उससे कहीं बढ़कर इसके ज़िम्मेदार आप ख़ुद होंगे।सिर्फ ये कहने भर से की जैसे बड़ो की मर्ज़ी…से आप अपने दामन को नहीं बचा सकते।

उत्तर-प्रदेश की अवाम ने आपको अपना नेता माना तो अवाम आपसे ये तवक़्क़ो भी रखती है कि विपरीत परिस्तिथि में आपको कठोर क़दम उठाना चाहिये था,हक़ और बातिल की जंग में हक़ परस्ती का क़ायदा बन कर उभारना चाहिये था,आप सिर्फ अब नेता जी के बेटे नहीं,शिवपाल चाचा के भतीजे ही नहीं बल्कि 4.5 करोड़ की आबादी के सरपरस्त भी हैं,आप न तो अच्छे बेटे ही साबित हो पाए और न ही अच्छे सरपरस्त…या तो आपको अपने परिवार के आगे बिलकुल हथियार डाल देने चाहिये थे और चुपचाप पद से इस्तीफा दे कर वापस ऑस्ट्रिलिया चले जाना चाहिये था ताकि कम से कम एक आदर्शवादी बेटे की छवि तो बनी रहती आपकी…

फिर अगर अवाम का क़ायद बनने का जज़्बा वाक़ई आपके दिल में था तो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आपको अपनी आवाज़ बुलंद करते हुये खड़े हो जाना चाहिये था।अखिलेश जी ये जम्हूरी निज़ाम है यहाँ दोनों हाथ में लड्डू नहीं चलते, अवाम को इतना भी बड़ा बेवक़ूफ़ मत समझीये की वो आपको इतनी आसानी से माफ़ कर देगी वो भी तब की जब अवाम हर कदम पर हर फैसले में आपके साथ शाना ब शाना खड़ी हुई, बुज़ुर्गों की दुआ आपके साथ,नोवजवां का खून आपके साथ,बच्चो का प्यार आपके साथ… और क्या चाहिये था आपको साहब…मगर आपको डर सता रहा था अपना इख़्तेदार जाने का, आप डर गए फैसला लेने से.

मौजूदा वक़्त में अवाम की नज़र में आपकी हैसियत अब सिर्फ एक कायर नेता की बची है जिसको हमेशा कुर्सी जाने का डर सताता रहा…मुस्लिम वोटों पर हुक़ूमत में आप आये तो आपको थोड़ा तारीख़े इस्लाम भी पड़ना चाहिये था…अगर मेरे हुसैन ज़ालिम के हाथ पर बैत कर जाते तो आज इस्लाम का वुजूद न होता…और इस वक़्त आपकी कारगर्दगी बता रही है कि आपमें वो जज़्बा इच्छाशक्ति नहीं है कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ परचम बुलंद कर पाएं और इतिहास में अमर हो जाएं,आपकी कायरता ये बयां कर रही है कि आप कितना भी विकास पुरुष होने का डंका पीट लें मगर अब अवाम की नज़र में आप कायर पुरुष ही हैं…

अखिलेश जी, संघर्ष की कोख से नायक जन्म लेता है और अब आप नायक नहीं खलनायक बन कर सामने आये हैं…न तारीख माफ़ करेगी, आपको और न अवाम… अखिलेश जी, आप सियासत में हारे हुए उस राज कुमार की तरह नज़र आरहे हैं जिसके सामने शतरंज की सारी बिसात पलट गयी और राजकुमार अपनी बारी का ही इंतेज़ार करता रहा… अखिलेश जी, इतिहास “बारी” को न लिखता है न याद करता है, इतिहास हमेशा फैसले को मान्यता देता है…

डॉ. एस. ई. हुदा
नेशनल कन्वेनर
हुदैबिया कमेटी
बरेली

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कनफ्यूज अखिलेश : पल भर में रंग बदलने वाला एक युवा नेता

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक बार फिर अपने यू-टर्न वाले स्वभाव के कारण चर्चा में आ गये है। पहले तो अखिलेश सरकारी फैसलों को पलटने के लिये बदनाम थे, अब समाजवादी परिवार के भीतर और संगठनात्मक स्तर पर भी वह ऐसा करने लगे हैं। बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय का खुलकर विरोध करने वाले और एक बार विलय को रोक देने में सफल रहे अखिलेश अब जबकि उनके बाप-चचा की मेहरबानी से कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय हो गया है तो इसके विरोध में एक भी शब्द नहीं बोल पा रहे हैं।

इसी तरह पहली बार जब उनके करीबियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था तब तो अखिलेश ने खूब हाय-तौबा मचाई और उनको फिर पार्टी में वापस भी करा लिया, लेकिन जब उनके चचा शिवपाल यादव प्रदेश सपा के अध्यक्ष बने तो एक बार फिर अखिलेश के करीबियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और अखिलेश कुछ नहीं कर पाये। अखिलेश से प्रदेश अध्यक्ष का पद छीन लिया गया,लेकिन वह हाय-तौबा मचाने की बजाये मूक बने रहे। प्रदेश का अध्यक्ष पद उनके न चाहने के बाद भी यूटर्न लेता हुए शिवपाल यादव के पास आ गया। ऐसा ही ‘यू-टर्न‘ अखिलेश सरकार के अंतिम मंत्रिमंडल विस्तार में देखने को मिला। पहले तो अखिलेश ने तैश में आकर विवादास्पद और उलटे-सीधे कामों में लिप्त कुछ मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन जब बाप-चचा की त्योंरियां चढ़ी तो फिर से इन्हें वापस मंत्रिमडल में पनाह दे दी। अखिलेश ने यह सब नजारा चुनावी साल में दिखाया। वह भी तब जब चुनाव आयोग की टीम चुनावी तैयारियों के सिलसिले में यूपी में डेरा डाले हुए थी।

बात सरकारी स्तर पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के यू-टर्न लेने की कि जाये तो इसके तमाम वाक्ये मिल जायेंगे। सरकार बनते ही अखिलेश ने देर रात्रि तक खुलने वाले मॉल के खुलने का समय घटा दिया था। मकसद था कि इससे बिजली की बचत होगी, परंतु विरोध के बीच उन्हें यह फैसला कुछ घंटो के भीतर ही बदलना पड़ गया। चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश ने वायदा किया था कि अगर सपा की सरकार बनेगी तो मायावती के सभी घोटालों की जांच की जायेगी,लेकिन बाद में वह इस वायदे को या तो भूल गये होंगे या फिर इससे पलट गये होंगे। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सरकार गठन के बाद विधायकों को विधायक निधि 20 लाख तक की कार लेने का फैसला किया, फिर जन दबाव में हाथ खड़े कर लिये। सपा की सरकार बनने पर सभी हाईस्कूल पास छात्रों को टॅबलेट और इंटर पास छात्रों को लैपटॉप देने का वायदा किया था, मगर जब सरकार बनी तो सिर्फ मेधावी छात्रों तक इसे सीमित कर दिया गया।

अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में पुलिस कर्मियों को गृह जनपद में तैनाती देने का फैसला किया। इस फैसले पर खूब वाहवाही बटोरी और फिर अपनी बात से पलट गये। चीनी मिलों की जांच कराने का वादा किया, फिर इस वायदे से तौबा कर ली। बलराम यादव को मंत्री पद से बर्खास्त किया और फिर मंत्री पद पर वापस दे दिया। हाल ही मे हद तो तब जो गई जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चचा  शिवपाल यादव के 10 में 8 विभाग वापस ले लिए और जब चचा ने मंत्रिमंडल से इस्तीफे की धमकी दी तो फिर पिताजी की फटकार के बाद उन्हें सम्मान सहित एक विभाग छोड़कर सब विभाग वापस कर दिये। इतना ही नहीं और तीन नए विभाग भी चचा को ईनाम में दे दिये। इसी तरह से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नोएडा के भ्रष्ट चीफ इंजीनियर यादव सिंह की पहले बहाली की और बाद में ज्यूडीशियल जांच के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने सें मना कर दिया, लेकिन बाद में कर हस्ताक्षर कर दिया। दीपक सिंघल को पहले मुख्यमंत्री मुख्य सचिव नहीं बनाने को राजी थे, पर बाद में बना दिया और अंततः हटा भी दिया।

पूरे कार्यकाल के दौरान अखिलेश ने अपने मंत्रिमडल सें 17 मंत्री बर्खास्त किये, लेकिन इसमें से सात मंत्रियों को न चाहते हुए भी उन्हें दबाव में वापस मंत्रिमडल में लेना पड़ गया। मंत्री गायत्री प्रजापति को लेकर सपा परिवार में जिस तरह का सियासी संग्राम छिड़ा, उसके बाद उनकी वापसी और वापसी के बाद नेता जी के चरणों में पड़े मंत्री जी की फोटो अखबारों की सुर्खियांें में रही। बर्खास्त हो चुके मंत्रियों शिवाकांत ओझा और मनोज पांडेय की भी अखिलेश मंत्रिमंडल में वापसी खूब चर्चा में रही। इससे पहले विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह, नारद राय और रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया को लेकर भी अखिलेश  ‘यू-टर्न‘ लेते नजर आ चुके थे। रघुराज प्रताप सिंह का मामला थोड़ा अलग है पर ‘यू-टर्न‘ में उसका रिश्ता बनता ही है।

अखिलेश सरकार बनने के चार महीने बाद से ही यह चर्चा शुरू हो गई थी कि अखिलेश खुल कर कोई स्टैंड नहीं ले पाते हैं। इसी लिये उन्हें बार-बार फैसले बदलना पड़ते हैं,लेकिन एक वर्ग ऐसा भी था जो शुरूवाती दौर में इसे मुख्यमंत्री की लोकतंत्र के प्रति आस्था के तौर पर प्रचारित कर रहा था,परंतु बाद में यह अखिलेश की कमजोरी समझी जाने लगी। अखिलेश सरकार ने चाहे जिन कारणों सें फैसले वापस लिए हों पर इनकी तादाद और तरीके ने सरकार की बेहद भद कराई।अब तो लोग कहने भी लगे हैं कि अखिलेश पल भर में बदल जाने में महारथ रखते हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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बंटवारे की ओर बढ़ती सपा में बगावत

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के तेवर हल्के होने का नाम नहीं ले रहे हैं। बाप-चचा की तमाम ‘घुड़कियों’ और ‘अपनों’ के खिलाफ कार्रवाई से तिलमिलाए अखिलेश ‘जख्मी शेर’ बनते जा रहे हैं। विकास और स्वच्छता की राजनीति के कायल अखिलेश से जब उनके बुजुर्गो ने यही दोंनो ‘हथियार’ उनसे छीन लिये तो अखिलेश के पास कहने-सुनने को कुछ नहीं बचा। दागी अमनमणि को टिकट दिये जाने पर तो उन्होंने यहां कह दिया,‘मैंने सारे अधिकरी छोड़ दिये हैं।’

लेकिन इसके साथ यह कह कर कर सनसनी भी फैला दी, ‘अभी इंतजार कीजिये, तुरूप का पत्ता सामने आने दीजिये, किसका तुरूप भारी पड़ेगा, यह तो वक्त बतायेगा। जनता तय करेगी किसको सरकार में लाना है।‘ अखिलेश ने यह बात लखनऊ में विधान भवन के समाने बने लोक भवन का उद्घाटन करने के बाद मीडिया के सवालों के जबाव में तब कही जबकि उनके बगल की कुर्सी पर बैठे पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान लगातार उनका हाथ ऐसा न कहने के लिये दबाये जा रहे थे। इससे अखिलेश की नाराजगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ बात सपा प्रमुख मुलायम सिंह की नाराजगी की कि जाये तो उनका भी पारा सांतवें आसमान पर चढ़ा है। लोक भवन का जब फीता काटने की बात आई तो यहां नेताजी ने फीता काटने से इंकार कर दिया। यहां भी आजम ने किसी तरह मुलायम से फीता कटवा कर माहौल शांत किया।

अखिलेश की तमाम बयानबाजियों को अनदेखा भी कर दिया जाये तो भी सियासी पंडित अखिलेश यादव के तुरूप के पत्ते वाले बयान को हल्के में लेने को तैयार नहीं है। यह तुरूप का पता क्या हो सकता है ? इस संबंध में जो कयास लगाये जा रहे हैं, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि अखिलेश कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। इसमें अधिकार छोड़ने के साथ ही पार्टी से बगावत करके नया दल बनाने के अलावा, पार्टी का चुनाव प्रचार शुरू करने से पहले कुछ शर्तों को रखना या अपने आप को प्रचार से दूर कर लेने की घोषणा कर देना,सीएम पद छोड़ देना,विधान सभा भंग कर देना, जैसे फैसले हो सकते हैं। चुनाव से पूर्व रथ यात्रा के माध्यम से जनता से संवाद स्थापित करने का कार्यक्रम अखिलेश रद्द कर ही चुके हैं और यह बताने को भी तैयार नहीं है कि क्या यह यात्रा भविष्य में निकाली जायेगी। इसी प्रकार से मेट्रो ट्रेन का शिलान्यास करने कानपुर  पहुंचे अखिलेश ने   ,‘सीएम का चेहरा तो मैं ही’ वाला बयान देकर शिवपाल खेमे में खलबली मचा दी है,जबकि शिवपाल कह रहे थे सीएम का फैसला चुनाव नतीजे आने के बाद विधायक करेंगे।   

