भास्कर ग्रुप ने रवीश कुमार से प्रायोजित सवाल पूछे!

Girish Malviya

कल देश के तथाकथित सबसे बड़े अखबार दैनिक भास्कर में पत्रकार रवीश कुमार से जो प्रायोजित 10 से 12 सवाल पूछे गए, उनमें से चार सवाल देखिए…

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रवीश कुमार ने पूछा- सीबीआई की ‘पार्वती’ और ‘पारो’ में से किसे चुनेंगे देवदास हुज़ूर!

आपने फ़िल्म देवदास में पारो और पार्वती के किरदार को देखा होगा। नहीं देख सके तो कोई बात नहीं। सीबीआई में देख लीजिए। सरकार के हाथ की कठपुतली दो अफ़सर उसके इशारे पर नाचते नाचते आपस में टकराने लगे हैं। इन दोनों को इशारे पर नचाने वाले देवदास सत्ता के मद में चूर हैं। नौकरशाही के भीतर बह रहा गंदा नाला ही छलका है। राजनीति का परनाला वहीं गिरता है जहाँ से उसके गिरने की जगह बनाई गई होती है। चार्जशीट का खेल करने वाली सीबीआई अपने ही दफ़्तर में एफ आई आर और चार्जशीट का खेल खेल रही है। महान मोदी कैलेंडर देख रहे हैं ताकि किसी महान पुरुष की याद के बहाने भाषण देने निकल जाएँ। Continue reading

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रवीश कुमार ने पूछा- ‘प्रधानमंत्रीजी जवाब दीजिए, एमजे अकबर अभी तक क्यों आपके साथ है?’

Ravish Kumar

मेरा अकबर महान ! कारनामा ऐसा कि कायनात शर्मा जाए… सवाल अकबर के इस्तीफ़े का नहीं है। इस्तीफ़ा लेकर कोई महान नहीं बन जाएगा। वो तो होगा ही। मगर जवाब देना पडेगा कि इस अकबर में क्या ख़ूबी थी कि राज्य सभा का सदस्य बनाया, बीजेपी का सदस्य बनाया और मंत्री बनाया। इसके दो दो दलों के अंदरखाने तक पहुँच होती है। सत्ता तंत्र का बादशाह बन जाता है। आराम से कांग्रेस का सांसद, आराम से भाजपा का सांसद। Continue reading

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‘मिरर नाऊ’ की पत्रकार सांतिया ने लिखा- ‘मुंबई का वो ब्यूरो चीफ लगातार मेरे स्तन घूरे जा रहा था!’

Ravish Kumar : सांतिया ‘मिरर नाऊ’ की पत्रकार हैं। कई चैनलों में काम कर चुकी हैं। उनका पोस्ट पढ़िए और ख़ुद में झांकिए। ख़ासकर वो लोग जो नौकरी देने के ओहदे में रहे हैं। बैंकों पर सीरीज़ के दौरान वहाँ काम करने वाली औरतों ने इस तरह के और इससे भी भयानक अनुभव बताए थे। पर उन्हें हैशटैग नहीं मिला क्योंकि वे लिख नहीं सकती थीं। निजी तौर पर मुझे बताया था। उम्मीद है एक हवा बहेगा। Continue reading

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अखिलेश यादव के साथ सेल्फी लेकर रवीश कुमार भी आ गए ‘सेल्फीबाज चिरकुट पत्रकार’ की कैटगरी में!

Vivek Kumar : रवीश कुमार बहुत बड़े वाले हिप्पोक्रेट हैं. जब सुधीर चौधरी और अन्य पत्रकारों ने पीएम नरेंद्र मोदी संग सेल्फी लेकर फेसबुक पर पोस्ट किया तो उन्हें कोसा गया. रवीश ने भी ऐसे सेल्फीबाज पत्रकारों को बुरा-भला कहा. लेकिन उन्होंने अखिलेश यादव के साथ सेल्फी लेकर खुद को ‘सेल्फीबाज चिरकुट पत्रकार’ की कैटगरी में ला खड़ा किया है. बधाई हो. सुधीर चौधरी और रवीश कुमार पत्रकारिता की दो अतियां हैं, दो एक्स्ट्रीम हैं. इन अतियों ने बीच की बहुत बड़ी पत्रकारीय धारा को निगल लिया है, जो पार्टीबाजी-सेल्फीबाजी की जगह सच में तथ्यपरक पत्रकारिता करते हैं, चुपचाप. Continue reading

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रवीश कुमार ने जेटली का बचाव करने वाले पत्रकारों को ‘चंपू’ कह दिया!

Ravish Kumar

मैं नहीं चाहता कि जेटली इस्तीफ़ा दें। मैं इसलिए ये चाहता हूं कि मुझे चांस ही नहीं मिला उनका बचाव करने के लिए। बहुत से पत्रकारों को जब जेटली का बचाव करते देखा तो उस दिन पहली बार लगा कि लाइफ में पीछे रह गया। मगर फिर लगा कि जब जेटली को भी इन पत्रकारों के बचाव की ज़रूरत पड़ जाए तब लगा कि मुझसे ज़्यादा तो जेटली जी पीछे रह गए। Continue reading

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रवीश कुमार को बदनाम करने वाले BJP आईटी सेल के हेड अमित मालवीय की ‘बदमाशी’ पकड़ी गई

Sanjaya Kumar Singh : भाजपा आईटी सेल के प्रमुख की कारगुजारी देखिए। पकौड़े बेचने की तरह करियर यहां भी है। ना गटर गैस की जरूरत और ना गटर के पास खड़े रहने की जरूरत। एयर कंडीशन की नौकरी है, अगर आपको पसंद आए। किसी को बदनाम कैसे किया जाता है, इनसे सीखिए। झूठ के उस्ताद हैं ये लोग। एक न एक दिन इनकी बदमाशी ऐसे ही पकड़ी जानी थी। आगे से ये ‘बदमाशी’ करने में शरम करेंगे, हिचकेंगे, इसमें संदेह है, क्योंकि जब करियर की झूठ का हो तो मजबूरी है इसको विस्तार देना। Continue reading

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क्या आपको आपके हिन्दी के अख़बार ने ये सब बताया?

Ravish Kumar

क्या आपको आपके हिन्दी के अख़बार ने ये सब बताया? नोटबंदी ने लघु व मध्यम उद्योगों की कमर तोड़ दी है। हिन्दू मुस्लिम ज़हर के असर में और सरकार के डर से आवाज़ नहीं उठ रही है लेकिन आंकड़े रोज़ पर्दा उठा रहे हैं कि भीतर मरीज़ की हालत ख़राब है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार मार्च 2017 से मार्च 2018 के बीच उनके लोन न चुकाने की क्षमता डबल हो गई है। Continue reading

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रवीश कुमार ने पूछा- क्या चौकीदार जी ने अंबानी के लिए चौकीदारी की है?

Ravish Kumar 

क्या चौकीदार जी ने अंबानी के लिए चौकीदारी की है? उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है। वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल कहने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये। जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है। आप लोग भी सावधान हो जाएं। Continue reading

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अभूतपूर्व : अमेरिका में एक ही दिन 300 अखबारों ने प्रेस की स्वतंत्रता पर संपादकीय लिखा

Ravish Kumar : प्रेस की आज़ादी पर 300 अमरीकी अख़बारों के संपादकीय… अमरीकी प्रेस के इतिहास में एक शानदार घटना हुई है। 146 पुराने अख़बार दी बोस्टन ग्लोब के नेतृत्व में 300 से अखबारों ने एक ही दिन अपने अखबार में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर संपादकीय छापे हैं। आप बोस्टल ग्लोब की साइट पर जाकर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर लिखे गए 300 संपादकीय का अध्ययन कर सकते हैं। Continue reading

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बाउंसर्स के साए में चलने लगे रवीश कुमार! देखें वीडियो

क्या रवीश कुमार ने अपनी जान पर मंडराते खतरे को देखते हुए बाउंसर रख लिया है? पिछले दिनों उऩ्हें बाउंसर्स के साये में चलते देखा गया. रविन्द्र भवन में आयोजित एक कार्यक्रम से रवीश जब निकले तो कुछ लोगों ने उनसे बातचीत की कोशिश की. पर रविश के बाउंसर ने रोक दिया. Continue reading

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रवीश कुमार के एफबी पेज की रेटिंग जीरो करने में जुटे हैं ‘मोदी भक्त’!

ख़र्चा मोदी जी के समर्थकों का और चर्चा रवीश कुमार का!

ध्यातव्य और ज्ञातव्य हो कि….. आई टी सेल मेरे फ़ेसबुक पेज Ravish Kumar की रेटिंग ज़ीरो करने में लगा है। उन्हें लगता है रेटिंग ज़ीरो होने से फ़ेसबुक मुझे फ्री 1.5 जीबी का दैनिक भत्ता बंद कर देगा।  इसलिए मेरी रेटिंग ज़ीरों करने में अपना 1.5 जीबी ख़त्म कर रहे हैं।

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रवीश की ‘नौकरी सीरीज’ का इंपैक्ट- हजारों युवाओं को इनकम टैक्स इंस्पेक्टर का नियुक्ति पत्र मिला

Ravish Kumar : एनडीटीवी के प्राइम टाइम के लिए जब उस नौजवान ने वीडियो मेसेज भेजा था, तब उसमें उदासी थी। नियुक्ति पत्र न मिलने की कम होती आस थी। जैसे ही वित्त मंत्रालय की शीर्ष संस्था सीबीडीटी ने 505 इनकम टैक्स इंस्पेक्टर के नाम वेबसाइट पर डाले, उसका चेहरा खिल उठा। चहक उठा। ये नौजवान उन 3287 में से एक था जो अगस्त 2017 से परीक्षा पास कर नियुक्ति पत्र का इंतज़ार कर रहे थे। Continue reading

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पेट्रोल की कीमत रिकार्ड स्तर पर होने के बावजूद गोदी मीडिया में संपूर्ण खामोशी : रवीश कुमार

Ravish Kumar : 2013-14 के साल जितना अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमत अभी उछली भी नहीं है लेकिन उस दौरान बीजेपी ने देश को पोस्टरों से भर दिया था बहुत हुई जनता पर डीज़ल पेट्रोल की मार, अबकी बार बीजेपी सरकार। तब जनता भी आक्रोशित थी। कारण वही थे जो आज केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान गिना रहे थे। Continue reading

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ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं : रवीश कुमार

…पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा है कि ख़बरों को चलाने और गिराने के लिए पीएमओ से फोन आते हैं। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए…

Ravish Kumar : न्यूज़ चैनल निर्लज्ज तो थे ही अब अय्याशियां भी करने लगे हैं। इस अय्याशी का सबसे बड़ा उदाहरण है अभी बारह महीने बाद होने वाले चुनाव में कौन जीतेगा। ताकि दिल्ली के आलसी पत्रकारों और एंकरों और बंदर और लोफर प्रवक्ताओं की दुकान चल सके। आम आदमी सड़कों पर मरता रहे।

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पब्लिक ही मेरा संपादक है और मैं पब्लिक न्यूज़ रूम में काम करता हूं। हमारा चैनल अब कई शहरों में नहीं आता है। इससे काम करने के उत्साह पर भी असर पड़ता है। शहर का शहर नहीं देख पा रहा है, सुनकर उदासी तो होती है। इससे ज्यादा उदासी होती है कि संसाधन की कमी के कारण आपके द्वारा भेजी गई हर समस्या को रिपोर्ट नहीं कर पाते। कई लोग नाराज़ भी हो जाते हैं। कोई बेगुसराय से चला आता है तो कोई मुंबई से ख़बरों को लेकर चला आता है। उन्हें लौटाते हुए अच्छा नहीं लगता। आपमें से बहुतों को लगता है कि हर जगह हमारे संवाददाता हैं। सातों दिन, चौबीसों घंटे हैं। ऐसा नहीं है। दिल्ली में ही कम पड़ जाते हैं। जिन चैनलों के पास भरपूर संसाधन हैं उन्हें आपसे मतलब नहीं है। आप एक एंकर का नाम बता दें तो सुबह चार घंटे लगाकर सैंकड़ों लोगों के मेसेज पढ़ता है। इसलिए धीरज रखें। मेरा सवाल सिस्टम से है और मांग है कि सबके लिए बेहतर सिस्टम हो। आपमें से किसी की समस्या को नहीं दिखा सका तो तो आप मुझे ज़रूर उलहाना दें मगर बात समझिए कि जो दिखाया है उसी में आपका सवाल भी है।

आपके मेसेज ने पत्रकारिता का एक नया मॉडल बना दिया है। उसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं और प्रणाम करना चाहता हूं। स्कूल सीरीज़, बैंक सीरीज़, नौकरी सीरीज़, आंदोलन सीरीज़ ये सब आप लोगों की बदौलत संभव हुआ है। दो तीन जुनूनी संवाददाताओं का साथ मिला है मगर इसका सारा श्रेय आप पब्लिक को जाता है।दुनिया का कोई न्यूज़ रूम इतनी सारी सूचनाएं एक दिन या एक हफ्ते में जमा नहीं कर सकता था। महिला बैंकरों ने अपनी सारी व्यथा बताकर मुझे बदल दिया है। वो सब मेरी दोस्त जैसी हैं अब। आप सभी का बहुत शुक्रिया। हर दिन मेरे फोन पर आने वाले सैंकड़ों मेसेज से एक पब्लिक न्यूज़ रूम बन जाता है। मैं आपके बीच खड़ा रहता हूं और आप एक क़ाबिल संवाददाताओं की तरह अपनी ख़बरों की दावेदारी कर रहे होते हैं। मुझे आप पर गर्व है। आपसे प्यार हो गया है। कल एक बुजुर्ग अपनी कार से गए और हमारे लिए तस्वीर लेकर आए। हमारे पास संवाददाता नहीं था कि उसे भेजकर तस्वीर मंगा सकूं।

