
मनीष सिसोदिया का चुनाव क्षेत्र बदला – को भी आज ज्यादा महत्व मिला है
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों से साफ है कि भारत को बांग्लादेश के हिन्दुओं की चिन्ता भारत के मुसलमानों से ज्यादा है। इसमें शेख हसीना भारत से बांग्लादेश के खिलाफ बयान दे रही हैं, कार्यवाहक सरकार के मुखिया ने इसपर चिन्ता जताई है पर वह शीर्षक नहीं है और यही हेडलाइन मैनेजमेंट है। ऐसे में विदेश सचिव बांग्लादेश गये तो ज्यादातर अखबारों की लीड है। अमर उजाला में दो पहले पन्ने हैं और पहले वाले पर धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं का सुप्रीम कोर्ट का आदेश है तो दूसरे में हिन्दुओं की चिन्ता ही है। ढाका / कोलकाता डेटलाइन से एक खबर का शीर्षक है, “शेख हसीना ने फिर कहा युनूस शासन फासीवादी”।
एक संपादक के रूप में ऐसी खबर छापने वाले को सोचना चाहिये कि कल को भारत के बारे में कोई ऐसा ही कहे तो मैं उसे कहां छापूंगा। राजनीति करने वाले तो कह सकते हैं उनका पक्ष लिया जाये, उनका साथ दिया जाये और उनका प्रचार किया जाये। यह विचारधारा के समर्थन में और विज्ञापन या पैसों के बदले भी हो सकता है लेकिन अखबार को तो निषप्क्षता से फैसला करना चाहिये और ये नहीं चलेगा कि बांग्लादेश या युनूस के खिलाफ तो छाप दें और अपने समय आंतरिक मामलों में दखल देने की बात करें, शेख हसीना को शरण दें, उनके बयान देने की व्यवस्था करें और मोदी के खिलाफ बोलने की ताकत देने वाले को देश विरोधी साबित करने में लगे रहें। इस लिहाज से आज द टेलीग्राफ का शीर्षक, ‘आस्तीन में सांप, ढाका में चिन्ता‘ दिलचस्प है।
इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर छपी एक खबर के अनुसार विपक्ष उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष अविश्वास प्रस्ताव पेश करने की तैयारी में है। इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर जो लिखा है उसका मतलब है कि विपक्ष के पास सदस्यों या सांसदों की संख्या इतनी नहीं है कि अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाये (और उन्हें पद से हटाया जा सके)। पर वे जल्दी ही ऐसा प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहे हैं। खबर के अनुसार यह इस साल विपक्ष की ऐसी दूसरी कोशिश है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों से संबंधित आज की अपनी लीड के साथ संबंधित खबर से जुड़ी खास बातों के बॉक्स के रूप में छापा है और आप कह सकते हैं कि खबर के रूप में यह यहां भी नहीं है पर इसे विदेश मामलों में बांग्लादेश के साथ भारत के संबंध और भारत में, भारत की अपनी स्थिति के रूप में छापा गया है। इसका शीर्षक है, धनखड़ को बाहर करने की कोशिश में विपक्ष एकजुट हुआ। इसे लीड के शीर्षक के साथ मिलाकर पढ़ा जाये तो देश की पूरी हालत का पता चलता है। विदेश सचिव ने युनूस से मुलाकात की, अल्पसंख्यकों पर हमले को रेखांकित किया। इंडियन एक्सप्रेस में भी आज यही खबर लीड है। हालांकि, शीर्षक में बताया गया है कि बांग्लादेश ने इसे अपना आंतरिक मामला कहा है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में भी आज यही खबर चार कॉलम की लीड है लेकिन इसके साथ तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, हसीना ने नई सरकार पर निशाना साधा, युनूस ने कहा कि उनके बयान से तनाव बढ़ता है। इस खबर में कहा गया है, युनूस ने विदेश सचिव विक्रम मिश्री के साथ अलग से भारत में हसीना की उपस्थिति का मसला यह कहते हुए उठाया कि वे जो बयान दे रही हैं उससे बांग्लादेश के लोग चिन्तित