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बीमारी लिए बच्चा न पैदा हो, इसके लिए क्या करें क्या न करें!

प्रदीप चौधरी-

Indian Express में छपी हाल की एक रिपोर्ट पढ़कर मन सचमुच सिहर उठा। चौदह साल तक चले इस अध्ययन में भारत के ही सत्रह सौ से अधिक भ्रूणों की जाँच की गई। नतीजे और भी चौंकाने वाले थे क्योंकि यह तस्वीर बाहर की नहीं, यहीं हमारे देश की है।

लगभग सत्ताईस प्रतिशत भ्रूण किसी न किसी आनुवंशिक रोग से पीड़ित पाए गए और तीस प्रतिशत केवल कैरियर थे। सोचिए, हर चौथा बच्चा जन्म से पहले ही बीमारी का बोझ लेकर चल रहा है।

WHO कहता है कि हर साल दुनिया में अस्सी लाख से अधिक बच्चे जन्मजात विकारों के साथ पैदा होते हैं, UNICEF का अनुमान है कि भारत में हर तैंतीस में से एक बच्चा किसी गंभीर जन्मजात रोग का शिकार होता है। जब यही आँकड़े हमारी जमीन से निकलकर सामने आते हैं तो डर और भी गहरा लगता है।

इस रिपोर्ट का मतलब केवल डराना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि संतान का स्वास्थ्य इलाज से नहीं, रोकथाम से सुरक्षित होता है। यही वह बिंदु है जहाँ आयुर्वेद की बीजदुष्टि की अवधारणा आधुनिक विज्ञान के जेनेटिक म्यूटेशन से जुड़ जाती है। आचार्य सुश्रुत शरीरस्थान में कहते हैं “तत्र कारणारूपं कार्यम्”, अर्थात जैसा कारण होगा वैसा ही कार्य होगा। जैसे सफेद धागे से बना वस्त्र सफेद होगा, वैसे ही माता-पिता के बीज और जीवनचर्या से संतान का स्वास्थ्य निर्धारित होता है। और यह तो स्पष्ट है कि “बीजं हि दोषयुक्तं गर्भस्य विकृतिं जनयति”।

यानी यदि माता-पिता का बीज दूषित है तो गर्भ में विकृति स्वाभाविक है।

बीजदुष्टि के कारण भी आयुर्वेद ने साफ़ बताए हैं। असंयमित आहार, मद्यपान, दूषित और अपक्व भोजन, अस्वस्थ दिनचर्या, रातभर जागना, अत्यधिक श्रम या भोग, मानसिक तनाव, भय, क्रोध या शोक की अधिकता, माता-पिता में पहले से व्याधि की उपस्थिति, यहाँ तक कि अनुपयुक्त समय पर गर्भाधान, सब मिलकर बीज की शुद्धि को नष्ट कर देते हैं।

आधुनिक विज्ञान इन्हीं बातों को अलग भाषा में एपिजेनेटिक्स कहता है और यह मानता है कि जीन अकेले तय नहीं करते, बल्कि जीवनशैली, आहार, प्रदूषण और मानसिक स्थिति भी यह निश्चित करती है कि कौन सा जीन सक्रिय होगा और कौन सा दबा रहेगा।

इसलिए ज़रूरी है कि आधुनिक जेनेटिक टेस्टिंग और आयुर्वेद की जीवनचर्या को विरोधी न मानें, बल्कि साथ लेकर चलें। एक तरफ आधुनिक जाँचें हमें यह बताती हैं कि कहाँ सावधानी की ज़रूरत है, दूसरी तरफ आयुर्वेद हमें सिखाता है कि जीवनचर्या और मानसिक स्थिरता से बीज को शुद्ध कैसे रखा जा सकता है।

और अंत में, एक जरूरी बात-भारत में सहालग का समय शुरू होने में अभी दो महीने बाकी हैं। अगर आपका विवाह होने वाला है तो अभी से तैयारी कीजिए। रात भर वाली ‘इलू-इलू’ बंद कीजिए, सिगरेट, शराब और किसी भी तरह का नशा छोड़ दीजिए। यही सब बीजदुष्टि का कारण बनते हैं। अगर बीज शुद्ध रहेगा तो ही आने वाली पीढ़ी रोगमुक्त और स्वस्थ होगी। रोकथाम ही सच्ची चिकित्सा है और यही आपके बच्चों के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।

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