सियासत के जानकार समाजवादी पार्टी में मचे उठापटक के बाद यह बात दावे से कहने लगे हैं कि अगर समय रहते समाजवादी पार्टी के कर्णधारों की आंखे नहीं खुली तो पार्टी का बंटावारा भले न हो लेकिन  2017 के विधान सभा चुनाव में सपा का बोरिया-बिस्तर बंधना निश्चित है। सपा के भीतर जो ‘महाभारत’ मचा हुआ है, उसमें मुलायम धृतराष्ट्र, शिवपाल‘ ‘दुर्योधन’ और सपा का युवा चेहरा अखिलेश ‘भीष्म पितामाह’ की तरह लाचार नजर आ रहे हैं। बस फर्क इतना है कि महाभारत में भीष्म पितामाह अपने बच्चों के समाने लाचार थे तो ‘सियासी महाभारत’ में पुत्र अखिलेश की ऐसी ही स्थिति अपने बाप-चचाओं के कारण हो रखी हैं। मुलायम-शिवपाल अपने ही घर के ‘चिराग’ अखिलेश यादव और उनकी सरकार को ‘बुझा’ देने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे है। अखिलेश से बिना विचार-विमर्श के एक के बाद एक अनाप-शनाप फैसले मुलायम-शिवपाल बंधु करते चले जा रहे हैंं। अपनों से ही इतने ‘जख्म’ मिलने के बाद कोई कैसे सिर उठाकर जी सकता है।

सपा में अखिलेश की जैसी धमाकेदार इंट्री हुई थी,वैसे ही उनका विरोध परवान चढ़ रहा है। अखिलेश को 2012 के विधान सभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान ‘मुलायम ब्रिगेड’ ने तब आगे किया था,जब उन्हें अच्छी तरह से यह समझ में आ गया था कि यूपी का मतदाता मुलायम राज के गुंडाराज को भूल नहीं पाया है।उसे डर सता रहा है कि अगर समाजवादी पार्टी को वोट दिया तो यूपी में फिर से गुंडाराज रिटर्न हो सकता है। 2003 से 2007 तक सत्ता में रही मुलायम सरकार की कानून व्यवस्था को लेकर काफी किरकिरी हुई थी। उस दौर में सत्तारूढ़ दल के बड़े नेताओं द्वारा गुडांे को संरक्षण दिये जाने के चलते जनता त्राहिमाम करने लगी थी। इसी लिये मतदाता फिर से मुलायम को सत्ता सौंपने के बजाये, बसपा राज के भ्रष्टाचार को भी अनदेखा करने को तैयार नजर आ रहे थे। इस बात का अहसास मुलायम टीम को हुआ तो उन्होंने अखिलेश को आगे करके हारी हुई बाजी जीतने की जुगत शुरू कर दी।

अखिलेश युवा थे। पढ़ाई लिखाई भी अच्छी की थी। उन्होंने सियासत को अपने घर के आंगन में पलते-बढ़ते देखा था। इस लिये राजनीति का क्षेत्र उनके लिये नया नहीं था। युवा अखिलेश ने बाप मुलायम का आदेश पाते ही तुरंत मोर्चा संभाल लिया,जो अखिलेश मात्र एक नेता की तरह मुलायम के अधीन प्रचार अभियान का अंग बने हुए थे,उनके लीडर बनकर  मोर्चा संभालते ही बुझे-बुझे से समाजवादी नेताओं और कार्यकर्ता में नये जोश का संचार होने लगा। अखिलेश ने तमाम मंचों से जनता को यकीन दिलाया कि अगर वह सपा को वोट देंगे तो यूपी में ‘गुंडराज रिटर्न’  नहीं होगा। गुंडे सलाखों के पीछे रहेंगे। एक तरफ वह गुंडों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ मायावती सरकार के भ्रष्टाचार को भी खुलकर उजागर कर रहे थे।

अखिलेश ने सपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिये एक तरफ रथ यात्रा निकाली तो दूसरी तरफ यह भी बताते जा रहे थे कि अगर उनको (सपा को) मौका दिया गया तो प्रदेश मे विकास की गंगा बहेगी। अखिलेश कमांडर की तरह सियासी मोर्चे पर आगे बढ़ते जा रहे थे तो सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से लेकर सपा के तमाम छोटे-बड़े नेता उनके पीछे हाथ बांधे खड़े प्रतीत हो रहे थे। अखिलेश की जनसभाएं अपने क्षेत्र में कराने की मांग सपा के तमाम उम्मीदवारों की तरफ से होने लगी थीं। मुलायम दूसरे पायदान पर थे, तो शिवपाल यादव सहित सपा के तमाम दिग्गज नेताओं की जनसभाएं अपने इलाके में कराने की मांग कोई नेता नहीं कर रहा था। यह कसक मुलयाम को छोड़ सपा के सभी दिग्गज नेताओं के चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी,लेकिन सत्ता की भूख में सब ने अपने मुंह पर ताला लगा रखा था। मगर सियासत के जानकारों की पारखी निगाहों को पता चल गया था कि सपा में मुलायम युग अस्तांचल की ओर हैं और अखिलेश युग शुरू होने जा रहा है। ’वृंदावन में रहना है तो राधे-राधे कहना है।’ की तरह ही समाजवादी पार्टी में भी सब लोग ‘अखिलेश-अखिलेश’ कहने लगे थे।

बदलाव प्रकृति का नियम है यह बात सपा के कुछ बड़े नेताओं को स्वीकार्य नहीं हो रही थी। यह वह लोग थे जिनके कंधो पर चढ़कर अखिलेश इस मुकाम तक पहुंचे थे, तो बदले माहौल में यही लोग अखिलेश के कंधे पर बैठकर अपने हित साधने का सपना देख रहे थे। इसमें पिता मुलायम सिंह, चचा शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव, आजम खॉ जैसे तमाम नेता शामिल थे। अखिलेश के सहारे पिता मुलायम 2014 में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे तो शिवपाल यादव को लग रहा था कि भले ही चुनाव प्रचार में भतीजा अखिलेश बाजी मार रहा हो,लेकिन उनके (शिवपाल) अनुभव के आगे भतीजा अखिलेश कहीं टिक ही नहीं सकता है। मुलायम सिंह देश का पीएम बनने का ख्वाब पाले थे तो मुलायम के पश्चात शिवपाल यादव यूपी का मुख्यमंत्री बनने लायक नेताओें में अपने आप को सबसे काबिल समझ रहे थे।

एक तरफ अखिलेश प्रदेश की जनता से संवाद करके उन्हें सपा के पक्ष में करने में लगे थे तो दूसरी तरफ सपा के कई दिग्गज नेता चुनाव के बाद पैदा होने वाले हालात के मद्देनजर बेहद चालकी से पांसे फांकते हुए अपने आप को सबसे बेहतर प्रोजेक्ट करने में लगे थे। चुनावी बेला में बाहुबली डीपी यादव को समाजवादी पार्टी में लाये जाने की कोशिश इसी कड़ी का एक हिस्सा था,जिसकी अखिलेश ने ठीक वैसे ही हवा निकाल दी थी, जैसे बाद में बाहुबली मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के साथ उन्होंने किया। इससे जनता के बीच अच्छा संदेश गया था। 

कुछ महीनों के भीतर ही अखिलेश ने चुनावी बेला में पिछड़ती नजर आ रही सपा के पक्ष में माहौल बना दिया था। नतीजों ने भी इस बात की गवाही दी। मार्च 2012 के विधान सभा चुनाव में 224 सीटें जीतकर मात्र 38 वर्ष की आयु में ही वे उत्तर प्रदेश के 33वें मुख्यमन्त्री बन गये। अखिलेश का मुख्यमंत्री बनाना शिवपाल यादव की सियासी मंशाओं के लिये किसी कुठाराघात से कम नहीं था,जो शिवपाल सीएम बनने का सपना देख रहे थे, उनके सामने भतीजे के नीचे ‘काम’ करने की मजबूरी आ गई।

सत्ता चीज ऐसी है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहता है। शिवपाल हों या फिर अखिलेश के अन्य चचा सब की सब भतीजे की सरकार में शामिल तो हो गये, लेकिन माथे पर शिकन साथ नजर आ रही थी। यह संकेत अखिलेश की भावी सियासत और सरकार के लिये अच्छे नहीं थे। इस बात का अहसास जल्द अखिलेश को हो भी गया जब उनकी सरकार बनने के छहः माह के भीतर ही जुलाई 2012 में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उनके कार्य की आलोचना करते हुए व्यापक सुधार का सुझाव दिया,जिससे जनता में  यह सन्देश गया कि सरकार तो उनके पिता और चाचा ही चला रहे हैं, अखिलेश नहीं। यह बात इस लिये पुख्ता भी हो रही थीं, क्योंकि अखिलेश बाप-चचाओं की ‘छाया’ से बाहर नहीं निकल पा रहे थे।

अखिलेश सरकार को दूसरा झटका तब लगा जब खनन माफियाओं के खिलाफ मोर्चा खोले एक आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को उन्होंने बाप-चचाओं के दबाव में आकर निलम्बित कर दिया। इस पर चारों ओर से उनकी आलोचना हुई। जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें नागपाल को बहाल करना पड़ा। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में 43 व्यक्तियों के मारे जाने व 93 के घायल होने पर कर्फ्यू लगाना पड़ा तथा सेना ने आकर स्थिति पर काबू किया। मुस्लिम व हिन्दू जाटों के बीच हुए इस भयंकर दंगे से उनकी सरकार की बेहद किरकिरी हुई। इस बीच अखिलेश ने अपने कई फैसलों पर ‘यूटर्न’ लेकर लोंगो को बातें बनाने के और मौके प्रदान कर दिये।

एक तरफ ‘अपनों’ की हठधर्मी के कारण जनता के बीच अखिलेश सरकार की किरकिरी हो रही थी,तो दूसरी तरफ पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अखिलेश की अनुभवहीनता पर चटकारे ले रहा था। अखिलेश पर दबाव साफ नजर आ रहा था,लेकिन इस दौरान जनता के बीच उनकी छवि नायक जैसी  बनी हुई थी। अखिलेश अनुभवहीनता और चचाओं की दखलंदाजी के बावजूद ईमानदारी से अपनी सरकार चला रहे थे। इसी बीच किसी तरह अखिलेश सरकार ने दो वर्ष का कार्यकाल पूरा किया और 2014 के लोकसभा चुनाव आ गये। पूरे  देश का सियासी वातावरण मोदीमय हो गया। यूपी भी इससे अछूता नहीं रहा। 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन ने जीत ली। न राहुल गांधी का क्रेज दिखा, न माया-मुलायम का जादू चला। सपा 05, कांग्रेस 02 सीट पर सिमट गई और बसपा का तो खाता ही नही खुला। राष्ट्रीय लोकदल जैसे छोटे-छोटे दलों के तमाम उम्मीदवार तो अपनी जमानत भी नहीं बचा सके।

सपा के तमाम दिग्गज और अनुभवी नेता परास्त हो गये, लेकिन इसका ठीकरा अखिलेश के सिर पर फोड़ दिया गया। यह बात हाल ही में तब और साफ हो गई जब मुलायम ने यहां तक कह दिया कि अगर उन्होंने शिवपाल की बात मानी होती तो 2014 में वह पीएम बन जाते। मुलायम के मुंह से यह बात निकलना थी और शिवपाल ने इस बात को पकड़ लिया। शिवपाल यादव को उन अमर सिंह का भी अदृश्य सहयोग मिल रहा था, जिन्हें हाल ही में अखिलेश ने अंकल मानने तक से ही इंकार कर दिया था। इसी लिये जब नेताजी ने अखिलेश से उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी की अध्यक्षी छीन कर शिवपाल को सौंपी तो अमर सिंह ने अखिलेश को चिढ़ाने के लिये शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने की खुशी में दिल्ली में एक शानदार दावत दे दी। इसके बाद जो कुछ हुआ वह तमाम अखबारों में काफी कुछ छप चुका है, जिसको दोहराया जाना शायद जरूरी नहीं है।

अखिलेश का भ्रष्टाचार की आड़ में मुलायम और शिवपाल के चहेते नेताओं की मंत्रिपद से बर्खास्ती, दोंनों नेताओं के करीबी नौकरशाहों के पर कतरना, शिवपाल का मंत्री पद से इस्तीफा। अमर सिंह को सपा का राष्ट्रीय सचिव बनाया जाना, शिवपाल द्वारा प्रदेश सपा की अध्यक्षी संभालते ही अखिलेश के करीबियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना और अखिलेश के निकट के नेताओं का विधान सभा के लिये टिकट काटना। तमाम प्रकरण हैं। जिससे यह साबित किया जा सकता है कि मुलायम और शिवपाल अखिलेश के खिलाफ एकजुट हो गये हैं। किसी को यह चिंता नहीं है कि इससे पार्टी का क्या हश्र होगा। अखिलेश की साफ-सुथरी छवि को बाप-चचाओं ने तार-तार कर दिया है।

