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नवभारत टाइम्स और बीबीसी हिंदी के लिए खबरें लिखने का ऑप्टिक्स अलग-अलग है!

नदीम अख्तर-

दरअसल कुछ बदनसीबों की शिक्षा पूरी नहीं हो पाती। वे पत्रकार बनते-बनते पक्षकार बन जाते हैं। आज के माहौल में जब ज्यादातर मीडिया संस्थानों में एथिक्स और ऑब्जेक्टिविटी नाम की चिड़िया मर चुकी है, वहां उन्हें कोई सीनियर भी नहीं मिलता, जो खबर का सलीका समझा सके। फिर इंटरनेट की दुनिया में वो echo chamber में खो जाते हैं और खुद को पत्रकार मानने लगते हैं।

एक बात मैं हमेशा कहता हूं। मीडिया संस्थान में पत्रकारिता की नौकरी करना और पत्रकार होने में अंतर है। पत्रकार आप बिना नौकरी के भी हो सकते हैं और मीडिया में काम करके भी क्लर्क या कंटेंट एडिटर रह जाते हैं। पत्रकारिता आपके अंदर होती है। आपके आचार, विचार और व्यवहार में। पत्रकारिता आपको सवाल करना सिखाती है लेकिन पत्रकारिता की नौकरी आपसे सिर्फ कंटेंट क्रिएट करवाती है। वह कोई 10वीं पास बच्चा भी कर सकता है। उसके लिए ना पत्रकारिता की ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है और ना किसी डिग्री डिप्लोमा की।

मैंने इंडस्ट्री में जितने भी पत्रकार तैयार किए या जिनको सिखाया, उनको क्लासिकल जर्नलिज्म करना बताया। सवाल पूछो। यही पत्रकारिता की शुरुआत है। लेकिन इंडस्ट्री और क्लासरूम में अंतर होता है। क्लासरूम में सबकी अलग चॉइस होती है और पत्रकार बनने की चाहत रखने वालों को भी एग्जाम पास करना होता है। फिर वहां आपकी कही बात का रिसेप्शन अलग अलग बच्चों में भिन्न होता है। उसमें कुछ कच्चे रह जाते हैं। फिर गुरु गुड़ और चेला चीनी हो जाता है। यही दुनिया में होता आया है। यही आगे भी होगा।

अभी पाकिस्तान के तीनों सेनाओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस देख रहा था। भारत की तरह वहां के पत्रकार भी देशभक्ति से सराबोर थे। जब नवभारत टाइम्स के लिए खबर लिखता था तो कश्मीर में आतंकवादी लिखता था। पर जब पार्ट टाइम काम करते हुए बीबीसी हिंदी के लिए खबर लिखनी होती थी तो कश्मीर में चरमपंथी लिखना होता था। देश और मीडिया संस्थान बदलते ही खबर का ऑप्टिक्स भी बदल जाता है।

इसलिए भारत पाक युद्ध के मद्देनजर इस पे चर्चा होनी चाहिए कि पत्रकारिता में देशभक्ति कितनी उड़ेली जाए! या फिर क्लासिकल जर्नलिज्म करते हुए सिर्फ सवाल पूछे जाएं। लोकतंत्र में सरकार, जनता की नौकर है और जनता को ये जानने का हक है कि सरकार क्या कर रही है? सो देश के हर संस्थान को अलोकप्रिय सवाल के लिए तैयार रहना चाहिए।

प्रेस, जनता का प्रतिनिधि है और वह सवाल पूछेगा। ये पत्रकारिता का बेसिक है। पत्रकारिता में नए आए लोग जितनी जल्दी इसे समझ लें, उतना अच्छा। अगर ये नहीं हो पा रहा तो बेहतर है कि कोई PR की नौकरी ढूंढ लें। मंत्री और सरकार के PR भी बन सकते हैं। ऑफिशियली।

और अगर पत्रकारिता करनी है तो बेखौफ करें। अब तो किसी मीडिया संस्थान से नौकरी मांगने की ज़रूरत भी नहीं। यूट्यूब पे अपना एक कोना बनाकर अपनी बात कह सकते हैं।

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