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आज के अखबार : बैंकिंग क्षेत्र में सुधार और ‘क्रांति’ के दावे, प्रचार के मुकाबले सच नाममात्र का भी नहीं है 

संजय कुमार सिंह

आज पहले पन्ने की खबरों में कोई खास राजनीतिक खबर नहीं है। दिल्ली जल बोर्ड के खोदे गड्डे में युवक की मौत बहुत गंभीर मामला है। टाइम्स ऑफ इंडिया और नवोदय टाइम्स ने इसे लीड बनाया है। लेकिन सभी अखबारों ने इसे महत्व नहीं दिया है। इस्लामाबाद के विस्फोट में 31 लोगों की मौत का मामला भी बड़ा है लेकिन भारत से बाहर का मामला है। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे लीड बनाया है। आज की तीसरी बड़ी खबर अमर उजाला और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है। इसके अलावा जो खबरें हैं उनमें द हिन्दू की लीड, रूस से भारत का तेल आयात कम होने की खबर है। इसके अनुसार यह 38 महीनों में न्यूनतम रहा है। दि एशियन एज की लीड लोकसभा, राज्यसभा के काम काज में बाधा जारी, संसद सोमवार तक स्थगित, दोनों सदनों में बजट पर बहस अगले हफ्ते होगी। द टेलीग्राफ की लीड मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए होने वाली परीक्षा नीट से संबंधित है। मुख्य शीर्षक प्रवेश के लिए न्यूनतम अंक या कटऑफ में कटौती पर सुप्रीम कोर्ट की नजर होने की है। इसका फ्लैग शीर्षक है, मेडिकल दाखिले का कटऑफ कम क्यों किया गया। देशबन्धु की लीड, कांग्रेस अध्यक्ष मल्किार्जुन खरगे का बयान है। उन्होंने कहा है, विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं मिला। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है, प्रधानमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति मनोबल टूटने पर ही अपशब्द बोलेगा।

इस लिहाज से आज अमर उजाला और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड पर बात करना बनता है। खास कर इसलिए भी कि बैंकिंग क्षेत्र में अपने काम का उल्लेख प्रधानमंत्री करते रहते हैं। लोकसभा में नहीं बोल पाए तो राज्य सभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में जो कहा है उसमें बहुत कुछ बैंकिंग व्यवस्था पर है। दूसरी ओर सच्चाई यह है कि बैंक के बैंक बंद हो गए, उनका विलय हो गया और आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की कहानी अब क्लाइमेक्स पर पहुंच गई है। भारत सरकार के निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा है कि बैंक को खरीदने के लिए फाइनेंशियल बिड्स मिल चुकी हैं। इससे सरकार को 33,000 करोड़ रुपये मिलेंगे लेकिन प्रधानमंत्री बैंकिंग क्षेत्र में सुधार की जो बातें कर रहे हैं उसका संबंधित अंश आगे पर यह सवाल अपनी जगह है कि उनके प्रयासों से बैंकों को, खाता धारकों को, आम नागरिकों को या देश को क्या लाभ मिला। इससे अलग, प्रधानमंत्री अक्सर कहते रहे हैं कि,   पहले कुछ “अभिजात वर्ग” ने संदेह जताया था कि गरीब और अशिक्षित लोग डिजिटल तकनीक को समझ नहीं पाएँगे लेकिन आज डिजिटल भुगतान/यूपीआई/नेटबैंकिंग पूरे देश में बहुत व्यापक हो चुका है और इसका उपयोग आम लोग भी कर रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सब समस्याएँ खत्म हो गईं हैं या डिजिटल बैंकिंग से संबंधित समस्याएं नहीं हैं।