लब्बोलुआब, यह है कि समाजवादी पार्टी एक बार फिर उसी ढर्रे पर चल पड़ी है, जिससे डरकर 2012 में सपा के थिंक टैंक ने अखिलेश को आगे किया गया था। अब मुख्तार अंसारी के सपा से गठबंधन की चर्चा होती है।भ्रष्टाचार में सिर से लेकर पैर तक डूबे मंत्री गायत्री प्रजापति आदि नेताओं की सीएम के न चाहने के बाद भी मंत्रिमण्डल में वापसी हो जाती है। कवियत्री मधुमिता की हत्या के जुर्म में जेल की सलाखों के पीछे उम्र कैद की सजा काट रहे अमरमणि त्रिपाठी के उस बेटे को शिवपाल सपा का प्रत्याशी घोषित कर देंते हैं जिसके ऊपर पत्नी की हत्या का आरोप लगा है। अतीक अहमद जैसे बाहुबली एक बार फिर सपा में अपने लिये जमीन तलाशने लगते हैं। कई दागी भी शिवपाल से करीबी के चलते टिकट हासिल कर लेते हैं।

हालात यहां तक पहुंच जाते हैं कि परिवार का सियासी घमासान घर में भी दीवारें खड़ी कर देता है, लेकिन इस सब से अंजान सपा प्रमुख यही दोहराते रहते हैं कि जिस सपा को उन्होंने खून-पसीने से सींचा उसे वह ऐसे खत्म नहीं होने देंगे। उन्हें यही नहीं पता कि सपा में विभीषण कौन है ? जनता किसे पसंद और किसे नापसंद करती है ? इतना ही नहीं मुलायम स्वयं के बारे में भी आकलन नहीं कर पा रहे हैं कि अब उनमें वह बात नहीं रही है जिसके बल पर वह सियासत का रूख बदल दिया करते थे। आज तो वह सिर्फ ‘इस्तेमाल’ किये जा रहे हैं और इस्तेमाल करने वाले उनके अपने ही हैं, जिनके मोह में फंस कर वह ‘धृतराष्ट्र’ जैसे हो गये हैं। जिन्हें कुछ दिखाई तो नहीं दे ही रहा है और सुनना वह (मुलायम) चाहते नहीं हैं।

पूरे परिवार का एक ही दर्द है कि कुछ वर्षो के भीतर ही उनका बेटा-भतीजा इतना सशक्त कैसे हो गया कि बाप-चचा को आंख दिखाने लगा है। इस पूरे सियासी खेल में ‘त्रिकोण’ का बहुत महत्व देखने को मिल रहा है। जहां एक तरफ खुले मोर्चे पर मुलायम, शिवपाल और अखिलेश नजर आ रहे हैं, वहीं तीन महिलाओं की भूमिका भी पूरे खेल में ‘द्रौपदी’ जैसी मानी जा रही है। इसमें दो परिवार की और एक ब्यूरोक्रेसी की वरिष्ठ महिला अधिकारी शामिल है। बात यहीं तक सीमित नहीं है जिस तरह से कुछ बाहुबलियों और हत्या के आरोपियों को सपा में विधान सभा का टिकट महिमामंडित किया जा रहा है,उसे देखते हुए तमाम लोग सपा में गुंडाराज रिटर्न की बात करने लगे हैं। अगर ऐसा हुआ तो अपनी छवि को बचाये रखने के लिये अखिलेश कोई बढ़ा फैसला ले सकते हैं।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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उ.प्र. सपा के किले में दरार : टीपू से टीपू सुल्तान बनने के अखिलेश के मंसूबों पर फिर गया पानी

अलग-अलग चाहर दिवारियों से समय-समय पर झर-झर के बाहर आये बयान जिन्हें पाठकों की सुविधा के लिए, सिलसिलेवार नीचे परोसा गया हैं, तो यही संकेत दे रहे हैं कि “टीपू“ से “टीपू सुलतान“ बनने के अखिलेश (घर परिवार में टीपू) के मंसूबों पर पूरी तरह पानी फिर गया है।

-सारा झगड़ा मुख्यमंत्री की उस कुर्सी का है, जिस पर मै बैठा हूँ। –अखिलेश यादव

-मुझे मुख्यमंत्री पद की कोई ख्वाहिश नहीं है, अखिलेश मेरे बेटे की तरह हैं। उन्हें अक्ल से काम लेना चाहिए। उन्हें अनुभव की जरूरत है। –शिवपाल सिंह

-अखिलेश अगर शिवपाल को राज्य में सपा का मुखिया बनाने से नाखुश हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि राजनीति में उनका कभी कोई अपना कद नही था।  –मुलायम सिंह

-अमर सिंह नेताजी की सरलता का लाभ उठा कर पार्टी को नुक्सान पहुँचाचा रहे हैं । उनका सपा से कुछ लेनादेना नही है। — रामगोपाल यादव

-अमर के बारे में क्या जानते हो? वे उस वक्त साथ थे जब पार्टी के नेता साथ छोड़ रहे थे। कॉंग्रेस ने जब मेरे खिलाफ सीबीआई जांच कराई तब किसने मदद की बताओ? केवल अमर सिंह ने। — मुलायम सिंह

सूबे की सत्ता सम्भाले बैठी संयुक्तपरिवारवादी पार्टिं के घर के भीतर में सब कुछ ठीक ठाक नही है। मामला 2012 से ही भीतर ही भीतर खौल रहा है। पार्टी में नम्बर दो की हैँसियत और राजनीति के दांव-पेंच, उठापटक, पैंतरेबाजी में अपने बड़े भाई मुलायम सिंह (नेता जी) की तरह माहिर खिलाड़ी शिवपाल अच्छी तरह जानते हैं कि नेताजी अपनी बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ के कारण अब किस सीमा तक राजनैतिक चुनौती झेल पाएंगे। ये चुनौती शिवपाल सिंह ने पार्टी और सरकार के सभी पदों से इस्तीफे दे कर दे भी दी। इसके बाद लखनऊ में घटनाक्रम ने जिस तरह करवट बदली, उससे लोगो के बीच यही सन्देश गया कि- अखिलेश को कुर्सी पर मुख्यमंत्री का अभिनय करने के लिए ही बिठाया गया था और 2017 के चुनाव तक भी उनसे यही अपेक्षा रहेगी। 

राजनीति का लिवास ओढ़े भृष्टाचारी, भू-माफिया, अराजक और गुंडा तत्वों के हौसले बुलंद हैं- ये किस्से अखबारों की सुर्खियां तो बनते ही रहे है साथ ही सड़कों, गली मोहल्लों में आम चर्चा का विषय भी बन चुके हैं। पार्टी में अंदरूनी उठा पटक की नब्ज पर पकड़ रखने वालों की माने तो प्रो0 यादव के सर भू-माफियाओं को संरक्षण देने का ठीकरा फोड़े जाने के प्रयास उच्च स्तर पर चल रहे हैं। मथुरा का जय गुरुदेव आश्रम ट्रस्ट पर उनके ड्राइवर पंकज यादव की ताजपोशी का मामला हो या मथुरा में ही जवाहर बाग़ पर रामबृक्ष यादव के कब्जे का मामला दोनों ही मामले पूरे प्रदेश में एक पखवाड़े से ज्यादा राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियों में रहे हैं। उस समय भी इन मामलों की आंच ने प्रदेश के प्रथम परिवार को लपेटे में लिया था। इन बातों से चौकन्ना होकर अखिलेश पिछले डेढ़ साल से पार्टी की छवि को मांजने, धोने-पोंछने और चमकाने में लगे रहे। साथ ही वो इस बात का भी भरसक प्रयास करते रहे कि सूबे में विकास और सामाजिक सशक्तिकरण की जो योजनाएं उनकी सरकार ले के आई है, उनका लाभ और स्वाद आमजन को चुनाव से पहले मिल जाये। इसके लिए जरूरी था कि वो बतौर मुख्यमंत्री अपनी “कठपुतली छवि“ को बदलें। निर्णय लेने में स्वतंत्र और उन्हें लागू कराने में मजबूत मुख्यमंत्री के रूप में अपने को स्थापित करें। पिछले डेढ़ वर्ष से वह यही तो कर रहे थे। अलबत्ता लोगों को इसका एहसास पिछले छः माह से होने लगा था।


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मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय का मामला हो, मुख्य सचिव आलोक रंजन की सेवा निबृति के बाद इस कुर्सी पर अपने पसंदीदा प्रवीर कुमार को बिठाने का मामला हो,  चार साल में तीन बार मंत्री पद की शपथ और हर बार एक सीढ़ी ऊपर उठाये जा रहे गायत्री प्रजापति को राज्य मंत्री फिर राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और फिर केबिनेट मंत्री बनाये जाने का मामला हो,  गायत्री प्रजापति व राजकिशोर की बर्खास्तगी का हो, या शिवपाल सिंह के सभी विभागों की वापसी (पीडब्ल्यूडी छोड़ कर) का रहा हो या फिर “बाहरी“ (अमर सिंह) का विरोध करने का, हर मामले में अखिलेश को “थूके को चाटने“ जैसी स्थिति का ही  सामना करना पड़ा है।

इतिहास भी किस तरह अपने को दोहराता है इसका अंदाजा मुलायम सिंह को शायद उस समय न रहा होगा जब उन्होंने अपने बेटे को प्यार में टीपू कहना शुरू किया होगा। इतिहासिक टीपू सुल्तान की उम्र , जब पहली बार उन्होंने अंग्रेज फौजों से अपने राज्य को बचाने के लिए युद्ध लड़ा (सन 1792) और उन्हें शिकस्त दी, मात्र 42 वर्ष थी। आज जब उ0प्र0 में “टीपू“ –  “टीपू सुलतान“ बन कर उभरने के लिए राजनैतिक समर में संघर्ष कर रहा है, तब उसकी उम्र भी 42 वर्ष की ही है। ये बात दूसरी है कि इस टीपू का बाप जिन्दा है और उसने इस राजनैतिक समर में खुद उसे पीछे धकेल दिया है। इतिहासिक टीपू के पिता जब वे मात्र 32 वर्ष (सन 1782) के थे चल बसे थे।

प्रदेश के वो लाखों युवा जिन्होंने 2012 में सपा को नही अखिलेश को वोट दिया था। उनके दिल-ओ-दिमाग पर अखिलेश छाये हुए हैं। ये वो युवा हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे युवा अखिलेश में अपना अक्स दीखता है । उन्हें अपनी राजनैतिक महत्वाकांछा के पूरा होने के सुख की अनुभूति होती है। आज सब घोर निराश हैं। इन युवकों में लाखों ऐसे युवा भी जुड़ गए हैं जो उ0प्र0 में 2017 के चुनाव में पहली बार अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। सब को पार्टी के मंचों से नीचे उतार दिया गया है। इस स्थिति में ये सब,  खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। ऐसे लाखों नौजवानों का मानना है की अखिलेश अपने ही परिजनों की “राजनैतिक गुंडई“ का शिकार बन गए हैं।

यह भी हकीकत है, कि पार्टी पर अखिलेश की सीधी पकड़ नही रही है। 2012 के चुनावों से पहले उनकी राजनैतिक पहचान मात्र इतनी ही थी कि, वह पार्टी के सर्वे सर्व मुलायम सिंह के बेटे है। पढ़े लिखे खुले दिमाग के हैं। लोगों को उम्मीद बधीं थी कि वह सपा के लठैती चरित्र को बदलेंगे। राजनैतिक दाँव-पेंच, उठा-पटक और लठैती  उखाड़-पछाड़ से दूर रहने वाले अखिलेश के पर कतरे जाने से क्षुब्ध उनके समर्थक लाखों युवा मुलायम सिंह से जानना चाहते हैं कि अगर उ0प्र0 के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम परिवार से बाहर का अन्य कोई युवा बैठा होता तो क्या वह —
 
सरकार का मुखिया होने के नाते जनता के प्रति जो उत्तरदायित्व हैं उनका निर्वहन वह किसी बाहरी या भीतरी दबाव से मुक्त रह कर नही करता? किसको मंत्रिमंडल या मंत्रीपरिषद में रखना किसको हटाना, मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इस विशेषाधिकार का उपयोग किसी बाहरी या भीतरी दबाव से मुक्त रह कर वह नही करता? शासन में किस नौकरशाह को किस कुर्सी पर बिठाना, किसको हटाना किसको किसकी जगह लाना ये मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इस अधिकार का उपयोग बिना किसी बाहरी या भीतरी दबाव के वह नही करता?

