मनोज अभिज्ञान-
कभी आग से, कभी रसायनों से, कभी विकिरण से – हमने कैंसर से लड़ने के अनगिनत तरीके आजमाए हैं। लेकिन अब विज्ञान की एक नई चमकदार किरण ने दस्तक दी है – इलेक्ट्रिसिटी। हां, वही इलेक्ट्रिसिटी जो हमारी दुनिया को रोशन करती है, अब हमारी कोशिकाओं की दुनिया में क्रांति लाने को तैयार है। यह कोई साइंस फिक्शन नहीं, बल्कि तेज़ी से उभरती हुई हकीकत है जिसे दुनिया की शीर्ष बायोटेक कंपनियाँ और शोध संस्थान आकार दे रहे हैं।
सदियों से मानव शरीर को रसायनों और हार्मोनों का संयोजन माना गया, लेकिन अब वैज्ञानिक मानते हैं कि हम केवल जैविक या रासायनिक प्राणी नहीं हैं – हम विद्युत प्राणी भी हैं। कैंसर कोशिकाएं, जो अंधाधुंध विभाजन करती हैं, उन्हीं के भीतर मौजूद विद्युत गुणों को अब हम उनके विरुद्ध प्रयोग में ला रहे हैं। नोवो क्योर जैसी कंपनियाँ ऐसी तकनीकें विकसित कर रही हैं जो बेहद हल्के विद्युत क्षेत्रों को कैंसर कोशिकाओं में भेजकर उनके विभाजन को रोक देती हैं। परिणामस्वरूप, ट्यूमर की बढ़त धीमी पड़ती है – और जीवन की घड़ी थोड़ी और आगे बढ़ती है।
62 वर्षीय टिम न्यूजेंट की कहानी यही कहती है। उन्हें जब ग्लियोब्लास्टोमा – मस्तिष्क का एक जानलेवा कैंसर – हुआ, तो कीमोथैरेपी और सर्जरी ने भी केवल आंशिक राहत दी। लेकिन नोवो क्योर की डिवाइस ने उन्हें समय दिया – अपने परिवार के साथ और कुछ दिन, और कुछ सपने। उन्होंने अपने सिर पर इलैक्ट्रोड्स लगाए, जो हर दिन 18 घंटे 200 किलोहर्ट्ज़ की आवृत्ति पर विद्युत तरंगें भेजते हैं – ताकि कैंसर कोशिकाओं के प्रोटीन विभाजन में हस्तक्षेप हो और वे टूटकर बिखर जाएं। ये तरंगें स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचातीं, क्योंकि कैंसर कोशिकाओं की विद्युत विशेषताएं ही उन्हें अलग बनाती हैं – और यही उनकी कमजोरी भी बनती जा रही है।
डॉक्टर ओला रोमिनीयी, जो पहले इस पर शक करते थे, अब मानते हैं कि यह तकनीक ग्लियोब्लास्टोमा के लिए पिछले कई दशकों की सबसे बड़ी आशा है। इतना ही नहीं, यह तकनीक अब फेफड़ों के कैंसर, मेसोथेलियोमा, और यहां तक कि मस्तिष्क में फैल चुके कैंसर के इलाज में भी प्रयोग हो रही है। अगला लक्ष्य है – अग्न्याशय और ओवरी के कैंसर। जैसा कि डॉक्टर काइल वांग कहते हैं – अगर बिजली कैंसर को ठीक कर सकती है, तो वह शायद हर प्रकार के कैंसर का इलाज बन सकती है।
लेकिन केवल कैंसर ही क्यों? अमेरिका की सेटपॉइंट मेडिकल नामक कंपनी अब इसी शक्ति का प्रयोग रुमेटॉयड अर्थराइटिस जैसे ऑटोइम्यून रोगों में कर रही है। उन्होंने एक छोटी सी चिप बनाई है – विटामिन की गोली जितनी – जो गर्दन की नसों में प्रतिदिन हल्के विद्युत संवेग भेजती है। इन तरंगों से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को दोबारा संतुलित किया जाता है – सूजन कम होती है, दर्द घटता है और शरीर फिर से सामान्य जीवन जीने लगता है। 240 मरीज़ों पर हुए परीक्षणों में, जिन्होंने यह विद्युत उत्तेजना प्राप्त की, उनमें आधे से अधिक को छह महीने में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला।
यह बस शुरुआत है। डॉक्टर ट्रेसी के अनुसार, आने वाले वर्षों में लाखों लोग दवाओं के स्थान पर ऐसे इलेक्ट्रिक डिवाइस से इलाज करवा सकेंगे – और बिना साइड इफेक्ट्स के! पार्किंसन से लेकर डिप्रेशन तक, अब विद्युत की यह नई चिकित्सा अनेक रोगों पर विजय का दावा कर रही है।
यह एक क्रांति है – चुपचाप, लेकिन प्रभावशाली। यह रसायनों की नहीं, झटकों की नहीं, बल्कि सूक्ष्म विद्युत कंपन की क्रांति है। जब शरीर में मौजूद स्पिंडल प्रोटीन खुद अपनी शक्ति से विभाजन नहीं कर पाते, तो मौत सिर्फ कोशिकाओं की नहीं होती – होती है रोग की, दर्द की, असहायता की।
आज विज्ञान ने न केवल बिजली को बल्बों तक सीमित रखा है, बल्कि उसे जीवन का रक्षक बना दिया है। और जब अगली बार बिजली की चमक आपकी आंखों में चमके – तो सोचिए, शायद वही चमक अब किसी के जीवन की उम्मीद भी बन गई है।
साथ में संलग्न है ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में मई 20, 2025 को प्रकाशित लेख (Top पर)



Hem Raj
May 21, 2025 at 8:48 am
ये सब बकवास है। हम तो गोबर, पेशाब से और गाय की पीठ पर हाथ घुमा के ठीक होयेंगे। और जरूरत पड़ी तो बागेश्वर बाबा की भभूत लगायेंगे।