शंभुनाथ शुक्ला-
हिंदुस्तान के प्रधान संपादक श्री शशि शेखर के सचिव बलराम दुबे का इंतक़ाल हो गया। वे महज़ 53 वर्ष के थे। मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था बस 7-8 साल पहले एक बार मिले ज़रूर थे। वे बहुत उत्साही और ऊर्जावान लगे थे।
जब कल शशि जी की पोस्ट से उनके निधन के बाबत सूचना मिली तो मैंने शशि जी से पूछा, कि उन्हें क्या हो गया था। शशि जी ने बताया कि उनकी दोनों किडनियाँ फेल हो गई थीं और इसके बावजूद वे होम्योपैथी का ही इलाज कराते रहे। शशि जी ने उनकी अच्छे एलोपैथी अस्पतालों में जाँच करवाई तब खुलासा हुआ। फिर डायलिसीस की बजाय योग करने लगे और शशि जी ने कहा, एम्स में इलाज करवाता हूँ पर वो टाल गए। अपने बॉस की बात भी नहीं मानी।
कुछ लोग 21वीं सदी में ऐसे टोटकों के भरोसे रहते हैं। एम्स जैसे मानक अस्पतालों के डॉक्टर मुर्दा मान लिये गये मरीज़ को उठाने की क़ाबिलियत रखते हैं। इसलिए होम्यो, आयुर्वेद या हिकमत के भरोसे न रहें बल्कि सही वैज्ञानिक पद्धति से इलाज कराएँ। भले लाइन लगानी पड़े, सैकड़ों बार दौड़ना पड़े, एम्स में ही जाएँ। मैं फिर आज एम्स जा रहा हूँ।
विश्वेश्वर कुमार-
काश बलराम जी के निधन की सूचना गलत होती। हिन्दुस्तान के समूह संपादक शशि शेखर के निजी सहायक श्री बलराम दुबे सबके प्रिय थे। बीते 28 जून को उनसे हिंदुस्तान के नोएडा स्थित नए ऑफिस में भेंट हुई थी। बहुत कमजोर से दिखे थे, मैंने पूछा भी तो हंसकर टाल दिया था।
उनको हमने हमेशा चैंबर में चक्के वाली कुरसी पर देखा था। खुले खुले बड़े शानदार ऑफिस में एक छोटे से स्टूल टाइप मेज के सामने उनको कुर्सी पर देखा तो थोड़ा अजीब लगा था। बलराम जी प्रधान संपादक के निजी सहायक थे, उनका ओहदा सीनियर मैनेजर का था। शशि जी के चैंबर में जाने से पहले सभी यूनिट संपादकों के लिए उनसे पूछना प्रोटोकॉल का तकाजा माना जाता रहा है। लेकिन देखा नई चाल चमक के नए ऑफिस में बड़े बड़ों को केबिन से बाहर बिठा दिया गया है। कॉरपोरेट की बोलचाल में शायद इसे ही पारदर्शी ऑफिस प्रबंधन कहते हैं।
बलराम जी के निधन की खबर कुछ देर पहले सोशल मीडिया के माध्यम से मिली, यकीन नहीं हुआ तो हिन्दुस्तान के एक बड़े अधिकारी से पूछा। फेफड़े में पानी भरने की तकलीफ के कारण बलराम जी अस्पताल में भर्ती थे। पूरे संपादकीय में वह सभी छोटे बड़े के प्रिय रहे थे। उनकी बातचीत में आत्मीयता दिखती थी। हिंदुस्तान के सेवाकाल में ही नहीं, रिटायरमेंट के बाद भी जब कभी मैंने उनसे बात की है वही पुराना अपनापन दिखता था। पहले दिल्ली में जब भी कोई बड़ी बैठक ( समग्र संपादक जन की ) होती थी या फिर ऑफसाइट, बलराम जी ही समन्वय संभालते थे। आने जाने से लगायत सारी सुविधाओं का वही ख्याल रखते थे। पूछे, बिना पूछे चाय पानी जरूर पिलाते थे। वरना विराटनगरी दिल्ली में छोटे- मझोले शहर का हमारे जैसा आदमी खुद को बौराहा जैसा ही महसूस करता है।
ईश्वर बलराम दुबे की आत्मा को शांति दें।
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