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सियासत

“द टेलीग्राफ” की इस अहम रिपोर्ट ने बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पर्दे के पीछे चल रही संघ-सरकार की रस्साकशी को सामने ला दिया है!

यशवंत सिंह-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 30 मार्च को नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय का दौरा कई राजनीतिक हलचलों को जन्म दे गया। यह दौरा सिर्फ एक औपचारिक शिष्टाचार नहीं था — इसके पीछे एक स्पष्ट उद्देश्य था: भाजपा के अगले अध्यक्ष पद के लिए अपनी पसंद के नाम को संघ की मंजूरी दिलवाना। लेकिन “द टेलीग्राफ” की एक अहम रिपोर्ट ने पर्दे के पीछे चल रही रस्साकशी को सामने ला दिया है — और वह यह कि मोदी की यह कोशिश फिलहाल सफल नहीं रही।

संघ और भाजपा: एकता में दरारें?

2014 के बाद से भाजपा ने जिस तरह चुनावी विजय दर विजय हासिल की है, उसका श्रेय अक्सर मोदी और अमित शाह की जोड़ी को दिया जाता है। लेकिन यह भी सच है कि इस जीत के साथ-साथ संगठनात्मक शक्ति का केंद्रीकरण भी हुआ है — और यही बात अब संघ को खटक रही है।

संघ का स्पष्ट मानना है कि भाजपा अध्यक्ष कोई “रबर स्टैम्प” नहीं, बल्कि एक “मजबूत संगठनात्मक नेता” होना चाहिए जो पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को बचाए रख सके। मोदी की नागपुर यात्रा इसी तनाव को हल करने की कोशिश थी, लेकिन संघ अब इस जोड़ी को एकतरफा फैसले लेने की “फ्री पास” देने को तैयार नहीं दिख रहा।

नड्डा का कार्यकाल और नया नेतृत्व

जेपी नड्डा का कार्यकाल जनवरी 2024 में खत्म हो चुका है, लेकिन भाजपा अभी तक नए अध्यक्ष के नाम पर सहमति नहीं बना पाई है। रिपोर्ट बताती है कि मोदी की तरफ से कई नाम संघ के सामने रखे गए, जिनमें कुछ मौजूदा केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे, लेकिन संघ किसी पर राज़ी नहीं हुआ।

इससे यह संकेत मिलता है कि संघ अब सिर्फ विचारधारा का वाहक नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका चाहता है।

राज्यों में संगठनात्मक ठहराव

उत्तर प्रदेश, बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भाजपा अब तक अपने जिला अध्यक्ष तक नहीं चुन पाई है। खासकर यूपी में योगी आदित्यनाथ और शाह खेमों के बीच मतभेदों के कारण असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यह न केवल भाजपा के संगठनात्मक स्वास्थ्य को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि ऊपर की लड़ाई का असर नीचे तक पड़ा है।

‘वन मैन शो’ बनाम संगठनात्मक शक्ति

मोदी-शाह युग को “वन मैन शो” कहने वालों की संख्या बढ़ी है। वहीं संघ चाहता है कि भाजपा में निर्णय सामूहिकता के साथ हो — वैसा ही जैसा उसके अपने ढांचे में होता है। भाजपा ने पहले ‘वन पर्सन, वन पोस्ट’ की नीति अपनाई थी, लेकिन नड्डा का दोहरी भूमिका निभाना उस सिद्धांत का उल्लंघन था।

क्या आने वाले दिन भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण होंगे?

यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि संघ-भाजपा में टकराव है, लेकिन यह ज़रूर स्पष्ट है कि संघ अब अपने सिद्धांतों को लेकर अधिक मुखर हो गया है। 2024 के चुनाव के बाद जब नेतृत्व की नज़रें 2029 की ओर होंगी, तो यह देखा जाएगा कि भाजपा किस दिशा में जाती है — संगठनवाद की ओर या फिर व्यक्तिवाद की ओर।

मोदी का नागपुर दौरा चाहे जितना “सौहार्दपूर्ण” रहा हो, लेकिन यह साफ है कि संघ अब सिर्फ मौन दर्शक की भूमिका में नहीं रहना चाहता। भाजपा अध्यक्ष पद को लेकर उठे सवाल सिर्फ एक नाम की पसंद को लेकर नहीं हैं, बल्कि पार्टी के भविष्य के चरित्र को लेकर हैं।

सवाल अब यह है — क्या भाजपा नेतृत्व संघ के विचारों को समाहित करेगा या दोनों के रास्ते धीरे-धीरे अलग होते जाएंगे?


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