प्रशांत टंडन-
यहां कुछ दिन पहले लिखा था और DBLive पर भी बताया था कि RSS ने मोदी को दो टूक कह दिया कि बीजेपी का अध्यक्ष गुजराती कंपनी का नहीं होगा. आज टेलीग्राफ में भी छप गया.
मेरी 2 अप्रैल वाली पुरानी पोस्ट देखिए-

टेलीग्राफ ने जो लिखा है, उसका विश्लेषण-
मोदी की आरएसएस यात्रा भी नहीं मना पाई संघ को, BJP अध्यक्ष के चयन पर सहमति नहीं
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 30 मार्च को नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय की यात्रा के बावजूद संघ और भाजपा के बीच नए पार्टी अध्यक्ष के चयन को लेकर गतिरोध बरकरार है। खबरों के अनुसार, मोदी का यह दौरा अपने 11 वर्षों के प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार था, जिसका उद्देश्य आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ संबंध सुधारना और नए भाजपा अध्यक्ष के लिए अपने पसंदीदा नाम को मंजूरी दिलाना था।
सूत्रों के मुताबिक, आरएसएस नेतृत्व ने अब तक प्रधानमंत्री द्वारा सुझाए गए नामों को मंजूरी नहीं दी है। संघ का स्पष्ट मत है कि अगला भाजपा अध्यक्ष “मजबूत संगठनात्मक नेतृत्व” वाला होना चाहिए, न कि केवल एक “रबर स्टैम्प”।
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, आरएसएस अब मोदी-अमित शाह की जोड़ी को पार्टी और सरकार पर एकतरफा नियंत्रण का फ्री पास देने के मूड में नहीं है। संघ का मानना है कि 2014 के बाद से पार्टी में जिस तरह से व्यक्तिवाद हावी हुआ है, उससे संगठनात्मक ताकत कमजोर हुई है।
बीजेपी द्वारा संघ को कई नाम प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें कुछ मौजूदा केंद्रीय मंत्री भी शामिल हैं, लेकिन कोई सहमति नहीं बन पाई है। बीजेपी सूत्रों के अनुसार, पार्टी अप्रैल के पहले सप्ताह तक नया अध्यक्ष घोषित करना चाहती थी, लेकिन अब यह मामला लंबा खिंचता दिख रहा है।
उत्तर प्रदेश, बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जिला स्तर के संगठनात्मक चुनाव भी रुके हुए हैं, जिससे संगठन में और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। यूपी में गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खेमों के बीच खींचतान को भी इस देरी का कारण माना जा रहा है।
संघ की यह स्पष्ट भूमिका दर्शाती है कि वह अब संगठन की वैचारिक दिशा और आंतरिक लोकतंत्र को लेकर और अधिक सजग हो गया है।
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