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साहित्यकार बजरंग बिहारी तिवारी को मिला ‘सत्राची सम्मान- 2024’

त्राची फाउंडेशन, पटना के द्वारा ‘सत्राची सम्मान’ की शुरुआत 2021 में की गयी। न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन को रेखांकित और प्रोत्साहित करना ‘सत्राची सम्मान’ का उद्देश्य है। अब तक श्री प्रेमकुमार मणि (2021) प्रो. चौथीराम यादव (2022) और श्री सच्चिदानंद सिन्हा (2023) जैसे बौद्धिक इस सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।

सत्राची सम्मान- 2024 के लिए वीर भारत तलवार की अध्यक्षता में चयन समिति गठित की गयी। इस समिति के सदस्य पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के तरुण कुमार और ‘सत्राची’ के प्रधान संपादक कमलेश वर्मा रहे।

सत्राची फाउंडेशन के निदेशक आनन्द बिहारी ने चयन समिति की सर्वसम्मति से प्राप्त निर्णय की घोषणा करते हुए बताया कि चौथा ‘सत्राची सम्मान’ (2024) प्रसिद्ध आलोचक व अत्यंत गंभीर अध्येता बजरंग बिहारी तिवारी को दिया जाएगा।

बजरंग बिहारी तिवारी बिना किसी शोर-शराबे के पिछले करीब 20-22 वर्षों से लगातार दलित आंदोलन और साहित्य का गंभीर अध्ययन-विश्लेषण करते हुए भारतीय समाज के जातिवादी चरित्र के यथास्थितिवाद से टकराते रहे हैं। लेखन और चिंतन के लिए ऐसे विषय का चुनाव और लगातार इस मोर्चे पर उनकी सक्रियता से न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का पता चलता है।

आगामी 20 सितम्बर, 2024 को बजरंग बिहारी तिवारी को सम्मान-स्वरूप इक्यावन हजार रुपये का चेक, मानपत्र, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किया जाएगा।

01 मार्च, 1972 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के नियावाँ गाँव में जन्मे बजरंग बिहारी तिवारी हिन्दी के महत्वपूर्ण आलोचक हैं। शुरुआती शिक्षा अपने गाँव में रहकर पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा इलाहाबाद और दिल्ली से प्राप्त की। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उन्होंने हिन्दी में एम.ए., एम.फिल. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पिछले सत्ताईस वर्षों से वे दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में अध्यापन कर रहे हैं। भक्तिकाव्य, समकालीन संस्कृत साहित्य, भारतीय दलित आंदोलन और अस्मितामूलक साहित्य उनके अध्ययन-चिंतन के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इक्कीसवीं सदी की हिन्दी आलोचना की पहचान जिन महत्वपूर्ण और संवेदनशील आलोचकों के जरिए बनती है, उनमें बजरंग बिहारी तिवारी का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दलित साहित्य और उसके बहाने जाति का सवाल बजरंग बिहारी तिवारी की आलोचना का केंद्र है। 2003 से ही इन्होंने ‘दलित प्रश्न’ शीर्षक स्तंभ ‘कथादेश’ पत्रिका में लिखना शुरू किया। वे दलित आंदोलन को ‘जातिवादी हिंसा से जूझने वाले संघर्षों के नवीनतम पड़ाव’ के रूप में देखते हैं। जातिवाद के विरुद्ध संघर्षों की परंपरा में दलित विमर्श की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करने के साथ-साथ वे उसके अंतर्विरोधों और दलित विमर्श की विभिन्न धाराओं के आपसी मतभेदों की भी बारीकी से पहचान करते हैं। दलित स्त्रीवाद के हवाले से दलित स्त्रियों के संघर्ष को भी इन्होंने अपने लेखन में रेखांकित किया है।

इनकी प्रकाशित किताबें भारतीय समाज की सबसे ज्वलंत समस्या- जाति के सवाल को पूरी संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ उठाती हैं। 1. दलित कविता : प्रश्न और परिप्रेक्ष्य, 2. हिंसा की जाति : जातिवादी हिंसा का सिलसिला, 3. दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा, 4. केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य, 5. बांग्ला दलित साहित्य : सम्यक अनुशीलन, 6. जाति और जनतंत्र : दलित उत्पीड़न पर केंद्रित, 7. भारतीय दलित साहित्य : आंदोलन और चिंतन, 8. भक्ति कविता, किसानी और किसान आंदोलन, 9. किसान आंदोलन और दलित कविता बजरंग बिहारी तिवारी की महत्वपूर्ण किताबें हैं। इसके अलावा इन्होंने दलित स्त्री के जीवन से संबंधित कहानियों, कविताओं और आलोचना की तीन किताबों का संपादन भी किया है।

पिछले कुछ वर्षों से बजरंग बिहारी तिवारी भारतीय दलित साहित्य के संकलन और विश्लेषण की अत्यंत श्रमसाध्य परियोजना पर काम कर रहे हैं। केरल के दलित साहित्य और बांग्ला दलित साहित्य से संबंधित उनकी किताबें इसी वृहद् परियोजना का हिस्सा हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों के दलित आंदोलन के स्वरूप और उसके साहित्य को समग्रता में और साथ ही तुलनात्मक रूप से समझने में यह निश्चित रूप से अत्यंत मददगार साबित होगा।

इस तरह के महत्वपूर्ण लेखकीय योगदान को ध्यान में रखकर बजरंग बिहारी तिवारी को ‘सत्राची सम्मान’- 2024 से सम्मानित किए जाने के निर्णय से सत्राची फाउंडेशन स्वयं को सम्मानित महसूस कर रहा है।

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