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जाति जनगणना सबसे पहले मीडिया और न्यायपालिका में हो! ये दो सेक्टर देश की तस्वीर बदल देंगे

Caste Census : जाति जनगणना ने देखते ही देखते देश के सबसे बड़े मुद्दे को एकदम से गायब कर दिया है। कास्ट सेंसस से पहले पूरा देश पाकिस्तान को निगल जाने की नियत लिए दिन काट रहा था। मीडिया इसे मोदी का मास्टरस्ट्रोक बता रहा है तो समूचा विपक्ष जाति जनगणना का पूरा श्रेय अपनी अपनी पार्टी और नेताओं को दे रहा है। इस विषय पर कुछ टिप्पणियां भी हैं, नीचे। पढ़ें…


श्याम मीरा सिंह-

TV मीडिया के शत प्रतिशत एंकर जाति जनगणना के ख़िलाफ़ थे, सरकार के फ़ैसले के बाद सब एंकर उदास हैं, अगर मीडिया में सर्वसमाज का प्रतिनिधित्व होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती। TV स्टूडियो में आज जहां मातम मचा हुआ है वहाँ मिठाइयाँ बंट रही होती। जातीय जनगणना और प्रतिनिधित्व इसलिए ज़रूरी है।

सबसे पहले न्यायपालिका और मीडिया में जातीय जनगणना हो और सबसे पहले इन्हीं दो जगहों पर सर्वसमाज का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। ये दो सेक्टर पूरे देश की तस्वीर बदल देंगे। भारत ऐसा शक्तिशाली देश बनेगा जैसा सोचा नहीं होगा। सर्वभागीदारी वाला देश ही विश्वशक्ति बन सकता है। भेदभाव वाला देश कभी पूर्ण विकसित नहीं हो सकता।


शरद शर्मा-

चर्चा चल रही थी पाकिस्तान की ऐसी की तैसी कैसे की जाएगी, PM मोदी लगातार बड़ी बैठक कर रहे हैं कभी भी कुछ बड़ा हो सकता है। इसी बीच मोदी कैबिनेट ने फैसला कर लिया कि देश में जातिगत जनगणना होगी।

किसी को समझ नहीं आया कि अचानक से मोदी सरकार विपक्ष की इतनी बड़ी मांग को इस समय क्यों मान रही है? जबकि सरकार और उससे जुड़ा सारा तंत्र जाति की जगह धर्म पे फोकस करवा रहा था।

एक बहुत बड़े न्यूज़ चैनल को समझ में नहीं आया अब इस खबर को कैसे चलाएं? क्योंकि चैनल मोदी सरकार पे तो सवाल उठा नहीं सकता था और ना इसे विपक्ष की जीत के तौर पर प्रोजेक्ट कर सकता था।

लिहाज़ा एंकर-रिपोर्टर ने इस फ़ैसले को “मोदी सरकार की विपक्ष पर सर्जिकल स्ट्राइक” कहकर किसी तरह मामला निपटाया।


अपूर्व भारद्वाज-

कल्पना कीजिए, अगर जातिगत जनगणना मनमोहन सिंह ने कराई होती… तो यही मनुवादी मीडिया उसे जातीय दंगे भड़काने की साज़िश करार देता। संघ और उसकी पूरी मशीनरी मंडल आयोग वाले दिनों की तरह देश को आग में झोंक देती।

सोचिए… उसी वक्त टीवी चैनलों पर चीखते एंकर, “देश तोड़ने की कोशिश”, “जाति की राजनीति”, “विभाजनकारी एजेंडा” जैसे चिल्ला-चिल्लाकर पूरे माहौल में ज़हर घोल देते।

अब देखिए आज का दृश्य — जातिगत जनगणना पर देश के 90% एंकरों की बॉडी लैंग्वेज देखिए। जैसे किसी ने उनकी जातीय श्रेष्ठता को खुली चुनौती दे दी हो। चेहरे पर खीज, शब्दों में झल्लाहट, सोशल मीडिया पर ग़ुस्से से भरे पोस्ट — जैसे उनकी सत्ता के तिलिस्म में किसी ने सेंध मार दी हो।

अब कल्पना कीजिए… अगर पठानकोट, उरी, पुलवामा या पहलगाम जैसी कोई घटना UPA सरकार में होती, तो यही मीडिया और संघी गिरोह सरकार को “राष्ट्रद्रोही” करार दे देता। सड़क से संसद तक उत्पात मचता, पुतले जलते, इस्तीफे की मांग उठती।

अब सोचिए… अगर नोटबंदी का फैसला मनमोहन सिंह लेते, तो क्या रामदेव-अन्ना जैसे लोग सड़कों पर अनशन न करते? क्या मीडिया उन्हें माफ करता? क्या वो फैसला टिकता भी?

और अब सोचिए… अगर कोरोना 2010 में आता, और यूपीए सरकार लॉकडाउन लगाती, मज़दूरों की भीड़ सड़कों पर भूखी-प्यासी चलती, लाखों मौतें होतीं — तो क्या यही मीडिया उन्हें जीने देता?

