नोएडा के भड़ास आश्रम से बाबा भड़ासानंद यशवंत का प्रवचन आप भी झेलें

Yashwant Singh : आजकल नोएडा सेक्टर 70 में एक मित्र द्वारा बनवाए गए भड़ास आश्रम में हूं. क्या खूब जगह है. लग ही नहीं रहा कि दिल्ली एनसीआर के धूल भीड़ शोर में हूं. बेहद शांत और हरा भरा इलाका. हवादार और नेचुरल रोशनी से चमक रहे एक कमरे का यह फ्लैट एक अधिकारी मित्र ने इसलिए बनवाया ताकि उनके मित्र लोग आकर रुक सकें. सो, इसका नामकरण मैंने ‘नोएडा का भड़ास आश्रम’ कर दिया है. परसों से यहां दोस्तों का आना जाना खाना गाना बजाना लगा हुआ है. सबको फोन कर बोल दिया था- ‘आओ रे, हम यहां पर हूं’.

नोएडा के भड़ास आश्रम में यशवंत

एक दिन रात को यह पकाया गया…

आज बिलकुल अकेले हूं. शोर के बाद शांति जरूरी / मजबूरी हो जाती है. उद्देश्य, लक्ष्य, मकसद, मंजिल नामक शब्दों के साथ कई दशकों तक जीते जीते अब इनसे उलट निरुद्देश्य जीवन जीने में कितना असीम आनंद आ रहा है, कितना सार्थक वाइब्रेशन फील हो रहा है, यह मैं महसूस कर रहा हूं.

जब आप निष्प्रयोज्य जीवन जी रहे हों और बिना वजह कुछ कर रहे हों तो उन क्षणों में आप परमात्मा के सबसे करीब होते हैं, यह महसूस करने लगा हूं. दिल्ली आता हूं तो चार छह जरूरी कामों की लिस्ट बनाकर लाता हूं लेकिन यहां आकर सब कामधाम भूल जाता हूं. खुद से ही सवाल पूछने लगता हूं कि ये काम हो भी जाए तो क्या, न भी हो तो क्या… दुनियादारी से दिन प्रतिदिन बढ़ती दूरी बड़ी सुखद से सुंदरतम होती जा रही है. लाखों करोड़ों की बातें चीजें प्रस्ताव आसपास होते रहते हैं / आते रहते हैं पर उसके प्रति आकर्षण / लालसा अब उतनी नहीं रही. संचय संग्रह के प्रति पहले भी बहुत अनिच्छा थी.

मेरा क्या है जो मेरे पास ही रहे? कुछ नहीं… हम बेवजह चीजों को अपने इर्दगिर्द अपने कब्जे में समेटकर रखना चाहते हैं जबकि असल में कुछ भी हमारे वश कब्जे में नहीं होता.. छोड़ते फेंकते देते जाइए और देखिए, दिन प्रतिदिन उदात्ततम होते जाएंगे…

जीवन जीने की न्यूनतम जरूरत क्या है… एक किलो आटा, आधा किलो आलू, सौ ग्राम तेल, पचास ग्राम नून. बस. कहीं पका लो. कहीं झोपड़ी बनाकर रह लो. इस धरती पर हम लोगों के लिए इतना काफी होना चाहिए क्योंकि ये धरती सिर्फ मनुष्यों की नहीं है. हम मनुष्यों ने अपने विस्तार अपनी लिप्सा अपनी वासनाओं के लिए लाखों करोड़ों अरबों प्रजातियों को धरती से खदेड़ दिया, नष्ट कर दिया. जिधर देखो उधर आदमी… आदमी उदरस्थ करता जा रहा है यह धरती. धरती की विविधता और सौंदर्यबोध को लेकर जो पाठ हम सभी को जीवन के शुरुआत में ही पढ़ाया सिखाया बताया अनुभव कराया जाना चाहिए, ऐसा कुछ नहीं. हम केवल एक ही चीज बढ़ाते बताते सिखाते और खुद जीते हैं, वो है पैसा. और, ये पैसा हमें मनुष्य नहीं रहने देता. हमें मानवीय नहीं होने देता. हमें उदात्त नहीं होने देता. हमें शांत नहीं रहने देता.

इस बेजान से रुपये पैसे में इतनी जान है कि हम लाखों करोड़ों प्रजातियों की जान ले चुके हैं और पूरी धरती को निगलने में लगे हैं और बरास्ते यूं हम खुद को शूली पर बिना वजह शहीद बनाने के लिए चढ़ा देते हैं…. हम अपने लिए नहीं जीते हैं. हम बेटे, पत्नी, परिवार आदि इत्यादि का नाम ले लेकर खुद का जीवन तो नष्ट कर ही डालते हैं, उन्हें भी पिंजरे का बुलबुल बनाकर छोड़ते हैं. प्रकृति को सूक्ष्मतम गहनतम रूप में देखें तो समझ आएगा कि हर प्रजाति में सरवाइवल के लिए जो स्ट्रगल, जो दुख सुख झेलना पड़ता है, उसी के जरिए उस प्रजाति के श्रेष्ठतम / बेस्ट सामने आ पाते हैं. लेकिन हम चाहते हैं हमारे अपने हमारे प्रिय लक्ष्मण रेखा के भीतर ही रहें ताकि उन्हें कोई दुख न पहुंचे. कोई अहित न हो जाए. पर इससे होता उलटा है. उनकी आंतरिक ताकत विकसित नहीं हो पाती. उनकी उदात्तता, उनकी समझ, उनका ब्रेन विकसित नहीं हो पाता. वो बाहर से भले गोल मटोल सुंदर सुरक्षित दिखें पर उनका आंतरिक अविकसित और विकलांग रह जाता है. तो, एक जीवन पैसा विहीन. एक आंदोलन पैसे के खिलाफ. एक पाठ अर्थ की राजनीति और समाजशास्त्र को लेकर.. एक समझ जीवन के प्रति बेहद जरूरी है.

