सत्येंद्र पीएस-
बुद्धिज्म में मांसाहार करने या न करने को लेकर बड़ी चर्चा होती है। बुद्ध शूकर मद्रव खाकर मरे से लेकर यह लंतरानी शुरू होती है और वज्रयान तक जाती है। इसमें कुछ फैक्चुअल बातें कहनी हैं, जो मुझे ज्ञानी जनों से मिली।
मांसाहार के विरोध में हाल में किताब लिखने वाले सुशोभित ने बताया की बुद्ध ने स्पष्ट शब्दों में माँसाहार का निषेध नहीं किया। जीवक-सुत्त में बुद्ध ने निर्देशित किया है कि तीन प्रकार का माँस अ-भोज्य है—दृष्ट, श्रुत और परिशंकित और तीन प्रकार का भोज्य- अ-दृष्ट, अ-श्रुत, अ-परिशंकित। इसे त्रि-कोटि परिशुद्ध कहा गया। यह कि वह माँस जिसके बारे में तुमने न देखा न सुना हो कि वह तुम्हारे लिए किसी पशु को मारकर प्राप्त किया गया है, और जिसके बारे में तुम नि:शंक हो कि उसे तुम्हारे लिए किसी पशु को मारकर प्राप्त नहीं किया गया है, उसे तुम ग्रहण कर सकते हो।
इसमें दो तरह के माँस आ गए- एक तो उस पशु का माँस जो प्राकृतिक मृत्यु को प्राप्त होकर मर गया है और दो उस पशु का माँस जिसे किसी अन्य प्राणी ने मार दिया था (यानी जिसे आपके भक्षण के लिए नहीं मारा गया) लेकिन उसने उसका भक्षण नहीं किया तो उसे तुम खा सकते हो। जबकि बुद्ध पशुबलि के घोर विरोधी थे। सम्राट अशोक के बौद्ध अभिलेखों में बलि के निषेध का उल्लेख है। महायानियों के यहाँ मुख्यतया शाकाहार की ही परम्परा है। महापरिनिब्बानसुत्त में तो बुद्ध ने यह तक कहा है कि शाकाहारी भोजन भी अगर माँस से स्पर्श हुआ हो तो उसे ग्रहण करने से पहले शुद्ध करना चाहिए। अंगुलीमालियसुत्त में बुद्ध ने मंजुश्री से कहा है कि सभी जीव धर्मधातु होते हैं और माँस ग्रहण करना किसी दूसरे जीव की धातु को ग्रहण करना होगा, जो अवांछनीय है।
इसके बारे में बुद्धिज्म के प्रैक्टिशनर ईश्वर श्रेष्ठ कहते है कि त्रिकोटि परिशुद्ध की अवधारणा थेरवाद व्यवस्था में है। यही वजह है कि थाईलैंड, श्रीलंका जैसे देशों के मॉन्क मांस का सेवन करते हैं। लेकिन पूर्वी एशिया के देशों में लँकावतार सुत्त की मान्यता है। इसमें बोधिसत्व के लिए मांस खाना वर्जित है। इसलिए चीन, वियतनाम, कोरिया आदि देशों में यह वर्जित है और वहां के मॉन्क सख्ती से शाकाहार का पालन करते हैं।
अब आते हैं मूल बात पर। ज्ञान पाकर कन्फ्यूज हों तो क्या करें? बुद्ध ने कहा है कि ऐसे में हमेशा अपने विजडम का इस्तेमाल करें। तो मेरा कहना यह है कि अगर बुद्धिज्म में आपको दिया बाती लेकर हजारों टन किताबों और गौतम बुद्ध के 84 हजार मार्गों में आपको मांसाहार ढूंढना पड़ रहा है तो इसका मतलब यह है कि बुद्धिज्म में मांसाहार वर्जित है और नहीं खाया जाता है। तभी आपको इतना ढूंढना पड़ रहा है। जिन दर्शनों और धर्मो में मांसाहार कॉमन है, वहां आपको जगह-जगह मांसाहार मिल जाएगा। उनकी पूजा पद्धतियों में बलि मिलेगी। वह अपने भगवान को खुलेआम मांस की पेशकश करते हैं। न तो उनके देवता बुरा मानते हैं, न भक्त। बल्कि देवता खुश ही होते हैं उससे।