हैं और यह वहां के सरकारी मीडिया की खबर है। हमारे लोग चिन्तित हैं क्योंकि वे वहां (भारत) से बहुत सारे बयान दे रही हैं। युनूस ने कहा है और यह हिन्दुस्तान टाइम्स या किसी अन्य अखबार ने शीर्षक में भले नहीं कहा हो पर कहा है कि, इससे तनाव पैदा होते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हसीना को भारत ने शरण दे रखा है। वे यहां से वहां की सरकार के खिलाफ बयान दे रही हैं जो वहां पहुंच रहे हैं (इसकी सुविधा भी है) और यहां अखबारों में खबर छप रही है, हिन्दुओं-अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे बांग्लादेश। उमर उजाला में (दूसरे पहले पन्ने पर) इस शीर्षक के साथ उपशीर्षक है, विदेश सचिव मिश्री ने बांग्लादेश के विदेश सचिव से इस मुद्दे पर (हिन्दुओं-अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मुद्दे पर) चिन्ता जताई।
कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों ने यह नहीं बताया है या उसे महत्व नहीं दिया है जो युनूस ने कहा है। समझना मुश्किल नहीं है कि वह कम महत्वपूर्ण नहीं है और भारत सरकार अगर बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिए चिन्ता जता रही है तो कल पाकिस्तान भी भारत के मुसलमानों की चिन्ता जता सकता है। स्पष्ट रूप से भारत जो कर रहा है वह बांग्लादेश के मामले में हस्तक्षेप है, युनूस उससे परेशानी बता रहे हैं पर उसे शीर्षक नहीं बनाया जा रहा है और हेडलाइन मैनेजमेंट को भी देश भक्ति बना दिया गया है और सोरोस अगर स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा देते हैं तो उन्हें भारत विरोधी साबित करने में पूरी ताकत लगा दी गई है। पत्रकारिता में मुद्दा भारत विरोध और समर्थन का होना ही नहीं चाहिये। मुद्दा सत्य को सत्य के रूप में ईमानदारी से जनहित के लिए पेश किया जाना चाहिये न कि सत्तारूढ़ दल के फायदे के लिए। लेकिन हालत यह है कि न सिर्फ सरकार और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग, हाई कोर्ट के जज भी हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करते हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पहले से संदेह के घेरे में है।
ऐसे में अगर संवैधानिक पद पर बैठे उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने जैसी स्थिति है तो निश्चित रूप से बड़ी खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी सूचनाओं में लिखा है, विपक्ष के लिए भले ही संख्या पूरी नहीं हो और संभावना है कि अविश्वास प्रस्ताव नाकाम रहेगा तो भी यह किसी राज्यसभा अध्यक्ष (उपराष्ट्रपति को भी) पद से हटाने का अब तक का पहला प्रयास होगा। भारत के संसदीय इतिहास का यह पहला प्रयास इस पद और उसपर बैठे व्यक्ति के लिए अपमानजनक होगा। अव्वल तो ज्यादातर अखबारों ने इस तथ्य को भी नहीं बताया है लेकिन बांग्लादेश में हिन्दुओं के मामले पर चिन्ता जताना और चुनाव के समय बांग्लादेशी मुसलमानों के घुसपैठ को मुद्दा बनाना बताता है कि मंदिर बनाने आये लोग धारा 370 हटाकर भी संतुष्ट नहीं हुए और लक्ष्य संविधान बदलकर हिन्दुस्तान बनाना है। इसीलिए राहुल गांधी से परेशानी है। दूसरी ओर, जज साब से हिन्दुत्व की बात न सिर्फ करवाई जा रही है बल्कि उसे प्रचार भी दिया जा रहा है। ऐसे में अखबारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सतर्क नजर नहीं आ रहे हैं। राज्यों के विधानसभा अध्यक्षों की भूमिका के बाद यह राज्यसभा के अध्यक्ष की भूमिका का मामला है और इसलिए भी ज्यादा गंभीर है। और बात सिर्फ हिन्दुत्व की नहीं है उसकी आड़ में सत्ता से चिपके रहने और फिर भारत या इंडिया को हिन्दुस्तान बनाने की दिखती कोशिश है जो न सिर्फ जनता के बल्कि देश-दुनिया के लिए भी किसी तरह फायदेमंद नहीं होगा। भले एक विचारधारा के लोगों को लगता हो कि यही सर्वश्रेष्ठ है। जो भी हो, अभी वह मुद्दा नहीं है और मुद्दा यह है कि अखबारों ने इस महत्वपूर्ण खबर को वैसी प्रमुखता नहीं दी है जिस लायक यह है।
