
संजय सिन्हा-
और मैं बच गया!
कहानी है साल 2015 की जाती हुई सर्दियों की। मैं फेसबुक पर रोज लिखने लगा था। संजय सिन्हा फेसबुक परिवार बन चुका था। परिवार का पहला मिलन समारोह दिल्ली में हो चुका था। मेरी किताब ‘रिश्ते’ छप कर आ चुकी थी।
मैं तब संपादक था और मेरे आसपास बहुत से सलाहकार हुआ करते थे। किसी ने मुझे सलाह दी कि संजय सर, आपकी किताब पर धूम-धड़ाका नहीं हुआ है। कुछ होना चाहिए। मैंने कहा था कि किताब का विमोचन तो फेसबुक परिवार के मिलन समारोह में हो चुका है, अब और क्या धूम?
बॉस के सलाहकार भक्त होते हैं।
“नहीं सर, वो तो हो गया। वो जंगल मे मोर का नृत्य था। नृत्य तो सरे बाज़ार होना चाहिए। लोगों को लगे कि संजय सिन्हा ने कुछ किया है। धूम के साथ धड़ाका भी होता तो मजा आ जाता।
‘रिश्ते’ किताब छप कर आने से बारह साल पूर्व संजय सिन्हा अपने अमेरिका प्रवास में एक उपन्यास ‘6.9 रिक्टर स्केल’ लिख कर लेखक बन चुके थे। उस किताब की इतनी धूम थी कि प्रकाशक जो अमेरिका में थे, ने मेरी किताब का विमोचन भारत में भी किया था और वो मुझे किताब के विमोचन के लिए अमेरिका से भारत लेकर आए थे। दिल्ली के इंडिया हैबिटाट सेंटर में तब के महान लेखक कमलेश्वर, निर्मल वर्मा समेत तमाम बड़े लोग वहां आए थे और मेरी किताब का उन्होंने ही विमोचन किया था। तब अटल बिहारी सरकार में मंत्री रहे जसवंत सिंह कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे।
सारा ताम-झाम प्रकाशक की ओर से था।
सलाहकारों ने सलाह दी कि सर, कुछ वैसा होना चाहिए।
आदमी प्रसद्धि (तारीफ) का गुलाम होता है।
सलाहकारों ने कहा कि संजय सर, आप इतने फिल्म वालों के दोस्त हैं। उनसे किताब का विमोचन कराइए। फिल्म वाले आते हैं तो धूम के साथ धड़ाका भी होता है।
मुझे पता चला कि अजय देवगन दिल्ली आने वाले हैं। मैंने उनसे बात की। अनुरोध किया कि आप इस बार दिल्ली आएं तो मेरी किताब का विमोचन कर दीजिएगा।
मेरी नज़र में अजय देवगन फिल्मी दुनिया के अच्छे लोगों में से एक हैं। बेहद संवेदनशील और सुलझे हुए। दोस्ती निभाने वाले। तो उन्होंने मेरी बात मान ली।
इतना पढ़ कर आपके मन में प्रश्न उठना चाहिए कि आखिर संजय सिन्हा आज बीती बात क्यों याद कर रहे हैं?
उठा न प्रश्न?
तो सुनिए आगे की दास्तां।
हुआ ये कि अजय देवगन मान गए। मैंने पुस्तक के प्रकाशक (प्रभात प्रकाशन) से बात की। मैंने कहा कि किताब का विमोचन अजय देवगन से कराना है। कहां उचित रहेगा?
उन लोगों ने कहा कि कहां चाहते है?
अब प्रश्न था कि कहां? मैंने पता किया कि अजय देवगन दिल्ली आएंगे तो कहां ठहरेंगे? पता चला कि मेरेडियन होटल में।
मेरेडियन के पास ही कनाट प्लेस में कहीं ठीक रहेगा। प्रकाशक ने कहा कि किताब का विमोचन है, ऑक्सफोर्ड बुक डिपो (किताब की मशहूर दुकान) में ठीक रहेगा।
ओके।
तारीख, समय तय हो गया। अजय देवगन ने मेरे लिए एक दिन सुरक्षित रख लिया। तय समय पर मैं अपनी टीम के साथ मेरेडियन होटल पहुंचा। अजय देवगन को साथ लेकर कनाट प्लेस पहुंचा और कनाट प्लेस में पहली मंजिल पर सीधे ऑक्सफोर्ड बुक डिपो।
भीतर मेरे और प्रकाश के बुलाए मेहमान थे। अजय देवगन ने किताब का विमोचन किया। मैंने, अजय ने, प्रकाशक ने भाषण दिया। किताब के विमोचन में भाषण क्या होता है, लेखक की तारीफ करनी होती है। लेखक खुद को महान समझता है, बुलाए गए मेहमान लेखक की तारीफ करते हैं और फिर फोटो खिंचे जाते हैं और किताब पर साइन करके किताब बेची जाती है (मंच वालों को फ्री)।
वो सब हुआ। अजय देवगन करीब एक घंटा या उससे भी कुछ अधिक समय तक वहां रहे।

मैने नोट किया कि हमने जितने लोगों को उस समारोह में बुलाया था, धीरे-धीरे उससे बहुत अधिक लोग वहां आ चुके थे। मैं मन ही मन इतरा रहा था कि मैं इतना पॉपुलर हो गया हूं।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब अजय देवगन को लेकर मैं नीचे उतरा तो रोड पर भारी भीड़ जमा थी। ट्रैफिक रुका पड़ा था। और पुलिस नीचे खड़ी थी। अजय देवगन नीचे उतरे, किसी तरह गाड़ी में बैठे और फिर पुलिस की मदद से उन्हें भीड़ से निकाल कर होटल भेज दिया गया।
अब आगे की कहानी शुरू होती है।
अजय के जाने के बाद इलाके के एसएचओ (इंस्पेक्टर) ने मुझे रोक लिया।
“संजय सिन्हा जी आपने ये क्या किया?”
