रंगनाथ सिंह-
यह जानकर दुख हुआ कि साहित्यकार मधु कांकरिया के जीवन में कुछ तनाव है। मूलतः यह तनाव उनके मित्र की जिन्दगी में है जो उनके जीवन में ढाका से रिसकर आया है वरना कोलकाता में तो सब ठीकठाक है! राहत की बात है कि तनाव बस “कुछ” है। उम्र ज्यादा हो तो तनाव ज्यादा होने पर कुछ से कुछ हो जाता है। कांकरिया जी के ढाका स्थित “मित्र” ने बताया है कि वहाँ “कुछ तनाव जरूर है” मगर मीडिया “जिस प्रकार के खूनखराबे की बात करके उत्तेजना फैला रहा है, वह गलत है!”
वह साहित्यकार ही क्या जो गलत को पाकर उसकी गर्दन न मरोड़ दे। कांकरिया जी ने तनाव की सूचना एक लाइन में दी बाकी छह लाइन में बताया कि मीडिया क्या गलत बता रहा है। उनकी इस राहत भरी पोस्ट से साहित्य समाज में सुख की लहर दौड़ पड़ी। सुधीजन धड़ाधड़ उनकी पोस्ट शेयर करने लगे। कौन कहता है कि केवल बुरी खबर तेजी से फैलती है! या कहीं ऐसा तो नहीं है कि कांकरिया जी की पोस्ट बुरी खबर है लेकिन उसे अच्छी खबर के रैपर में लपेट कर परोसा गया है!

इस बात की काफी सम्भावना है कि जैसी कांकरिया जी हैं, वैसे ही उनके मित्र होंगे। ज्यादा नहीं तो कुछ-कुछ उनके जैसे ही होंगे। कांकरिया जी ने वह मीडिया देखा जिसमें दो पुराने वीडियो को ताजा बताकर दिखाया गया था। जिसमें दो मन्दिरों के क्षतिग्रस्त होने की खबर थी।
कांकरिया जी अपने लम्बे साहित्यिक अनुभव से जान गयी होंगी कि वे दोनों वीडियो पुराने हैं, ढाका के दो प्रसिद्ध मन्दिर अब भी खड़े हैं! वरना आमतौर पर ऐसी बातें आम लोगों को व्हाट्सऐप से पता चलती हैं! अब मान लीजिए कि कोई नामी अखबार इस्कान के प्रवक्ता का बयान छाप दे और तस्वीरें जारी कर दे कि इस्कान मन्दिर का ढांचा खड़ा है लेकिन उसके अन्दर घुसकर भीड़ ने तोड़फोड़ करने के बाद भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियाँ जला दीं तो क्या ये खबर कांकरिया जी के व्हाट्सऐप तक कोई पहुँचा सकता है! कुछ तनाव है!
कभी अवसर मिला तो कांकरिया जी एवं अन्य “हिन्दी साहित्यकारों की बांग्लादेश हिंसा पर प्रतिक्रिया” पर पीएचडी करवाया जाएगा लेकिन फिलहाल आप इस टिप्पणी से काम चलाएँ क्योंकि मेरे जीवन में भी कुछ तनाव है।

कांकरिया जी और उनके मित्र वही मीडिया देख रहे हैं जहाँ दो पुराने वीडियो ताजा बताकर दिखाए जा रहे हैं। सचमुच के ताजा वीडियो कांकरिया जी और उनके मित्र तक क्यों नहीं पहुँच रहे हैं, यह ज्यादा तनाव का विषय है। इसीलिए ऊपर कहा कि उनकी पोस्ट अच्छी के रैपर में लिपटी बुरी खबर है! कांकरिया जी एवं फ्रेण्डस जिस दुनिया में वास करते हैं, वहाँ वही वीडियो पहुँच रहे हैं जो फेक हैं! उनके आधार पर वे राय बनाते जा रहे हैं कि जब ये फेक हैं तो बाकी सारे वीडियो फेक हैं! आप कह सकते हैं कि जिस तरह के लोग फेक वीडियो फैला रहे हैं उसी तरह के दूसरे लोग उन फेक वीडियो के सहारे रियल वीडियो का सच छिपाने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ लोग पहले तरह के व्हाट्सऐप ग्रुप में एड हैं, कांकरिया जी जैसे लोग दूसरे तरह के समूह के सदस्य हैं।
वीभत्स वीडियो और तस्वीरें शेयर करना मुझे पसन्द नहीं है इसलिए मैं यहाँ बस कुछ साधारण तस्वीरें और कुछ आंकड़े रख रहा हूँ। आंकड़ों की अच्छी बात ये है कि उनसे खून टपकता है मगर दिखता नहीं है। खूनखराबा दिख जाए तो नाजुक दिल साहित्यकारों को ज्यादा तनाव हो जाता है। यही कारण है कि मैंने यह जवाब कांकरिया जी के कमेंट बॉक्स में नहीं दिया। वरिष्ठ साहित्यकारों की ख्वाबगाह में कौन सच का कंकड़ उछाले! कांकरिया जी को छोड़कर बाकी जवान साहित्कारों को विदित हो कि बांग्लादेश के प्रमुख अखबार ढाका ट्रिब्यून के अनुसार शेख हसीना जी के तख्तापलट के बाद से अब तक 232 लोगों की जान जा चुकी है। हसीना जी के तख्तापलट से पहले करीब 20 दिन तक चले प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में 328 लोगों की जान गयी थी।

