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सुख-दुख

मशहूर कार्टूनिस्ट हरिश्चंद्र शुक्ला ‘काक’ का हृदयाघात से निधन!

शहूर कार्टूनिस्ट काक का निधन हो गया. उनका पूरा नाम था- हरिश्चंद्र शुक्ला. उन्नाव, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे.

काक, देश के उन दुर्लभ कार्टूनिस्टों में एक थे जिन्होंने, हिंदी भाषा के प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका इत्यादि से जुड़े रहकर कार्टून जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई.

व्यंग्य की अनोखी शैली के चलते काक राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय और जटिल राजनीतिक विषयों को बड़ी सरलता से आम आदमी से जोड़कर अपने व्यंग्यचित्रों में प्रस्तुत करते थे.

जन्म- 16 मार्च 1940 : मृत्यु- 01 जनवरी 2025 …


देवप्रिय अवस्थी-

हमारे-आपके प्रिय कार्टूनिस्ट काक जी आज सुबह दिल का दौरा पड़ने से नहीं रहे. यह दुख सूचना उनकी वाल पर उनकी पुत्र सुभव ने दी है. हिंदी में काक जी सरीखा लोकप्रिय कार्टूनिस्ट दूर- दूर तक नजर नहीं आता है.

मुझे गर्व है कि मुझे नवभारत टाइम्स और जनसत्ता में काक जी के साथ काम करने का मौका मिला. सादर नमन.


बालेन्दु शर्मा दाधीच-

स्मृतिशेष ‘काक’ साहब!

बेहद दुःखद ख़बर है। प्रसिद्ध व्यंग्यचित्रकार काक साहब नहीं रहे। पहली जनवरी की सुबह-सुबह बेहद दुःखद ख़बर मिली। सुबह लगभग पाँच बजे उन्हें हृदयाघात हुआ। तुरंत गाजियाबाद के अस्पताल ले जाया गया किंतु डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। पुत्र सुभव शुक्ला ने सूचित किया।

हिंदी पत्रकारिता ने कार्टून की विधा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ, बेबाक व्यक्तित्व और आत्मीय इंसान को खो दिया है। आरके लक्ष्मण के बाद इस विधा में हाल के वर्षों में एक अन्य बेहद व्यथित करने वाली क्षति है यह। काक साहब ने हिंदी पत्रकारिता को धार देने में उत्प्रेरक का कार्य किया था वह भी उस समय, जब देश को इसकी सर्वाधिक ज़रूरत थी। उनके साथ मेरे गहरे निजी एवं व्यावसायिक संबंध रहे। लंबे समय तक उनकी आत्मीयता और आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।

हमारे हिंदी समाचार पोर्टल प्रभासाक्षी के साथ भी वे लंबे समय तक जुड़े रहे । फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया माध्यमों तथा निजी वेबसाइटों के जरिए नए मीडिया पर भी उनकी उपस्थिति थी। जीवन के इस चरण में भी हर प्रकार के मीडिया पर उनकी सक्रियता और लोकप्रियता बहुत प्रभावित करती थी। इस विलक्षण व्यक्तित्व का चले जाना कार्टून विधा के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता और भाषा के लिए भी बेहद दुःखद है। काक साहब हमेशा हमारी यादों में बने रहेंगे। ईश्वर उन्हें शाश्वत शांति प्रदान करे। करबद्ध श्रद्धांजलि। ओम् शांति।


राकेश कायस्थ-

मशहूर कार्टूनिस्ट काक के देहावसान की खबर आई है। काक जी मेरी बाल स्मृतियों का हिस्सा हैं। दिल्ली से छपने वाले अखबार रांची में शाम तक पहुंचते थे। मैं काक जी के कार्टून काटकर और बकायदा संभालकर रखता था।

सार्क सम्मेलन में शामिल होने प्रधानमंत्री राजीव गांधी जब पाकिस्तान जा रहे थे। उस समय पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों थीं। तब काक जी ने राजीव गांधी को फिल्म देशप्रेमी वाले अमिताभ बच्चन की तर्ज पर लुंगी में चित्रित करते हुए लिखा था—खातून की खिदमत में सलाम अप्पुन का।