जब मीडिया हाउस खत्म कर दिए जाएंगे या जो पैसे से लबालब हैं अपने भीतर ख़बरों के संग्रह की व्यवस्था ख़त्म कर देंगे तब क्या होगा। इसका जवाब तो आप दर्शकों ने दिया है। आपका दर्जा मेरे फ़ैन से कहीं ज़्यादा ऊंचा है। आप ही मेरे संपादक हैं। कई बार मैं झुंझला जाता हूं। बहुत सारे फोन काल उठाते उठाते, उसके लिए माफी चाहता हूं। आगे भी झुंझलाता रहूंगा मगर आप आगे भी माफ करते रहिएगा। यही व्यवस्था पहले मीडिया हाउस के न्यूज़ रूम में होती थी। लोगों के संपर्क संवाददाताओं से होते थे। मगर अब संवाददाता हटा दिए गए हैं। स्ट्रिंगर से भी स्टोरी नहीं ली जाती है। जब यह सब होता था तो न्यूज़ रूम ख़बरों से गुलज़ार होता था। अब इन सबको हटा कर स्टार एंकर लाया गया है।

आपसे एक गुज़ारिश है। आप किसी एंकर को स्टार होने का अहसास न कराएं। मुझे भी नहीं। ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं। एक दिन जब आपके भीतर का सियासी और धार्मिक उन्माद थमेगा तब मेरी हर बात याद आएगी। ये एंकर अब हर दिन सत्ता के इशारे पर चलने वाले न्यूज रूम में हाज़िर होते हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा है कि ख़बरों को चलाने और गिराने के लिए पीएमओ से फोन आते हैं। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए।

मैंने सोचा है कि अब से आपकी सूचनाओं की सूची बना कर फेसबुक पर डाल दूंगा ताकि ख़बरों को न कर पाने का अपराधबोध कुछ कम हो सके। यहां से भी लाखों लोगों के बीच पहुंचा जा सकता है। कभी आकर आप मेरी दिनचर्या देख लें। एक न्यूज़रूम की तरह अकेला दिन रात जागकर काम करता रहता हूं। कोई बंदा ताकतवर नहीं होता है। जो ताकतवर हो जाता है वो किसी की परवाह नहीं करता। मैं नहीं हूं इसलिए छोटी छोटी बातों का असर होता है। आज कल इस लोकप्रियता को नोचने के लिए एक नई जमात पैदा हो गई है जो मेरा कुर्ता फाड़े रहती है। यहां भाषण वहां भाषण कराने वाली जमात। एक दिन इससे भी मुक्ति पा लूंगा। शनिवार रविवार आता नहीं कि याद आ जाता है कि कहीं भाषण देने जाना है। उसके लिए अलग से तैयारी करता हूं जिसके कारण पारिवारिक जीवन पूरा समाप्त हो चुका है। जल्दी ही आप ऐसे भाषणों को लेकर आप एक अंतिम ना सुनेंगे। अगर आप मेरे मित्र हैं तो प्लीज़ मुझे न बुलाएं। कोई अहसान किया है तब भी न बुलाएं। मैं अब अपनी आवाज़ सुनूंगा साफ साफ मना कर दूंगा। अकेला आदमी इतना बोझ नहीं उठा सकता है। गर्दन में दर्द है। कमर की हालत खराब है। चार घंटे से ज्यादा सो नहीं पाता।

आप सब मुझे बहुत प्यार करते हैं, थोड़ा कम किया कीजिए, व्हाट्स अप के मेसेज डिलिट करते करते कहीं अस्पताल में भर्ती न हो जाऊं। इसलिए सिर्फ ज़रूरी ख़बरें भेजा करें। बहुत सोच समझ कर भेजिए। मुझे जीवन में बहुत बधाइयां मिली हैं, अब रहने दीजिए। मन भर गया है। कोई पुरस्कार मिलता है तो प्राण सूख जाता है कि अब हज़ारों बधाइयों का जवाब कौन देगा, डिलिट कौन करेगा। मुझे अकेला छोड़ दीजिए। अकेला रहना अच्छा लगता है। अकेला भिड़ जाना उससे भी अच्छा लगता है। गुडमार्निग मेसेज भेजने वालों को शर्तियां ब्लाक करता हूं। बहुतों को ब्लाक किया हूं। जब नौकरी नहीं रहेगी तब चेक भेजा कीजिएगा! तो हाज़िर है पब्लिक न्यूज़ रूम में आई ख़बरों की पहली सूची।

उत्तर प्रदेश में बेसिक टीचर ट्रेनिंग कोर्स एक पाठ्यक्रम है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी पाने के लिए यह कोर्स करना होता है। प्राइवेट कालेज में एक सेमेस्टर की फीस है 39,000 रुपए। राज्य सरकार हर सेमेस्टर में 42,000 रुपये भेजती है। मगर इस बार छात्रों के खाते में 1800 रुपये ही आए हैं। छात्रों का कहना है कि अगले सेमेस्टर में एडमिशन के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। आगरा के एम डी कालेज के छात्र ने अपनी परेशानी भेजी है। उनका कहना है कि प्राइवेट और सरकारी कालेज के छात्रों के साथ भी यही हुआ है।

छात्र ने बताया कि बेसिक टीचर ट्रेनिंग का नाम सत्र 2018 से बदलकर डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन कर दिया है। इसमें राज्यभर में 2 लाख छात्र होंगे। अब जब 2 लाख छात्र अपने साथ होने वाली नाइंसाफी से नहीं लड़ सकते तो मैं अकेला क्या कर सकता हूं। इन्होंने कहा है कि मैं कुछ करूं तो मैं लिखने के अलावा क्या कर सकता हूं। सो यहां लिख रहा हूं।

बिहार से 1832 कंप्यूटर शिक्षक चाहते हैं कि मैं उनकी बात उठाऊं। लीजिए उठा देता हूं। ये सभी पांच साल से आउटसोर्सिंग के आधार पर स्कूलों में पढ़ा रहे थे। मात्र 8000 रुपये पर। अब इन्हें हटा दिया गया है। आठ महीने से धरने पर बैठे हैं मगर कोई सुन नहीं रहा है। इन्हें शिक्षक दिवस के दिन ही हटा दिया गया। कई बार लोग यह सोचकर आउटसोर्सिंग वाली नौकरी थाम लेते हैं कि सरकार के यहां एक दिन परमानेंट हो जाएगा। उन्हें आउटसोर्सिंग और कांट्रेक्ट की नौकरी को लेकर अपनी राजनीतिक समझ बेहतर करनी होगी। नहीं कर सकते तो उन्हें रामनवमी के जुलूस में जाना चाहिए जिसकी आज कल इन 1832 कंप्यूटर शिक्षकों की भूखमरी से ज़्यादा चर्चा है। ऐसा कर वे कम से कम उन्माद आधारित राजनीति के लिए प्रासंगिक भी बने रहेंगे। नौकरी और सैलरी की ज़रूरत भी महसूस नहीं होगी क्योंकि उन्माद की राजनीति अब परमानेंट है। उसमें टाइम कट जाएगा। सैलरी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। वैसे इन शिक्षकों ने एक ट्विटर हैंडल भी बनाया है जहां वे मुख्यमंत्री को टैग करते रहते हैं। मगर कोई नहीं सुनता है। पचास विधायकों ने इनके लिए लिखा है मगर कुछ नहीं हुआ। ये सांसद विधायक भी किसी काम के नहीं है। पत्र लिखकर अपना बोझ टाल देते हैं।

हज़ारों की संख्या में ग्रामीण बैंक के अधिकारी और कर्मचारी तीन दिनों से हड़ताल पर हैं मगर इन्हें सफलता नहीं मिली है। रिटायरमेंट से पहले एक लाख रुपये की सैलरी होती है और रिटायर होने के अगले ही महीने इनकी पेंशन 2000 भी नहीं होती है। बहुत से बुज़ुर्ग बैंकरों की हालत ख़राब है। कोई 2000 में कैसे जी सकता है। आप नेताओं की गाड़ी और कपड़े देखिए। अय्याशी चल रही है भाई लोगों की। ज़ुबान देखिए गुंडों की तरह बोल रहे हैं। आपका सांसद और विधायक पेंशन लेता है और आप से कहता है कि पेंशन मत लो। यह चमत्कार इसलिए होता है क्योंकि आप राजनीतिक रूप से सजग नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है कि सरकारें किसी की नहीं सुनती तो फिर क्यों इन दो कौड़ी के नेताओं के पीछे आप अपना जीवन लगा देते हैं।

कटिहार मेडिकल कालेज के छात्र लगातार मेसेज कर रहे हैं। वहां डॉक्टर फैयाज़ की हत्या हो गई थी। कालेज प्रशासन ख़ुदकुशी मानता है। फ़ैयाज़ की हत्या को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। कैंडल मार्च कर रहे हैं। बहुत दुखद प्रसंग है। गोपालगंज, कटिहार में भी छात्रों ने प्रदर्शन किया है। दोस्तों अपनी लड़ाई में मेरे इस लेख को ही शामिल समझना। मिलने की ज़रूरत नहीं है न बार बार मेसेज करने की। काश संसाधनों वाले चैनल के लोग आपकी खबर कर देते तब तक आप अपने घरों से हर न्यूज़ चैनल का कनेक्शन कटवा दें। एक रुपया चैनलों पर ख़र्च न करें।

अनवर बर्ख़ास्त हो गया, अनिल बच गया। हांसी से किसी पाठक ने दैनिक भास्कर की क्लिपिंग भेजी है। खबर में लिखा गया है कि गवर्नमेंट पी जी कालेज प्रशासन ने प्रोग्रेसिव स्टुडेंट यूनियन के सदस्य अनवर को बर्ख़ास्त कर दिया और एक अन्य सदस्य अनिल को चेतावनी दी है। अच्छी बात है कि सभी छात्रों ने इसका विरोध किया है और प्रिंसिपल सविता मान से मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी है।

भास्कर ने लिखा है कि कालेज के इतिहास विभाग ने 22 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के मौके पर भाषण प्रतियोगिता कराई थी। कार्यक्रम में प्रोगेसिव स्टुडेंट्स फ्रंट के सदस्यों ने पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। भगत सिंह की जेल डायरी,दस्तावेज़ व अन्य प्रगतिशील पत्रिकाएं रखी गईं। छात्रों ने कहा कि प्रिंसिपल ने क्रायक्रम के बीच से ही सब हटवा दिया। छात्रों के आई कार्ड छीन लिया। इसके बाद नोटिस लगाया गया जिसने अनवर का नाम काटने और अनिल को चेतावनी देने की बात लिखी हुई है। छात्रों ने विरोध किया है। प्रिंसिपल ने कहा कि अनवर अनुशासनहीनता करता है। प्राध्यापकों की बात नहीं मानता है। दीवार पर पोस्टर चिपका देता है। उसे कई बार चेतावनी दी गई मगर नहीं माना। हमने भास्कर की ख़बर यहां उतार दी।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था- सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए

Devpriya Awasthi : अपने देश और समाज को समझना है तो एनडीटीवी पर रवीश कुमार और फेसबुक पर हिमांशु कुमार को फालो कीजिए. आपको रवीश के बारे में अपनी राय बनाने और रखने का पूरा अधिकार है लेकिन, सत्ता और व्यवस्था प्रतिष्ठान के विरोध में उनका नजरिया मुझे और मुझ सरीखे बहुत से लोगों को पसंद आता है. मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था कि सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए.

सत्ता और व्यवस्था का समर्थन करना जितना आसान है, सतत विरोध करना उतना ही मुश्किल. जहां तक रवीश द्वारा २.२० करोड़ रुपए के सालाना पैकेज की बात है, मोदी और उनकी सरकार के समर्थन में चाटुकारिता की हद तक जुटे दर्जनों पत्रकार इससे भी ज्यादा पैकेज पा रहे हैं. रही बात अपने मालिक के हित में बात करने की, क्या कोई भी कर्मचारी अपने मालिक के हितों को नुकसान पहुंचाकर उसके संस्थान में टिका रह सकता है.

मैं ३६ साल के कैरियर में आठ संस्थानों और १० राज्यों में काम करने के अनुभव के साथ कह सकता हूं कि किसी भी संस्थान में मालिक या अपने वरिष्ठ अधिकारियों का विरोध करना है तो हर समय इस्तीफा जेब में रखना चाहिए. मैं तो भाग्यशाली था कि मेरे दौर में वैकल्पिक रोजगार के लिए ज्यादा भटकना नहीं पड़ता था. आज तो वैकल्पिक रोजगार मिलना बहुत मुश्किल हो गया है.

वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की एफबी वॉल से.