मुलायम सिंह जी, बिना इस अपेक्षा के कि लाखों युवाओं को उनके उपरोक्त सवालों का जबाब आपसे मिलेगा, वो पूछना चाहता हैं कि —

जब आप शुरू से जानते थे कि राजनीति में आपके भाई शिवपाल सिंह यादव के मुकाबले अखिलेश का कोई कद नहीं है, तो 2012 में आपने अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर, क्या सोच के बिठाया था? क्या यह सोच के, कि वह पूरे कार्यकाल आपकी या आपके भाइयों की कठपुतली बनकर काम करेंगे? अगर आपकी मंशा यही थी तो, जब अखिलेश अपने कठपुतली होने के लबादे को फाड़ के फेंकने में लगे हुए थे, आप धृतराष्ट्र बन कर चुप क्यों बैठे रहे? शायद इस लिए कि आपको अपने जीवन काल में अपने भाई शिवपाल सिंह से ये उम्मीद नही रही होगी कि वह पार्टी तोड़ आपके सामने प्रतिद्वंदी बन खड़े होने की हद तक चले जाएंगे।

जो भी हो, फिलहाल आपने कुनबे को बिखरने से तो बचा लिया है, पर यह सब लाखों युवाओं और अपने चहेते अखिलेश (टीपू) को सार्वजनिक रूप से बौना साबित करके। इसकी भारी कीमत आपको 2017 के चुनावों में चुकानी ही होगी। इन परिस्थितियों में फंसे अखिलेश अपना ध्यान पीडब्ल्यूडी विभाग पर केंद्रित कर रहे हैं। वो अच्छी तरह जानते हैं कि प्रदेश में सड़कों पर यदि वाहन फर्राटे से दौड़ेंगे तो उनके विजय रथ की राह कोई रोक नही पायेगा। हो सकता है यही सोच के उन्होंने चाचा को सारे विभाग लौटा दिए पर पीडब्ल्यूडी अपने पास ही रख लिया। अभी हाल ही में मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और विशेष सचिव स्तर के अपने विश्वस्त 14 आईएएस अधिकारियों को प्रमुख विभागों का मुखिया बना के बिठाया है।

लेखक विनय ओसवाल हाथरस के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क vinayoswal1949@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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अखिलेश यादव की कहानी से याद आये राजीव गांधी!

अनेहस शाश्वत
23 जून, 1980 की सुबह रेडियो पर एक समाचार आया और सन्नाटा छा गया। समाचार यह था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र और उनके सम्भावित उत्तराधिकारी कांग्रेस नेता संजय गांधी का दुर्घटना में निधन हो गया। इस दारुण दुख के आघात से उबरी इन्दिरा गांधी ने सिर्फ इतना कहा कि-‘‘मेरे साथ इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है।’’ लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में न डिगने वाली भारतीय मानसिकता की इन्दिरा गांधी ने तत्काल अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी चुनकर प्रषिक्षण देना शुरू किया। अभी यह प्रशिक्षण चल ही रहा था कि दूसरी दुर्घटना घटी और 31 अक्टूबर, 1984 को इन्दिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। चूंकि सारी गोटें इन्दिरा गांधी बिछा चुकी थीं और उनके सिपहसालार भी जांनते थे कि उनका भविष्य वंशवादी शासन में ही सुरक्षित है। इसलिए तत्काल राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी।

कुछ ही दिन बाद हुए अगले आम चुनाव में सहानुभूति की लहर के फलस्वरूप प्रचन्ड बहुत की सरकार के मुखिया राजीव गांधी हुए। हंसमुख, ऊर्जावान और नये विचारों से भरे हुए राजीव गांधी ने कई नयी शुरुआत की। जिनका फल हम आज भी खा रहे हैं। राजनीति में नई संस्कृति लाने के विचार से प्रेरित राजीव गांधी ने स्वीकारोक्ति की कि दिल्ली से जो रुपया चलता है वह गांव तक पहुंचते-पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है और भी तमाम कदम उन्होंने उठाये। राजीव की ऐसी बेबाक बयानी और नई राजनीतिक संस्कृति लाने की आहट से पुराने जमे-जमाये घाघ कांग्रेसी सक्रिय हो गये। बहुत डिटेल में जाने की जरूरत नहीं क्योंकि यह सब हाल ही का इतिहास है। ज्यादातर लोग जानते हैं। इन घाघ नेताओं के सक्रिय होने का नतीजा यह हुआ कि राजीव गांधी खासी बदनामी झेलकर सत्ता से बेदखल हुए बाद में किस्मत ने भी दगा किया और वे एक दर्दनाक मौत का शिकार हुए। इस तरह सम्भावनाओं से भरे एक राजनैतिक जीवन का अंत हो गया। जो शायद पूरा समय पाता तो हो सकता है कुछ बहुत अच्छा देखने को मिलता।

इन्दिरा गांधी की कार्यशैली से नाराज और विश्वनाथ प्रताप सिंह के मण्डल अभियान से शीर्ष पर पहुंचे कई नेताओं में से मुलायम सिंह भी एक हैं। शीर्ष पर पहुंचने के बाद मुलायम सिंह में वे सारे गुण विकसित हो गये जिनके लिए मुलायम और उन सरीखे दूसरे नेता इन्दिरा गांधी की बुराई करते थे। वंशवाद भी ऐसा ही एक गुण है। सत्ता पाने और उसे बनाये रखने के लिए मुलायम सिंह ने भी वे सारे करम-धतकरम किये जो आम राजनीतिज्ञ करता है। और इन्दिरा गांधी की तरह सत्ता अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दी। यहां तक तो सब ठीक रहा। लेकिन अखिलेश ने भी वही गलती कर दी। जो कभी राजीव गांधी ने की थी। उन्होंने राजनीति में नये विचार और संस्कार का समावेश करने की कोशिश की और एक हद तक सफल भी रहे।

लेकिन आज के इस दौर में जब अलग चाल, चरित्र और चेहरे का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा तक सारे करम-धतकरम करने पर उतारू है, अखिलेश की यह सदाशयता कितने दिन चलती? पुराने राजनैतिक ढंग में रचे-बसे सपाई जो इत्तफाक से उनके परिजन भी हैं, सक्रिय हो गये। तर्क दिया गया कि केवल आदर्शों और काम के सहारे चुनाव नहीं जीता जाता। उसमें वे सब शतरंजी गोटें भी बिछानी पड़ती हैं, जिससे अखिलेश यादव अनभिज्ञ हैं या जानबूझकर परहेज करते हैं। जाहिर सी बात है रार छिड़नी ही थी और जमकर छिड़ी। दोनो ओर से आरोप-प्रत्यारोप और घात-प्रतिघात का दौर षुरू हुआ। अन्ततः पुराने सपाई सफल हुए और मुलायम सिंह के आशीर्वाद से सक्रिय भी हो गये।

इस लड़ाई में विपक्षियों ने भी छौंक लगाना शुरू किया और तमाम अरोप जड़ दिये। विपक्षियों के वे सारे आरोप निराधार भी नहीं हैं सत्ता के शीर्ष पर बैठे अखिलेश यादव दूध के धुले हों, यह सम्भव भी नहीं है। लेकिन कम से कम एक नई शुरुआत तो अखिलेश ने की ही और एक नई राजनैतिक संस्कृति लाने का प्रयास भी किया। अब रहा सवाल चुनाव जीतने की तिकड़मों का तो पिछला चुनाव जो समाजवादी पार्टी हार गयी थी तब भी तो प्रबन्धन इन्हीं सिपहसालारों की हाथ में था, जो अब मुलायम के आषीर्वाद से फिर सक्रिय हो गये हैं।

ऐसे में अगर अखिलेश को पूरी छूट दी जाती तो शायद कुछ अच्छा देखने को मिलता। आखिर बिहार जैसे जंगल राज्य में नीतीश ने ऐसा कारनामा करके दिखाया ही जैसा अखिलेश अब उत्तर प्रदेष में करना चाहते हैं। हालांकि नई पारी में लालू यादव नीतीश के प्रयास को फिर से मटियामेट करने पर उतारू हैं, ऐसा दिख रहा है। इन परिस्थितियों में एक बात कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि कांग्रेस की नीतियों से असंतुष्ट मुलायम, लालू सरीखा जो नेतृत्व विभिन्न राज्यों में उभरा उसके अगर ऐसे ही कारनामे रहे तो भाजपा को उनका सफाया करते देर नहीं लगेगी। सच यह भी है कि कांग्रेस फिर भी खासी उदार है भाजपा से उदारता की यह उम्मीद ये क्षेत्रीय-क्षत्रप नहीं करें, वही उनके हित में होगा।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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जंगलराज और घरेलू झगड़े के आरोपी अखिलेश यादव मीडिया पर निकाल रहे भड़ास

यूपी में अजब गजब राज चल रहा है. सीएम किसी बच्चे की तरह अपनी हर हार का ठीकरा मीडिया पर फोड़ रहा है. प्रदेश में जंगलराज चरम पर है. सरकारी आफिसों में घूसखोरी और भ्रष्टाचार, सपा नेताओं व मंत्रियों की नंगई, सत्ताधारियों के परिजनों की गुंडई, समाजवादी पार्टी के कुनबे में आंतरिक विवाद, महिलाओं का उत्पीड़न और बलात्कार, बाढ़ से परेशान लाखों किसान, पुलिस प्रशासन द्वारा आम जनता की सुनवाई से इनकार… यूपी के बारे में जितना लिखा जाए कम है. लेकिन नौजवान सीएम अखिलेश यादव लंबे चौड़े कई कई पन्ने और कई कई मिनट के विज्ञापन अखबारों-चैनलों में देकर खुद की बढ़िया इमेज गढ़ने-काढ़ने में लगे हैं लेकिन कोई मामला जब उनके सिर के उपर सवार हो जाता है तो वह सारा ठीकरा मीडिया के सिर मढ़ देते हैं…

कुछ दिन पहले चाचा शिवपाल के साथ एक कार्यक्रम में शिरकत करने के बाद कहा कि हे मीडिया वालों, हम लोगों में झगड़े मत लगाओ. सोचिए जरा, क्या मीडिया वालों की इतनी हैसियत है कि वे अखिलेश, शिवपाल, रामगोपाल, मुलायम के बीच झगड़े लगा दें? अरे जब आपके घर में कई किस्म के महत्वाकांक्षाओं के चलते झगड़े रगड़े चल रहे हैं तो मीडिया तो उसे रिपोर्ट करेगी ही, मीडिया तो नेताओं से अलग अलग मिलकर उनके मन की बात, मूड, मिजाज जानकर उसे खबर बनाएगी ही, लेकिन ये कहना कि मीडिया वाले झगड़ा लगा रहे हैं, अखिलेश की अपरिपक्वता दर्शाता है. अखिलेश अपने गिरेबान में झांके तो खुद पता चलेगा कि असल में झगड़े के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. कौमी एकता दल का विलय होने के बाद उसे रद्द कराना शिवपाल को बुरी तरह नाराज करने के लिए काफी है. अमर सिंह ने जो ताजा बयान दिया है कि उससे पता चलता है कि अखिलेश तो इतने बड़े हो गए हैं कि वे अब अमर सिंह जैसे नेताओं के अनुरोध करने पर भी उनसे बात तक करने का वक्त नहीं निकाल पाते. ऐसे में अशांति, तूतूमैंमैं को भला कौन रोक सकता है.

अखिलेश का मन नहीं भरा तो एक बार फिर मीडिया को गरिया दिए हैं… मीडिया पर फिर भड़के अखिलेश बोले, ‘मालूम है कहां से आता है मुनाफा’. अखिलेश यादव का ये मौसम मीडिया से नाराजगी का है. उन्होंने मीडिया पर पक्षपात करने का आरोप लगाया. अखिलेश ने कहा कि टीवी और अखबारों से जो यूपी को देखता है, उसे लगता है यूपी में बुरी हालत है. यूपी में कुछ हो जाता है तो टीवी चैनल में खूब दिखाया जाता है. अखिलेश यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि टीवी वालों हमें पता नहीं कि तुम्हारा मुनाफा कहां से आता है. अखिलेश ने कहा कि एक टीवी चैनल ने सर्वे दिखाया है जिसमें पहले हमें तीन नंबर पर बताया था और अब एक नंबर पर बता रहे हैं. लगता है चुनाव आने के साथ ही इनका हिसाब-किताब ठीक हो गया है.

अखिलेश जी, आप खुद बताइए कि मीडिया को आपके अफसर किस तरह मैनेज करते हैं. कोई बड़ी घटना हो जाने पर मीडिया को मैनेज करने के वास्ते नोटों भरी अटैची के साथ अफसरों को दिल्ली कौन भेजता है. मीडिया वाले भ्रष्ट तो हैं ही. लेकिन उन्हें भ्रष्ट किसने किया? आप जैसों ने ही तो. नेताजी मुलायम सिंह यादव ने तो अपने जमाने में मीडिया को मैनेज करने के लिए विवेकाधीन कोष से करोड़ों रुपये बांट डाले. अपात्रों को मान्यता प्राप्त पत्रकार बनाने और उन्हें सरकारी मकान देकर उपकृत करने का खेल कौन खेलता है. सीएम साहब, मीडिया पर भड़ास निकालने से नहीं, अपने गिरेबां में झांकने से समस्या का हल निकलेगा वरना चुनाव आने वाला है, जनता बोलती नहीं तो भूलती भी नहीं. सारे सर्वे धरे रह जाएंगी और आपके नीचे से कुर्सी सरक जाएगी.

