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भास्कर ग्रुप ने रवीश कुमार से प्रायोजित सवाल पूछे!

Girish Malviya

कल देश के तथाकथित सबसे बड़े अखबार दैनिक भास्कर में पत्रकार रवीश कुमार से जो प्रायोजित 10 से 12 सवाल पूछे गए, उनमें से चार सवाल देखिए…

‘क्या मोदी को हरा पाना नामुमकिन है?’

‘अभी तक सरकार में भ्रष्टाचार का कोई भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है?’

‘क्या विपक्ष बिना चेहरे के मोदी का सामना कर पाएगा?’

‘धारणा बन रही है कि जर्नलिस्ट या तो राइटिस्ट है या लेफ्टिस्ट है या एक्टिविस्ट है। या टीवी पर फैसले सुना रहा है?’

यह देश के सबसे बड़े अखबार की हालत है कि एक पत्रकार से भी वह ऐसे सवाल पूछ रहा है जो भाजपा के एजेंडा को पूरी तरह से सपोर्ट कर रहे हैं. दरअसल यह सवाल है ही नहीं. यह कुछ धारणाएं हैं जो अखबार बोल्ड अक्षरों में छाप कर पाठकों के अनकांशस में बैठा देना चाहता है.

कभी आप आज तक, एबीपी, जी न्यूज पर ओर NDTV पर न्यूज़ देखें और उसके साथ जो विजुअल चलाए जाते हैं, उन्हें ध्यान से देखें. आप पाएँगे कि मोदी का चेहरा हमेशा गर्व से तना हुआ दिखाया जाता है, जबकि राहुल गाँधी के ऐसे पिक सलेक्ट करके डाले जाते हैं जिसमे वह पप्पू ही दिखे और कभी कभी तो उनकी मुस्लिम टोपी पहनी तस्वीरें तक दिखाई जाती है. यह एक प्रायोजित छवि बनाई जा रही है.

एक तरह का एजेंडा सेट किया जाता है. पिछले दो तीन महीनों से चैनलों पर राममंदिर पर लगातार बहस दिखाई जा रही है. जबकि जन सामान्य में यह मुद्दा प्राथमिकता खो चुका है. लेकिन निर्देश है कि हिन्दू मुस्लिम से जुड़े छोटे छोटे इशू या बयान बिल्कुल छूटने नहीं चाहिये.

जैसे ही राम मंदिर पर कोर्ट सुनवाई टालने का फ़ैसला करता है, सभी चैनलों पर ओवैसी की प्रतिक्रिया को प्रमुखता से दिखाया जाता है. क्यों? क्या ओवैसी पूरे देश के मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं जो उन्हें आप इतनी प्रमुखता दे रहे हैं? वह भी बहुत होशियारी से वही बात बोलते हैं जो चैनलों को चाहिए.

भारतीय मीडिया के इस स्वरूप को देखने बाद इसके बनिस्बत आप अमेरिकी मीडिया को देखिए …..ट्रम्प की आँख में आँख डालकर सवाल पूछते हुए पत्रकार को देखिए….. और तो और जबरन चुप कराने की कोशिशों के बाद अगला सवाल जिस पत्रकार ने किया, उन्होंने भी उस पत्रकार का ही सपोर्ट किया…. यह है अंतर दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र में…. और अब आप समझ पाएंगे कि हम मीडिया की स्वतंत्रता के सूचकांक में इतना नीचे क्यों गिर गए हैं?

इंदौर निवासी गिरीश मालवीय सोशल मीडिया के चर्चित लेखक हैं. वे मीडिया मामलों के अलावा आर्थिक और राजनीतिक विषयों के भी जानकार हैं.

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