समीर अली, एनडीटीवी संवाददाता, बुलंदशहर
मेरा नाम समीर अली है और मैं बुलंदशहर से एनडीटीवी के साथ वर्षों से जुड़ा रहा हूँ। मेरी पत्रकारिता की शुरुआत स्व. कमाल ख़ान सर के साथ हुई थी और मुझे आज भी गर्व है कि मेरी जॉइनिंग उन्हीं के द्वारा कराई गई। कमाल ख़ान सर की सादगी, पत्रकारिता में गहराई और इंसानियत को मैंने बहुत करीब से महसूस किया है।
उनके जाने के बाद भी, एनडीटीवी की टीम और नेतृत्व ने वैसी ही संवेदनशीलता और सराहना मेरे काम को दी — जिससे कभी ऐसा नहीं लगा कि सर अब हमारे बीच नहीं हैं।
अब बात रणवीर सिंह सर की। जब सर ने एनडीटीवी यूपी हेड के रूप में कार्यभार संभाला, कुछ ही समय बाद सितंबर 2024 में मेरी तबीयत बहुत बिगड़ गई। मेडिकल जांच में पता चला कि मुझे हेड एंड नेक कैंसर है। उस समय मैं मानसिक रूप से टूट चुका था — डर था कि नौकरी भी जाएगी और जीवन की दिशा भी।
लेकिन जब मैंने रणवीर सर को यह बात बताई, तो उन्होंने मुझसे केवल इतना कहा:
“बिल्कुल घबराना नहीं है, हिम्मत रखो, हम सब तुम्हारे साथ हैं। सब ठीक होगा।”
यह शब्द मेरे लिए दवा से कम नहीं थे। उनसे मेरी न कोई पहले जान-पहचान थी, न मुलाकात। लेकिन उनके समर्थन ने मुझे आगे बढ़ने की ताकत दी।
अक्टूबर 2024 में मेरी सर्जरी दिल्ली के अपोलो अस्पताल में हुई। उसके बाद कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का लंबा दौर चला। करीब तीन महीने तक मैं कोई काम नहीं कर पाया, लेकिन न कंपनी ने, न रणवीर सर ने मुझसे एक भी शिकायत की।
बल्कि मेरी गैरमौजूदगी में सारा काम रणवीर सर खुद करते रहे, समय-समय पर फोन कर मेरी तबीयत पूछते रहे, हिम्मत बंधाते रहे। कंपनी ने मुझे आर्थिक सहयोग भी दिया।
आज भी मेरी आवाज़ पूरी तरह से ठीक नहीं है, इलाज चल रहा है — कैंसर दोबारा वापस आ गया है (रिलैप्स), लेकिन मैं खुद को अकेला नहीं समझता। एनडीटीवी ने मुझे सिर्फ जॉब नहीं दी, उन्होंने मुझे जीवन दिया।
रणवीर सर सिर्फ एक योग्य पत्रकार नहीं, बल्कि एक असाधारण इंसान हैं, जिनकी सोच धर्म, जाति और क्षेत्र से कहीं ऊपर है।
जो लोग उन पर भेदभाव के आरोप लगा रहे हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि उन्होंने मुरादाबाद और गोरखपुर जैसे महत्वपूर्ण ज़िलों में मुस्लिम संवाददाताओं को नियुक्त किया — जबकि गोरखपुर उनका खुद का गृह ज़िला है।
मैं पिछले 8 महीनों से सिर्फ खबरें लिखकर भेज रहा हूँ, न वीडियो दे पा रहा हूँ, न वॉयस ओवर, लेकिन पंकज झा सर और रणवीर सर का हमेशा एक ही जवाब होता है —
“जल्द ठीक हो जाओगे, कुछ ही दिन की बात है।”
मैं आज भी लड़ रहा हूँ — अपने शरीर से, बीमारी से — लेकिन मेरी आत्मा मजबूत है, क्योंकि मेरे पीछे खड़ा है एनडीटीवी जैसा संस्थान।
जो लोग एनडीटीवी की छवि खराब करना चाहते हैं, वे इस संस्था की मानवीयता, निष्पक्षता और मूल्यों को नहीं समझते।
एनडीटीवी टैलेंट को सपोर्ट करता है — यह मैंने जिया है, महसूस किया है।
समीर अली
रिपोर्टर, एनडीटीवी
बुलंदशहर
9412519156