328 लोगों की मौत से उपजे आक्रोश के बाद प्रधानमंत्री को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा। उसके बाद जिन 232 लोगों की अबतक मौत हुई उसके बाद हमें मधु कांकरिया का फेसबुक पोस्ट में पढ़ना पड़ रहा है कि कुछ तनाव है! पता नहीं कांकरिया जी ने ढाका के वे वीडियो देखे या नहीं जिनमें हजारों की तादाद में हिन्दू हिंसा के खिलाफ सड़क पर उतरे हैं। पता नहीं किसी फैक्टचेकर ने उस वीडियो का फैक्टचेक करके कांकरिया जी के व्हाट्सऐप पर भेजा या नहीं जिसमें कम्युनिस्ट मजदूर नेता और प्रेस क्लब के पदाधिकारी प्रदीप भौमिक को मारकर उल्टा लटका दिया गया था! कांकरिया जी ने इसपर भी विचार नहीं किया होगा कि नए मुख्य सलाहकार नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस को यह क्यों कहना पड़ा कि, अल्पसंख्यकों-हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा नहीं रुकी तो वे इस्तीफा दे देंगे! कुछ तनाव है!
सच ये है कि मधु कांकरिया और उनके वैचारिक बिरादरों पर बांग्लादेश में हो रही हिंसा की खबरों को “गलत” मानने का भारी मानसिक दबाव है! वरना जहाँ एक महीने में 560 से ज्यादा नागरिकों की मौत हो चुकी है, वहाँ “कुछ तनाव है” कहना नृशंसता है और यह किसी साहित्यकार से कतई अपेक्षित नहीं है। ऐसे लोगों को ज्यादा तनाव देने के लिए कितने लोगों को जान देनी होगी! कांकरिया जी एण्ड फ्रेंडस पर बांग्लादेश में हुई हिंसा के डिनायल का इतना दबाव है कि वो तर्क और तथ्य पर Confirmation Bias की चादर डालकर तनाव मुक्त साहित्य रच रहे हैं! कांकरिया जी Confirmation Bias वह बीमारी है जिसका पीड़ित बस वही देखता-सुनता है जिससे उसके जीवन में तनाव बढ़ने न पाये!

कांकरिया जी, बांग्लादेश में हो रही हिंसा के डिनायल के लिए चलाए जा रहे प्रोपगैण्डा को आगे बढ़ाने से बेहतर होता कि आप साफ कहतीं कि वहाँ हो रही हिंसा का मतलब यह नहीं है कि हम अपने यहाँ अल्पसंख्यकों को डरायें या हिंसा में झोंके। तब मेरे जैसे अनगिनत लोग आपकी बात से सहमत होते। आपने अभी जो किया है, वह दरअसल उन लोगों का बचाव करना है जो वर्तमान हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं। अगर आपने हिंसा करने वालों को क्लीन चिट देने के बजाय केवल पुराने फेक वीडियो को एक्सपोज किया होता तो हम मान लेते कि आप फेक न्यूज के खिलाफ लिख रही थीं लेकिन आपकी पोस्ट में फेक न्यूज का इस्तेमाल रियल न्यूज को छिपाने के लिए किया गया है! पता नहीं कांकरिया जी उन 232 जन की मौत को हत्या मानेंगी या नहीं जो अपनी हत्या का वीडियो बनवाए बिना दुनिया से चले गये? कुछ तनाव है!


