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सुख-दुख

मैं कभी मिला तो नहीं पर अपनी टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं में जिंदा हैं ‘काक’!

ओम थानवी-

कार्टूनकार ‘काक’ (हरीशचंद्र शुक्ल) नहीं रहे। जनसत्ता में उनका ख़ूब साथ रहा। उससे पहले हमारे साथ राजस्थान पत्रिका में रहे। उन्होंने दिनमान और रविवार के लिए भी कार्टून बनाए। उनका व्यंग्य मारक था। जनसत्ता की पहचान का हिस्सा बन गया। उनका ‘आम आदमी’ खेतिहर लगता था। बाद में वे दूसरे अख़बार में गए तो जनसत्ता वाला कटाक्ष अलग हुआ। उनकी ख़ूबी रही कि अंत तक कार्टून बनाते रहे। “काकदृष्टि” उनकी वैबसाइट थी।

उनकी स्मृति को विनम्र नमन।


महेश शर्मा-

श्रद्धांजलि- जाने माने कार्टूनिस्ट ‘काक’ से मैं कभी नहीं मिला, मन था, पर संयोग नहीं बना। उनका नाम ही काफी था। बहुत सुना था। उनकी रेखाभिव्यक्ति ने उन्हें बहुत पहचान दी। अखबारनवीसी के इब्तिदाई दिनों में काक जी को जनसत्ता से जाना।

हिंदी में मुझे काक जी और राजेन्द्र धोड़पकर जी बहुत अपील करते रहे। हालांकि सुधीर तैलंग भी पसंदीदा रहे हैं। पर उन दोनों की बात ही दीगर। वैसे अजजी, कांजिलाल को काफी पहले स्वतंत्र भारत, नवजीवन में देखा करता था। बहुत धार नहीं दिखती थी।

आबिद सुरती का धर्मयुग में कार्टून कोना डब्बू जी अच्छे लगते थे। रेखाचित्र और कार्टून में मेरी दृष्टि में अंतर है। हालांकि दोनों ही मुखातिब होते हैं। लेकिन काक दृष्टि तो गजबै थी। अंग्रेजी में बेजोड़ कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण, उन्नी, मारियो मिरांडा, शंकर जैसे नामचीन कार्टूनिस्ट की बोलती रेखाएं गज़ब हुआ करती थी।

कार्टूनिस्ट अपने व्यंग्य के तीखे बाणों से समसामायिक मुद्दों को जनता तक पहुंचाते हैं। कटाक्ष है तो दिखना चाहिए। यह कोई छोटामोटा काम नहीं है। मुनव्वर राना का शेर है कि ‘इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए/आपको भी चेहरे से बीमार होना चाहिए।। यानी पेशेगत प्राकट्य जरूरी है।

हमारे दोस्त गोविंद दीक्षित, अनिल कुमार अंकुर की पत्रकारिता कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू हुई थी पर वे भटक गए और पत्रकार बनकर खो गए कहीं। कहां हैं? नहीं पता। मेडिकल, हेल्थ बीट की रिपोर्टिंग के दौरान संजीदा कार्टूनिस्ट अशोक कुमार शुक्ला ‘अंकुश’ जी से मेरी मुलाकातें मेडिकल कालेज के एसपीएम (अब कम्युनिटी मेडिसिन) विभाग में मुसलसल होती रहीं। उनके कार्टून दैनिक जागरण में छपते थे। पर मुझे ज्यादा तीखे नहीं दिखते थे (जो सकता है गहराई न समझ पाता हूंगा) और न ही गुदगुदाने वाले।

हां, कुछ अच्छे भी होते थे। हो सकता है अखबार के संचालक शासन और प्रशासन से पंगेबाजी न चाहते हों। तो अंकुश जी की भी सरकारी मजबूरी रही हो। वह बहुत गम्भीर मुद्रा में तीखा व्यंग्य व्यक्त कर देते थे। एक दौर में जागरण से नाराज होकर ‘आज’ में वह जागरण वाले भाई साहब से भाई जी हो गए। गज़ब पैनापन दिखा। आज को वह चुप्पे से भेज दिया करते थे।

जागरण के पाठक भी समझ गए थे, कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी यूं ही कोई बे-वफ़ा नहीं होता। धारदार कार्टून न होना भी कार्टूनिस्ट की अखबार या पत्रिका के पाठकों के प्रति बेवफाई ही कही जाती है। पहले पहल हेड लाइन फिर सीधे कार्टून पर नज़र जाती है।

अजीत नैनन के इंडिया टुडे में अच्छे कार्टून दिख जाते थे। शेखर गुरेरा भी कभी-कभार भा जाते रहे। काक जी ने कानपुर से बाहर बहुत नाम कमाया। उनका सही एक्सपोज़र जनसत्ता में हुआ। वाह क्या अखबार था।

जनसत्ता में उन्हें राजेन्द्र जी ने रिप्लेस किया तो न जाने क्यों, यह निर्णय मुझे अच्छा नहीं लगा। तब महसूस हुआ कि कार्टूनिस्ट में भी पाठक संख्या बढ़ाने की क्षमता होती है।

एक भी जनसत्ताई किसी अखबार में पहुंच जाए तो छा जाता है जैसे सत्य प्रकाश त्रिपाठी स्वतंत्र भारत में छा गए थे। देखो भटकने लगा न। बहरहाल काक जी आप हमेशा याद आओगे।

अपनी टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं में जिंदा है/काक दुनिया से गया ही नहीं।

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