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पीएम मोदी का पीएनबी घोटाले के एक आरोपी मेहुल भाई से कनेक्शन! देखें वीडियो

Ravish Kumar : प्रधानमंत्री के हमारे मेहुल भाई और रविशंकर प्रसाद की जेंटलमैन चौकसी… ये शब्द प्रधानमंत्री के हैं- ”कितना ही बड़ा शो रूम होगा, हमारे मेहुल भाई यहां बैठे हैं लेकिन वो जाएगा अपने सुनार के पास ज़रा चेक करो।” ये वाक्य यूट्यूब पर हैं। यूट्यूब पर ”PM Narendra Modi at the launch of Indian Gold Coin and Gold Related Schemes” नाम से टाइप कीजिए, प्रधानमंत्री का भाषण निकलेगा। इस वीडियो के 27वें मिनट से सुनना शुरू कीजिए। प्रधानमंत्री हमारे मेहुल भाई का ज़िक्र कर रहे हैं। ये वही मेहुल भाई हैं जिन पर नीरव बैंक के साथ पंजाब नेशनल बैंक को 11 हज़ार करोड़ का चूना लगाने का आरोप लगा है। उनके पार्टनर हैं।

संबंधित वीडियो यहां देखें:

रविशंकर प्रसाद काफी गुस्से में प्रेस कांफ्रेंस करने आए थे। उन्हें लगा कि वे जो बोलेंगे वे जज की तरह फैसला होगा। पत्रकार भी सवाल जवाब नहीं कर सके। आज कल चुप रहने वाले लोग पोलिटिकल एडिटर बन रहे हैं, बोलने वाले निकलवा दिए जा रहे हैं। बहरहार रविशंकर प्रसाद दोबारा अपना प्रेस कांफ्रेंस देख सकते हैं। कितने गुस्से में मेहुल चौकसी का नाम लेते हैं जैसे उनकी हैसियत से नीचे की बात हो उस शख्स का नाम लेना। जबकि प्रधानमंत्री उसी मेहुल भाई को कितना आदर से पुकार रहे हैं। हमारे मेहुल आई। अहा। आनंद आ गया। इन्हीं के बारे में रविशंकर प्रसाद कह रहे थे कि इनके साथ कांग्रेसी नेताओं की तस्वीरें हैं मगर वो जारी नहीं करेंगे। क्योंकि ये उनकी राजनीति का स्तर नहीं है। दुनिया भर के विरोधी नेताओं की तस्वीरों और सीडी जारी करने की राजनीति के बाद उनके इस आत्मज्ञान पर हंसी आई। गोदी मीडिया की हालत बहुत बुरी है।

13 जनवरी 2016 को पीटीआई की खबर कई अखबारों में छपी है कि अरुण जेटली 100 उद्योगपतियों को लेकर जा रहे हैं। यह ख़बर फाइनेंशियल एक्सप्रेस में भी छपी है। आप ख़ुद भी देख सकते हैं कि उसमें नीरव मोदी का नाम है। किसी भी बिजनेस अख़बार की ख़बर देखिए, उसमें यही लिखा होता है कि प्रधानमंत्री मोदी इन बिजनेसमैन की टोली का नेतृत्व कर रहे हैं। ज़ाहिर है उन्हें पता था कि भारत से कौन कौन वहां जा रहा है। इसलिए रविशंकर प्रसाद को सही बात बतानी चाहिए थी न कि इसे सी आई आई पर टाल देना चाहिए था। नीरव मोदी 1 जनवरी 2018 को भारत से रवाना हो जाते हैं। उसके एक दिन बाद सीबीआई की जांच शुरू होती है। क्या यह महज़ संयोग था? जांच के दौरान यह शख्स 23 जनवरी को स्वीट्ज़रलैंड के दावोस में प्रधानमंत्री के करीब पहुंचता है, क्या यह भी संयोग था? इतने छापे पड़े, एफ आई आर हुई मगर यह तो मकाऊ में शो रूम का उद्घाटन कर रहा है। क्या ऐसी छूट किसी और को मिल सकती है? 2014 के पहले मिलती होगी लेकिन 2014 के बाद क्यों मिल रही है?

एनडीटीवी की नम्रता बरार की रिपोर्ट है कि नीरव मोदी इस वक्त न्यूयार्क के महंगे होटल में है। सरकार ने कहा है कि पासपोर्ट रद्द कर दिया जाएगा मगर अभी तक तो नहीं हुआ है। इतने दिनों तक उन्हें भागने की छूट क्यों मिली? हंगामा होने के बाद ही सरकार ने ये क्यों कहा जबकि पंजाब नेशनल बैंक ने एफ आई आर में कहा है कि इनके ख़िलाफ़ लुक आउट नोटिस जारी किया जाए। क्यों नहीं तभी का तभी किया? अब ख़बर आई है कि इंटरपोल के ज़रिए डिफ्यूज़न नोटिस जारी किया गया है। इसका मतलब है कि पुलिस जांच के लिए गिरफ्तारी ज़रूरी है। हंगामे के बाद तो सब होता है मगर लुकआउट नोटिस उस दिन क्यों नहीं जारी हुआ जब एफ आई आर हुई, छापे पड़े। 15 फरवरी को नीरव मोदी के कई ठिकानों पर छापे पड़े हैं जिनमें 5100 करोड़ की संपत्ति के काग़ज़ात ज़ब्त हुए हैं। सभी जगह इसे बड़ा कर छापा गया है जिससे लगे कि बड़ी भारी कार्रवाई हो रही है। इस पर मनी कंट्रोल की सुचेता दलाल ने सख़्त ट्वीट किया है। उनका कहना है कि ख़बर है कि सीबीआई और डीआरई ने 5100 करोड़ के जवाहरात ज़ब्त किया है। अगर नीरव मोदी के पास इतनी संपत्ति होती तो उसे फर्ज़ी लेटर आफ अंडर टेकिंग लेकर घोटाला करने की ज़रूरत नहीं होती। दूसरा प्रक्रिया की बात होती है जो इन छापों से जुड़े अधिकारी बता सकते हैं। इतनी जल्दी संपत्ति का मूल्यांकन नहीं होता है। यह सब ख़बरों का मोल बढ़ाने के लिए किया गया है।

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि घोटाला 2011 से शुरु हुआ। लेकिन यह 2017 तक कैसे चलता रहा? क्यों फरवरी 2017 में आठ फर्ज़ी लेटर ऑफ अंडर टेकिंग जारी किए गए? रविशंकर प्रसाद ने यह तथ्य प्रेस कांफ्रेंस में क्यों नहीं कहा? इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि यह घोटाला 17 बैंकों तक भी गया है। 11,300 करोड़ के अलावा भी 3000 करोड़ का घोटाला हुआ है। नीरव मोदी की कई कंपनियां हैं, इन कंपनियों को 17 बैंकों ने 3000 करोड़ रुपये के लोन दिए हैं। एक्सप्रेस ने लिखा है कि नीरव मोदी और उनके रिश्तेदारों की कंपनी को 2011 से 2017 के बीच 150 लेटर आफ अंटरटेकिंग दिए गए हैं। नियम है कि लेटर आफ अंडर टेकिंग से पैसा लेने पर 90 दिनों के अंदर चुका देना होता है। मगर बिना चुकाए भी इन्हें LOU मिलता रहा है। इतनी मेहरबानी किसके इशारे से हुई? इस मामले में बैंक मैनेजर को क्यों फंसाया जा रहा है? LOU की मंज़ूरी बैंक के बोर्ड से मिलती है, बैंक के मैनेजर से नहीं। मगर एफ आई आर बैंक के मैनेजर और क्लर्कों के खिलाफ हुई है। बोर्ड के सदस्यों और चेयरमैन के ख़िलाफ़ क्यों नहीं एफ आई आर हुई?

एक दो LOU बैंक के खाते में दर्ज नहीं हो सकते हैं मगर उसके आधार पर जब दूसरे बैंक ने नीरव मोदी को पैसे दिए तो उस बैंक ने पंजाब नेशनल बैंक को तो बताया होगा। अपने पैसे पंजाब नेशनल बैंक से तो मांगे होंगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन बैंकों से भी पैसे ले लिए गए और वहां भी हिसाब किताब में एंट्री नहीं हुई? इसका जवाब मिलना चाहिए कि पंजाब नेशनल बैंक के बोर्ड ने कैसे LOU को मंज़ूरी दी, बैंक की आडिट होती है क्या उस आडिट में भी 11,000 करोड़ का घपला नहीं पकड़ा गया तो फिर आडिट किस बात की हो रही थी? इसलिए नौटंकी कम हो ज़रा इस पर, जांच जल्दी हो। 2 जी में भी सारे आरोपी बरी हो गए। एक नेता को बचा कर कितने कारपोरेट को बचाया गया आप खुद भी अध्ययन करें। आदर्श घोटाले में भी अशोक चव्हाण बरी हो गए। इटली की कंपनी अगुस्ता वेस्टलैंड से हेलिकाप्टर खरीदने के घोटाले को लेकर कितना बवाल हुआ। पूर्व वायु सेनाध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया मगर इटली की अदालत में सीबीआई सबूत तक पेश नहीं कर पाई। ये सारी मेहरबानियां किस पर की गईं हैं?

बैंक कर्मचारी बताते हैं कि ऊपर के अधिकारी उन पर दबाव डालते हैं। नौकरी बचाने या कहीं दूर तबादले से बचने के लिए वे दबाव में आ जाते हैं। इन ऊपर वाले डकैतों के कारण बैंक डूब रहे हैं और लाखों बैंक कर्मचारी डर कर काम कर रहे हैं। उनकी सैलरी नहीं बढ़ रही है, बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। बैंको पर भीतर से गहरी मार पड़ी है। आप किसी भी बैंक कर्मचारी से पूछिए वो बता देंगे अपना बुरा हाल। उनकी मानसिक पीड़ा समझने वाला कोई नहीं। आप उस महंगी होती राजनीति की तरफ देखिए जहां पैसे से भव्य रैलियां हो रही हैं। वो जब तक होती रहेंगी तब तक बैंक ही डूबते रहेंगे। आखिर बिजनेसमैन भी पैसा कहां से लाकर देगा। इन्हीं रास्तों से लाकर देगा ताकि हुज़ूर रैलियों में लुटा सकें। यह पैटर्न आज का नहीं है मगर इसके लाभार्थी सब हैं।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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तीन सौ मुकदमों में गवाह है यह एक शख्स!

Ravish Kumar : 300 मामले में गवाह बना सोमेश आपके हर भरोसे पर सवाल है…. क्या ऐसा संभव है कि कोई एक बंदा 250-300 केस में चश्मदीद गवाह हो? उसके 300 केस में फर्ज़ी गवाह होने के क्या मायने हैं? क्या इतना आसान है कि किसी के ख़िलाफ़ फर्ज़ी मामले बनाकर, फ़र्ज़ी गवाब जुटा कर अदालतों के चक्कर लगवा देना और कई मामलों में सज़ा भी दिलवा देना? आसान नहीं होता तो छत्तीसगढ़ का सोमेश पाणिग्रही 250-300 मामलों में गवाह कैसे बन जाता?

हिन्दुस्तान टाइम्स के रीतेश मिश्र की यह रिपोर्ट दहला देने वाली है। बहुत लोग इसे पढ़कर हंस सकते हैं मगर उन्हें भी पता नहीं कि वे या उनका कोई भी रिश्तेदार फ़र्ज़ी केस में फंसा दिया जा सकता है। आपसे कहा जाएगा कि अदालत में भरोसा रखिए। इंसाफ़ मिलेगा। आख़िर भारत में किसी को फर्ज़ी मुकदमें में फंसा देना इतना आसान क्यों हैं? क्या हम एक निष्पक्ष और पेशेवर पुलिस तक नहीं पा सकते हैं? क्या यही हम सबकी औकात रह गई है?

सोमेश पाणिग्रही बस्तर का रहने वाला है। 2013 में पहली बार पुलिस ने जुआ खेलने के मामले में गिरफ्तार लोगों के केस में गवाब बनने को कहा। ना नुकर करने के बाद गवाब बन गया और उसके बाद पुलिस से संबंध रखने के नाम पर गवाब बनता चला गया। पुलिस भी कैसी कि किसी को जानबूझ कर फर्ज़ी मामलों में गवाह बनाती रही।

सोमेश के बारे में कहा गया है कि सब जानते हैं कि इसे कुछ भी रटा दो, गवाही दे आता है। बस्तर का रहने वाला है सोमेश। सोमेश ने इस रिपोर्ट में कहा है कि कोर्ट में उसे हर मजिस्ट्रेट, वकील और पुलिसवाला जानता है। जुआ खेलने के मामले से लेकर अफीम की ज़ब्ती और माओवादी हिंसा तक के मामले में सोमेश चश्मदीद गवाह है। इसने कितनों की ज़िंदगी बर्बाद की होगी? पुलिस ने सोमेश का सहारा लेकर कितनों से पैसे लिए होंगे? इस खेल के पीछे परिवारों पर क्या गुज़री होगी?