अखिलेश खुद को ट्रेनी सीएम बता रहे हैं. साथ ही यह भी कह रहे हैं कि उन्हें फिर मौका मिला तो वह खूब काम करेंगे, खूब विकास करेंगे. यह सुनकर सिहरन पैदा होती है. उनके ट्रेनी राज में यूपी में क्या क्या कांड हुआ और उन कांडों पर किस तरह सरकार ने राख डाला, सबको पता है… इस ट्रेनी सीएम के राज में एक रीढ़ वाला पत्रकार जिंदा जलाकर फूंक डाला गया.. आरोपी मंत्री और पुलिस वाले सब आज भी मौज काट रहे हैं… अगर आप लोगों की स्मृति कमजोर न हो तो शाहजहांपुर का पत्रकार जोगेंद्र सिंह हत्याकांड याद होगा… ऐसे दर्जनों कांड इनके राज में हुए और सब पर राख डालते गए… जाने किस विकास में लीन हैं कि जनता हर ओर करप्शन घूसखोरी उत्पीड़न बलात्कार दबंगई से त्रस्त है और ये महाशय हैं कि विकास गान गाते हुए अघा नहीं रहे हैं… कहो भाई रे, ये टीपू कैसा विकास कर रहा है… और, जब इस टीपू पर लोग सवाल उठाने लगते हैं तो परेशान होकर गुस्से में सारा ठीकरा मीडिया पर फोड़ देता है… न न, बहुत हो गया टीपू… अब किसी और को मौका दो और पांच साल थोड़ा सीखो देखो सोचो मंथन करो… बहुत पाप किए हैं… पश्चाताप के लिए भी दिन मिलने चाहिए…

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

पिछले चौबीस घंटे में यूपी में जंगलराज से संबंधित तीन समाचार भड़ास के पास मीडिया वालों ने भेजे हैं, जो इस प्रकार हैं…

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UP mei Jangal Raj ki Sachhi Kahaniyan

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सपा परिवार में हालात नहीं सुधरे तो मुलायम सम्भाल लेंगे सत्ता की बागडोर

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के सामने 2017 का चुनाव जीतना मुख्य लक्ष्य है। मीडिया और राजनैतिक विश्लेषकों के सारे पूर्वानुमान ध्यस्त करने और विरोधियों को पटकनी देने में माहिर मुलायम इस मामले में अगर जरूरत हुयी तो अपने पुत्र को भी दर किनारे बिठा देने से भी नहीं चूकेंगे। उनकी पैनी निगाह चुनाव क्षेत्रवार उन क्षत्रपों पर गड़ी हुयी है, जिनका वर्चस्व उस क्षेत्र विशेष के जातीय वोटों को गोलबंद कर सकने में सक्रीय, महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली भूमिका हो सकती हैं। ऐसे क्षत्रपों की पहचान कर उनको अपने राजनैतिक हित साधने के लिए अपने पीछे लामबंद करने की जुगत बिठाने वे इनदिनों मशगूल हैं। फिर चाहे उसकी पृष्ठभूमि का इतिहास कितना ही मटमैला क्यों न हो।

यही कारण बनेगा, वे अपने मुख्यमंत्री पुत्र द्वारा कौमी एकता दल के विलय को खारिज कर दिए जाने के लाभ हानि का आंकलन कर रहे हैं। जरूरत पड़ी तो वे फिर दोनों दलों के विलय की आधारशिला रख सकते हैं। विदित है कि उस समय इस मामले की पैरोकारी कर रहे, शिवपाल यादव के अथक प्रयासों को एक झटके में अखिलेश द्वारा खारिज कर दिए जाने के कारण उन्हें भारी शर्मिन्दिगी उठानी पड़ी थी।

अखिलेश ने इस विलय को इस आधार पर खारिज किया था कि आनेवाले चुनावों में सपा अपराधियों को संरक्षण देने और प्रोत्साहित करने वाली पार्टी है, वोटरों के बीच ऐसा सन्देश जाएगा। तभी से चाचा भतीजे के बीच पार्टी के मसलों को लेकर गहरे मतभेद हैं ये बात सब के सामने आगयी थी। यूँ तो चर्चाएं और कानाफूसी तो बहुत दिनों से प्रदेश के राजनैतिक वातावरण में चल रही थी।

मुलायम बहुत दिनों से इन चर्चाओं को तथ्यहीन बता खारिज करते रहे हैं।  परंतु हाल ही में मुलायम की स्वीकारोक्ति कि उनके भाई शिवपाल सिंह यादव दो बार पार्टी छोड़ने की बात उनसे कर चुके हैं। वे इस बात से आहात है कि अखिलेश महत्वपूर्ण निर्णयों में उन्हें विश्वास में नहीं लेते और नहीं सलाह करते हैं। मुलायम के हालिया इस रहशयोद्घाटन के बाद जो खेल परदे के पीछे चल रहा था वो जगजाहिर हो गया। मुलायम की रीति-नीति को जानने वाले जानते हैं कि वे अपने जीवन काल में अपने पीछे खड़े परिवार को छिन्नभिन्न नहीं होने देंगे। ऐसे मामलों को घर की बैठक के बंद दर्वामो के पीछे ही निबटाते रहेंगे।

सच तो ये भी है कि उ0प्र0 में सरकार के गठन और सत्ता की रास थामने को लेकर मतभेद सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बने थे। कुछ लोग अनुमान लगा रहे थे की सत्ता की बागडोर मुलायम यातो अपने हांथो में रक्खेंगे या फिर शिवपाल को सौंप सकते है। पर मुलायम ने कठोर निर्णय सुनाते हुए सत्ता अपने युवा बेटे के हांथों में थमा दी। राजनैतिक गलियारों में जानकारों का कहना है कि शिवपाल के अहम को उस समय भी ठेस लगी थी। पर सब कुछ भीतर ही भीतर मैनेज कर लिया गया था। मुलायम सिंह खुद को इस समय बेटे अखिलेश और भाई शिवपाल के बीच द्वन्द में फंसा महसूस कर रहे हैं, तो यह अनुमान आधार हीन भी नहीं कहा जा सकता।

विदित है कि शिवपाल सिंह यादव पार्टी गठन के बाद से ही हर चुनावो में उनके चुनावी रथ के सारथी रहे है। इससे पूर्व उन्होने शायद ही कभी खुद को निरशा से इतना घिरा महसूस किया हो, जितना अखिलेश के राजनैतिक उदय के बाद आजकल वो महसूस कर रहे होगें। उन्होंने अपने बड़े भाई के सामने मुख्यमंत्री की कुर्सी की चाहना कभी जाहिर नही की। आज मुलायम सिंह के परिवार में लगभग 100 लोग हैं और सब की आकांछायें, अभिलाषाएं और हर मुद्दे पर मत भिन्नता होना स्वभाविक ही है। इस सब के चलते जिन प्रमुख मुद्दों को लेकर वातावरण गर्म होता रहा है उनमें कुछ निम्न प्रकार हैं।

प्रदेश में माफिया डॉन की छवि वाले मुख्तार अब्बास अंसारी के भाई की पार्टी, कौमी एकता दल का विलय सपा में करने का चाचा शिवपाल यादव का निर्णय अखिलेश द्वारा मजबूती से खारिज कर देना। उम्मीद है क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न जाती समूह पर पकड़ रखनेवाले क्षत्रपों के साथ क्षेत्रवार गोलबंदी करने की नीति मुलायम को कौमी एकता दल के सपा में फिर विलय के लिए मजबूर न करे।

प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन का कार्यकाल न बढ़वा पाने और मुख्य सचिव दीपक सिंघल को बना दिया जाना भी अखलेश के दिल की खारिश बना होगा। ऐसे कयास राजनैतिक गलियारों में तैर रहे है। आलोक रंजन अखिलेश के विश्वासपात्रों में माने जाते हैं। सेवा निवृति के बाद अलोक रंजन को अखोलेश ने बतौर अपना मुख्य सलाहकार बना लिया है। उनके जिम्में प्रदेश में चल रही जनहितकारी महत्वाकांक्षी योजनाओं की प्रगति की रफ़्तार को बनाये रखने की समीक्षा की जिम्मेदारी अब उनके कन्धों पर होगी।

अमर सिंह को राज्यसभा भेजा जाना भी अखिलेश को रास नहीं आया है। हालांकि मो0 आजम खां और प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव भी अमर सिंह को राज्यसभा भेजने के पक्ष में नहीं थे। परंतु पिता के सामने उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए थे। लोकदल नेता अजित सिंह के साथ शिवपाल यादव की पेंगें बढ़ाने का प्रो0 रामगोपाल यादव ने खुल्लम खुल्ला विरोध किया था। लोग अभी इसे भूले नहीं हैं।

इन सब के आलावा अखिलेश पार्टी टिकटों के बटवारों में युवा चेहरों को वरीयता दिए जाने पक्षधर है तो वहीं उनके पिता और चाचा लोग पुराने बुजुर्ग नेताओं पर दांव आजमाने के हामी माने जाते हैं। मीडिया हर राजनैतिक पदचाप पर कान रख्खे हुए है। नए नए रहस्योद्घाटन होते रहेंगे। ऐन चुनाव के समय बनने बिगड़ने वाले के आधार पर यह अनुमान लगाया जाएगा की सत्ता की दौड़ में कौन पिछड़ता है कौन आगे रहता है। ऐन वक्त पर सत्ता की बागडोर मुलायम सिंह, अखिलेश से अपने हांथो लेले तो भी किसी को कोई अचरज नहीं होना चाहिए।

लेखक vinay oswal से संपर्क vinayoswal1949@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम एक खुला ख़त : आप दोबारा उत्तर प्रदेश के सीएम न बनें

आदरणीय अखिलेश यादव जी,
मुख्यमंत्री
उप्र सरकार

सबसे पहले तो मैं आपको अपने बारे में बता दूं। मैं उसी उत्तर प्रदेश का एक साधारण सा नागरिक हूं, जिसके आप मुख्यमंत्री हैं। काम से ‘जर्नलिस्ट’ हूं, आपका प्रशंसक हूं और आज भी इस मुगालते में जी रहा हूं कि मेरा पेशा लोगों की आवाज़ उठाना है। मैंने कभी आपसे सीधे मिलने की कोशिश नहीं की, न ही इस तरह का कोई पत्र कभी लिखा। हालांकि कई बार मेरा मन कहता था कि आपको लिखूं, कभी आपकी प्रशंसा करूं या कभी जोर से चीखूं कि यह क्या तमाशा लगा रखा है!

यकीन मानिये, मैं आपका फैन / प्रशंसक रहा हूं। मैं मानसिक तौर से आपके करीब तब आया जब आप उत्तर-प्रदेश में अपने पिता का मुलायम राज लाने निकले थे। 2012 के उस दौर में मैं ‘जी-न्यूज’ का ब्यूरो-हेड हुआ करता था और गोरखपुर में ही तैनात था। आपकी ‘सवारी’ या कहें ‘रथ’ वहां से भी गुजरा था। पेशा था, तो आपको कवर भी करना था। लेकिन इसी दौरान अपने पढे-लिखे इंजीनियरिंग बैक ग्राउंड, बात-चीत, ईमानदार तेवर, और नयी सोच से आप ने हम सरीखे कई पत्रकारों को भी अपना मुरीद बना लिया था। और फिर प्रदेश को भी। बाद में जब आपने मोहन सिंह (स्व.) और आजम खान सरीखे नेताओं को गलतबयानी पर हद दिखायी, और डीपी यादव सरीखे बाहुबली नेताओं को बाहर का दरवाजा दिखाया, तो हम सब तो आपके लिए ‘जुनूनी’ हो गये थे। यकीन हो चला था कि आप ही हैं जो इस प्रदेश की तस्वीर बदल देंगे।

पर हो क्या गया अखिलेश भइया? आपने हम सब के ‘जुनून’ और ‘उम्मीद’ को मायूस क्यों कर दिया? ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी, कि आप कुछ न कर सके। मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, आजम खान, आपके दूसरे अजीजों और कुछ भ्रष्ट लोक प्रशासकों ने भी पूरा उत्तर प्रदेश बांट लिया और आप ‘छाया मुख्यमंत्री’ बन कर रह गये। आपको पता नहीं, कि प्रदेश के डीएम-एसपी के पास हर रोज कोई न कोई छुटभइय्या नेता पहुंचता है और ‘भइया का फोन है’ कहकर अपना उल्टा-सीधा काम करा ले जाता है? आपको पता नहीं, कि आपके चाचाओं-भइय्याओं ने अपने-अपने गढ़ बांट लिए हैं, और बेखौफ हर ठेके में लूट कर रहे हैं? आपको पता नहीं, कि आपके थाने-चौकियां बोलियों पर बिकती हैं और फिर छोटे साहब नुकसान पूरा करने के लिए आम लोगों को मारे डाल रहे हैं?