डिजिटल विभाजन अभी भी मौजूद है। डिजिटल वोटर लिस्ट नहीं दिए जाते हैं, पांच बजे के बाद के मतदान का डिजिटल वीडियो सार्वजनिक नहीं किया जाता है और 45 दिन बाद डिलीट कर देने का नियम है। इसके अलावा, ग्रामीण, गरीब या कम पढ़े-लिखे लोगों के पास अभी भी स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं है। उच्च डेटा लागत सबके बूते का नहीं है, साक्षरता, शिक्षा और तकनीकी ज्ञान की कमी है, भरोसे और सुरक्षा की आशंका है तथा सैकड़ों हजारों लोगों के पैसे डूब गए या फंस गए। इनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। परेशानी अलग है। रांची में एक बैंक के बाहर एक बुजुर्ग ने मुझे अपना पासबुक देकर पूछा कि 25,000 रुपए जमा किए हैं, इसमें चढ़ गए कि नहीं। जो पढ़ नहीं सकता है, सब पर भरोसा नहीं कर सकता है उसके लिए यह कितनी बड़ी समस्या है, समझा जा सकता है। ऐसे लोगों के लिए बैंकिंग व्यवस्था में क्या है, बताए बगैर अपनी पीठ खुद थपथपाई जा रही है।

बैंकों से आम आदमी की भलाई के लिए एक और बड़ा काम करने का दावा प्रधानमंत्री करते हैं। नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय स्तर पर यह अपील की है कि लोग अपने अनक्लेम्ड (बिना दावे के पड़े) पैसे खोजें और वापस लें। इसे एक बड़ी सरकारी मुहिम “आपकी पूँजी, आपका अधिकार” के रूप में चलाया जा रहा है। प्रचार पूरा है और दावा करने के जो पोर्टल हैं उससे काम आसान नहीं है तो दलालों की बन आई है और लोगों को फोन करके कहा जाता है कि आपने वर्षों पूर्व बीमा कराया था जिसकी आगे की किस्तें जमा नहीं कराने से आपका पैसा फंसा पड़ा है। आप चाहें तो आपको इतने पैसे वापस मिल जाएंगे जो आपके ही हैं। अगर आप झांसे में आ गए तो आपसे कुछ पैसे जमा करने के लिए कहा जाएगा और यह वादा किया जाएगा कि ये पैसे भी उसके साथ ही आएंगे और पैसे पहले दिये बिना आपके फंसे पैसे वापस नहीं मिल सकते हैं। आमतौर पर आदमी बैंक वालों पर भरोसा करके फंस जाता है और अक्सर लुट जाता है। कम से कम दो बैंकों में मेरे थोड़े से पैसे दो अलग तरह के खातों में पड़े हैं। बैंकों के विलय के बाद अब दोनों एक ही बैंक हैं मैंने दोनों को खोजने की कोशिश की पर नहीं मिला। एक मामला तो बहुत पुराना है पर दूसरा 10-12 साल पुराना भी नहीं होगा और मेरा फोन नंबर तथा पता सब वही है। फिर भी बैंक से कोई सूचना नहीं आई है। इसलिए प्रधानमंत्री का मकसद चाहे जो हो ठगों को मौका मिल गया है।

बैंकों में सावधि अवधि के खातों में जमा बहुत सारे पैसे वो होंगे जो मुकदमों के सिलसिले में जमानत या बंधक अथवा रेहन रखे हैं। जाहिर है कि मुकदमा निपटने तक ऐसे लोग कुछ नहीं कर सकते हैं। फिर भी सरकारी प्रचार चल रहा है। दूसरी ओर ऐसे पैसे कितने हैं, किसके हैं औऱ किन मामलों में हैं उसका कोई हिसाब ना बैंकों के पास, ना अदालतों में और न सरकार के पास है। प्रचार चल रहा है। डिजिटल इंडिया का एक सच यह भी है कि तमाम लोग रोज ठगे और लूटे जा रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट करके लोगों के खाते खाली कर दिए गए और इनमें गरीब अनपढ़ नहीं जाने-माने उद्यमी, व्यवसायी और कुछ मशहूर हस्तियां भी हैं। ज्यादातर माममों में ठगे और लूटे गए धन की बरामदगी नहीं होती है और स्थिति इतनी खराब हो गई कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर सीबीआई को मामले की जांच करने का आदेश दिया है। यह नामुमकिन के मुमिकन होने जैसा मामला है और अभी तक मुझे यह समझ में नहीं आया है कि जब काला धन खत्म हो गया है। रोकने के तमाम उपाय किए गए हैं तो इस तरह लूटे गए धन बरामद क्यों नहीं हुए और नहीं हो सकते हैं तो डिजिटल इंडिया का लाभ क्या है या लुटरों के लिए बैंकिंग सिस्टम को डिजिटल किया गया और चुनाव को पुराने तरीकों से चलाया जा रहा है। जो भी हो, स्थिति बहुत दिलचस्प है और इसलिए भी है कि मीडिया अपना काम ठीक से नहीं करता है या करने दिया जा रहा है। एनडीटीवी के खिलाफ कार्रवाई, फिर बिक जाने और मामला खत्म हो जाने की कहानी आप जानते हैं।

