संजय कुमार सिंह-
आज के अखबारों में जब भारत के चीन के साथ चले जाने पर ट्रम्प की चिन्ता प्रमुखता से छपी है तो चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की तस्वीर योगी आदित्यनाथ के साथ छपी है (नवोदय टाइम्स) और उनके हवाले से खबर है, चीन के साथ सीमा विवाद सबसे बड़ी चुनौती। यह खबर अमर उजाला में ट्रम्प की खबर के नीचे चार कॉलम में है तो नवोदय टाइम्स में सिंगल कॉलम। देशबन्धु में ट्रम्प की चिन्ता से ज्यादा महत्व सीडीएस के इस बयान को दिया गया है। मोटे तौर पर नरेन्द्र मोदी लाल आंखें दिखाना भूलकर, ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के बावजूद चीन के साथ हो गये है। भले ही मोदी जी ने ऐसा ट्रम्प की ‘दगाबाजी’ के कारण किया लेकिन अखबार यही बता रहे हैं कि ट्रम्प को अफसोस है कि भारत चीन के पाले में चला गया और गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ से मिलने के बाद या पहले सीडीएस ने कहा है कि चीन भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
आज मेरे अखबारों की मुख्य चिन्ता ट्रम्प का दुख यानी भारत के चीन के साथ जाने की चिन्ता मुख्य खबर है। इसके अलावा जो खबरें लीड हैं उनमें टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड जीएसटी है। वह भी दिलचस्प, वित्त मंत्री ने कहा है कि जीएसटी में कमी का लाभ उपभोक्ताओं को देना है, 22 फरवरी से वे इसपर ध्यान देंगी। आप समझ सकते हैं कि सरकार का निर्णय लागू करने के लिए मंत्री को खुद ध्यान देना पड़े तो सरकार का क्या इकबाल है और क्या व्यवस्था बनाई गई है। कहने की जरूरत नहीं है कि वित्त मंत्री ने ऐसा यह आशंका जताये जाने पर कहा है कि टैक्स में कमी का लाभ उपभोक्ताओं को मिलने पर संदेह है। वैसे भी एक बार कीमत बढ़ जाये तो कम होने के मामले देश में बहुत कम होते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड वित्त मंत्री का साक्षात्कार है। इसका शीर्षक है, “मांग में वृद्धि से लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद”। यह शीर्षक पहले भी छप चुका है और वित्त मंत्री को वही बात दोबारा कहनी पड़ रही है या पूरी बातचीत का शीर्षक यही निकल कर आया तो आप समझ सकते हैं कि इंटरव्यू में क्या होगा। अगर यह शीर्षक खराब संपादकीय प्रतिभा के कारण है तो संबंधित अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स है और इससे पत्रकारिता में प्रतिभा की कद्र को समझा जा सकता है। अगर वाकई ऐसा हो तो यह भी चर्चा का विषय हो सकता है पर अघोषित इमरजेंसी के इस दौर में मीडिया के लिए यह चर्चा का मुद्दा नहीं हो सकता है। जहां तक वित्त मंत्री के बोलने और बयान की बात है, आज तकरीबन सभी अखबारों में है।
मैं यहां लिख चुका हूं कि अमेरिकी टैरिफ से भारत का निर्यात ज्यादा प्रभावित हुआ है और सरकार स्वदेशी की बात कर रही थी। बाद में पैकेज लाने की तैयारी जैसी सरकारी कोशिशों की भी ‘खबर’ चली। मेरा मानना है कि इसकी तैयारी तभी शुरू कर दी जानी चाहिये थी जब ट्रम्प ने टैरिफ लगाने की घोषणा की थी या संकेत दिया था। स्थिति यह है कि बढ़ा हुआ टैरिफ लागू हो चुका है और निर्यातक व निर्यात प्रभावित है। लेकिन आज भी नवोदय टाइम्स में खबर है, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है कि सरकार की पैकेज लाने की तैयारी है। इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, मजाक उड़ाने वाले अब कर रहे हैं श्रेय लेने की कोशिश। उन्होंने कहा है और पहले पन्ने पर छपा है, जो लोग कभी जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहकर उसका मजाक उड़ाते थे वे अब सरकार के 2.0 सुधारों का श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे नहीं पता (और खबर में भी नहीं है) कि राहुल गांधी ने कब, कहां कैसे श्रेय लेने की कोशिश की है। फिर भी मेरा मानना है कि श्रेय तो उनको बनता है। टैक्स कम किये जाने से यह साबित हो गया है कि 28 प्रतिशत की जगह अगर 12 प्रतिशत टैक्स किया गया है (एक भी आयटम पर) तो वह बहुमत के नशे में गब्बर सिंह टैक्स ही था और अगर कुल वसूली 48,000 करोड़ रुपये कम हुई (या की गई) है तो जो वसूली हो रही थी वह इलेक्टोरल बांड के रूप में नहीं थी तो गब्बर सिंह टैक्स की ही तरह थी। राहुल गांधी ने जीएसटी लागू होने से पहले 2016 में ही ट्वीट किया था। मेडिकल इंश्योरेंस पर सर्विस टैक्स का मुद्दा भी उठाया ही था। सरकार ने जो भी कटौती की है उसके लिए दबाव राहुल गांधी का ही था और श्रेय वे लें या नहीं, देना चाहिये। फिर भी मंत्री जी का यह रुख समझने लायक है। मुहावरों में इसे खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे कहा जाता है।