लंबा हो गया. झेलना मुश्किल होगा. इसलिए विराम. और, प्रणाम. लीजिए ये एक मेरा पसंदीदा कबीर भजन….

बीत गये दिन भजन बिना रे ।
भजन बिना रे भजन बिना रे ॥

बाल अवस्था खेल गवांयो ।
जब यौवन तब मान घना रे ॥

लाहे कारण मूल गवाँयो ।
अजहुं न गयी मन की तृष्णा रे ॥

कहत कबीर सुनो भई साधो ।
पार उतर गये संत जना रे ॥

बीत गये दिन भजन बिना रे ।
भजन बिना रे भजन बिना रे ॥

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स में कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Vivek Satya Mitram : अ से अ: और क से ज्ञ तक के बीच जितने संभव शब्द हो सकते हैं, उनमें से जो भी सबसे शानदार हों वो जीवन के इस अद्भुत विश्लेषण को समर्पित करने के लिए कम हैं। थैंक्यू Yashwant भईया, इस पोस्ट के लिए। सच कहूं तो कई बार बहुत जलन होती है आपसे, चाहकर भी हम आपसे क्यों नहीं हो सकते, पर हां..ये समझना भी कि हम क्या चाहते हैं अपनी जिंदगी से, वो आप जैसे लोगों की जिंदगी को देखकर ही पता चलता है, वरना इस निष्कर्ष तक पहुंचने में ही न जाने क्या कुछ और गंवाना पड़ता बेवजह। थैंक्स।

Sant Sameer निरुद्देश्य जीवन…यानी स्थितिप्रज्ञता प्राप्त होने वाली है। नाम मेरा, सन्तई आप कर रहे है! जय हो स्वामी यशवन्तानन्द की।

Anand Gkp 23 साल पहले नाना पाटेकर ने मुझसे कहा था-मुझे जिंदा रहने के लिए क्या चाहिए…..चार सूखी रोटी, एक मुर्गी की भुनी हुई टांग और दो पैग दारू। बस। मुर्गी न मिले तो मां की दाल भी चलेगी। वही गति यशवंत बाबू आप भी बता रहे हैं। बढ़िया है।

Ghanshyam Dubey “जीवन की न्यूनतम जरूरत क्या है…..” यही सत्य – या इसे आनन्द भी कहा सकते है, जीवन- मार्ग है ।

Bhagwat Shukla बदला बदला सा अलग अंदाज….पर सत्य के काफी करीब

Chandra Kant Tiwari जीवन जीने की न्यूनतम जरूरत क्या है… एक किलो आटा, आधा किलो आलू, सौ ग्राम तेल, पचास ग्राम नून ….कुछ दिनो बाद आदमी को यह भी नसीब नहीं होगा…

Sanjaya Kumar Singh एक भड़ासी प्रवचन रोज सुबह दे सकते हैं आप। शिष्य बनाने की योग्यता है आपमें।

Naveen Sinha मैंने भी आज इसी बात को दूसरे ढंग से सोचा था ,जब भी भूकंप आता है हम जो हैं जैसे हैं उसी हालात में बहार भाग लेते हैं मतलब जहाँ शरीर वंही सब कुछ ।बाकी सब भरम है

Rajnikant Shukla भड़ास आश्रम से प्रवचन श्रृंखला – 1

Pankaj Kumar जीवन जीने की न्यूनतम जरूरतों में भड़ास बाबा आपने दो बड़ी छोड़ दी।। जिनके योगदान से आप और हम सरक रहे है। पहला स्मार्टफ़ोन,लैपटॉप और नेट की सुविधा। तब जाकर मनुष्य की न्यूनतम जरुरतें पूरी होंगी।

Sanjay Rai बेहतरीन लेख। समय की मांग यही है। कुछ नया होना चाहिए जिससे कि जीवन बिना पैसे के भी लोग सही तरीके से गुजार सकें। जानलेवा बन चुका है ये पैसा।

Chandan Singh Bndhu aap jo bhi ho mhan aatma ho mai aapki es soch ki kdar krta hu.khud bhi ye rah per chlne ki koshish m hu

Divakar Singh आपकी बातें देख सुन कर पैसे के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी है। जै जै।

मैं सत्या हूं bahut khoob likha bhaiya aapne…jeevan ka param satya ka anubhav or ahsaas

Dheeraj Kumar Anuragi Hame bhi le chalo sir……?

Sudhanshu Dwivedi शानदार। अगर हरिद्वार या ऋषिकेश में आश्रम खोलना हो तो नाचीज भी साथ है।

Anand Agnihotri तब तो मजा आ गया, मेरे रुकने का भी एक ठिकाना बन गया।

Mukund Hari जीवन को तो अविरल झरने की तरह बहने देना चाहिए।

Arun Srivastava देवभूमि देहरादून भी उत्तम जगह है । नाम भी तय हो गया है भडास का “बच्चा” आश्रम।

Golesh Swami Life jeene ka sahi tarika yahi Hai.

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