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सियासत

भारत-देश में एक अंदरूनी युद्ध चल रहा है!

सुशोभित-

दिल्ली के बम धमाके पर कई कोणों से विचार करना आवश्यक है। पहली बात यह है कि राहुल गांधी ने बहुत परिश्रम से देश में एक स्वस्थ राजनैतिक चेतना जगाने का प्रयास किया था, लेकिन इस तरह के आतंकी हमले सामूहिक-विमर्श को अपने वैध बिंदुओं से हटाकर फिर उसी क्षेत्र में ले जाते हैं, जो साम्प्रदायिक ताक़तों का प्रिय विषय है।

यानी आज अगर मैं भारत का एक प्रबुद्ध व्यक्ति हूँ, या एक भारतीय मुसलमान हूँ, तो दिल्ली के आतंकी हमले के बाद मेरी मायूसी का कोई ओर-छोर न होगा, और मेरे दिल से दहशतगर्दों के लिए बददुआ के सिवा कुछ नहीं निकलेगा, क्योंकि ना केवल उन्होंने बेगुनाहों की जान ली- जिसकी इस्लाम में सख़्त मनाही है (“जो एक जान लेता है वो पूरी इंसानियत का क़त्ल करता है, जो एक जान बचाता है वो पूरी इंसानियत को बचा लेता है”- क़ुरआन 5:32)- बल्कि उन्होंने राजनै​तिक नैरेटिव को भी उस दिशा में मोड़ देने का प्रयास किया, जहाँ प्रबुद्धजन उसे नहीं ले जाना चाहते और जहाँ इसको ले जाने के लिए दक्षिणपंथी बेचैन हैं।

आप देखें कि मतदान प्रक्रिया में अनियमितता, ग़रीबी, बेरोज़गारी, युवाओं की चिंताओं, बिहार की बदहाली पर एकाग्र हुआ लोक-विमर्श एक झटके में इस्लामिक आतंकवाद पर शिफ़्ट हो गया है। और यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

उदास कर देने वाली बात है कि पढ़े-लिखे मुसलमान भी दहशतगर्दी में लिप्त पाए जाते हैं और सम्प्रदायवादियों को अपने दुष्प्रचार को मज़बूत बनाने की सुविधा दे जाते हैं। क्योंकि उनमें इतनी बुद्धि तो होनी चाहिए कि इस तरह के आतंकी हमलों से कुछ हासिल नहीं किया जा सकता- ना तो वो भारत-राष्ट्र को हरा सकते हैं, ना ही ‘काफिरों’ का ख़ात्मा कर सकते हैं- ले​किन वो अपनी ही क़ौम का एक बहुत बड़ा नुक़सान ज़रूर कर देते हैं। यानी इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन आज की तारीख़ में मुर्तद, या मुनाफिक, या मुशरिक़, या काफिर नहीं, बल्कि ये दशहतगर्द हैं, जो क़ुरआन और हदीस और सीरत की सीखों के विपरीत जाकर, या उनकी ग़लत व्याख्याएँ करके बेमानी ख़ूँज़ारी को अंजाम देते हैं।

और मैं आपसे कह रहा हूँ कि क़ुरआन और हदीस और सीरत में ऐसा कोई कथन नहीं है, जो किसी बेगुनाह के क़त्ल की हिदायत देता हो। जो बदनाम कथन प्रचारित किए जाते हैं, वो एक विशेष अरबी संदर्भ में, एक विशेष परिस्थिति में तत्कालीन क़ुरैशों के प्रति कहे गए हैं, जिनसे उस समय मुजाहिदों और अंसारों की जंग चल रही थी। और जब जंग ख़त्म हुई और ख़ून का एक भी क़तरा बहाए बग़ैर मक्का फ़तह हुआ तो अपने सबसे बड़े दुश्मन अबू सूफ़्यान को पैग़म्बर मोहम्मद ने न केवल माफ़ किया, बल्कि ऊँचे ओहदे से भी नवाज़ा। आगे चलकर इसी अबू सूफ़्यान की उम्मेद क़ौम ने अपनी खिलाफ़त भी क़ायम की।

ऐसे में इतिहास पर बारीक़ नज़र रखने वाले इस बात की तस्दीक़ कर सकते हैं कि इस्लाम की जो अंतर्धारा आज के वक़्त तक चली आई है, उसमें मौलिक स्वर किसका है- रशीदों और अहले-बैत का या उम्मेदों या उनके बाद के ख़लीफ़ाओं का? क़रबला की लड़ाई को याद कीजिये, ऊपरी तौर पर वो जंग मुसलमानों के बीच ही हो रही थी, लेकिन इन्साफ़पसंद पक्ष उनमें से एक ही था। आतंकवाद के नुक़्ते पर मुसलमानों के बीच वो क़रबला आज भी जारी है।

कहा जाता है कि इस्लामिक आतंकवाद में आत्मघाती हमलों पर इसलिए ज़ोर है, क्योंकि आखिरत को मुसलमान इस जीवन से अधिक महत्त्व देते हैं। यह बात सच है, लेकिन आध्यात्मिक संदर्भ में। मौला अली कहते थे कि असल जिंदगी ये नहीं है, जो हम जी रहे हैं, बल्कि वह है जो हमारी मौत के बाद शुरू होगी। लेकिन इसके मायने ये थे कि हम इस संसार में निर्लिप्त होकर रहें, नेकी पर अमल करें, लालच न करें, भ्रष्ट आचरण ना करें, क्योंकि ये दुनिया तो यूँ भी फ़ानी है। आखिरत के लिए जीने का मतलब इस जीवन में ख़ून-ख़राबा करना नहीं है और फिदायीन हमले तो बिलकुल नहीं हैं, क्योंकि क़ुरआन में आत्मघात को स्पष्ट शब्दों में हराम बतलाया गया है (4:29)!