आप जानते हैं कि बिहार में चुनाव है और भाजपा की तैयारियां जोरों पर हैं। दि एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, बिहार का करार तय करने के लिए इंडिया समूह की बैठक 15 सितंबर को होगी। इसके साथ बताया गया है भाजपा ने यह एलान कर दिया है कि बीड़ी की कीमत कम करने को चुनावी मुद्दा बनाया जायेगा। मामला यह है कि जीएसटी की कटौती की हाल की कार्रवाई में सिगरेट पर टैक्स तो बढ़ा है लेकिन बीड़ी पर कम हुआ है। यह सिन टैक्स का मामला है और बीड़ी जैसी चीज सस्ती बेचने का कोई मतलब नहीं है। ठीक है कि यह सस्ती सिगरेट है इसलिए इसकी खपत गरीब बिहार में ज्यादा होती होगी और इसकी कीमत कम रखकर वोट बटोरे जा सकते हैं। पर यह जहर सस्ता बेचने या मुफ्त बांटने जैसा मामला है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भाजपा के खिलाफ सोशल मीडिया पर जो पोस्ट लिखी वह इस मुद्दे को रेखांकित करने की बजाय बीड़ी को बिहार से जोड़ रही थी। भाजपा ने मौके का लाभ उठाया और इसके लिए कांग्रेस की आलोचना की और चुनावी नुकसान से बचने के लिए कांग्रेस ने उस पोस्ट को डिलीट कर दिया तो भाजपा चोरी और सीनाजोरी की शैली में बीड़ी को बिहार से जोड़ने के लिए कांग्रेस की आलोचना कर रही है और इसमें मूल मुद्दा रह गया है। भाजपा अपने प्रचारकों और गोदी मीडिया के दम पर इसे चुनावी मुद्दा बनाने की हिमाकत कर रही है। वह आज के अखबारों और भाजपा के तेवर से दिख रहा है। नवोदय टाइम्स में प्रधानमंत्री के बिहार दौरे की खबर भी है। शीर्षक है, बिहार की पहली मेट्रो का उद्घाटन करेंगे प्रधानमंत्री! नई दिल्ली डेटलाइन से विशेष संवाददाता की खबर है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर बिहार का दौरा करने वाले हैं। बताया जा रहा है कि इस दौरान वह पूर्णिया हवाई अड्डे के साथ बिहार की पहली मेट्रो का उद्घाटन कर सकते हैं। जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री 15 सितम्बर को सीमांचल का दौरा करने वाले हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री पूर्णिया हवाई अड्डा का उद्घाटन करेंगे। साथ ही वह राज्य को नई वंदे भारत एक्सप्रेस और नई रेल लाइन की सौगात भी देंगे। प्रधानमंत्री पटना मेट्रो का उद्घाटन भी कर सकते हैं। हाल ही में पटना मेट्रो का ट्रायल किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका चुनावी लाभ मिलेगा और प्रधानमंत्री भाजपा के मुख्य चुनाव अधिकारी की तरह काम करते रहे हैं तभी मुख्य चुनाव आयुक्त भी भाजपा की भाषा बोलने और तर्क देने को मजबूर हुए।
भाजपा के चुनावी मुद्दों और चुनाव में उसका हश्र जो होगा सो होगा पर भाजपा वोट के लिए जहर (बीड़ी) सस्ती बेच सकती है – यह खबर या मुद्दा नहीं है। उल्टे बीड़ी को बिहार (की गरीबी) से जोड़ने के लिए कांग्रेस पर हमले करके उसे राजनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश कर रही है। बीड़ी मुद्दा है तो बिहार में मुद्दा यह भी होना चाहिये कि सात साल बीड़ी सिगरेट जैसी चीज पर सिन टैक्स नहीं लगा। जब सिगरेट पर लगा तो बीड़ी को अलग कर दिया गया और यह सब तब किया गया जब जीएसटी की बुनियादी गलतियों को आठ साल बाद तब सुधारा गया जब वोट चोरी की पोल खुल गई है। एक तरफ तो टैक्स सुधार का दावा है दूसरी ओर, टैक्स स्लैब कम होने से कीमतें कम होने का चुनावी फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है। बीड़ी पर टैक्स बढ़ने की बजाय कम होना इसका उदाहरण है। ऐसे में मुद्दा यह होना चाहिये था कि इतने दिन ज्यादा टैक्स वसूला गया जबकि अब जो कटौती की गई है उसका बड़ा हिस्सा इसी से वसूल हो जाना है। फिर भी सिगरेट सस्ती बिकने दी गई। महंगी अब की गई है तो बीड़ी सस्ती कर दी गई और विदेशी सिगरेट की बरामदगी बताती है कि सिन टैक्स लगाने का फायदा होना संदेह के घेरे में है। उल्लेखनीय है कि सिगरेट पर अभी तक 28 प्रतिशत टैक्स ही है। नया सिन टैक्स 22 सितंबर के बाद लागू होगा। ऐसे में विदेशी और देसी सिगरेट की कीमतों में अंतर कम है। तब भी तस्करी होती थी। विदेशी सिगरेट की खेप बरामद होती रही है। अगर सरकारी व्यवस्था ऐसी रही है तो सिगरेट पर टैक्स बढ़ने और बीड़ी पर घटने के बाद विदेशी सिगरेट की उपलब्धता के मद्देनजर सिन टैक्स का मकसद अभी भी पूरा नहीं होने वाला है और बच्चों में सिगरेट की लत लगती रहेगी जो आगे के लिए नुकसानदेह होगा।