“मैंने क्या किया?”
“आपने पूर्व सूचना दिए बिना, बिना तैयारी किए अजय देवगन को इस भीड़ वाले इलाके में क्यों बुला लिया?”
“तो क्या मैं किताब का विमोचन भी नहीं कर सकता था?”
“बिल्कुल कर सकते थे। कीजिए। लेकिन आपने फिल्मी कलाकार को बुलाया था। आप पढ़े-लिखे समझदार व्यक्ति हैं। आपको पता होना चाहिए कि ऐसा होने पर भीड़ होती है। भीड़ होने पर भगदड़ हो सकती है। आप हमें पूर्व सूचना देते हम तैयारी करते। ऐसे ही आपने बिना तैयारी के न्योता दे दिया?”
“मैंने थोड़े ने भीड़ को न्योता दिया था?”
“भीड़ को न्योता नहीं देते हैं। भीड़ खुद आती है। लेकिन ऐसे आयोजनों के पूर्व पूरी तैयारी करनी होती है। आप ऐसे कहीं किसी कुछ भी नहीं कर सकते हैं, जिसमें भगदड़ मचने की आशंका हो और कोई अनहोनी हो जाए। और हो जाए तो वो सौ फीसदी आयोजकों की जिम्मेदारी होती है। ये कनाट प्लेस है। बाजार है। सार्वजनिक स्थान है। कोई फिल्मी कलाकार ऐसे बिना पूर्व सूचना और तैयारी के आएगा या उसे बुलाया जाएगा और कोई अनहोनी हो जाएगी तो सीधे जिम्मेदारी दोषी। इसके आयोजक आप थे। वो तो भला मनाइए कि कुछ हुआ नहीं। आप तो ऊपर जाकर बैठ गए थे। नीचे धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि अजय देवगन आए हैं और भीड़ बाहर रुक कर उनके नीचे उतरने का इंतज़ार करने लगी। ट्रैफिक जाम हो गया। हमारे पास फोन आया। सर, हमने ऊपर आकर आपका प्रोग्राम नहीं खराब किया लेकिन आपने जो किया, वो गलत था। कुछ होता तो आप दोषी होते।”
कहानी खत्म।
तब से मैंने तय किया कि मेरी किताब का विमोचन अपने परिवार के सदस्य ही करेंगे। कोई ऐसा व्यक्ति बिलकुल नहीं, जिसके आने से भीड़ आए। मैं पढ़ा-लिखा हूं। उस पुलिस वाले ने मुझसे समझा दिया था कि अगर कोई हादसा होता तो आयोजक दोषी होते। आयोजक ही दोषी होते हैं, भीड़ के लिए, भगदड़ के लिए।
वो तो भला पुलिस वाला था और मेरी किस्मत भली थी कि मैं संपादक था। तब तक संपादकों का थोड़ा रुतबा पुलिस वालों की नज़र में था तो मैं तिहाड़ जाने से बच गया था, नहीं तो क्या पता सुनील गुप्ता की नई किताब ‘ब्लैक वारंट’ (जिस पर बना नया सीरियल आप ‘नेटफ्लिक्स’ पर देख रहे हैं) में संजय सिन्हा का भी जिक्र होता।
भीड़ में भगदड़ के लिए दोषी एक संपादक जेल में।
नोट-
- भीड़ में भगदड़ और हादसे के लिए आयोजक दोषी होते हैं।
- आयोजक अगर प्रभावशाली हों तो पुलिस कुछ नहीं करती है।
इसे भी पढ़ें-
स्यापा बंद करिये, यह सुपारी पत्रकारिता का दौर है..! https://www.bhadas4media.com/supari-patrakarita/


