
यशवंत सिंह-
17 मई यानि आज ही के दिन वर्ष 2008 में Bhadas4Media.com डोमेन नेम रजिस्टर्ड हुआ। भड़ास वाला काम लगातार इतने दिनों तक इसलिए कर पाया क्योंकि ये मन का काम रहा। पैशन ही प्रोफेशन बन जाए तो क्या बात है! अठारह साल की यात्रा में करोड़ों लोगों का प्यार आशीर्वाद गुस्सा घृणा पाया झेला। सबका धन्यवाद। जीवन सभी रंगों के मिश्रण से ही पूर्ण होता है। भड़ास की यात्रा में सहयोग सपोर्ट योगदान देने वाले सभी का हृदय से आभार। वो जो भड़ास से प्यार करते थे लेकिन अब इस दुनिया में नहीं रहे, उनको नमन !
खासकर आलोक तोमर भैया और शेष नारायण सिंह भैया को याद करना चाहूँगा। ऐसे सैकड़ों लोग हैं जो भड़ास की आत्मा से कनेक्ट रहे लेकिन बारी बारी से बिछड़ते गए!
निदा फ़ाज़ली की कुछ लाइनें-
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है
आवारा–मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है
ग़म हो कि ख़ुशी, दोनों कुछ दूर के साथी हैं।
फिर रास्ता ही रास्ता है, हँसना है न रोना है।
रही बात मेरी मनःस्थिति की तो मैं इस सूत्र वाक्य में अटका हुआ हूँ जो ओशो ने कहा है-
“जब भी तुम दो चीजें देखते हो जो विरोधाभासी हैं और तुम दोनों को ही पाने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें उस कड़ी की खोज करनी होगी जो उस विरोधाभास को सामंजस्य में रूपांतरित कर दे। और तुम्हें आश्चर्य होगा – अस्तित्व में कोई विरोधाभास नहीं हैं, वहां केवल पूरक हैं – लेकिन वे हमें विरोधाभासों की तरह दीखते हैं।”
लोग पूछते हैं अब आप भड़ास के बर्थडे या किसी मौके पर कोई आयोजन क्यों नहीं करते कोई अवार्ड फंक्शन क्यों नहीं कराते! मैं सोचने लगता हूँ, हाँ मैं अब ऐसा क्यों नहीं करता? मुझे लगता है अंतर्मन में एक गहन उदासी का इनरलेयर और निर्थकताबोध का आउटरलेयर पैरलल चलते रहते हैं। क्रांति से शांति का नारा ख़ुद के जीवन के लिए दिया।
मंच आयोजन उत्सव अवार्ड धन संपत्ति टर्नओवर ये सब बाहरी दुनिया के दिखावे हैं जिसमें सब लगे हुए हैं लेकिन जिसे बुद्ध की दृष्टि मिल गई, कंधे पर लाश ले जाते देखना, एक बूढ़े को झुककर चलते हुए देखना… तो फिर उसका इस संसार में मन नहीं लगेगा! मुझे अब अक्सर लगता है मैंने अपना जीवन पूर्ण कर लिया है। अब जीवन जबरन है तो इसे आंतरिक यात्रा की तरफ़ मोड़ते हैं। देखिए कितना मुड़ पाता हूँ। लेकिन ये सच है, जब इंद्रियजन्य सुखों भोगों और सामाजिक पारिवारिक दबावों से मुक्त होकर जीना प्रारंभ करते हैं तभी असली जीवन शुरू होता है।
मुझे कबीर का “भटक मरो ना कोई” दुनिया का सबसे रहस्यमय वाक्य लगता है। भटकना असल में बाहरी दुनिया को प्राणों पर लेकर जीना और मर जाना है। मरने से पहले जीना सीखना शुरू करना चाहिए, और जीवन को कतई बाहरी दुनिया के रंग ढंग में रमकर नहीं पाया जा सकता। ये बाहरी दुनिया असल में कम बुद्धि और एनिमल इंस्टिंक्ट तक सीमित लोगों का काम है। इनलाइटेंड मनुष्यों के लिए बाहरी दुनिया और इसका राजकाज तनिक न नोटिस लिए जाने लायक चीज है।
आइए तलाशते तराशते हैं अपने भीतर के बुद्ध को! थोड़ा थोड़ा ध्यान की प्रैक्टिस शुरू करते हैं! आंतरिक खिड़कियों को खोलने का प्रयास करते हैं।
हैप्पी बर्थडे भड़ास!
चियर्स
यशवंत