ऐसे में आज खबर है, डिजिटल लेन-देन में धोखाधड़ी पर 25 हजार तक मुआवजा। अमर उजाला की खबर इस प्रकार है, साइबर धोखाधड़ी, वित्तीय उत्पादों-सेवाओं की गलत बिक्री और वसूली एजेंटों की मनमानी के बढ़ते मामलों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आम लोगों की सुरक्षा के लिए कई उपायों की घोषणा की है। इसके तहत डिजिटल लेनदेन में धोखाधड़ी के शिकार लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए 25,000 रुपये तक का मुआवजा मिलेगा। मुआवजा उन ग्राहकों को भी मिलेगा, जो अपना ओटीपी जालसाजों से साझा कर देते हैं। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में रेपो दर यथावत रखने का निर्णय किया गया। मल्होत्रा ने बताया कि नए फ्रेमवर्क के तहत छोटे मूल्य की धोखाधड़ी से प्रभावित ग्राहकों को कुल राशि का 85 फीसदी तक और अधिकतम 25,000 रुपये मुआवजा मिलेगा। बशर्ते, लेनदेन दुर्भावनापूर्ण न हो। संशोधित निर्देश जल्द जारी होंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि आम आदमी या कम पैसे वालों लोगों के लिए सरकार की यह गिनी-चुनी चिन्ता या कार्रवाई हो सकती है। हालांकि अभी यह योजना या विचार स्तर पर भी है और हाल में ऐप्प से लेन-देन करने वालों के लिए किल बटन देने की योजना पर चर्चा प्रकाश में आई थी। हालांकि मुझे उससे किसी लाभ की उम्मीद नहीं है। और 25,000 का मुआवजा उनलोगों के लिए नहीं है जिनके करोड़ों लूटे जा रहे हैं और न जाने कैसे खर्च भी हो जा रहे हैं या काल धन बन कर इकट्ठा हो रहे हैं।

प्रधानमंत्री के भाषण का संबंधित अंश

(यह असंपादित कॉपी/पेस्ट है, पीआईबी से लिया गया है)   

अब एक उदाहरण देता हूं मैं बैंकिंग सेक्टर का, बैंकिंग सेक्टर एक प्रकार से अर्थव्यवस्था की एक रीढ होता है। 2014 से पहले, फोन बैंकिंग का कालखंड था। नेता के फोन जाते थे और उसके आधार पर करोड़ों रुपया दे दिए जाते थे और गरीबों को तो बैंकों में दुतकार मिलती थी, नफरत मिलती थी। देश की 50% से ज्यादा आबादी बैंक के दरवाजे तक नहीं देख पाई थी। कांग्रेस के नेताओं के फोन पर अरबों रुपए लोगों को दे दिए गए और जो ले जाते थे, वह अपनी पर्सनल प्रॉपर्टी मान करके पैसे हजम कर जाते थे, यही खेल चलता रहा। कांग्रेस और यूपीए के राज में और आज जो इंडी एलायंस बनकर के बैठे हैं, उनके राज्य में बैंकिंग व्यवस्था तबाही के कगार पर खड़ी थी। मैं नया-नया प्रधानमंत्री के पद का दायित्व मुझे मिला, मैं एक देश के मुखिया से मैं मिला, ऐसे ही बात कर रहा था। मैंने कहा बैंकिंग की दृष्टि से हमें कुछ आगे बढ़ना चाहिए, उन्होंने कहा पहले एक बार साहब जरा आप अभी नए-नए हो, आपके बैंकों की व्यवस्था का अध्ययन कर लीजिए। हम कैसे हिम्मत करें? एक देश के नेता को यह जानकारियां थी, उसने मुझे बताया। यहां इनको कोई परवाह ही नहीं, यानी एक प्रकार से उन्होंने जिस प्रकार से बैंकिंग व्‍यवस्‍था है, एनपीए के पहाड़ खड़े हो गए थे। जहां भी देखो, चर्चा चलती थी, एनपीए का क्या होगा? एनपीए का क्या होगा? कैसे बचेंगे?