उदाहरण के लिए गोरखपुर में तरकुलहा की माता दुर्गा को केवल मटन यानी बकरे की पेशकश की जाती है, हालांकि अब तमाम शाकाहारी लोग तफरी के लिए लिट्टी चोखा और पूड़ी खीर भी चढ़ाने लगे हैं और कमाई के चक्कर में पंडे ऐसा करने भी देते हैं। इसी तरह असम में मां कामाख्या को भैंसे की बलि दी जाती है और भैंसे का मांस ही वहां मुख्य प्रसाद है। बंगाल और बिहार में कई मंदिरों में मछली चढ़ाई जाती है और प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। मूल रूप से वैदिक धर्म मांसाहार का समर्थन करता है। ऋग्वेद में देवताओं को शराब की पेशकश की जाती है कि आप आइए और इसे पीकर प्रसन्न होइए, मेरी रक्षा करिए। रामायण में राजा जनक द्वारा अश्वमेध यज्ञ में घोड़े की बलि देने का उल्लेख है जिसमें लिखा है कि जब घोड़े का मांस अग्नि में डाला गया तो पूरा महल खुशबू से भर गया। राजा जनक अतिशय मुदित हुए।
कहने का मतलब जहां मांसाहार है, वहां है। उसे ढूंढना नहीं पड़ता है। मांस और शराब उनकी पूजा पद्धति में शामिल है। उनके खानपान में शामिल है। उनके पुजारी मांस का भोग लगाते हैं, देवताओं को शराब चढ़ाया जाता है। बुद्धिज्म में मांसाहार ढूंढना पड़ता है कि हजारों टन किताबों में किसने मांसाहार का समर्थन किया है, उसके आधार पर हम यह कहें कि बुद्धिज्म में मांसाहार है।
बुद्धिज्म को लेकर तरह तरह की गन्द मचाई जाती रही है। छोटे मोटे लोग तो मचाते ही रहते हैं, स्वामी विवेकानंद से लेकर आचार्य रजनीश और अभी इस समय के सद्गुरु भी पीछे नहीं हैं इसमें। इसकी वजह यह है कि बुद्धिज्म कहीं न कहीं दुनिया भर में अभी जिंदा है और कम से कम 20 देशों में तो बहुसंख्य बुद्धिस्ट हैं। ऐसे में लोग बुद्धिज्म में मार्केट ढूंढते हैं कि उसे वेदों से निकला बताकर इंडिया के वैदिक धर्म/हिंदुइज्म को भी साध लें और कोरिया, जापान, चीन थाईलैंड जैसे देशों में थोड़ी इज्जत पा लें। इस तरह से यह लोग गड्ड मड्ड करके अपना योग ध्यान का धंधा चला लेते हैं।
अभी हाल में एक साथी से मैंने कहा कि नेपाल, हिमाचल, तिब्बत, अरुणाचल तक कहीं भी वज्रयान को मानने वाले मांसाहार और शराब का समर्थन/सेवन नहीं करते हैं। उन्होंने तत्काल खारिज कर दिया। लेकिन नेपाल के नेवार का उदाहरण देकर कि नेवार लोग भैंसे का माँस खाते हैं और दारू पीते हैं, कहकर उन्होंने मुझे सदमे में डाल दिया! उसकी वजह यह है कि अरुणाचल, हिमाचल, तिब्बत की बात तो सुनी सुनाई है, नेपाल में मैं खुद फंस चुका हूँ। उन मित्र से पूछा कि नेवार के वज्रयान के आचार्य कौन हैं? शायद उन्होंने बताया हो या नहीं बताया हो, मैं देख नहीं पाया उनकी टिप्पणी।
खैर… नेपाल में नेवार लोगों के वज्रयान का प्रतिनिधि आचार्य श्रीधर राणा रिनपोछे को मान सकते हैं। वह पिछले 5 दशक से बुद्धिज्म की प्रैक्टिस कर रहे हैं और नेपाल ही नहीं, पूरी दुनिया में उनकी ख्याति है। (उनकी एक वीडियो कमेंट में डाल दूंगा)। वहाँ के राजवंश राणा परिवार के उत्तराधिकारी भी हैं और उनके पिताजी आधुनिक नेपाल में नेपाल के डीजीपी भी रह चुके हैं। उनके मठ में शराब और मांस कड़ाई से प्रतिबंधित है। काठमांडू में दारू मांस की सर्विंग इतनी अच्छी लगी कि जब मैं उनसे मिलने गया तो उसके पहले 4 पैग लगा लिया था। जो मित्र मुझे मिलवाने ले गए थे, वह मेरे ऊपर इतने फिरन्ट हो गए कि जैसे मैंने कोई महापाप कर दिया हो और अब नरक में ही मुझे स्थान मिल पाएगा! खैर मुझे न तो स्वर्ग नरक या ईश्वर की चिंता है, न कभी सोचता हूँ। इसके अलावा एक और मठ में गया, जो मिंगयुर रिनपोछे का है। वहां भी खाना खाया, बातचीत की। लेकिन वह भी शाकाहारी हैं। दोनों लोग वज्रयान और बूद्धिज्म के जाने माने वैश्विक विद्वान हैं।