यह कहानी हम सभी की चिन्ता के केंद्र में होनी चाहिए। भारत में किसी को भी फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसा देना आसान है। वर्षों तक जांच और अदालती हेर-फेर की प्रक्रिया में किसी का जीवन बर्बाद हो जाता है। एक फ़र्ज़ी केस से पीछा छुड़ाने में लोगों के दस दस साल लग जाते हैं और सारी पूंजी बर्बाद हो जाती है। न्याय की उस जीत के लिए जिसे हासिल करने के लिए कोई अपना जीवन हार जाता है। कई बार सोचता हूं कि दस साल बाद मिली जीत उस व्यक्ति की जीत है या उस संस्था की जीत है जो हर दिन न्याय पाने की आस में आ रहे लोगों को हराती रहती है। हम जिसे न्याय की जीत कहते हैं दरअसल वह न्याय की हार है।

इस कहानी से मिलती जुलती हज़ारों कहानियों आपके आस-पास बिखरी हैं। एक बार जब उनके करीब जाएंगे तो सरकारों को लेकर ज़िंदाबाद करने का सारा जोश हवा में उड़ जाएगा। इस जोश का कुछ तो फायदा हो। क्या हमें सिर्फ सरकार और नेता ही चाहिए, व्यवस्था नहीं चाहिए? सोचिएगा ज़रा ग़ौर से।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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Artificial intelligence के कारण मध्यम और निम्न दर्जे की ढेर सारी नौकरियां विलुप्त हो जाएंगी

Ravish Kumar : नौकरियों के घटते और बदलते अवसरों पर चर्चा कीजिए…  FICCI और NASSCOM ने 2022 में नौकरियों के भविष्य और स्वरूर पर एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसके बारे में बिजनेस स्टैंडर्ड में छपा है। लिखा है कि इस साल आई टी और कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने जा रहे छात्र जब चार साल बाद निकलेंगे तो दुनिया बदल चुकी होगी। उनके सामने 20 प्रतिशत ऐसी नौकरियां होंगी जो आज मौजूद ही नहीं हैं और जो आज मौजूद हैं उनमें से 65 प्रतिशत का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका होगा। ज़रूरी है कि आप अपनी दैनिक समझ की सामग्री में BIG DATA, ARTIFICIAL INTELLEGENCE, ROBOTIC को शामिल करें। इनके कारण पुरानी नौकरियां जाएंगी और नई नौकरियां आएंगी। क्या होंगी और किस स्तर की होंगी, इसकी समझ बनानी बहुत ज़रूरी है।

शोध करने वाली एक कंपनी Gartner का कहना है कि artificial intelligence (AI) के कारण मध्यम और निम्न दर्जे की ढेर सारी नौकरियां समाप्त हो जाएंगी। इसकी जगह पर उच्चतम कौशल, प्रबंध वाली नौकरियां आएंगी। स्थाई नौकरियों तेज़ी से चलन से बाहर हो रही हैं। साझा अर्थव्यवस्था का चलन बढ़ रहा है। इसे GIGS ECONOMY कहते हैं। मैंने पहली बार सुना है। इसके बारे में ठीक से नहीं मालूम। जैसे कूरियर ब्वाय होगा वो कई कंपनियों का सामान ढोएगा।

आप दिल्ली में ही सड़कों पर दुपहिया वाहनों की भीड़ ग़ौर से देख सकते हैं। पीठ पर बोझा लादे ये नौजवान रोज़गार की आख़िरी लड़ाई लड़ते नज़र आएंगे। COWORKING HUB एक नया प्रचलन आया है। इसके बारे में जानने का प्रयास कीजिए। शायद हम और आप किसी चौराहे पर खड़े होंगे, किसी भी काम के लिए, दो या दो से अधिक स्किल के साथ, कोई आएगा काम कराएगा, और घर भेज देगा। घर जाकर हम न्यूज़ चैनलों पर विश्व गुरु बनने का सपना देखते हुए सो जाएंगे।

इकोनोमिक टाइम्स की मालिनी ने भी रोज़गार में आ रहे बदलावों पर एक लेख लिखा है। मैंने इसके कुछ अंश भी बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे फिक्सी और नैसकॉम की रिपोर्ट के साथ मिला दिया है।

मालिनी ने लिखा है कि कंपनियों को पूंजी निर्माण के लिए अब वर्कर की ज़रूरत नहीं है। फेसबुक में मात्र 20,000 लोग ही काम करते हैं जबकि कंपनी का वैल्यू 500 अरब डॉलर है। इसे भारतीय रुपये में बदलेंगे तो सदमा लग जाएगा। डिजिटल युग में नौकरी दो स्तर पर होगी। उच्चतम कौशल वाली और निम्नतम मज़ूदरी वाली। बहुत से दफ्तरों में सर छिपा कर काम करने वाले बीच के काबिल लोग ग़ायब। बल्कि ग़ायब हो भी रहे हैं।

इन सब बदलावों के सामाजिक राजनीतिक परिणाम होंगे। दुनिया भर में सरकारें तेज़ी से ऐसे एजेंडे पर काम कर रही हैं जो भटकाने के काम आ सके। ऐसे मुद्दे लाए जा रहे हैं जिन्हें सुनते ही सपना आने लगता है और जनता सो जाती है। सरकारों पर दबाव बढ़ रहा है कि न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाएं। मगर आप जानते ही हैं, सरकारें किसकी जेब में होती हैं।

मालिनी गोयल ने सरसरी तौर पर बताया है कि जर्मनी, सिंगापुर और स्वीडन में क्या हो रहा है और भारत उनसे क्या सीख सकता है। बल्कि दुनिया को भारत से सीखना चाहिए। यहीं का युवा ऐसा है जिसे नौकरी नहीं चाहिए, रोज़ रात को टीवी में हिन्दू मुस्लिम टापिक चाहिए। अब उसे उल्लू बनाने के लिए इस बहस में उलझाया जाएगा कि आरक्षण ख़त्म होना चाहिए। नौकरी की दुश्मन आरक्षण है। पूरी दुनिया में नौकरी नहीं होने के अलग कारणों पर बहस हो रही है, भारत अभी तक उसी में अटका है कि आरक्षण के कारण नौकरी नहीं है।

सरकार कोई प्रस्ताव नहीं लाएगी, बहस तीन तलाक की तरह बहस में उलझा कर युवाओं का तमाशा देखेगी। आरक्षण पर बहस के मसले का इस्तमाल फ्रंट के रूप में होगा, जिसे लेकर बहस करते हुए युवा सपने में खो जाएगा कि इसी के कारण नौकरी नहीं है। नेता वोट लेकर अपने सपने को पूरा कर लेगा। तथ्यों के लिहाज़ से यह हमारे समय का सबसे बड़ा बकवास है। नौकरी न तो आरक्षित वर्ग के लिए सृजित हो रही है और न अनारक्षित वर्ग के लिए। यही फैक्ट है। नौकरी के सृजन पर तो बात ही नहीं होगी कभी।

जापान के प्रधानमंत्री ने कोरपोरेट से कहा है कि तीन प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूरी बढ़ाएं। जापान में एक दशक बाद अर्थव्यवस्था में तेज़ी आई है। कंपनियों का मुनाफा बढ़ा है मगर यहां लेबर की ज़रूरत नहीं बढ़ी है। उनका मार्केट बहुत टाइट होता है। अखबार लिखता है कि यह और टाइट होगा। टाइट शब्द का ही इस्तमाल किया गया है। जिसका मतलब मैं यह समझ रहा हूं कि तकनीकि बदलाव या उत्पादन का स्वरूप बदलने से अब मानव संसाधन की उतनी ज़रूरत नहीं रही। जापान में कई साल तक कई कंपनियों ने मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं की थी।

कुल मिलाकर बात ये है कि रोज़गार से संबंधित विषयों पर तथ्यात्मक बहस हो, लोगों को पता चलेगा कि दुनिया कैसे बदल रही है और उन्हें कैसे बदलना है। आप अपनी जानकारी का सोर्स बदलिए, ख़बरों को खोज कर पढ़िए। ध्यान रहे, अख़बार ख़रीद लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है। हमेशा किसी एक टापिक पर दो से तीन अखबारों देसी और विदेशी मिलाकर पढ़ें।

नोट- आईटी सेल के लोग बिना पढ़े गाली देना शुरू कर सकते हैं। मुझे खुशी होती है कि मेरे कारण भी आई टी सेल के लड़कों को कुछ काम मिल जाता है। भारत सरकार को बिना किसी ठोस नतीजे वाले स्किल इंडिया कार्यक्रम में ट्रोलिंग को भी शामिल करना चाहिए।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार ने पूछा- मीडिया क्यों सरकार से दलाली खा रहा है?

Ravish Kumar : नागरिक निहत्था होता जा रहा है…. राजस्थान के डॉक्टरों की हड़ताल की ख़बर पर देर से नज़र पड़ी। सरकार ने वादा पूरा नहीं किया है।हमने प्रयास भी किया कि किसी तरह से प्राइम टाइम का हिस्सा बना सकें। मगर हम सब ख़ुद ही अपने साथियों से बिछड़ने की उदासी से घिरे हुए थे। हर दूसरे दिन संसाधन कम होते जा रहे हैं। हम कम तो हुए ही हैं, ख़ाली भी हो गए हैं। साथियों को जाते देखना आसान नहीं था। वर्ना डॉक्टरों को इनबाक्स और व्हाट्स अप में इतने संदेश भेजने की ज़रूरत नहीं होती। आगरा से आलू किसान और दुग्ध उत्पादक भी इसी तरह परेशान हैं। दूध का दाम गिर गया है और आलू का मूल्य शून्य हो गया है। इन ख़बरों को न कर पाना गहरे अफसोस से भर देता है। कोई इंदौर से लगातार फोन कर रहा है।

सबने यही कहा कि एनडीटीवी के अलावा तो कोई हमारी स्टोरी करेगा नहीं। सबको इसी वक्त पत्रकारिता की याद क्यों आती है? आप समझते तो हैं फिर भी क्यों ऐसे अख़बार और चैनल के लिए पैसे देते हैं जहाँ पत्रकारिता के नाम पर तमाशा हो रहा है। हम सवाल करने की कीमत चुका रहे हैं। गुणगान करने वालों को कोई तकलीफ नहीं है। उनके पास सारे संसाधन हैं मगर उन चैनलों पर आम लोगों की खोजकर लाई गई कहानी नहीं होती है। तभी तो आप परेशान वक्त में एनडीटीवी की तरफ देखते हैं। हम किसकी तरफ देखें।
अपवादों को छोड़ दें तो टीवी मीडिया के लिए किसान अब आलू से भी गया गुज़रा हो गया है। मीडिया के लिए डॉक्टरों की भी हैसियत नहीं रही। राजस्थान के डाक्टर महसूस कर ही रहे होंगे। वे भी आलू किसानों की तरह अपने हालात पर चर्चा के लिए परेशान हैं। क्या इस दौरान डॉक्टरों ने मीडिया और उसके साथ नागरिकं के रिश्ते के बारे में सोचा ? आप सरकार चुनते हैं, आपकी जगह मीडिया क्यों सरकार का दोस्त बन जाता है? मीडिया क्यों सरकार से दलाली खा रहा है? क्या मीडिया ने सरकार चुना है?

क्या डॉक्टर आलू किसानों की पीड़ा की ख़बरों को पढ़ते हैं? अपने राजनीतिक फैसले में इस बात को महत्व देते हैं कि फ़लाँ सरकार ने किसानों को सताया है। क्या आलू किसान डाक्टरों से हो रही नाइंसाफी से नाराज़ होते होंगे? नागरिकता का बोध खंडित हो चुका है। सिस्टम एकजुट है। गोदी मीडिया उस सिस्टम का हिस्सा हो चुका है। नागरिक निहत्था हो चुका है। चैनलों को पता है कि लोग उसका परोसा हुआ तमाशा देखेंगे, डॉक्टर और आलू किसान न देखें तो कोई बात नहीं। बाकी बहुत लोग देख रहे हैं। ट्वीटर पर ख़बरें फ्री मिल जाती हैं मगर आप तब भी अख़बार मँगाते हैं जबकि उसमें काम का कुछ नहीं होता। टीवी के साथ भी यही है। जब आपकी ख़बरें नहीं हैं तो बकवास बहसों के लिए आप क्यों पैसे देते हैं?

आप किस चैनल में रिपोर्टिंग देखते हैं ? कितना डिबेट देखेंगे? मीडिया ने आपको भांग की गोली खिला दी है। आप भी नशे में हैं। मैं भले सबकी स्टोरी नहीं कर पा रहा और अब तो और भी कम कर पाऊँगा लेकिन साफ साफ दिख रहा है कि लोग कितने परेशान हैं। वो अपनी आवाज़ सुनाना चाहते हैं मगर कोई चैनल नहीं है। कहीं आवाज़ उठा भी दी जाती है तो किसी पर असर नहीं है। असर तभी पैदा होगा जब आप ख़ुद को इस मीडिया से मुक्त कर लें क्योंकि मीडिया ने ख़ुद को आपसे मुक्त कर लिया है। आप उसके लिए कुछ नहीं है।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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भारत के न्यूज़ एंकर रोबोट के पत्रकार बनने से पहले ही सरकार के रोबोट बन गए हैं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : भले मत जागिए मगर जानते रहिए… अमरीका में एक अद्भुत गिनती हुई है। नए राष्ट्रपति ट्रंप ने दस महीने के कार्यकाल में झूठ बोलने के मामले में शतक बना लिया है। ओबामा ने आठ साल के कार्यकाल में कुल 18 झूठ बोले थे। न्यूयार्क टाइम्स ने भारत के प्रधानमंत्री का झूठ नहीं गिना है। यहाँ भी गिना जाना चाहिए। नेताओं के झूठ की गिनती हो रही है।

दुनिया के बीस देशों में मीडिया के प्रति भरोसा घटा है। भारत में भी घटा है। सर्वे ने यह नहीं बताया या पूछा ही नहीं होगा कि भरोसा घटने के बाद भी न्यूज़ चैनल के दर्शकों या अखबार के पाठकों में कोई कमी आई है क्या? weforum पर यह सर्वे आया है।

ब्रिटेन के अख़बार फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है कि ब्रिटेन के अखबार आदमी और रोबोट का लिखा हुआ लेख छापना शुरू कर रहे हैं। पाठक तय करेंगे कि किसका अच्छा है या रोबोट लेख लिख सकता है या नहीं। भारत के न्यूज़ एंकर रोबोट के पत्रकार बनने से पहले ही सरकार के रोबोट बन गए हैं और अच्छा कर रहे हैं। एक दिन इनकी जगह रोबोट आ भी जाएगा तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। गोदी मीडिया की जगह गोदी रोबोट आने वाला है!