ऐसे में बुनियादी सवाल यह है कि दशहतगर्दी की सख़्त मनाही और बेगुनाहों की जान बचाने की साफ़ ​हिदायतों के बावजूद जो हमें यह ग्लोबल इस्लामिक टेररिज़्म दिखलाई देता है, इसकी उत्पत्ति कहाँ से होती है? इसके मूल में धार्मिक कथनों की ग़लत व्याख्याएँ हैं, और ऐसे में मुसलमानों और इस्लाम के जानकारों का यह फ़र्ज़ बनता है कि इन ग़लत व्याख्याओं को नकारकर सच्ची तस्वीर को दुनिया के सामने पेश करें और एक स्वर में चरमपंथी आतंकवाद की निंदा करें। बेशक वो ये करते भी हैं। लेकिन बीसवीं सदी में जिहाद शब्द की विकृत व्याख्या करने में सईद क़ुत्ब, अब्दुल्ला मौदूदी, ओसामा बिना लादेन, अयमन अल-जवाहिरी ने मुख्य भूमिका निभाई है। इनके विपरीत अल ग़ज़ाली, इब्र तैमिय्या, अल शफ़ी, अबू हनीफ़ा, मलिक इब्न अनस की व्याख्याओं को पढ़ा जाना चाहिए, जो शांति, अहिंसा, न्याय का हवाला देते हैं।

जलालुद्दीन रूमी ने भी​ जिहाद की बात कही थी, लेकिन वो जिहादुल-नफ़्स था- यानी आत्मशुद्धि की जद्दोजहद। इसका बाहरी क़त्लो-ग़ारत से दूर-दूर का नाता नहीं था। पैग़म्बर मोहम्मद के समय इस्लाम की तमाम लड़ाइयाँ अपने स्वरूप में रक्षात्मक थीं और प्रभाव की स्थिति में आने पर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल दिया गया था। फिर ये दहशतगर्द कौन हैं, जो ख़ुद पैग़म्बर की शिक्षाओं के विपरीत जाने का अपराध करते हैं?

इसमें यह ना भूलें कि उड़ी, पुलवामा, पहलगाम की सुरक्षा-चूक और खुफिया नाकामी के बाद दिल्ली की यह घटना देश की राजधानी के हृदयस्थल में घटी है, इसलिए यह और ​बड़ी प्रशासनिक विफलता है। सरकार और विशेषकर केंद्रीय गृह मंत्रालय को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हमने अतीत में नेताओं को पुलवामा के शहीदों के लिए वोट माँगते देखा है, ऑपरेशन सिंदूर को राजनैतिक फ़ायदे के लिए भुनाते देखा है। जबकि ज़रूरत अपनी चूक को स्वीकार कर व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाने की होनी चाहिए। आप पाएँगे कि आज सत्ताधारी पार्टी के समर्थक सरकार से सवाल पूछने के बजाय एक विशेष साम्प्रदायिक नैरेटिव को आगे ठेल रहे हैं। इससे तस्वीर थोड़ी साफ़ भी होती है।

यह कि आज भारत-देश में एक अंदरूनी युद्ध चल रहा है। दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक लोग आपको बताएंगे कि यह लड़ाई हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच है और देश एक गृहयुद्ध की ओर अग्रसर है। जबकि सच्चाई यह है कि यह युद्ध भारत-देश की जनता और युद्धप्रिय तत्त्वों के बीच चल रहा है। भारत-देश की जनता में तो हम-आप शा​मिल हैं, लेकिन युद्धप्रिय तत्त्वों में जिहादी, आतंकवादी, धुर दक्षिणपंथी, सम्प्रदायवादी, घृणा का प्रचार करने वाले और राजनैतिक हितधारक मिल-जुलकर शामिल हैं। इनकी सांठगांठ हैं। ऊपर से लगता है कि ये परस्पर संघर्षरत हैं, जबकि वास्तव में ये एक-दूसरे के नैरेटिव को मज़बूत बनाते हैं और देश को आंतरिक संघर्ष की ओर ले जाते हैं।

हिन्दुत्व की राजनीति का सबसे बड़ा ईंधन तो इस्लामिक चरमपंथ ही है, वही उसको चुनाव जिताता है। प्रबुद्ध हिन्दुओं और मुसलमानों- दोनों को ही इस दुरभिसंधि के प्रति सजग होने की ज़रूरत है।

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