बुद्धिज्म को लेकर लोगों में तरह तरह की भ्रांतियां हैं। मैंने भी कहीं पढ़ रखा था कि वज्रयान में पंच मकार यानी मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा और मैथुन शामिल है। लेकिन 3 साल के वज्रयान की स्टडी में मेरे दिमाग में भारतीय विद्वानों द्वारा बिठाया गया कचरा कुछ हद तक साफ हुआ। श्रीधर राणा ने बातचीत के क्रम में मांसाहार और शराब के सेवन का जिक्र भी किया। उन्होंने पांच प्रतिज्ञाओं का जिक्र करते हुए कहा कि हिंसा और नशा नहीं करूंगा, इसकी प्रतिज्ञा तो श्रावकयन यानी हीनयान में भी कराई जाती है और महायान में भी। तो ऐसे में संदेह कहाँ रह जाता है कि मांसाहार और शराब पीने को लेकर बुद्धिज्म में क्या व्यवस्था है? लेकिन तमाम देशों में, जो खासकर ठंडे इलाके हैं वहां शराब आम तौर पर प्रचलन में है और लोग पीते हैं! वज्रयान तो महायान की ही एक शाखा है, ऐसे में वज्रयान में भी मांस और शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है।
बुद्धिज्म मध्यमार्गी है। इसमें मानव जीवन को सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। शरीर को बड़ा महत्व दिया गया है कि यह शरीर रहेगी तभी आप कोई ध्यान तपस्या या कोई भौतिक काम कर सकते हैं। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति हिंसक है तो उसे अहिंसा की ओर आकर्षित किए जाने का प्रावधान है। साथ ही व्यापक मानवता के हित की कल्पना की जाती है जिसमें सबका कल्याण हो। तो ऐसे में अगर लग रहा है कि कोई एक व्यक्ति लाखों लोगों के लिए खतरा है तो उससे किसी भी तरीके से निपट सकते हैं। लेकिन किसी से इसलिए नफरत नहीं कर सकते कि वह बकरी मछली खाता है और शराब पीता है। हिमाचल के पालगा रिनपोछे कहते हैं कि मैने तमाम लोग देखे हैं जो मांस खाते हैं लेकिन वह शाकाहारी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा मानवीय और दया, करुणा, विवेक से भरपूर होते हैं।
मतलब आप मांस खाते हैं दारू पीते हैं तो बुद्धिज्म आपको भगाता नहीं है और न ही आपके प्रति हिंसक होता है। हाँ, आपके अंदर इतनी दया, करुणा भरने की कोशिश करता है कि आप किसी के प्रति हिंसक और क्रूर न बनें। बकिया ऐसा कुछ नहीं है कि गेहूं उत्पादन में कीटनाशकों का इस्तेमाल कर लाखों जीवों को मारा जाता है, इसलिए हम खुद ही खाने बगैर मर जाएं आए और गेहूं खइबे न करें! बुद्धिज्म का पहला सिद्धान्त मानव जीवन की अमूल्यता है। अपना हो या दूसरे का। इसे अधिकतम बचाने की कोशिश करनी चाहिए।
तो बुद्धिज्म में जबरी मांसाहार ठूंसने की जरूरत नहीं है। अगर आप धार्मिक रूप से मांस खाने को इक्छुक हैं तो वैदिक धर्म सर्वश्रेष्ठ है। इस्लाम धर्म भी अपना सकते हैं। लेकिन मांस खाने की वजह से आपको बुद्धिज्म से भगाया भी नहीं जाता है, कुल मिलाकर मुझे इतना सा मामला समझ में आया है।