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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टीएम कृष्णा यानि एक ऐसा शास्त्रीय संगीतकार जो सत्ता और कारपोरेट को चुनौती देता है

Ravish Kumar : टी एम कृष्णा हिन्दी जगत के लिए अनजान ही होंगे। मैं ख़ुद कृष्णा के बारे में तीन चार साल से जान रहा हूं, संगीत कम सुना मगर संगीत पर उनके लेख ज़रूर पढ़े हैं। टी एम कृष्णा कर्नाटिक संगीत के लोकप्रिय हस्ती हैं और वे इस संगीत की दुनिया का सामाजिक विस्तार करने में लगे हैं। उनकी किताब A SOUTHERN MUSIC-THE KARNATIK STORY हम जैसे हिन्दी भाषी पाठकों के लिए दक्षिण भारत के संगीत की दुुनिया खोल देती है। संगीत से लेकर मौजूदा राजनीति के बारे में उन्होंने काफी लिखा है जो इस वक्त TMKRISHNA.COM पर मौजूद भी है। कृष्णा कर्नाटिक संगीत सभा पर ऊंची जाति के वर्चस्व को लेकर काफी मुखर रहे हैं और कोशिश करते रहे हैं कि संगीत की इस दुनिया में दलित प्रतिभाएं भी स्थान और मुकाम पाएं। जिसके लिए उन्हें कर्नाटिक संगीत के पांरपरिक उस्तादों की काफी नाराज़गी भी झेलनी पड़ती है।

मैं यहां पर कृष्णा के एक वीडियो की बात करना चाहता हूं। तमिलनाडु में ennore creek के अतिक्रमण को लेकर काफी विवाद हो रहा है। क्रीक मतलब संकरी खाड़ी जहां कोसास्थलियर नदी आकर समुद्र में मिलती है। इस खाड़ी पर कारखानों का कब्ज़ा हो गया है। यह प्राकृतिक जगह पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। कृष्णा इसके लिए प्रतिरोध का संगीत रचते हैं। क्रीक के बीचों बीच खड़े होकर बदहवास विकास का चेहरा दिखाते हैं। उनके गाने को आप सुन सकते हैं। दृश्य शानदार हैं। अंग्रेज़ी में सबटाइटल है तो दिक्कत नहीं होगी।

कृष्णा इस गाने के लिए पोरंबोक शब्द का इस्तमाल करते हैं। पोरंबोक का मतलब है बिना पट्टे वाली सामूहिक भूमि। एक और मतलब है कि आवारा और लापरवाह जिसकी कोई कदर नहीं। वो गाकर बताते हैं कि कैसे एक शब्द जिसका अर्थ सामूहिकता से है वो लांछन में बदल जाता है। कृष्णा ennore creek से कहते हैं कि तुम्हें पावर प्लांट चाहिए था न देखो, आसमान में राख का अंधेरा है। इस प्लांट ने नदी और समुद्र को अलग कर दिया है, क्योंकि अतिक्रमण हो जाने से नदी अब समुद्र में नहीं मिल पाती है। उसके भीतर प्लांट का राख भर गया है। नदी की गहराई कम हो गई है। कृष्णा कहते हैं कि जब विकास की यह भूख ennore creek को हड़प लेगी तो हमारी तरफ आएगी। हम सबको पोरंबोक समझ हड़प लेगी।

हिन्दी के दर्शकों को अपनी दुनिया का विस्तार करना चाहिए। बहुत लोग करते भी हैं मगर सबको करना चाहिए। टी एम कृष्णा बेहद प्रतिभाशाली और दिलचस्प शख़्स हैं। इस म्यूज़िक वीडियो के ज़रिए अपने ही मिडिल क्लास फैन्स या श्रोता को झकझोर रहे हैं कि जागो, वरना अब तुम्हारा ही अतिक्रमण या कब्ज़ा होना बाकी है। मैंने उत्तर भारत में कम ही शास्त्रीय संगीतकार देखें हैं जो सत्ता और कारपोरेट को चुनौती देता हो। हिन्दी शास्त्रीय जगत के गायक और गायिकाओं को सत्ता की चरणों में लोटते ही देखा है। कभी राष्ट्रवाद के बहाने तो कभी संस्कृति के गौरव के बहाने। कृष्णा शास्त्रीय संगीत की दुनिया को बदल रहे हैं। वे शास्त्रीय संगीत में प्रतिरोध के स्वर पैदा कर रहे हैं, उसे लोक संगीत बना रहे हैं।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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आरके सिन्हा का अख़बारों ने भावनात्मक दोहन किया है : रवीश कुमार

Ravish Kumar : क्यों छपी बीजेपी सांसद सिन्हा की सफाई विज्ञापन की शक्ल में… पैराडाइस पेपर्स में भाजपा के राज्य सभा सांसद आर के सिन्हा का भी नाम आया था। इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने उनकी सफाई के साथ ख़बर छापी थी। पैराडाइस पैराडाइस पेपर्स की रिपोर्ट के साथ यह भी सब जगह छपा है कि इसे कैसे पढ़ें और समझें। साफ साफ लिखा है कि ऑफशोर कंपनी कानून के तहत ही बनाए जाते हैं और ज़रूरी नहीं कि सभी लेन-देन संदिग्ध ही हो मगर इसकी आड़ में जो खेल खेला जाता है उसे भी समझने की ज़रूरत है। सरकार को भी भारी भरकम जांच टीम बनानी पड़ी है। ख़ैर इस पर लिखना मेरा मकसद नहीं है।

आज कई अख़बारों में आर के सिन्हा का बयान विज्ञापन की शक्ल में छपा देखा। यह चिन्ता की बात है। मुझे जानकारी नहीं कि अख़बार ने इसके लिए पैसे लिए हैं या नहीं। अगर मुफ्त में भी छापा है तो भी इस तरह से छापना ग़लत है। आर के सिन्हा ने बतौर सांसद राज्य सभा के अध्यक्ष वेंकैया नायडू को पत्र लिखा है और इस पत्र को विज्ञापन की शक्ल में छापा गया है।

मेरी नज़र में यह फिरौती वसूलना है। पेड न्यूज़ भी है। क्या जिन अख़बारों ने सिन्हा की सफाई छापी है, उन्होंने पैराडाइस पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी? अगर नहीं तो यह और भी गहरा नैतिक अपराध है? ख़बर नहीं छापी मगर सफाई के नाम पर धंधा कर लिया? मीडिया और राजनेता का संबंध विचारों और बयानों के आदान प्रदान का होना चाहिए। इस आधार पर कोई अखबार किसी नेता का हर बयान नहीं छापेगा मगर छापने के लिए पैसे नहीं ले सकता है, यह तय है। एक्सप्रेस ने विज्ञापन वाली सफाई नहीं छापी है। अगर नहीं छापी है तो ठीक किया है।

हमारे देश में किसी संस्था की कोई विश्वसनीयता नहीं रह गई है, वरना इस पर उन अखबारों के ख़िलाफ़ एक्शन हो जाना चाहिए था जिन्होंने सिन्हा का विज्ञापन छापा। ठीक है कि सिन्हा ही लेकर आए होंगे मगर अखबारों को मना करना चाहिए था और कहना चाहिए कि हम ऐसे ही आपकी सफाई छापेंगे।

कई बार कंपनियां अपनी सफाई में विज्ञापन देती हैं ताकि सारी बात उनके हिसाब से छप जाए जिसे कोई नहीं पढ़ता है। हो सकता है कि कुछ लोग पढ़ लेते। कायदे से इस पर भी खबर छपनी चाहिए कि फला कंपनी ने हमारे अखबार में 5 लाख का विज्ञापन देकर विस्तार से सफाई छापी है, उसे भी पेज नंबर दस पर जाकर पढ़ें। वैसे भी सिन्हा की सफाई तो बतौर सांसद है। उसमें राजनीतिक आरोप भी है। उनकी कंपनी की तरफ से सफाई नहीं छपी है। क्या राजनेताओं से उनकी सफाई के लिए पैसे लिए जाएंगे?

मेरी राय में अख़बारों को आर के सिन्हा का पैसा लौटा देना चाहिए। सिन्हा ख़ुद चलकर फिरौती देने आए, इससे अपहरण का अपराध कम नहीं जाता और न फिरौती नैतिक हो जाती है। किसी के कमज़ोर वक्त में फ़ायदा नहीं उठाना चाहिए। हम कार्टून बना सकते हैं, उन पर हंस सकते हैं उनके खिलाफ लिख सकते हैं तो उनकी सफाई भी बिना पैसे के छपनी चाहिए। इससे राजनेता और मीडिया का संबंध बदल जाएगा। अख़बार फिरौती वसूलने लगेंगे। नेता ख़बर दबाने के लिए पहले ही विज्ञापन दे देगा और सफाई छाप देगा कि एक पत्रकार उनकी कंपनी को बदनाम करने में लगा है। कई नेताओं की अपनी कंपनियां होती हैं। तब क्या होगा।

मैं मानता हूं कि आरके सिन्हा का अख़बारों ने भावनात्मक दोहन किया है। उन्हें फ्री में सफाई का स्पेस मिलना चाहिए था। वैसे भी सिन्हा भागवत यज्ञ के बीच में है । मौन धारण किए हुए हैं। विज्ञापन की शक्ल में इतनी लंबी सफाई लिख डाली। यज्ञ से उनका ध्यान हट गया है। किसी का भी हट जाएगा। क्या उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी? संपादकों तक भी भिजवा सकते थे। मुझे इसकी जानकारी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया या नहीं। फिर भी मुझे लगता है कि सफाई को विज्ञापन के मामले में छाप कर या छपवा कर दोनों ने ग़लत किया है।

एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए

Ravish Kumar : इंडियन एक्सप्रेस में छपे पैराडाइस पेपर्स और द वायर की रिपोर्ट pando.com के बिना अधूरा है… हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए। एक पाठक के रूप में आप बेहतर होंगे। हिन्दी में तो यह सब मिलेगा नहीं क्योंकि ज्यादातर हिन्दी अख़बार के संपादक अपने दौर की सरकार के किरानी होते हैं। कारपोरेट के दस्तावेज़ों को समझना और उसमें कमियां पकड़ना ये बहुत ही कौशल का काम है। इसके भीतर के राज़ को समझने की योग्यता हर किसी में नहीं होती है। मैं तो कई बार इस कारण से भी हाथ खड़े कर देता हूं। न्यूज़ रूम में ऐसी दक्षता के लोग भी नहीं होते हैं जिनसे आप पूछकर आगे बढ़ सकें वर्ना कोई आसानी से आपको मैनुपुलेट कर सकता है।

इसका हल निकाला है INTERNATIONAL CONSORTIUM OF INVESTIGATIVE JOURNALISTS ने। दुनिया भर के 96 समाचार संगठनों को मिलाकर एक समूह बना दिया है। इसमें कारपोरेट खातों को समझने वाले वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। एक्सप्रेस इसका हिस्सा है। आपको कोई हिन्दी का अख़बार इसका हिस्सेदार नहीं मिलेगा। बिना पत्रकारों के ग्लोबल नेटवर्क के आप अब कोरपोरेट की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते हैं।

1 करोड़ 30 लाख कारपोरेट दस्तावेज़ों को पढ़ने समझने के बाद दुनिया भर के अख़बारों में छपना शुरू हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में आज इसे कई पन्नों पर छापा है। आगे भी छापेगा। पनामा पेपर्स और पैराडाइस पेपर्स को मिलाकर देखेंगे तो पांच सौ हज़ार लोगों का पैसे के तंत्र पर कब्ज़ा है। आप खुद ही अपनी नैतिकता का कुर्ता फाड़ते रह जाएंगे मगर ये क्रूर कुलीन तंत्र सत्ता का दामन थामे रहेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके यहां कोई नैतिकता नहीं है। वो नैतिकता का फ्रंट भर है।

राज्य सभा में सबसे अमीर और बीजेपी के सांसद आर के सिन्हा का भी नाम है। जयंत सिन्हा का भी नाम है। दोनों ने जवाब भी दिया है। नोटबंदी की बरसी पर काला धन मिटने का जश्न मनाया जाने वाला है। ऐसे मौके पर पैराडाइस पेपर्स का यह ख़ुलासा हमें भावुकता में बहने से रोकेगा। अमिताभ बच्चन, अशोक गहलोत, डॉ अशोक सेठ, कोचिंग कंपनी फिट्जी, नीरा राडिया का भी नाम है। आने वाले दिनों में पता नहीं किस किस का नाम आएगा, मीडिया कंपनी से लेकर दवा कंपनी तक मालूम नहीं।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जयंत सिन्हा की सफाई पढ़ेंगे तो लगेगा कि कोई ख़ास मामला नहीं है। जब आप इसी ख़बर को PANDO.COM पर 26 मई 2014 को MARKS AMES के विश्लेषण को पढ़ेंगे तो लगेगा कि आपके साथ तो खेल हो चुका है। अब न ताली पीटने लायक बचे हैं न गाली देने लायक। जो आज छपा है उसे तो MARK AMES ने 26 मई 2014 को ही लिख दिया था कि ओमेदियार नेटवर्क मोदी की जीत के लिए काम कर रहा था। यही कि 2009 में ओमेदियार नेटवर्क ने भारत में सबसे अधिक निवेश किया, इस निवेश में इसके निदेशक जयंत सिन्हा की बड़ी भूमिका थी।

2013 में जयंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर मोदी के विजय अभियान में शामिल होने का एलान कर दिया। उसी साल नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की एक सभा मे भाषण दिया कि ई-कामर्स को खोलने की ज़रूरत है। यह भाजपा की नीति से ठीक उलट था। उस वक्त भाजपा संसद में रिटेल सेक्टर में विदेश निवेश का ज़ोरदार विरोध कर रही थी। भाजपा समर्थक व्यापारी वर्ग पार्टी के साथ दमदार तरीके से खड़ा था कि उसके हितों की रक्षा भाजपा ही कर रही है मगर उसे भी नहीं पता था कि इस पार्टी में एक ऐसे नेटवर्क का प्रभाव हो चुका है जिसका मकसद सिर्फ एख ही है। ई कामर्स में विदेश निवेश के मौके को बढ़ाना।