मैं वह कार्टून अपने दोस्तों को दिखाने के लिए स्कूल ले गया था। सब बहुत हंसे थे। कार्टून किसी भी अखबार में संपादकीय जितना अहम होता है। आबिद सुरती के ढब्बूजी ने मुझे धर्मयुग जैसी पत्रिका पढ़ना सिखाया तो काक के कार्टून ने नवभारत टाइम्स जैसे अखबार पढ़ना।

अपने जीवन के उत्तरार्ध में आकर काक जी ने मुझे ज्यादा बड़ी शिक्षा दी। वह शिक्षा यह थी कि हम कई पत्रकारों और लेखकों को स्वभाविक तौर पर एंटी स्टैलबलिशमेंट मान लेते हैं क्योंकि वो एक कालखंड में किसी एक सरकार की आलोचना कर रहे होते हैं। लेकिन यह पैमाना गलत है।

किसी भी बड़े रचानाकर के बारे राय उसके पूरे जीवन में किये गये काम के आधार पर बनाई जानी चाहिए। हमें यह देखना चाहिए कि जब निजाम बदलता है तो उसकी रचनाधर्मिता वही रहती है या बदल जाती है। काक जी रिटायरमेंट के बाद भी लगातार सक्रिय रहे। पिछले 11 साल में मैंने उनका एक भी ऐसा कार्टून नहीं देखा जहां उन्होंने मौजूदा सरकार को लेकर उस तरह सवाल उठाये हों, जिस तरह वो गैर-भाजपा सरकारों के समय उठाते थे। प्रधानमंत्री मोदी पर तो खैर सवाल ही नहीं उठता।

अपना कार्टूनिस्ट धर्म पूरा करने के लिए उन्होंने बीच-बीच में महंगाई और बेरोजगारी जैसे शाश्वत प्रश्नों पर कुछ छायावादी किस्म की टिप्पणियां जरूर की, जिनका कोई खास मतलब नहीं था। बाकी मैंने जो कार्टून शेयर किये हैं, वह बताते हैं कि उनकी तथ्य निरपेक्षता क्या थी और वैचारिक लाइन किस तरह का था।

काक जी की पीढ़ी के बहुत से लेखक और पत्रकारों को मैंने सतत प्रतिपक्ष मानकर एक वक्त बहुत ज्यादा सम्मान दिया लेकिन बाद में पता चला कि वो सिर्फ किसी एक पार्टी या विचारधारा के लोग थे। ऐसे में निष्कर्ष यह निकलता है कि अगर आप किसी कालखंड में बहुत तीखे तेवरों के साथ सरकार से सवाल पूछते हैं और उसे लेकर हमलावर नजर आये, तो संभव है, इसका ज्यादा श्रेय उस दौर की सरकार आपसे कहीं ज्यादा हो, क्योंकि उसने आपको ऐसा करने दिया।

कार्टूनिस्टों के प्रथम पुरुष शंकर से जुड़ा एक किस्सा मशहूर है, जिन्होंने खुद कई मंचों पर बताया था। शंकर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को गधे के तौर पर चित्रित करते थे। एक दिन शंकर के पास फोन आया, लाइन पर प्रधानमंत्री नेहरू थे, उन्होंने पूछा- क्या आप एक गधे के साथ शाम की चाय पीना पसंद करेंगे? क्या आप इस तरह के किसी वाकये की कल्पना आज कर सकते हैं।

बहरहाल काक जी का जो प्राप्य है, वो उन्हें मिलना चाहिए। हिंदी जगत ने उन्हें भरपूर प्यार और सम्मान दिया। जीवन के अंतिम दिनों में भी वह जिस सक्रियता से वह अपना काम करते रहे, उससे हम सबको सीखना चाहिए। विनम्र श्रद्धांजलि!

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