अखिलेश भइया! आप तो चुनाव से पहले साइकिल से ही पूरी यूपी नाप डाले थे। काश, जीतने के बाद हेलीकाप्टर से ही थोड़ा प्रदेश नाप डालते तो जानते, कि आपने हमें मायूस किया है, और आक्रोशित भी! सच बतायें भइया, तो जर्नलिस्ट बनने से पहले हमारा भी सपना था कि आईएएस-आईपीएस बनें। हनक और ताकत देखते थे न, तो दूसरों की तरह हम भी ख्वाब बुन लिए थे, कि यही बनेंगे। पर आपने इनका जो हाल बना दिया, उससे लगने लगा है कि जो हैं ठीक ही हैं।

आप को कभी शर्म नहीं आती कि आपके ही शहर में, एक आईएएस अफसर-डॉ हरिओम को कुछ गुण्डे पीटकर चले जाते हैं और आराम से निजी अस्पताल में आराम करने लगते है। और आप के साथ पूरा का पूरा सरकारी अमला न जाने क्यों बेबस-मजबूर नज़र आता है। आपके शासन में वर्दी पर 1200 से ज्यादा हमले हो जाते हैं, और आप कहते हैं कि ‘इस साल तो हम ट्रेनी मुख्यमंत्री थे’। तब भइय्या, डीपी यादव-आजम-मोहन सरीखे लोगों पर इतना कड़ा बोल-बोलकर आपने हमें धोखा काहे दिया था? कम से कम हम किसी ‘ट्रेन्ड’ मुख्यमंत्री को ही ले आते।

मुजफ्फरगर में आप ऐसे बेबस नजर आये जैसे कोई नाबालिग हमारा ‘शाह’ है। कहीं गाय के नाम पर इंसान मार डाला गया और आप भकुआ बने देखते रहे। मथुरा में जमकर खूनी खेल हुआ, दो दर्जन इंसान लाश बन गये और आपने बेचारों की पहचान भी नहीं जाहिर होने दी। इऩ हालातों पर आप ‘रोते नहीं’ अखिलेश भइय्या?  कभी आपको लगता नहीं कि हथियार भले ही अलग-अलग रहे हों, पर कातिल आप ही हैं।

और, ये जो लखनऊ को जरा रंग-रोगन कर पूरे प्रदेश को फिर से ‘बना रहे’ हैं, ये ठीक नहीं। अच्छी बात कि गोमती-क्रिकेट-मैट्रो-पेड़-गौरैय्या जैसे काम आप किये हैं। पर क्या इतना ही काफी है? इस सब को तो हम तब देखेंगे, जब लखनऊ पहुंचेगे और जिन्दा रहेंगे। आपके ‘प्रचार सचिव’ क्या आपको नहीं बताते कि आप लखनऊ के नहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं? और एक बात और, ये मुख्तार अंसारी पर अकड़कर आप जो ‘डीपी यादव पार्ट-टू’ का नाटक किये हैं, वो आप पर नहीं अच्छा लगता। और आप तो पढ़ते-लिखते भी हैं, जानते भी होंगे कि ‘काठ की हांडी’ दोबारा नहीं चढ़ती। देश-विदेश में ‘इवेन्ट’ पर सिर्फ ‘साहब’ का ही हक है, उन्हें ही करने दीजिए।  

आप तो पढे लिखे हैं न। हालात नहीं सम्भाल पा रहे, तो किनारे काहे नहीं हो जाते? इंजीनियरिंग की डिग्री है ही, कमा ही लेंगे। डिम्पल भाभी और बच्चे भी आप पर नाज करेंगे। कम से कम ‘कत्ल’ और ‘अपने प्रदेश को बरबाद’ करने की बदनामी तो आपके नाम नहीं दर्ज होगी न। मैं आपका फैन हूं, और जानता हूं कि आप भी किसी न किसी के फैन होंगे। ठेस लगती है, तो दर्द होता है, और फैन-वैन जैसे मामलों में जरा ज्यादा होता है। इसलिए, अगर कहीं कुछ कड़ा कह दिया हो, तो बुरा मत मानिएगा। बुरा लगे तो आइना देखिएगा, खुद को देखिएगा। जानता हूं कि हमारे नेता आपकी जी-हुजूरी करते हैं । इसलिए आपको कुछ नहीं बतायेंगे। पर मैं फिलहाल खुद को ईमानदार खबरनवीस मानता हूं, आपसे कुछ चाहिए भी नहीं, इसलिए यह सब लिखने की हिम्मत कर सका। आप उत्तर प्रदेश के दोबारा मुख्यमंत्री न बनें। इस शुभ कामना के साथ….

आपका ही एक प्रशंसक,
आलोक वर्मा
alokverma_journalist@rediffmail.com
9628844666

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दैनिक जागरण में कितने यादव हैं, सीएम अखिलेश ने सरेआम पूछ लिया (देखें वीडियो)

Mahendra Yadav : मिस्टर दैनिक जागरण ! आप बताते क्यों नहीं कि दैनिक जागरण में कितने यादव हैं? जागरण फोरम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ये सवाल किया है तो जवाब तो बनता है न! चलिए, ब्राह्मण कितने हैं, ठाकुरों को कितनी जगह मिली है, कायस्थों को कितनी सीटें मिली हैं, बनियों को कितनी मिली है, कितने अल्पसंख्यक हैं, कितने आदिवासी हैं…कितने ओबीसी हैं..यही बता दीजिए..

सुनील यादव : सुने हैं कि आज फिर से किसी दलाल अखबार वाले ने यह सवाल उठाया कि यूपी पुलिस में यादव कितने हैं? उसका प्रत्युत्तर भी ठीक मिला कि तुम्हारे अखबार में यादव कितने हैं? पर उन हरामखोरों के लिए मैं एक बात लिखना चाहूँगा जिनके पेट में यूपी पुलिस में यादवों कि संख्या पर मरोड़ उठने लगती है ….उनको यह लगता है कि सपा सरकार ने यादवों को सर्वाधिक यूपी पुलिस में ठूस दिया है तो ….सुनो…..बसपा सरकार के समय की पुलिस भर्ती का रिजेल्ट उठा के देख लो और बहुत पीछे के उन गैर सपा सरकारों के पुलिस भर्ती का रिजेल्ट उठा के देखों …यह देखो की सपा सरकार में इन सरकारों की अपेक्षा कम यादव भर्ती क्यों हुए? .केवल बकलोली से निष्कर्ष नहीं निकलता शारीरिक दक्षता वाली भर्तियों के रिजेल्ट उठाओ उसे गौर से देखों फिर समझ में आएगा असली मामला क्या है? असली मामला दलाली का नहीं है असली मामला गरीब गुरबों के श्रम का है …जिसे तुम बार बार लतियाते रहते हो …यह घनघोर श्रम के अपमान का मामला है। आज पहली बार आपका यह तमाचा भरा जवाब मुझे खुश कर गया शुक्रिया….

Yashwant Singh : दैनिक जागरण ने यादवीकरण का सवाल पूछ कर चौका मारना चाहा तो अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण में यादवों की संख्या पूछ कर छक्का मार दिया. दैनिक जागरण की तरफ से लखनऊ में जागरण फोरम नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. इसमें शिरकत कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से दैनिक जागरण के नेशनल ब्यूरो चीफ प्रशांत मिश्रा ने सवाल यूपी में थानों के यादवीकरण पर किया तो अखिलेश ने पलट कर पूछ लिया कि बताओ दैनिक जागरण में कितने यादव हैं?

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=iTtX0D-bCA4

महेंद्र, सुनील और यशवंत की एफबी वॉल से.

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अखिलेश के साहसिक निर्णय के बाद कुनबे में युद्ध शुरू

भतीजे के दांव से बाप-चचा सब चित, सपा पर भारी अखिलेश की सोच और जातिवाद पर भारी पड़ा विकासवाद

अजय कुमार, लखनऊ

अंत भला तो सब भला। समाजवादी पार्टी में अखिलेश समर्थक यही कह रहे हैं। पहले साल बाहुबली नेता डीपी यादव को और आखिरी समय में बाहुबली अंसारी बंधुओं को ‘नो इंट्री’ का कार्ड दिखाकर अखिलेश यादव ने यह साबित कर दिया है कि अगर वह अड़ जायें तो फिर उन्हें कोई बैकफुट पर नहीं ढकेल सकता है। तीन दिनों तक चले ड्रामें के बाद सपा संसदीय बोर्ड की बैठक में अखिलेश के तेवरों को देखते हुए जब पार्टी ने मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल (कौएद) से किराना करने की घोषणा की तो उन लोगों के चेहरों पर मायूसी दिखाई दी जिन्हें लगता था कि कौएद की मदद से सपा पूरबी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर अपनी ताकत में इजाफा कर सकती है।

अखिलेश की जिद्द के आगे उनके पापा-चाचा सब बौने नजर आये। कौएद को सपा के करीब लाने मे अहम भूमिका तो चचा शिवपाल यादव गुट ने निभाई थी, लेकिन जब चचा को लगा की भतीजा अखिलेश हत्थे से उखड़ा जा रहा है तो शिवपाल ने यह कहते हुए गेंद मुलायम सिंह क पाले में गेंद डाल दी कि कौएद को साथ लाने के बारे में फैसला नेताजी मुलायम सिंह की मर्जी से लिया गया था। इसके बाद अखिलेश के तेवर तो ढीले पड़ गये, लेकिन इरादे चट्टान की तरह अडिग नजर आये। उन्हें लग रहा था कि दागी-दबंग अंसारी बंधुओं को साथ लाने से 54 प्रतिशत युवा वोटर नाराज हो सकते हैं,जो इस समय अखिलेश सरकार के विकास कार्यो से काफी प्रभावित नजर आ रहे हैं।

संसदीय समिति की बैठक से चंद घंटे पहले एक निजी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में एक सवाल के जबाव में जब अखिलेश ने कहा कि ‘सपा में नहीं आयेंगे मुखतार जैसे लोग’ तो सीधे मैसेज सपा आलाकामन यानी संसदीय बोर्ड को गया। यही वजह थी संसदीय बोर्ड में अखिलेश के खिलाफ किसी ने मंुह खोलने की हिमाकत नहीं की। अखिलेश ने बैठक में साफ कहा आपराधिक गतिविधियों वाले नेताओं को पार्टी में लाने से विकास का मुद्दा पीछे छूट जायेगा। दो घंटे के भीतर संसदीय बौर्ड ने अखिलेश की विचारधारा को मोहर लगा दी और कुछ ही देर बाद समाजवादी पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव ने प्रेस कांफ्रेस करके घोषणा कर दी कि कौमी एकता दल के सपा में विलय से सीएम अखिलेश यादव नाराज थे, इस लिये इस विलय को रद्द किया कर दिया गया है। रामगोपाल के बगल में शिवपाल यादव भी बैठे थे,लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

भतीजे के सामने बाप-चचा छोटे नहीं नजर आयें, इस लिये कौएद से दूरी बनाये जाने के साथ यह घोषणा भी कर दी गई कि कौएद को सपा के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बलराम यादव जिनको अखिलेश ने कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया था, का मंत्री पद फिर से बहाल होगा। कौएद से सपा के दूरी बनाते ही कौएद नेता बाहुबली मुख्तार अंसारी को लखनऊ जेल से फिर शिफ्ट कर दिया गया। मुख्तार को कौएद-सपा के विलय की घोषणा होते ही लखनऊ की जेल में शिफ्ट कर दिया गया था, जिसके चलते पुलिस के कुछ बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिरी थी।

पूरे घटनाक्रम से एक बात जरूर साफ हो गई कि समाजवादी परिवार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है और इसे मात्र मीडिया की उपज बताकर खारिज नहीं किया जा सकता है। खासकर चचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव के बीच कुछ ज्यादा ही तल्खी नजर आ रही है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव कई बार इस तल्खी को कम करने के लिये अपने हिसाब से कदम उठा चुके हैं, परंतु उनके सभी प्रयास बेकार साबित हो रहे हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सपा परिवार में विचारों से अधिक कुर्सी की लड़ाई चल रही है।

इसका कारण भी है कि 2012 के विधान सभा चुनाव के समय जब यह बात उभर कर आ रही थी कि मुलायम सिंह सीएम बनकर यूपी की सियासत नहीं करेंगे, इसके बाद सीएम के तौर पर शिवपाल यादव के नाम की चर्चा होने लगी थी, मगर ऐन मौके पर अखिलेश की इंट्री हुई और वह बाजी मार ले गये। सियासी पिच के नये खिलाड़ी अखिलेश यादव को सीएम बनाये जाने की घोषणा जब पिता मुलायम सिंह ने की तो राजनीति की पिच के पुराने खिलाडी शिवपाल यादव और उनके समर्थकों को नेताजी का यह फैसला रास नहीं आया, लेकिन कोई कर क्या सकता था। यही वजह है कि आज भी शिवपाल यादव के कई फैसलों पर अखिलेश को तो अखिलेश के अनेक फैसलों से शिवपाल आहत होते रहते हैं।

यह पहला मौका नहीं था जब सीएम को बिना भरोसे में लिए पार्टी ने कोई फैसला ले लिया हो। हाल ही में मुलायम की छोटी बहू अर्पणा यादव को लखनऊ कैंट से विधान सभा प्रत्याशी बनाये जाने का फैसला मुलायम सिंह ने अखिलेश को विश्वास में लिये बिना अपने स्तर पर कर दिया था। इससे पहले पंचायत चुनाव के समय सीएम के करीबी सुनील यादव साजन और आनंद भदौरिया को पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। उस वक्त भी सीएम को भरोसे में नहीं लिया गया। तब भी शिवपाल यादव ने अखिलेश की नाराजगी की चिंता किये बिना उनके दोंनों करीबियों के निष्कासन का पत्र जारी कर दिया था।

इस घटना से सीएम अखिलेश काफी नाराज हो गए और सैफई महोत्सव में भी नहीं पहुंचे। बाद में सीएम ने न सिर्फ दोनों की वापसी करवाई बल्कि एमएलसी भी बनवा दिया। इसके अलावा आरएलडी के विलय और अमर-बेनी की वापसी में भी शिवपाल यादव की सक्रिय भूमिका रही। इसने सीएम को असहज किया,यह सब तब हो रहा है जबकि आम धारणा यही है कि सपा के भीतर होने वाले फैसलों पर अंतिम मुहर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ही लगाते हैंं। इससे पहले अखिलेश की नाराजगी की चिंता किये बिना बिहार के सीएम नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ हुए महागठबंधन पर भी मुलायम ने मुहर लगा दी थी। तब भी अखिलेश की सोच से इत्तर शिवपाल यादव इस महागठबंधन के पक्ष में खड़े थे। उस समय सपा महासचिव प्रो.रामगोपाल इस महागठबंधन के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की थी। बाद में यह फैसला  बदल भी दिया गया।