दूसरी ओर, सरकार ज्यादा वसूली से अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी होने का भ्रम फैलाने में कामयाब रही। इससे सिगरेट बनाने वाली कंपनियों को जो अतिरिक्त लाभ हुआ उसे भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं बनाया गया जबकि दिल्ली की शराब नीति बदलने पर हो सकने वाले लाभ को भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाकर आम आदमी पार्टी की सरकार और उसके नेताओं को परेशान-बदनाम किया गया। आज की दूसरी बड़ी खबरों में एक खबर इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम में छपी है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्रम में जांच के लिए एसआईटी बनतारा में। आज इंडियन एक्सप्रेस और दूसरे अखबारों में कई अन्य खबरें भी हैं। लेकिन अंबानी से संबंधित इस खबर को सिंगल कॉलम में छापने या प्रमुखता नहीं देने के मायने हैं और आप देखिये कि आपके अखबार में यह खबर है कि नहीं और है तो कैसी, कितनी बड़ी। नहीं है तो आप खेल समझ ही सकते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, मणिपुर में मेइती समूह ने कुकी-जो इकाइयों के साथ सरकार के एसओओ (ससपेंशन ऑफ ऑपरेशंस यानी जो ऑपरेशन चल रहे हैं उन्हें निलंबित करना, टालना) करार को खारिज कर दिया है। यह खबर इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि सैकडों मौतों, ढेरों आगजनी, हिंसा, आंदोलन, हथियारों की लूट आदि के कई महीनों और वह वर्षों में है, के बाद प्रधानमंत्री की मणिपुर जाने की योजना है। यह खबर 13 सितंबर के दौरे से पहले आई है।
द टेलीग्राफ की पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, गर्मी और ‘बेपरवाह’ विकास विनाश का कारण बन रहे हैं। नई दिल्ली डेटलाइन से टेलीग्राफ ब्यूरो और एसोसिएटेड प्रेस की खबर इस प्रकार है – सरकारी अधिकारियों के अनुसार, लगातार हो रही मानसून की बारिश ने पूरे उत्तर भारत में भीषण बाढ़ और भूस्खलन की ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जो दशकों में नहीं हुई। इससे हाल के हफ्तों में कम से कम 90 लोगों की मौत हो गई और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, साथ ही पंजाब जैसे हिमालयी राज्य और क्षेत्र सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं। नई दिल्ली और आसपास के इलाके नदियों के बढ़ते जलस्तर और भारी बारिश से प्रभावित हुए हैं। यमुना नदी खतरे के निशान को पार कर गई है, इसलिए हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। आज अखबारों में तस्वीर है जिससे पता चलता है कि गुड़गांव में सड़कों पर पानी भरने से लोगों को ट्रैक्टर से गंतव्य पर जाना पड़ रहा है।
ऐसे में आज अमर उजाला, नवोदय टाइम्स, हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू की लीड का शीर्षक लगभग एक जैसा है। दैनिक भास्कर का थोड़ा अलग, दगाबाज ट्रम्प को याद आई दोस्ती। अमर उजाला में फ्लैग शीर्षक है, पीएम मोदी, पुतिन और जिनपिंग के गहराते संबंधों पर सामने आई, अमेरिकी राष्ट्रपति की हताशा। अखबार के अनुसार उन्होंने कहा है, “हमने भारत-रूस को चीन के हाथों खो दिया : ट्रम्प”। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, “लगता है हमने भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया।” बाकी अंग्रेजी अखबारों की लीड के शीर्षक भी लगभग ऐसे ही है। इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी बताया है, (अमेरिकी कामर्स सेक्रेट्री) हॉवर्ड लुटनिक का दावा दिल्ली (यानी भारत) मान जायेगा। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय ने कहा है, कोई टिप्पणी नहीं। मुझे लगता है कि मीडिया की इस जबरदस्त लामबंदी के बावजूद अखबार जो छिपाना चाह रहा है वह खुलकर सामने आ चुका है। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, कश्मीर के 112 गांव पानी में डूबे।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


