एक भारतीय अफ़सर की कहानी… आदमी के कर्मफल सच में लौटकर आते हैं, कोई माने या न माने! उन्होंने अनुरोध किया है कि उनकी कहानी सुना दूं….

संजय सिन्हा-
मेरे एक जानने वाले बड़े सरकारी अधिकारी थे। कुछ साल पहले दिवाली के मौके पर उनके घर गया था। बंगले के बाहर गाड़ियों की लाइन लगी थी, लोग उपहार के बोझ से झुके जा रहे थे।
दिल्ली में दिवाली रोशनी से ज़्यादा उपहारों का त्योहार है। उपहार वही देते हैं जिन्हें कोई काम निकलवाना होता है। और उपहार वही पाते हैं जो काम आते हैं।
उनके घर फलों के टोकरों के ढेर लगे थे। मैं हैरान था, इतने फल कोई क्या करेगा? मैंने कहा, “सर, ये सारे फल तो खा नहीं पाएंगे, बांट दीजिए।”
वे हंस पड़े। बोले, “संजय सिन्हा, आप नादान हैं। कोई अधिकारी फल नहीं खाता। वह फलों के टोकरों के नीचे रखी चीज़ देखता है।” समझदार के लिए इशारा काफी था। मुझे थोड़ी देर लगी थी, पर समझ गया था।
मैंने सहज ही कहा था, “सर, फल तो खाना ही पड़ता है। अंत में यही फल लौटकर आते हैं, जिन्हें हम कर्मफल कहते हैं।” उन्होंने हंसकर बात टाल दी।
समय बीत गया। मैं काफी समय तक नहीं मिला। मिलता कैसे, मैं तो दिल्ली छोड़ जबलपुर में बैठा था। वे रिटायर हो चुके थे। फोन पर शुरू में बात हुई थी। लेकिन संपर्क नहीं हो पाया था।
खैर- कल उनके घर से फ़ोन आया। उनकी पत्नी थीं। बोलीं, “भैया, हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। कई दिनों तक सोचने के बाद, बहुत हिम्मत जुटा कर कह रही हूं।
क्या? मेरा मन आशंकित था।
“वे नहीं रहे।” मैं स्तब्ध रह गया।
“कैंसर था। लंबा इलाज चला, बहुत पैसे (समझ लीजिए सारे पैसे) खर्च हो गए। ये तो बहुत तकलीफ से गुजरे ही, पूरा परिवार तकलीफ के लंबे दौर से गुजरा। और अंत में डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए।
ये जाते-जाते बार-बार आपको याद कर रहे थे। कहते थे, मेरे कर्मफल लौट आए हैं। काश मैंने संजय सिन्हा जी की बात सुनी होती।”
आवाज़ भर्रा गई थी, “भैया, आपकी कहानी रोज ढूंढ कर पढ़ते थे। आपसे खुद बात करना चाहते थे। संकोच में कर नहीं पाए। रोज कहते थे संजय जी को फोन करो। कहो लिख दे मेरी कहानी।
भैया, आप नाम मत लिखिएगा। लेकिन कहानी में ये लिख दीजिए, आदमी के कर्मफल सच में लौटकर आते हैं। कोई माने या न माने।”
वो बहुत देर कर सिसकती रहीं। मैं बहुत देर तक चुप रहा। मन में वही सवाल, क्या सचमुच कर्मफल लौटते हैं?
- महाभारत की विदुर नीति कहती है, यथा बीजं तथाऽङ्कुर – जैसा बीज बोओगे, वैसा ही अंकुर निकलेगा।
- भगवद्गीता में श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं, कर्म, विकर्म और अकर्म तीनों के परिणाम निश्चित हैं, कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता।
- गरुड़ पुराण और मनुस्मृति भी यही कहते हैं। मनुष्य अपने कर्म के हिसाब से सुख और दुख भोगता है।
हम भौतिक विज्ञान के हर नियम पर विश्वास करते हैं। रसायन विज्ञान पर भी। हम किताबों पर यकीन करते हैं लेकिन जीवन के किताबों पर नहीं।
हम क्यों नहीं मानते कि जीवन का भी एक विज्ञान है? क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, और यह नियम सिर्फ़ प्रयोगशालाओं में नहीं, ज़िंदगी में भी चलता है।
मरना तो सबको है। फर्क केवल इतना है कोई हल्का होकर जाता है, कोई बोझ से दबा हुआ। नोटों से भरे टोकरों के सारे फल खर्च हो गए। पर जो पीड़ा लौटी, वह गिनी नहीं जा सकती थी।
यह कहानी धार्मिक नहीं, सच्ची है। कर्मफल से कोई नहीं बचा, न इतिहास में, न आज। मानकर विश्वास कर लें, या भोगकर जान लें, निर्णय आपका।