मगर अंसारी बंधुओं से हाथ मिलाने के पक्ष में नहीं होने के बाद भी प्रो0रामगोपाल यादव ने अखिलेश का साथ देने की बजाये चुप्पी ओढ़े रखी, जिसको लेकर भी सियासी मायने निकाले गये। अब तो हर तरफ एक ही चर्चा हो रही है कि समाजवादी परिवार में ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही हो, लेकिन अब यह लड़ाई सार्वजनिक हो चुकी है। इसलिये इसे छिपाया नहीं जा सकता है। जब सपा के महासचिव प्रो.रामगोपाल प्रेस कांफ्रेस में कहे,‘ इस फैसले (अंसारी बंधुओं को सपा में शामिल करना) से सीएम अखिलेश यादव नाराज थे, मगर अब नहीं हैं. कौमी एकता दल का विलय उनकी इच्छा के विपरीत हुआ था” तो हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

हर परिवार में कुछ न कुछ चलता है, पर सब मिलकर उसे ठीक कर लेते हैं।’ यह जुमला ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है। सपा से किसी को निकालने, किसी को गले लगाने की परिपाटी के कारण पारिवारिक रिश्तों में तनाव आता देख,संसदीय बोर्ड ने अब नेताजी के पास यह अधिकार सीमित कर दिया है कि बिना उनकी सहमति से किसी नेता को निकाला या पार्टी में शामिल नहीं किया जा सकता है। इसी के साथ सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का भी गठन नेताजी की मर्जी से ही किया जायेगा। कौएद प्रकरण से उबरने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 2012 की समाजवादी ‘क्रांति रथ यात्रा’ की तर्ज पर पूरे प्रदेश में ‘समाजवादी विकास रथ यात्रा पर निकलने वाले हैैं ताकि प्रदेश की जनता को उनकी सरकार के विकास कार्यो की जानकारी दी जा सके।

खैर, पूर्वी उत्तर प्रदेश में कौमी एकता दल से हाथ मिलाने या दूरी बनाये रखने से पार्टी को क्या फायदा होगा, यह सब तो अतीत के गर्भ में छिपा है, लेकिन इस सच्चाई को ठुकराया नहीं जा सकता है कि पूर्वांचल के कई जिलों में अंसारी बंधुओं की मजबूत पकड़ है। कौएद 2012 के विधानसभा चुनाव में भारतीय समाज पार्टी के साथ मिलकर 22-22 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। मऊ और मोहम्मदाबाद विधानसभा से पार्टी के विधायक मुख्तार अंसारी और सिगबतुल्लाह अंसारी जीत गए थे। इसके अलावा जहूराबाद, घोसी, जमानिया, गाजीपुर सदर, सैदपुर, जखनिया, जंगीपुर, बलिया सदर, फेफना, बांसडीह, चंदौली, बनारस दक्षिणी विधान सभा सीट पर कौमी एकता दल के प्रत्याशियोे को 30 से 50 हजार तक वोट मिले थे। अंसारी बंधुओं का इन सीटों पर आज भी प्रभाव है। कौएद मुस्लिमों के बीच की ही पार्टी नहीं थी। मुस्लिमों के अलावा दूसरी कई बिरादरियां भी कौएद के साथ जुड़ी है।

सपा इसी वोट बैंक को अपने पक्ष में करना चाहती थी। मगर अब विलय रद होने से पूरे इलाके में नाराजगी बढ़ सकती है। इसके विपरीत राजनैतिक पंडित इसे प्रदेशीय परिपेक्ष में देख रहे हैं। उन्हें लगता है कौएद के साथ हाल मिलाने से पूर्वांचल की कुछ सीटों पर भले ही सपा की दावेदारी मजबूत हो जाती, लेकिन प्रदेश के कई हिस्सों में इसकी निगेटिव प्रतिक्रिया भी होती। विरोधियों को सपा को घेरने का मौका हाथ लग जाता। अखिलेश की इसी सोच ने कौएद और सपा के रिश्तों की चंद घंटों में ही बलि ले ली। आज की तारीख में समाजवादी पार्टी में अखिलेश से बड़ा कोई चेहरा नहीं है। भले ही अखिलेश सरकार कानून व्यवस्था के मामले में घिरी हुई हो, परंतु अखिलेश की छवि बेदाग है। उनके ऊपर किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है और छवि एक विकास पुरूष जैसी है।

बहरहाल, सपा में अंसारी बंधुओं की इंट्री पर रोक से सपाईयों को एक बार फिर जश्न मनाने का मौका मिल गया है। 2012 के चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर अखिलेश यादव ने बाहुबली डीपी यादव को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया था। इसका मेसेज पूरे प्रदेश में गया था। अब उसी इमेज को फिर से भुनाने की तैयारी है। माफिया मुख्तार अंसारी की पार्टी को न लेकर सीएम अखिलेश यादव अपनी वही इमेज दोबारा पा सकते हैं। इससे पार्टी को फायदा हो सकता है। कौएद और सपा के विलय का पूरा प्रकरण नाटकीय अंदाजा में खत्म हो गया। रह गईं तो कुछ यादें और इसके सहारे वोट बटोरने की चाहत। अगर यह प्रकरण सामने ही नहीं आता तो शायद सपा के पक्ष में माहौल बनाना आसान नहीं होता।

अंसारी बंधुओं से दूरी बनाकर अखिलेश ने साहसिक फैसला लिया है,लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्हें मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं है। यही वजह थी अंसारी बंधुओं को लेकर सपा की तरफ से मुसलमानों के बीच गलत मैसेज नहीं जाये,इसलिये अखिलेश यादव ने तुरंत अपने आवास पर रोजा इफ्तार के बहाने मुसलमानों को लुभाना शुरू कर दिया। सरकार के मंत्री अहमद हसन ने मुलायम और अखिलेश यादव को मुलसमानों का सबसे बड़ा हितैषी बताया। यह बात वह मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरूओं की मौजूदगी को भी बार-बार बताते रहे। इससे चंद घंटों पहले अखिलेश सरकार ने मुसलमानों के लिये एक साथ कई प्रस्तावों को मंजूरी देकर अपने इरादे साफ कर दिये थे।

अखिलेश कैबिनेट ने अल्पसंख्यकों के हितों के नाम पर बीपीएल अल्पसंख्यक अभिभावकों की बेटियों की शादी के लिए आर्थिक सहायता राशि दस हजार रुपये से बढ़ाकर बीस हजार रुपये कर दी। ज्यादा से ज्यादा अल्पसंख्यकों को यह सहायता मिले, इसके लिए उनकी आय सीमा को भी बढ़ा दिया गया । मदरसा शिक्षकों को समय से सैलरी और अल्पसंख्यक छात्रों की स्कॉलरशिप और उसके लिए आय सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को भी मंजूर कर लिया गया हैं। मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से वेतन देने के लिए उत्तर प्रदेश मदरसा (शिक्षकों-कर्मचारियों का वेतन भुगतान) विधेयक 2016 के प्रारूप को कैबिनेट मंजूरी देते हुए कहा गया है कि मदरसा शिक्षकों के वेतन की पूरी रकम का भुगतान राज्य सरकार करेगी। अब तक इन्हें वेतन शासनादेश से मिलता था पर इसमें अक्सर देरी हो जाती थी। अब हर संस्था को हर महीने की 20 तारीख को बिल जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को देना होगा। बिल मंजूर होते ही वेतन खाते में आएगा।

इसी तरह से दो लाख की वार्षिक आय वाले अल्पसंख्यक परिवार के कक्षा नौ और दस के छात्र भी स्कॉलरशिप के लिए आवेदन कर सकेंगे। अब तक केवल एक लाख रुपये आय वाले परिवार के छात्र ही आवेदन कर पाते थे। छात्रों को अब स्कालरशिप में 150 रुपये प्रतिमाह (अधिकतम दस महीने के लिए 1500 रुपये वार्षिक) और भत्ते के रूप में 750 रुपये एकमुश्त दिए जाते जाएंगे। यानी एक छात्र को कुल 2250 रुपये दिए जाएंगे।

सीएम अखिलेश यादव अपनी छवि को लेकर गंभीर हैं तो  विपक्ष अंसारी बंधुओं को सपा में शामिल किये जाने पर अखिलेश की नाराजगी और उनको बाहर का रास्ता दिखाने के प्रकरण को ड्रामेबाजी करार दे रहा है। भाजपा के प्रवक्ता विजय पाठक कहते हैं पहले डीपी यादव और अब मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल नहीं किये जाने का विरोध कर रहे सीएम को यह बात भी नहीं भूलना चाहिए कि 2012 के विधान सभा चुनाव में सबसे अधिक 111 दागी उन्हीं की पार्टी के टिकट से चुनाव जीतकर माननीन बने थे। इनमें से 56 के खिलाफ तो हत्या, अपहरण जैसे गंभीर अपराध में मुकदमा चल रहा था। उन्हीं के राज में समाजवादी परिवार के संरक्षण में रामवृक्ष यादव जैसे भस्मासुर भी पैदा हुए। अनिल यादव, यादव सिंह जैसे भ्रष्ट अधिकारियों, को भी उनकी सरकार ने पाला पोसा। गायत्री प्रसाद प्रजापति जैसे भ्रष्ट नेता उनकी कैबिनेट का हिस्सा बने हुए हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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थू है यूपी की ऐसी चापलूस पत्रकारिता और ऐसे बेशर्म नेताओं पर

बीते दिनों उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चित्रकूट दौरे पर थे. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जहाँ वहां के पत्रकारों को जमीन पर नीचे बिठा दिया गया, वहीं खुद सीएम कुर्सी में बैठे पीसी लेते रहे. इस वाकये से छत्तीसगढ़ के पत्रकार योगेश स्तब्ध और ग़मज़दा हैं, एक पत्रकार होने के साथ ही पत्रकारिता का छात्र होने के नाते… पढ़िए उनका विश्लेषण….

मेरी इस पोस्ट को पढ़ने से पहले इस तस्वीर को आंख भर देख लीजिये. ये तस्वीर उत्तर प्रदेश की है. उसी उत्तर प्रदेश की, जहाँ की जनता ने सबसे कम उम्र का मुख्यमंत्री चुना. जिस प्रदेश को अपराध प्रदेश की संज्ञा भी दी जाती रही है, ये वही प्रदेश है जहाँ की सत्ताधारी पार्टी के नेता सैफ़ई महोत्सव के नाम पर बाक़ायदा संस्कृति विभाग के खाते से ठुमके के नाम पर करोड़ों साफ़ कर देते रहे हैं.  समाजवाद का चोला ओढ़े समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री के पिताजी का जन्मदिन वृद्धावस्था में भी जहाँ शाही अंदाज़ में मनाया जाता है, ये वही उत्तरप्रदेश की तस्वीर है.

अब प्वाइंट पर आते हैं.

ये तस्वीर आज से कुछ दिन पहले की है. उत्तर प्रदेश की सियासत के रहनुमा यानि अखिलेश यादव चित्रकूट पहुँचे हुए थे. अपने दौरे के दौरान सीएम अखिलेश ने सरकार की 15 महत्वपूर्ण योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया. इसके बाद अपने कार्यक्रम की जानकारी देकर पीठ थपथपाने अखिलेश यादव पत्रकारवार्ता में पहुँचे. ये उसी प्रेस कांफ्रेंस की तस्वीर है, जो किसी भी तरह से प्रेस कांफ्रेंस नहीं लग रही है. जिस प्रदेश की सियासत से देश की तस्वीर तय होती रही है, उसी निर्णायक प्रदेश की अनोखी और शर्मिंदगी भरी तस्वीर है ये. अपनी पीठ थपथपाने के लिए सीएम अखिलेश ने ऐसी जगह चुनी जहां पत्रकार हों या यूँ कहें कथित तौर पर सपा सरकार की वाहवाह करते कलमकार मिलें. सो, प्रेस कांफ्रेंस बुला ली गई. इस प्रेस कांफ्रेंस में उन सभी मीडिया हाउसेस के संवाददाता, ब्यूरो मौज़ूद थे, जो ख़ुदको सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश का जिम्मेदार चैनल, अख़बार, मीडिया घराना कहते हैं. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान सीएम अखिलेश यादव बड़े आराम से कुर्सी पर अपना कूल्हा टिकाये रहे और हमारी बिरादरी के मौज़ूद सभी पत्रकार साथी सीएम के बयान को ज़मीन में कूल्हा टिकाये लिखते रहे, शूट करते रहे।

आज टीवी न्यूज़ चैनल्स की ख़बरें नहीं देख पाया हूँ, पर इतना अभी तक के अनुभव से दावे से बोल सकता हूँ कि खुद की छीछालेदर कराने वाले इन पत्रकारों में से किसी के संस्थान ने मीडिया की इस कड़वी हक़ीक़त और चित्रकूट के चिरकुट पत्रकारों के दर्द, या यूँ कहें उनकी ‘औक़ात’ को दिखाने की ज़हमत नहीं उठाई होगी. एक पत्रकार होने के नाते मुझे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सफ़ेदपोश, खाकीपोश, सेलिब्रिटी को कवरेज़ करने का मौक़ा मिला है. पर कभी ऐसा नहीं हुआ है कि पीसी लेने वाला ‘रहनुमा’ की तरह आराम से बैठा हो और हमारे पत्रकार साथी ज़मीन में भक्त की तरह बैठ प्रवचन सुनें हों. कम से कम छत्तीसगढ़ में तो ऐसा कभी नहीं हुआ. पत्रकारिता में तो ऐसा वाकया अब तक सम्भव नहीं हो पाया है.