मुझे PANDO.COM के बारे में आज ही पता चला। मैं नहीं जानता हूं क्या है लेकिन आप भी सोचिए कि 26 मई 2014 को ही पर्दे के पीछे हो रहे इस खेल को समझ रहा था। हम और आप इस तरह के खेल को कभी समझ ही नहीं पाएंगे और न समझने योग्य हैं। तभी नेता हमारे सामने हिन्दू मुस्लिम की बासी रोटी फेंकर हमारा तमाशा देखता है। जब मोदी जीते थे तब ओमेदियार नेटवर्क ने ट्वीट कर बधाई दी थी। टेलिग्राफ में हज़ारीबाग में हे एक प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता शिव शंकर प्रसाद गुप्त कहते हैं कि जयंत सिन्हा 2012-13 में दो साल मोदी की टीम के साथ काम कर चुके हैं। इस दौरान जयंत सिन्हा ओमिदियार नेटवर्क में भी काम कर रहे थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि 2013 में इस्तीफा दिया।

इसमें मार्क ने लिखा है कि जयंत सिन्हा ओमेदियार नेटवर्क के अधिकारी होते हुए भी बीजेपी से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में निदेशक हैं। इसी फाउंडेशन के बारे में इन दिनों वायर में ख़बर छपी है। शौर्य डोवल जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बेटे हैं, वो इस फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। जयंत सिन्हा ई कामर्स में विदेशी निवेश की छूट की वकालत करते रहते थे जबकि उनकी पार्टी रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर ज़ोरदार विरोध करने का नाटक करती थी। जनता इस खेल को कैसे देखे। क्या समझे। बहुत मुश्किल है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट को the wire.in और PANDO.COM के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

क्या सही में आप इस तरह के खेल को समझने योग्य हैं? मेरा तो दिल बैठ गया है। जब हम वायर की रिपोर्ट पढ़ रहे थे तब हमारे सामने PANDO.COM की तीन साल पुरानी रिपोर्ट नहीं थी। तब हमारे सामने पैराडाइस पेपर्स नहीं थे। क्या हम वाकई जानते हैं कि ये जो नेता दिन रात हमारे सामने दिखते हैं वे किसी कंपनी या नेटवर्क के फ्रंट नहीं हैं? क्या हम जानते हैं कि 2014 की जीत के पीछे लगे इस प्रकार के नेटवर्क के क्या हित रहे होंगे? वो इतिहास का सबसे महंगा चुनाव था।

क्या कोई इन नेटवर्कों को एजेंट बनकर हमारे सामने दावे कर रहा था? जिसे हम अपना बना रहे थे क्या वो पहले ही किसी और का हो चुका था? इसलिए जानते रहिए। किसी हिन्दी अख़बार में ये सब नहीं मिलने वाला है। इसलिए गाली देने से पहले पढ़िए। अब मैं इस पर नहीं लिखूंगा। यह बहुत डरावना है। हमें हमारी व्यक्तिगत नैतिकता से ही कुचल कर मार दिया जाएगा मगर इन कुलीनों और नेटवर्कों का कुछ नहीं होगा। इनका मुलुक एक ही है। पैसा। मौन रहकर तमाशा देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश जी, अगर Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये!

Divakar Singh : रवीश जी, आपने सही लिखा हमारी मीडिया रीढविहीन है. साथ ही नेता भी चाहते हैं मीडिया उनकी चाटुकारिता करती रहे. आप बधाई के पात्र हैं यह मुद्दे उठाने के लिए. पर क्या बस इतना बोलने से डबल स्टैंडर्ड्स को स्वीकार कर लिया जाए? आप कहते हैं कि ED या CBI की जांच नहीं हुई तो कोई मानहानि नहीं हुई. आप स्वयं जानते होंगे कितनी हलकी बात कह दी है आपने. दूसरा लॉजिक ये कि अमित शाह स्वयं क्यों नहीं आये बोलने. अगर वो आते तो आप कहते वो पिता हैं मुजरिम के, इसलिए उनकी बात का कोई महत्त्व नहीं. तीसरी बात आप इतने उत्तेजित रोबर्ट वाड्रा वगैरह के मामले में नहीं हुए. यहाँ आप तुरंत अत्यधिक सक्रिय हो गए और अतार्किक बातें करने लगे. ठीक है नेता भ्रष्ट होते हैं, मानते हैं, पर कम से कम तार्किक तो रहिये, अगर निष्पक्ष नहीं रह सकते.

हालांकि हम जैसे लोग जो आपका शो पसंद करते हैं, चाहते हैं कि आप निष्पक्ष भी रहें. किसी ईमानदार पत्रकार का एक गुट के विरोध में और दूसरे के समर्थन में हर समय बोलते रहना एक गंभीर समस्या है, जिसमें आप जैसे आदरणीय (मेरी निगाह में) पत्रकार हठधर्मिता के साथ शामिल हैं. मोदी सरकार के कट्टर समर्थक मीडिया को आप बुरा मानते हैं, तो कट्टर विरोधी जोकि तर्कहीन होकर आलोचना करने लग जाते हैं, उतने ही बुरे हैं. एक और बात भी आपसे कहना चाह रहा था. आप को शायद बुरा लगा कि भारत की मीडिया कुछ कर नहीं पा रही है और ऑस्ट्रेलिया की मीडिया बहुत बढ़िया है.

क्या आप जानते हैं कि आप जिस इंडस्ट्री में है, उसके लिए भारत में सबसे धाकड़ मीडिया स्तम्भ कौन सा है? कुछ महीने पहले आपने हिंदी मीडिया के कुछ पोर्टल गिनाये थे, कल फिर कुछ गिनाये थे. Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये, जो वो तमाम पत्रकारों के हित में करते हैं. उनको भी थोडा महत्त्व दें जब आप हिंदी मीडिया की बात करते हैं. नहीं तो आप भी मोदी और शाह के लीक में शामिल नहीं हैं जो अपने आलोचक को तवज्जो नहीं देते? तो सर मुख्य समस्या डबल स्टैंडर्ड्स की है. सोचियेगा जरूर. न सोचेंगे तो भी ठीक. जो है सो हईये है.

एक आईटी कंपनी के मालिक दिवाकर सिंह ने उपरोक्त कमेंट एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार के जिस एफबी पोस्ट पर किया है, वह इस प्रकार है—

Ravish Kumar : मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी… आस्ट्रेलिया के जिन शहरों का नाम हम लोग क्रिकेट मैच के कारण जानते थे, वहां पर एक भारतीय कंपनी के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को एडिलेड, कैनबरा, सिडनी, ब्रिसबेन, मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट, पोर्ट डगलस में प्रदर्शन हुए हैं। शनिवार को आस्ट्रेलिया भर में 45 प्रदर्शन हुए हैं। अदानी वापस जाओ और अदानी को रोको टाइप के नारे लग रहे हैं। वहां के करदाता नहीं चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट की सब्सिडी उनके पैसे से दी जाए।

अदानी ग्रुप के सीईओ का बयान छपा है कि प्रदर्शन सही तस्वीर नहीं है। स्तानीय लोग महारा समर्थन कर रहे हैं। जेयाकुरा जनकराज का कहना है कि जल्दी ही काम शुरू होगा और नौकरियां मिलने लगेंगी। यहां का कोयला भारत जाकर वहां के गांवों को बिजली से रौशन करेगा। पिछले हफ्ते आस्ट्रेलिया के चैनल एबीसी ने अदानी ग्रुप पर एक लंबी डाक्यूमेंट्री बना कर दिखाई। इसका लिंक आपको शेयर किया था। युवा पत्रकार उस लिंक को ज़रूर देखें, भारत में अब ऐसी रिपोर्टिंग बंद ही हो चुकी है। इसलिए देख कर आहें भर सकते हैं। अच्छी बात है कि उस डाक्यूमेंट्री में प्रशांत भूषण हैं, प्रांजॉय गुहा ठाकुरता हैं।

प्रांजॉय गुहा ठाकुरता ने जब EPW में अदानी ग्रुप के बारे में ख़बर छापी तो उन पर कंपनी ने मानहानि कर दिया और नौकरी भी चली गई। अभी तक ऐसी कोई ख़बर निगाह से नहीं गुज़री है कि अदानी ग्रुप ने एबीसी चैनल पर मानहानि का दावा किया हो। स्वदेशी पत्रकारों पर मानहानि। विदेशी पत्रकारों पर मानहानि नहीं। अगर वायर की ख़बर एबीसी चैनल दिखाता तो शायद अमित शाह के बेटे जय शाह मानहानि भी नहीं करते। क्या हमारे वकील, कंपनी वाले विदेशी संपादकों या चैनलों पर मानहानि करने से डरते हैं?

एक सवाल मेरा भी है। क्या अंग्रेज़ी अख़बारों में छपी ख़बरों का हिन्दी में अनुवाद करने पर भी मानहानि हो जाती है? अनुवाद की ख़बरों या पोस्ट से मानहानि का रेट कैसे तय होता है, शेयर करने वालों या शेयर किए गए पोस्ट पर लाइक करने वालों पर मानहानि का रेट कैसे तय होता है? चार आना, पांच आना के हिसाब से या एक एक रुपया प्रति लाइक के हिसाब से?

पीयूष गोयल को प्रेस कांफ्रेंस कर इसका भी रेट बता देना चाहिए कि ताकि हम लोग न तो अनुवाद करें, न शेयर करें न लाइक करें। सरकार जिसके साथ रहे, उसका मान ही मान करें। सम्मान ही सम्मान करें। न सवाल करें न सर उठाएं। हम बच्चे भी खेलते हुए गाएं- मानहानि मानहानि, घोघो रानी कितना पानी। पांच लाख, दस लाख, एक करोड़, सौ करोड़।
यह सब इसलिए किया जा रहा है कि भीतरखाने की ख़बरों को छापने का जोखिम कोई नहीं उठा सके। इससे सभी को संकेत चला जाता है कि दंडवत हो, दंडवत ही रहो। विज्ञापन रूकवा कर धनहानि करवा देंगे और दूसरा कोर्ट में लेकर मानहानि करवा देंगे। अब यह सब होगा तो पत्रकार तो किसी बड़े शख्स पर हाथ ही नहीं डालेगा। ये नेता लोग जो दिन भर झूठ बोलते रहते हैं,

क्या इनके ख़िलाफ़ मानहानि होती रहे?

अमित शाह एक राजनीतिक शख्स हैं। तमाम आरोप लगते रहे हैं। वे उसका सामना भी करते हैं, जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। वायर की ख़बर में आरोप तो हैं नहीं। जो कंपनी ने रिकार्ड जमा किए हैं उसी का विश्लेषण है। फिर कंपनी रजिस्ट्रार को दस्तावेज़ जमा कराने और उस आधार पर लिखने या बोलने से समस्या है तो ये भी बंद करवा दीजिए।

अमित शाह के बेटे के बारे में ख़बर छपी। पिता पर तो फेक एनकाउंटर मामलों में आरोप लगे और बरी भी हुए। सोहराबुद्दीन मामले में तो सीबीआई ट्रायल कोर्ट के फैसले पर अपील ही नहीं कर रही है। उन पर करप्शन के आरोप नहीं लगे हैं। इसके बाद भी अमित शाह आए दिन राजनीतिक आरोपों का सामना करते रहते हैं। जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। कायदे से उन्हें ही आकर बोलना चाहिए था कि पुत्र ने मेरी हैसियत का कोई लाभ नहीं लिया है। मगर रेल मंत्री बोलने आ गए। मानहानि का फैसला अगर पुत्र का था तो रेल मंत्री क्यों एलान कर रहे थे?

इस ख़बर से ऐसी क्या मानहानि हो गई? किसी टीवी चैनल ने इस पर चर्चा कर दी? नहीं न। सब तो चुप ही थे। चुप रहते भी। रहेंगे भी। कई बार ख़बरें समझ नहीं आती, दूसरे के दस्तावेज़ पर कोई तीसरा जिम्मा नहीं उठाता, कई बार चैनल या अखबार रूक कर देखना चाहते हैं कि यह ख़बर कैसे आकार ले रही है? राजनीति में किस तरह से और तथ्यात्मक रूप से किस तरह से। यह ज़रूरी नहीं कि टीवी दूसरे संस्थान की ख़बर को करे ही। वैसे टीवी कई बार करता है। कई बार नहीं करता है। हमीं एक हफ्ते से उच्च शिक्षा की हालत पर प्राइम टाइम कर रहे हैं, किसी ने नोटिस नहीं लिया।

लेकिन, जब चैनलों ने कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार किया तो उन्हें पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस का भी बहिष्कार करना चाहिए था। जब सिब्बल का नहीं दिखाए तो गोयल का क्यों दिखा रहे थे? अव्वल तो दोनों को ही दिखाना चाहिए था। लाइव या बाद में उसका कुछ हिस्सा दिखा सकते थे या दोनों का लाइव दिखा कर बाद में नहीं दिखाते। यह मामला तो सीधे सीधे विपक्ष को जनता तक पहुंचने से रोकने का है। सिब्बल वकील हैं। उन्हें भी अदालत में विपक्ष के स्पेस के लिए जाना चाहिए। बहस छेड़नी चाहिए।
इस तरह से दो काम हो रहे हैं। मीडिया में विपक्ष को दिखाया नहीं जा रहा है और फिर पूछा जा रहा है कि विपक्ष है कहां। वो तो दिखाई ही नहीं देता है। दूसरा, प्रेस को डराया जा रहा है कि ऐसी ख़बरों पर हाथ मत डालो, ताकि हम कह सके कि हमारे ख़िलाफ़ एक भी करप्शन का आरोप नहीं है। ये सब होने के बाद भी चुनाव में पैसा उसी तरह बह रहा है। उससे ज़्यादा बहने वाला है। देख लीजिएगा और हो सके तो गिन लीजिए।

एक सवाल और है। क्या वायर की ख़बर पढ़ने के बाद सीबीआई अमित शाह के बेटे के घर पहुंच गई, आयकर अधिकारी पहुंच गए? जब ऐसा हुआ नहीं और जब ऐसा होगा भी नहीं तो फिर क्या डरना। फिर मानहानि कैसे हो गई? फर्ज़ी मुकदमा होने का भी चांस नहीं है। असली तो दूर की बात है। एबीसी चैनल ने अदानी ग्रुप की ख़बर दिखाई तो

ENFORCEMENT DEPARTMENT यानी ED अदानी के यहां छापे मारने लगा क्या? नहीं न। तो फिर मानहानि क्या हुई?