आदरणीय सभापति जी,

चुनौती बड़ी थी, लेकिन हमने समझदारी से काम लिया। बैंकिंग व्‍यवस्‍था के सब कर्ता-धर्ताओं का विश्वास में लिया। रिफॉर्म की आवश्यकता थी, हिम्मत के साथ रिफॉर्म किए। पारदर्शी व्यवस्था बनाई, ढेर सारे बैंकिंग रिफॉर्म्स हुए और जो सरकारी बैंक दुर्बल हो चुकी थी, ठीक नहीं चल पाती थी, उसको हमने बड़े बैंक के साथ मर्जर कर दिया और मुझे याद है, किसी एक महाशय, बड़े अपने आप को विद्वान मानने वाले ने लिखा था, अगर मोदी सरकार बैंकों में यह कर ले, तो हिंदुस्तान का बहुत बड़ा रिफॉर्म हो जाएगा। वह काम मैंने आते ही कर दिए थे।

आदरणीय सभापति जी,

और इन सारी चीजों का नतीजा यह हुआ, बैंकों में जो बीमारी घर कर गई थी, उस बीमारी से बैंकों को मुक्ति मिली। बैंकों का स्वास्थ्य सुधरा, लगातार सुधरा और अभी भी तेजी से आगे दौड़ रहे हैं और बैंकिंग का जब स्वास्थ्य सुधरा, तो लेन-देन का कारोबार भी उनका बढ़ा, लोगों को पैसे मिलने लगे, सामान्य मानवीय व्यक्ति को पैसे मिले। ऐसे-ऐसे गरीब लोगों को लोन मिले, जिनके लिए कभी बैंक के दरवाजे बंद थे, वो बेचारा दूर से देखकर के उनको जाना पड़ता था। आज मुद्रा योजना, मुद्रा योजना जो देश के नौजवान को अपने पैरों पर खड़े रहने की ताकत देता है। मुद्रा योजना जो स्वरोजगार की प्रेरणा देता है, लेकिन स्वरोजगार के भाषण के काम नहीं होता है, उसका हाथ पकड़ना पड़ता है, उसको साथ देना पड़ता है, उसको सहाय देनी पड़ती है और हमने मुद्रा योजना के द्वारा 30 लाख करोड़ रूपया, 30 लाख करोड रुपए से ज्यादा लोन मुद्रा योजना के माध्यम से और बिना गारंटी देश के नौजवानों के हाथ में दिया और उन्होंने अपने कारोबार को आगे बढ़ाया और गर्व की बात है, उसमें बहुत बड़ी मात्रा में माताएं-बहने भी हकदार बनी हैं, इसकी लाभार्थी हैं। सेल्फ हेल्प ग्रुप, इन दिनों ग्रामीण महिलाएं बड़े सपने देखती हैं। खुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। वूमेन सेल्फ हेल्प ग्रुप का हमने विस्तार तो किया ही किया, लेकिन 10 करोड़ बहनों को हमने सीधी आर्थिक मदद की व्यवस्था की। हमारे एमएसएमई सेक्टर को हमने भरपूर लोन दी और मैं आज बड़े संतोष के साथ, बड़ी जिम्मेवारी के साथ, इस पवित्र सदन में कहना चाहता हूं। हमने एनपीए जिसके पहाड़ हुआ करते थे, 2014 के पहले, आज इसको हमने नीचे निम्न स्तर पर लाकर के खड़ा कर दिया है। आज एनपीए एक परसेंट से भी नीचे हैं, यह अपने आप में बैंकों के स्वास्थ्य के लिए बहुत उत्तम काम हमने किया है। इतना ही नहीं, हमारे बैंकों का प्रॉफिट आज रिकॉर्ड पर है, हाई रिकॉर्ड है उसके, यह अपने आप में देश की अर्थव्यवस्था को ताकत देने के लिए बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होती है, तो बाकी अर्थव्यवस्था को भी मजबूत मिलती है, उस काम को किया है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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