एक युवा होने के नाते मुझे भी व्यक्तिगत तौर पर सीएम अखिलेश यादव का काम करने का तरीका पसन्द है, सोशल मीडिया पर मैं उन्हें फॉलो करता हूँ, पर एक युवा सीएम, अपने सूबे के मीडियाकर्मियों को इस कदर बेईज्ज़त करें, ये कतई सही नहीं है.

एलसीडी, एलईडी, सामान्य टीवी से लेकर प्रोजेक्टर और मोबाइल के लाइव टीवी में डींगे हांकने वाले उत्तरप्रदेश के बड़े चेहरे वाले पत्रकार ऐसी तस्वीरों पर क्यों अपनी हाथ बाँध लेते हैं, समझ नहीं आता. सैफ़ई, जन्मदिन जैसे कथित महोत्सवों में सपा सरकार की ठाठ की रिपोर्ट देने वाले दिल्ली के पत्रकार इस तस्वीर पर क्या बोलेंगे, वो पता नहीं, पर नहीं बोल पाये, तो उन्हें ख़ुद को पत्रकार कहलवाने का हक़ नहीं होना चाहिए. पत्रकारों के संगठन अगर ऐसे वाकयों पर चुप्पी साधे बैठे रहें, तो उन्हें पान की दुकान खोल पान बेचना चाहिए.

दरअसल, ये तस्वीर भले ही अलग है, पर मौज़ूदा दौर में मीडिया का जिस तरह स्तर गिर गया है, वो हर राज्य, हर जिले, हर तहसील और हर गांव तक दिख रहा है. इसके लिए जिम्मेदार हम ख़ुद हैं. पत्रकारिता की अच्छी डिग्री, अच्छे सपने संजोये पत्रकार आज भी कैसे रायपुर प्रेस क्लब में बैठकर कैरम खेल टाईमपास कर रहे हैं, देख कर कुछ देर पहले ही आया हूँ. एक हाथ में माईक आईडी और दूजे हाथ में सिगरेट. धुआँ उड़ाते इन पत्रकारों को अनेक बार देख शर्म से सिर कई बार झुकाया हूँ. एक पत्रकार को दूजे पत्रकार के ख़िलाफ़ गंदी बात कहते, नेताओं के जूते, चप्पल, बाल, गाल की तारीफ़ करने वाले पत्रकारों के दर्शन रायपुर में हफ़्ते में एकाध बार हो ही जाते हैं.

सच कहें तो पत्रकार कौन है, पत्रकारिता का पैमाना क्या है, कोई तय नहीं है. अगर आपको कुछ काम नहीं मिला, तो आइये आपका स्वागत है मीडिया में. अगर आपके पास अनाप शनाप पैसे हैं तो फ्रेंचाइज़ी लाकर बैठ जाइये. अच्छे ब्रांड में अगर नौकरी करनी है तो सरकार के ख़िलाफ़ लिखना, बोलना, सोचना तक छोड़ दीजिये. अगर आप अपने तरीके की पत्रकारिता करने वाले पागल हैं, और सत्ता के खिलाफ कोई सवाल पूछते हैं (आज एसपी से मैंने पूछा), तो पीछे बैठे चिरकुटीए आपके सवाल पर हंसी उड़ाएंगे. मतलब ये कि यहाँ पत्रकारिता ही समझ नहीं आती है, जो उत्तर प्रदेश में हुआ, वो हो सकता है, आजकल, परसों कहीं और भी देखने को मिले. इस तस्वीर को खींचने, शेयर करने वाले के मन की उम्दा सोच को समझा जा सकता है. पर वो बेचारा अपने अख़बार, अपने चैनल में इसे ख़बर के तौर पर नहीं चला पाया होगा (ऊपर बैठने वालों की कहाँ हिम्मत हुई होगी). यानि ये कि आप कपड़े रोज़ उतारिये, जिस तरह से चाहिए, अपनी ऐसी तैसी कराइये और ख़ुद को पत्रकार बता आत्मप्रसन्न रहिये. बाकि तो भगवान भरोसे है ही।

मैं इस वाकये का घोर विरोध करता हूँ सीएम अखिलेश जी।

योगेश मिश्रा
प्रदेश अध्यक्ष
पत्रकार प्रेस परिषद्
छत्तीसगढ़

(योगेश मिश्रा पत्रकारिता में एम् फिल कर रहे हैं. पत्रकार प्रेस परिषद, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष हैं. न्यूज़ फ्लैश नामक सैटेलाइट चैनल में छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख के तौर पर काम कर रहे हैं. योगेश से संपर्क 9329905333 या 882710300 के जरिए कर सकते हैं)

मूल पोस्ट….

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‘नया लक्ष्य’ अखिलेश के हाथों लांच कराने वाले संजय ने लखनऊ के पत्रकारों को दिखाया उद्यमिता और सफलता का चरम लक्ष्य

शानदार, शानदार और शानदार… ‘नया लक्ष्य’ और संजय शर्मा के लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है. लखनऊ की पत्रकारिता में संजय ने वो मुकाम हासिल कर लिया है जहां तक पहुँचना असंभव नहीं तो मुश्किल बहुत है. संजय की पत्रकारिता उन लोगों के लिए प्रेरणा जरूर बन सकती है जो अपने दम पर कुछ करना चाहते हैं. दस साल पहले जब संजय ने वीकएंड टाइम्स शुरू किया था तब लोगों ने इसे हलके में लिया था मगर इस साप्तहिक ने देश भर में अपनी अच्छी रिपोर्टिंग से एक ख़ास मुकाम बना लिया. मई में संजय ने अपना अखबार 4PM लॉन्च किया और छह महीने में ही इस अखबार ने लोकप्रियता के वो रिकॉर्ड बना लिए जिसके लिए लोग तरसते हैं.

इस अखबार की हेडिंग और तीखी खबरों ने लखनऊ में उन बड़े अखबारों के पसीने छुड़ा दिए जिनकी सत्ता के खिलाफ लिखने में हवा खराब होती है. यूपी के माध्यमिक शिक्षा मंत्री पंडित सिंह ने जब एक नौजवान को गाली दी तो संजय ने 4PM में वही गालियां छाप कर एक नई बहस को जन्म दे दिया. केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने अपनी साइट पर यह अखबार लगा दिया. इस एक खबर पर 4PM की वेबसाइट पर साढ़े तीन लाख हिट आये जो एक रिकॉर्ड है. यही नहीं, यह खबर वायरल हो गई और फेसबुक पर दो हजार से अधिक लोगों ने इसे शेयर किया.

लखनऊ में सब जानते हैं कि खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ कोई नहीं लिखता मगर संजय के अखबार ने लगातार खनन मंत्री के कारनामों पर खबर लिखी जिससे बौखलाए मंत्री के गुर्गो ने अखबार के हॉकर को पीट दिया. मगर इसके बाद भी 4PM में इसी शैली की खबरें लगातार छपती रहीं और अखबार सुर्ख़ियों में बना रहा. ‘डीजीपी बिकता है बोलो खरीदोगे’ जैसी पहले पेज की ख़बरों ने संजय को बहुत उचाइयां दे दी. लोग हैरान थे कि संजय दो दो अखबार कैसे मैनेज करते हैं तभी संजय ने एक और धमाका कर दिया. उन्होंने ‘पाक्षिक’ प्रतियोगी पत्रिका निकालने का एलान कर दिया. लोग चौंके और उससे भी ज्यादा तब चौंके जब यह पता चला कि इसका विमोचन खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने घर से कर रहे हैं. इस मैगजीन की लॉन्चिंग के लिए संजय ने एक और रिकॉर्ड बना दिया. आज तक किसी अखबार या मैग्जीन के इतने होर्डिंग नहीं लगे जितने संजय ने अपनी इस मैग्जीन के लगा दिए. पूरा लखनऊ इन होर्डिंग से भर गया.

मुख्यमंत्री निवास पर इस तरह की शानदार लॉन्चिंग शायद पहले कभी नहीं हुई होगी. यह पहला मौका था जब मुख्यमंत्री के सामने पत्रकारों ने पत्रकारिता के मुद्दे पर भाषण दिया. नवभारत टाइम्स के संपादक सुधीर मिश्रा, बीबीसी के हेड रहे रामदत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार और न्यूज़ वर्ल्ड के यूपी हेड ज्ञानेन्द्र शुक्ल ने बहुत बढ़िया मुद्दे उठाये. मुख्यमंत्री भी शायद ही किसी कार्यक्रम में इतने खुश नजर आये हों. खुद सीएम ने कहा कि संजय इस पत्रिका की लॉन्चिंग कहीं और करना चाहते थे लेकिन मैंने ही कहा कि मेरे घर से करो. बेहद विनम्र स्वर में मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके घर पर कार्यक्रम है इसलिए वो सबका स्वागत कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि 4PM जब आने का समय होता है तब लंच के बाद उबासी और नींद आती है मगर संजय के अखबार की हेडिंग सबकी नींद उड़ा देती है. जाहिर है आज की तारीख में संजय ने खुद को मीडिया जगत का एक बड़ा ब्रांड बना लिया है.

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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एबीपी न्यूज की एक अधूरी ‘प्रेस कांफ्रेंस’ की कहानी : क्या अखिलेश यादव वाला एपिसोड दिखवा पाएंगे दिबांग?

पिछले दिनों लखनऊ में हिंदुस्तान टाइम्स और एबीपी न्यूज का एक समिट था. इसमें सीएम अखिलेश यादव भी बुलाए गए थे. लगे हाथ प्लान हुआ कि क्यों न एबीपी न्यूज के प्रोग्राम ‘प्रेस कांफ्रेंस’ के लिए अखिलेश यादव का इंटरव्यू हो जाए. दिबांग अपनी पूरी पत्रकार मंडली के साथ समिट वाले स्थल के बगल में ही बनाए गए स्टूडियो में बैठे. अखिलेश यादव भी आ गए. प्रोग्राम शुरू हुआ.

तीखे सवालों का दौर शुरू होते ही अखिलेश यादव को समझ में आ गया कि उन्हें अब सच का सामना करना ही पड़ेगा. ऐसे में अखिलेश ने शुरुआती कुछ सवालों का घुमा-फिरा कर जवाब देने के बाद चुप्पी साध ली और अंतत: अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए बाद में फिर कभी ‘प्रेस कांफ्रेंस’ प्रोग्राम शूट करने के लिए कह दिया. कुल मिलाकर आठ दस मिनट तक ही ये प्रेस कांफ्रेंस कार्यक्रम रिकार्ड हो पाया था.

लेकिन असली सवाल इसके बाद उठता है. क्या एबीपी न्यूज और दिबांग में हिम्मत है कि एक नेता जो शो छोड़कर चला जाता है, उसका जितना भी प्रोग्राम रिकार्ड हुआ है, उसे दिखा सकें. शायद नहीं. क्योंकि हिंदुस्तान टाइम्स वालों ने भी एबीपी न्यूज वालों से कहा है कि अगर ये रिकार्ड हुआ कार्यक्रम दिखाएंगे तो अखिलेश नाराज हो जाएंगे और इतने बड़े राज्य के शासन की नाराजगी से बिजनेस पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. इस तरह कारपोरेट के दबाव में दिबांग की पत्रकारिता दफन हो गई. इस बारे में जब सच्चाई जानने के लिए दिबांग को फोन किया गया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया.

कल्पना करिए कि अखिलेश यादव की जगह अगर अरविंद केजरीवाल होते और इस तरह की हरकत करते तो यह चैनल क्या पालिसी अपनाता. शायद तब आसमान सिर पर उठा लेता और जोर जोर से चिल्लाते हुए फुटेज दिखाता कि देखो, मीडिया ने आइना दिखाया तो नेताजी उठकर चल दिए, भाग गए, तानाशाही रवैया अपना लिया आदि इत्यादि. इसीलिए कहा जाता है कि आज के दौर में कारपोरेट मीडिया खबरों कार्यक्रमों को लेकर बेहद चूजी, सेलेक्टिव है. जिस कार्यक्रम या खबर से उसका बिजनेस प्रभावित होगा, वह कार्यक्रम या खबर तुरंत जमींदोज. बाकी जिससे कोई फरक नहीं पड़ता उसे जोर शोर से विचारधाराओं की चाशनी में लपेट कर दिखाओ, चिल्लाओ.

दिबांग में अगर तनिक भी नैतिकता है तो उन्हें एबीपी न्यूज पर दबाव डालना चाहिए कि वह अखिलेश यादव वाले एपिसोड को, जितना भी शूट हुआ था, दिखाए. एबीपी न्यूज अगर ऐसा नहीं करता है तो दिबांग को प्रेस कांफ्रेंस व एबीपी न्यूज से जिस तरह का भी नाता है, तोड़ लेना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि एबीपी न्यूज से ज्यादा दिबांग के साख पर सवाल खड़ा होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट.

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