अदालत को भी आदेश देना चाहिए कि ख़बर सही है या ग़लत, इसकी जांच सीबीआई करे, ईडी करे, आयकर विभाग करे फिर सबूत लेकर आए, उन सबूतों पर फैसला हो। ख़बर सही थी या नहीं। ख़बर ग़लत इरादे से छापी गई या यह एक विशुद्ध पत्रकारीय कर्म था।

एक तरीका यह भी हो सकता था। इस ख़बर का बदला लेने के लिए किसी विपक्ष के नेता के यहां लाइव रेड करवा दिया जाता। जैसा कि हो रहा है और जैसा कि होता रहेगा। सीबीआई, आयकर विभाग, ईडी इनके अधिकारी तो पान खाने के नाम पर भी विपक्ष के नेता के यहां रेड मार आते हैं। किसी विपक्ष के नेता की सीडी तो बनी ही होगी, गुजरात में चुनाव होने वाले हैं, किसी न किसी को बन ही गई होगी। बिहार चुनाव में भी सीडी बनी थी। जिनकी बनी थी पता नहीं क्या हुआ उन मामलों में। ये सब आज से ही शुरू कर दिया जाए और आई टी सेल लगाकर काउंटर कर दिया जाए।

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‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

रवीश कुमार का उपरोक्त पत्र फेसबुक पर लाखों की संख्या में शेयर, लाइक और कमेंट हासिल कर चुका है..

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बिकने के बाद भी एनडीटीवी में काम करेंगे रवीश कुमार?

Ashwini Kumar Srivastava :  ”अब तेरा क्या होगा रवीश कुमार…” एनडीटीवी पर भी कब्जा कर चुके मोदी-अमित शाह और उनके समर्थक शायद ऐसा ही कुछ डॉयलाग बोलने की तैयारी में होंगे। जाहिर है, रवीश हों या एनडी टीवी के वे सभी पत्रकार, उनके लिए यह ऐसा मंच था, जहां वे बिना किसी भय के सरकार की आलोचना या खामियों की डुगडुगी पीट लेते थे। उनकी इसी डुगडुगी को अपने लिये खतरा मानकर संघ और भाजपा के समर्थकों की नजर में ये पत्रकार और एनडीटीवी सबसे बड़े शत्रु बने हुए थे।

कौन नहीं जानता कि लोकतंत्र में पक्ष से कहीं ज्यादा जरूरी विपक्ष होता है और मीडिया के जरिये पत्रकार भी विपक्ष की ही भूमिका निभाते हैं। हालांकि यह मामूली सी समझ भी केवल उनको ही हो सकती है, जिन्हें वास्तव में देश और लोकतंत्र से प्यार होगा। सरकार के खिलाफ भी बेबाकी से बोलने एनडी टीवी जैसे मीडिया का भी यदि देश में अभाव होगा, तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में लोकतंत्र सिर्फ यादों में जीवित रह जायेगा। लोकतंत्र की क्या अहमियत है, यह मोदी-अमित शाह के समर्थकों को शायद तभी पता चल पाएगा, जिस दिन उनके नेता लोकतंत्र की समस्त संस्थाओं को एनडीटीवी की ही तरह खुद या अपने कारिंदों द्वारा एक एक करके निगल जाएंगे। तब तक यूं ही अच्छे दिनों के आने का जश्न मनाते रहिये… (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

Uday Prakash : तो अब एनडीटीवी भी बिक गया? ख़बर प्रामाणिक है। स्पाइस जेट मालिक अजय सिंह, जो २०१४ के चुनाव अभियान में भाजपा के सहयोगी रहे हैं, वही अब सारे सम्पादकीय अधिकारों के साथ एनडीटीवी के मालिक होंगे। (जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.)

Nitin Thakur : कितना सच और कितना झूठ ये नहीं मालूम लेकिन बीजेपी के समर्थक और मोदी की कैंपेनिंग में जुटी कोर टीम के मेंबर, प्रमोद महाजन के पूर्व सचिव और स्पाइसजेट नाम की सस्ती और सर्विस में बकवास (मेरी निजी राय) एयरलाइंस चलानेवाले अजय सिंह ने एनडीटीवी खरीद लिया है. अब उनके एनडीटीवी में सबसे ज़्यादा शेयर हैं. उनके पास चैनल के संपादकीय अधिकार सुरक्षित होंगे और वही तय करेंगे कि एनडीटीवी कौन सी खबर किस एंगल से चलाए. अगर वो कायदे के इंसान हुए तो एकाध परसेंट चांस ही हो सकता है कि दखलअंदाज़ी से बचें. (सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से)

Om Thanvi : एनडीटीवी को ख़रीदने वाले अजय सिंह कौन हैं? वही जिन्होंने नारा गढ़ा था- अबकी बार मोदी सरकार। जी हाँ, अजय सिंह 2014 के चुनाव में भाजपा अभियान समिति के सदस्य थे। नारा सुझाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने में अजय भाजपा के सामान्य सेवक थे, प्रमोद महाजन के क़रीबी। महाजन ने उन्हें अपना ओएसडी बनाया, नई संचार नीति बनाने का ज़िम्मा सौंपा। मोदी के पदार्पण पर वे उनके साथ हुए। सौदेबाज़ी और तकनीकी ‘बुद्धि’ की जितनी पहचान महाजन को थी, मोदी को उनसे कम नहीं। अजय सिंह को साथ लेकर और अब चैनल ख़रीद में आगे खड़ा उन्होंने यही साबित किया है। (वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.)

Priyabhanshu Ranjan : NDTV का भावी मालिक – अजय सिंह (भाजपाई)। News18 के अंग्रेजी और हिंदी न्यूज चैनल के अलावा पूरा ETV नेटवर्क- मुकेश अंबानी (मोदी जी का जिगरी यार)।  आजतक, India Today और ABP News —- महीने में 28 दिन ‘मोदी-मोदी’ जपेंगे और दो-तीन दिन इधर-उधर के भाजपाइयों के खिलाफ खबरें दिखाएंगे, ताकि ‘बैलेंस’ बना रहे और लोगों की नजरों में ये ‘निष्पक्ष’ बने रहने का ढोंग कर सकें। Doordarshan की तो खैर, क्या ही बताऊं। लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी में भी मोदी जी और RSS के ‘चेले’ सेट कर दिए गए हैं। Times Now, Republic, Zee News और सुदर्शन न्यूज़ के आगे तो दूरदर्शन और अंबानी के चैनल भी शर्मा जाएं। अब आप खुद तय कर लें कि असल खबरें देखने के लिए आपको कौन सा चैनल देखना है! (पीटीआई के तेजतर्रार पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.)

Dilip Khan : पूरा मीडिया ग़लत लिख-बोल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिख दिया तो देखा-देखी सारे अख़बार, सारी वेबसाइट्स ने छाप दिया कि “अब की बार मोदी सरकार” का नारा स्पाइसजेट वाले अजय सिंह ने लिखा था। सच ये है कि ये नारा पीयूष पांडेय का लिखा हुआ है। “अच्छे दिन आने वाले हैं” का नारा अनुराग खंडेलवाल ने दिया था। “सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं झुकने दूंगा” प्रसून जोशी ने लिखा था। अजय सिंह कैंपेन में शामिल था, लेकिन लिखा क्या, ये मैं भी जानना चाहता हूं। अब शायद NDTV के लिए ही कुछ लिखे। एक नारा छूट रहा है। अजय सिंह चाहे तो उसपर क्लेम कर सकते हैं। शंकराचार्य वगैरह के नाक-भौं सिकोड़ने के बाद बनारस में नारे को डाइल्यूट कर दिया गया था। नारा था- हर-हर मोदी, घर-घर मोदी। इसके लेखक को मैं नहीं जानता। वेबसाइट्स वाले भेड़चाल चलने लगे हैं। देखा-देखी छापते हैं। फैक्ट्स चेक नहीं करते। (टीवी जर्नलिस्ट और सोशल मीडिया के चर्चित लेखक दिलीप खान की एफबी वॉल से.)

Yashwant Singh : एनडीटीवी का बिकना दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसे दौर में जब सत्ता की पोलखोल वाली खबरों की सर्वाधिक जरूरत है, एनडीटीवी पर छापे मार मार कर उसे घुटनो के बल बैठने के लिए मजबूर करना और बिक्री के रास्ते पर ले जाना यह बताता है कि सत्ता से ताकतवर कोई चीज नहीं होती. लोकतंत्र में इस किस्म का रवैया बेहद निराशाजनक है. एनडीटीवी और प्रणय राय से मेरे लाख मतभेद रहे हों, पर एनडीटीवी का मुंह बंद करने के लिए उसे पहले डराना धमकाना फिर बिक्री के लिए दबाव डालना चौथे स्तंभ के लिए खतरनाक है. ये नए किस्म का आपातकाल ही है. ये नए किस्म का फासिज्म ही है. (भड़ास संपादक यशवंत की एफबी वॉल से.)

मूल खबर….

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‘पेट्रो लूट’ का पैसा चुनावों में आसमान से बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा : रवीश कुमार

Ravish Kumar : सजन रे झूठ मत बोलो, पेट्रोल पंप पर जाना है… पेट्रोल के दाम 80 रुपये के पार गए तो सरकार ने कारण बताए।  लोककल्याणकारी कार्यों, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए सरकार को पैसे चाहिए। व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी और सरकार की भाषा एक हो चुकी है। दोनों को पता है कि कोई फैक्ट तो चेक करेगा नहीं। नेताओं को पता है कि राजनीति में फैसला बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट या प्रदर्शन से नहीं होता है। भावुक मुद्दों की अभी इतनी कमी नहीं हुई है, भारत में।

बहरहाल, आपको लग रहा होगा कि भारत सरकार या राज्य सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च कर रही होंगी इसलिए आपसे टैक्स के लिए पेट्रोल के दाम से वसूल रही हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता है। आप किसी भी बजट में इन मदों पर किए जाने वाले प्रावधान देखिए, कटौती ही कटौती मिलेगी। स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर रवि दुग्गल और अभय शुक्ला का काम है। आप इनके नाम से ख़ुद भी करके सर्च कर सकते हैं।

भारत ने 80 के दशक में स्वास्थ्य सेवाओं पर अच्छा ख़र्च किया था, उसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखा लेकिन नब्बे के दशक में उदारवादी नीतियां आते ही हम 80 के स्तर से नीचे आने लगे। स्वास्थ्य सेवाओं का बजट जीडीपी का 0.7 फीसदी रह गया। लगातार हो रही इस कटौती के कारण आम लोग मारे जा रहे हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा महंगे इलाज पर ख़र्च हो रहा है।

यूपीए के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के कारण हेल्थ का बजट वापस जीडीपी का 1.2 प्रतिशत पर पहुंचा। इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन तो बने मगर डाक्टरों और कर्मचारियों की भयंकर कमी के कारण यह भी दम तोड़ गया। अब तो इस योजना में भी लगातार कमी हो रही है और जो बजट दिया जाता है वो पूरा ख़र्च भी नहीं होता है। तो ये हमारी प्राथमिकता का चेहरा है।

12 वीं पंचवर्षीय योजना में तय हुआ कि 2017 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हेल्थ बजट होगा। मोदी सरकार ने कहा कि हम 2020 तक 2.5 प्रतिशत ख़र्च करेंगे। जब संसद में नेशनल हेल्थ राइट्स बिल 2017 पेश हुआ तो 2.5 प्रतिशत ख़र्च करने का टारगेट 2025 पर शिफ्ट कर दिया गया। ये मामला 2022 के टारगेट से कैसे तीन साल आगे चला गया, पता नहीं। रवि दुग्गल कहते हैं कि हम हकीकत में जीडीपी का 1 फीसदी भी स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च नहीं करते हैं। सरकार के लिए स्वास्थ्य प्राथमिकता का क्षेत्र ही नहीं है। ( डी एन ए अख़बार में ये विश्लेषण छपा है)

गोरखपुर में कई सौ बच्चे मर गए। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में अभय शुक्ला और रवि दुग्गल ने एक लेख लिखा। कहा कि यूपी ने जापानी बुखार और एंसिफ्लाइटिस नियंत्रण के लिए 2016-17 में केंद्र से 30.40 करोड़ मांगा, मिला 10.19 करोड़। 2017-18 में तो मांगने में भी कटौती कर दी। 20.01 करोड़ मांगा और मिला मात्र 5.78 करोड़। तो समझे, बच्चे क्यों मर रहे हैं।

रही बात कुल सामाजिक क्षेत्रों के बजट की तो अभय शुक्ला ने हिन्दू अख़बार में लिखा है कि 2015-16 में जीडीपी का 4.85 प्रतिशत सोशल सेक्टर के लिए था, जो 2016-17 में घटकर 4.29 प्रतिशत हो गया। प्रतिशत में मामूली गिरावट से ही पांच सौ हज़ार से लेकर दो तीन हज़ार करोड़ की कटौती हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं के हर क्षेत्र में भयंकर कटौती की गई।