इसमें ना खाउंगा ना खाने दूंगा के प्रचार से अदाणी के खिलाफ कार्रवाई होने नहीं दूंगा तक की व्यवस्था और उसपर अखबारों में सन्नाटा गौर करने वाली बातें हैं। ऐसे में आज द हिन्दू में पहले पन्ने पर बताया गया है कि पूजा स्थलों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भारत में धर्मनिरपेक्षता का भविष्य तय कर सकती है। आप जानते हैं कि भारत में जब धर्मनिरपेक्षता गाली हो गई है तब इसी भारत में 1991 में बनाये गये प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के बावजूद ऐसा आदेश दिया गया जो इसके मकसद को खत्म करता है। जो लोग इसे जानते हैं वे समझते हैं और जो नहीं जानते हैं उन्हें समझाना मेरा मकसद नहीं है पर सच यह है कि द हिन्दू ने इसपर आज ही संपादकीय लिखा है। यह सुनवाई 12 दिसंबर से होनी है। इस कानून में एक धर्म के पूजा स्थल को दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदलने का प्रावधान किया गया है और 1947 में जो स्थिति थी उसी को कायम रखना है। प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 की धारा 5 में यह प्रावधान है कि अधिनियम राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर लागू नहीं होगा। इसी वजह से राम मंदिर का निर्माण संभव हो पाया। अब आगे बढ़ने की जगह दूसरे विवाद खड़े किये जा रहे हैं तो यह मामला भी महत्वपूर्ण है।
दि एशियन एज ने विदेश सचिव की बांग्लादेश यात्रा को लीड नहीं बनाया है पर खबर पहले पन्ने पर है जबकि लीड के रूप में जो खबर है वह सरकार का और भी हल्का प्रचार है। इसके अनुसार, प्रधानमंत्री का दावा है कि भारत की प्रगति हर क्षेत्र में दिखाई देती है। इसमें आम आदमी पार्टी ने मनीष सिसोदिया को जंगपुरा से लड़ायेगी – खबर तो पहले पन्ने पर है। उपराष्ट्रपति की खबर नहीं है। कांग्रेस सोरोस के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में हंगामे की खबर जरूर पहले पन्ने पर है। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ में लीड का फ्लैग शीर्षक तो वही है जो दूसरे अखबारों में है या सरकार का प्रचार है लेकिन मुख्य शीर्षक है, घोस्ट इन क्लोजेट, वैरी इन ढाका। हिन्दी में इसका मतलब हो सकता है, ‘आस्तीन में सांप, ढाका में चिन्ता’। पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है और धनखड़ की खबर यहां नहीं है। नवोदय टाइम्स की लीड सरकारी प्रचार न होकर एक सामान्य खबर है – अदाणी, सोरोस पर संसद में शोर। यहां बांग्लादेश में चिन्ता वाली खबर दो कॉलम में पहले पन्ने पर फोटो के साथ वैसे ही है जैसे दूसरे अखबारों में है पर यहां लीड नहीं है। मुझे लगता है कि यह सरकार अखबारों को इतनी संपादकीय आजादी भी नहीं देती है या अखबार इतने का भी लाभ नहीं उठाते हैं। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि यहां सिंगल कॉलम में एक शीर्षक है, उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए नोटिस देने पर विचार कर रहा विपक्ष। इसके साथ तीन कॉलम की खबर है, उपराष्ट्रपति के साथ पक्ष-विपक्ष की बैठक। यह उपराष्ट्रपति का पक्ष भी हो तो यहां मूल खबर भी है। जो आज मेरे कई अखबारों में नहीं है।