महिला व बाल विकास के बजट में 62 फीसदा की कमी कर दी गई। ICDS का बजट 2015-16 में 3568 करोड़ था, ,2016-17 में 1340 करोड़ हो गया। जगह जगह आंगनवाड़ी वर्करों के प्रदर्शन हो रहे हैं। हर राज्य में आंगनवाड़ी वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं।

मिंट अख़बार ने लिखा है कि यूपीए के 2009 में सोशल सेक्टर पर 10.2 प्रतिशत ख़र्च हुआ था। 2016-17 में यह घटकर 5.3 प्रतिशत आ गया है, कटौती की शुरूआत यूपीए के दौर से ही शुरु हो गई थी। सर्व शिक्षा अभियान, इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, मिड डे मील का बजट कम किया या है।

वही हाल शिक्षा पर किए जा रहे ख़र्च का है। आंकड़ों की बाज़ीगरी को थोड़ा सा समझेंगे तो पता चलेगा कि सरकार के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा महत्वपूर्ण ही नहीं हैं। बीमा दे दे और ड्रामा कर दो। दो काम है। 31 मार्च 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर है कि संघ ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट कम करने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की है। सरकार ने इन क्षेत्रों में बजट बढ़ाया होता तो समझा भी जा सकता था कि इनके लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम हमसे आपसे वसूले जा रहे हैं।

दरअसल खेल ये नहीं है। जो असली खेल है, उसकी कहानी हमसे आपसे बहुत दूर है। वो खेल है प्राइवेट तेल कंपनी को मालामाल करने और सरकारी तेल कंपनियों का हाल सस्ता करना। ग़रीब और आम लोगों की जेब से पैसे निकाल कर प्राइवेट तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। दबी जुबान में सब कहते हैं मगर कोई खुलकर कहता नहीं। इसका असर आपको चुनावों में दिखेगा जब आसमान से पैसा बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा। चुनाव जब महंगे होंगे तो याद कीजिएगा कि इसका पैसा आपने ही दिया है, अस्सी रुपये पेट्रोल ख़रीदकर। जब उनका खजाना भर जाएगा तब दाम कम कर दिए जाएँगे। आप जल्दी भूल जाएँगे । इसे ‘control extraction of money and complete destruction of memory’ कहते हैं।

एनडीटीवी इंडिया न्यूज चैनल के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार के लिए रवीश कुमार ने कहा- ”असफल योजनाओं की सफल सरकार, अबकी बार ईवेंट सरकार”

Ravish Kumar : असफल योजनाओं की सफल सरकार- अबकी बार ईवेंट सरकार… 2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है। नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है। मोदी सरकार ने हमें अनगिनत ईवेंट दिए हैं। जब तक कोई ईवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था,उसका क्या हुआ, तब तक नया ईवेंट आ जाता है। सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता।

जनता को आशा-आशा का खो-खो खेलने के लिए प्रेरित कर दिया जाता है। प्रेरना की तलाश में वो प्रेरित हो भी जाती है। होनी भी चाहिए। फिर भी ईमानदारी से देखेंगे कि जितने भी ईवेंट लांच हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर फेल हुए हैं। बहुतों के पूरा होने का डेट 2019 की जगह 2022 कर दिया गया है। शायद किसी ज्योतिष ने बताया होगा कि 2022 कहने से शुभ होगा। ! काश कोई इन तमाम ईवेंट पर हुए खर्चे का हिसाब जोड़ देता। पता चलता कि इनके ईवेंटबाज़ी से ईवेंट कंपनियों का कारोबार कितना बढ़ा है। ठीक है कि विपक्ष नहीं है, 2019 में मोदी ही जीतेंगे, शुभकामनाएं, इन दो बातों को छोड़ कर तमाम ईवेंट का हिसाब करेंगे तो लगेगा कि मोदी सरकार अनेक असफल योजनाओं की सफल सरकार है। इस लाइन को दो बार पढ़िये। एक बार में नहीं समझ आएगा।

2016-17 के रेल बजट में बड़ोदरा में भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था। उसके पहले दिसंबर 2015 में मनोज सिन्हा ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया था। अक्तूबर 2016 में खुद प्रधानमंत्री ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया। सुरेश प्रभु जैसे कथित रूप से काबिल मंत्री ने तीन साल रेल मंत्रालय चलाया लेकिन आप पता कर सकते हैं कि रेल यूनिवर्सिटी को लेकर कितनी प्रगति हुई है।

इसी तरह 2014 में देश भर से लोहा जमा किया गया कि सरदार पटेल की प्रतिमा बनेगी। सबसे ऊंची। 2014 से 17 आ गया। 17 भी बीत रहा है। लगता है इसे भी 2022 के खाते में शिफ्ट कर दिया गया है। इसके लिए तो बजट में कई सौ करोड़ का प्रस्ताव भी किया गया था।

2007 में गुजरात में गिफ्ट और केरल के कोच्ची में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई। गुजरात के गिफ्ट को पूरा होने के लिए 70-80 हज़ार करोड़ का अनुमान बताया गया था। दस साल हो गए दोनों में से कोई तैयार नहीं हुआ। गिफ्ट में अभी तक करीब 2000 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं। दस साल में इतना तो बाकी पूरा होने में बीस साल लग जाएगा।

अब स्मार्ट सिटी का मतलब बदल दिया गया है. इसे डस्टबिन लगाने, बिजली का खंभा लगाने, वाई फाई लगाने तक सीमित कर दिया गया। जिन शहरों को लाखों करोड़ों से स्मार्ट होना था वो तो हुए नहीं, अब सौ दो सौ करोड़ से स्मार्ट होंगे। गंगा नहीं नहा सके तो जल ही छिड़क लीजिए जजमान।

गिफ्ट सिटी की बुनियाद रखते हुए बताया जाता था कि दस लाख रोज़गार का सृजन होगा मगर कितना हुआ, किसी को पता नहीं। कुछ भी बोल दो। गिफ्ट सिटी तब एक बडा ईवेंट था, अब ये ईंवेट कबाड़ में बदल चुका है। एक दो टावर बने हैं। जिसमें एक अंतर्राष्ट्रीय स्टाक एक्सचेंज का उदघाटन हुआ है। आप कोई भी बिजनेस चैनल खोलकर देख लीजिए कि इस एक्सचेंज का कोई नाम भी लेता है या नहीं। कोई 20-25 फाइनेंस कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है जिसे दो ढाई सौ लोग काम करते होंगे। हीरानंदानी के बनाए टावर में अधिकांश दफ्तर ख़ाली हैं।

लाल किले से सांसद आदर्श ग्राम योजना का एलान हुआ था। चंद अपवाद की गुज़ाइश छोड़ दें तो इस योजना की धज्जियां उड़ चुकी हैं। आदर्श ग्राम को लेकर बातें बड़ी बड़ी हुईं, आशा का संचार हुआ मगर कोई ग्राम आदर्श नहीं बना। लाल किले की घोषणा का भी कोई मोल नहीं रहा।

जयापुर और नागेपुर को प्रधानमंत्री ने आदर्श ग्राम के रूप में चुना है। यहां पर प्लास्टिक के शौचालय लगाए गए। क्यों लगाए गए? जब सारे देश में ईंट के शौचालय बन रहे हैं तो प्रदूषण का कारक प्लास्टिक के शौचालय क्यों लगाए गए? क्या इसके पीछ कोई खेल रहा होगा?

बनारस में क्योटो के नाम पर हेरिटेज पोल लगाया जा रहा है। ये हेरिटेज पोल क्या होता है। नक्काशीदार महंगे बिजली के पोल हेरिटेज पोल हो गए? ई नौका को कितने ज़ोर शोर से लांच किया गया था। अब बंद हो चुका है। वो भी एक ईवेंट था, आशा का संचार हुआ था। शिंजो आबे जब बनारस आए थे तब शहर के कई जगहों पर प्लास्टिक के शौचालय रख दिए गए। मल मूत्र की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं हुई। जब सड़ांध फैली तो नगर निगम ने प्लास्टिक के शौचालय उठाकर डंप कर दिया।

जिस साल स्वच्छता अभियान लांच हुआ था तब कई जगहों पर स्वच्छता के नवरत्न उग आए। सब नवर्तन चुनते थे। बनारस में ही स्वच्छता के नवरत्न चुने गए। क्या आप जानते हैं कि ये नवरत्न आज कल स्वच्छता को लेकर क्या कर रहे हैं।

बनारस में जिसे देखिए कोरपोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी का बजट लेकर चला आता है और अपनी मर्ज़ी का कुछ कर जाता है जो दिखे और लगे कि विकास है। घाट पर पत्थर की बेंच बना दी गई जबकि लकड़ी की चौकी रखे जाने की प्रथा है। बाढ़ के समय ये चौकियां हटा ली जाती थीं। पत्थर की बेंच ने घाट की सीढ़ियों का चेहरा बदल दिया है। सफेद रौशनी की फ्लड लाइट लगी तो लोगों ने विरोध किया। अब जाकर उस पर पीली पन्नी जैसी कोई चीज़ लगा दी गई है ताकि पीली रौशनी में घाट सुंदर दिखे।

प्रधानमंत्री के कारण बनारस को बहुत कुछ मिला भी है। बनारस के कई मोहल्लों में बिजली के तार ज़मीन के भीतर बिछा दिए गए हैं। सेना की ज़मीन लेकर पुलवरिया का रास्ता चौड़ा हो रहा है जिससे शहर को लाभ होगा। टाटा मेमोरियल यहां कैंसर अस्पताल बना रहा है। रिंग रोड बन रहा है। लालपुर में एक ट्रेड सेंटर भी है।

क्या आपको जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट याद है? आप जुलाई 2014 के अख़बार उठाकर देखिए, जब मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में जलमार्ग के लिए 4200 करोड़ का प्रावधान किया था तब इसे लेकर अखबारों में किस किस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे। रेलवे और सड़क की तुलना में माल ढुलाई की लागत 21 से 42 प्रतिशत कम हो जाएगा। हंसी नहीं आती आपको ऐसे आंकड़ों पर।

जल मार्ग विकास को लेकर गूगल सर्च में दो प्रेस रीलीज़ मिली है। एक 10 जून 2016 को पीआईबी ने जारी की है और एक 16 मार्च 2017 को। 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि पहले चरण में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया के बीच विकास चल रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि वाराणसी से हल्दिया के बीच जलमार्ग बन रहा है। इलाहाबाद कब और कैसे ग़ायब हो गया, पता नहीं।

2016 की प्रेस रीलीज़ में लिखा है कि इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यात्रियों के ले जाने की सेवा चलेगी ताकि इन शहरों में जाम की समस्या कम हो। इसके लिए 100 करोड़ के निवेश की सूचना दी गई है। न किसी को बनारस में पता है और न इलाहाबाद में कि दोनों शहरों के बीच 100 करोड़ के निवेश से क्या हुआ है।

यही नहीं 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ सेवा शुरू होने का ज़िक्र है। क्या किसी ने इस साल पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ चलते देखा है? एक बार क्रूज़ आया था, फिर? वैसे बिना किसी प्रचार के कोलकाता में क्रूज़ सेवा है। काफी महंगा है।

जुलाई 2014 के बजट में 4200 करोड़ का प्रावधान है। कोई नतीजा नज़र आता है? वाराणसी के रामनगर में टर्मिनल बन रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि इस योजना पर 5369 करोड़ ख़र्च होगा और छह साल में योजना पूरी होगी। 2014 से छह साल या मार्च 2017 से छह साल?

प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि राष्ट्रीय जलमार्ग की परिकल्पना 1986 में की गई थी। इस पर मार्च 2016 तक 1871 करोड़ खर्च हो चुके हैं। अब यह साफ नहीं कि 1986 से मार्च 2016 तक या जुलाई 2014 से मार्च 2016 के बीच 1871 करोड़ ख़र्च हुए हैं। जल परिवहन राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित रूप में यह जवाब दिया था।

नमामि गंगे को लेकर कितने ईवेंट रचे गए। गंगा साफ ही नहीं हुई। मंत्री बदल कर नए आ गए हैं। इस पर क्या लिखा जाए। आपको भी पता है कि एन जी टी ने नमामि गंगे के बारे में क्या क्या कहा है। 13 जुलाई 2017 के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दो साल में गंगा की सफाई पर 7000 करोड़ ख़र्च हो गए और गंगा साफ नहीं हुई। ये 7000 करोड़ कहां ख़र्च हुए? कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था क्या? या सारा पैसा जागरूकता अभियान में ही फूंक दिया गया? आप उस आर्डर को पढ़ंगें तो शर्म आएगी। गंगा से भी कोई छल कर सकता है?

इसलिए ये ईवेंट सरकार है। आपको ईवेंट चाहिए ईवेंट मिलेगा। किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे रिकार्ड ख़राब है।

नोट: इस पोस्ट को पढ़ते ही आईटी सेल वालों की शिफ्ट शुरू हो जाएगी। वे इनमें से किसी का जवाब नहीं देंगे। कहेंगे कि आप उस पर इस पर क्यों नहीं लिखते हैं। टाइप किए हुए मेसेज अलग-अलग नामों से पोस्ट किए जाएंगे। फिर इनका सरगना मेरा किसी लिखे या बोले को तोड़मरोड़ कर ट्वीट करेगा। उनके पास सत्ता है, मैं निहत्था हूं। दारोगा, आयकर विभाग, सीबीआई भी है। फिर भी कोई मिले तो कह देना कि छेनू आया था।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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