आज… GST की मार है, अर्थव्यवस्था लहूलुहान है, महंगाई और बेरोज़गारी सिर चढ़कर बोल रही है — मगर मीडिया चुप है।

सवाल नहीं, सिर्फ़ सेवा। लोकतंत्र के Watchdog अब सत्ता के Lapdog बन चुके हैं। हर गलत कदम को “मास्टरस्ट्रोक” बताकर जनता की आंखों में धूल झोंकी जा रही है।

और मैं दावे से कहता हूँ — अगर देश का अख़बार और पत्रकार सिर्फ़ 48 घंटे के लिए सच बोलना शुरू कर दें — तो इस सरकार की हालत पतली हो जाएगी।


डॉ मुकेश कुमार-

मीडिया में भी होगी जातिवार जनगणना… उड़ती-उड़ती ख़बर आई थी। पहले उन्हें ये फ़ेक न्यूज़ लगी मगर बाद में पता चला कि ख़बर पक्की है तो वे सदमे की हालत में आ गए। दरअसल, ख़बर ही ऐसी थी। सरकार ने ऐलान कर दिया था, बल्कि उसे करना पड़ा था कि मीडिया में भी जातिवार जनगणना करवाई जाएगी।

इस उड़ती ख़बर से अधिकांश छोटे-बड़े पत्रकार निराशा और गुस्से से भर गए। वे भुजाएं फड़फड़ाने लगे, सन्निपात में बड़बड़ाने लगे। अब चैनल-चैनल, अख़बार-अख़बार यही चर्चा चल रही है। चाय-पान की गुमटियों से लेकर ट्वीटर, फेसबुक और न्यूज़रूम, स्टूडियो तक सब इसी टॉपिक पर चपे हुए हैं।

सबसे ज़्यादा उद्वेलित सबसे बड़े चैनल का चौधरी है। उसे लग रहा है कि इतने पवित्र, निष्कलंक, मीडिया में अब जात-कुजात भरने की तैयारी हो रही है। न्यूज़रूम में वह बड़बड़ाते हुए घूम रहा है कि राजनीति का बेड़ा गर्क़ करने के बाद अब ये लोग मीडिया में भी जातिवाद फैलाएंगे। ये लोग का मतलब आप समझ ही गए होंगे।

जोशी हमेशा अपने बॉस की हाँ में हाँ मिलाता है। इसी से उसकी नौकरी बची हुई है और तरक्कियाँ भी मिलती रहती हैं। चौधरी की कै-दस्त समेटना उसका काम है। लायल देन द किंग। वह और ज़ोर से बोला- ससुरों के दिमाग़ में जाति भरी है, कुछ सूझता नहीं तो जाति-जाति करने लगते हैं। भाई किसने रोका है अच्छा काम करो और आगे बढ़ो मगर नहीं, क़ोटा चाहिए बस।

विचित्रा को अपनी जाति का घमंड है। वह डंके की चोट पर इसका प्रचार करती है और दूसरी जातियों पर हिकारत भरी टिप्पणियाँ भी करने से बाज नहीं आती। सत्ता में बैठे सजातीय उस पर मेहरबान भी रहते हैं। इस समय वह भी क्षोभ से भरी हुई है। वह ट्विटर के लिए तीन बार पोस्ट लिखकर डिलीट कर चुकी है। उसे डर है कि कहीं कुछ ऐसा न लिख बैठे कि पिछड़े-दलित एक्टिविस्ट उसकी नौकरी ही ले लें।

व्यंजना समझदार है। वह चतुराई के साथ अपना जातीय दर्प छुपा लेती है। वह कभी इस पक्ष के साथ खड़ी हो जाती है तो कभी उस पक्ष के साथ। इससे कन्फ्यूजन बना रहता है। मगर अंदर ही अंदर वह भी खौल रही है। सफ़ेदा सिंह का भी कमोबेश यही हाल है। नोटों में चिप वाली घटना के बाद से वह मुँह बंद रखने में ही भलाई समझती है। हालाँकि निजी बातचीत में वह भी आग़ उगल रही है।

मिश्रा, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, ठाकुर, सिन्हा, अग्रवाल हालाँकि दूसरे कैंप के हैं और हमेशा चौधरी को निपटाने में लगे रहते हैं, मगर ये आफ़त तो सब पर आ रही है, इसलिए वे भी साथ खड़े हो गए हैं। गुटबंदी छोड़कर दुनिया भर के हिंदुओं एक हो जाओ की तर्ज़ पर जातिवार जनगणना के ख़िलाफ़ लामबंदी करने में जुट गए हैं।

मिश्रा- मोदी जी को चाहिए कि एक बिल लाकर रिज़र्वेशन की पॉलिटिक्स को भस्म कर दें….और ये जो जनगणना को लेकर कूद रहे हैं न इनको भीमा कोरेगाँव कांड की तरह यूएपीए लगाकर अंदर कर दें। ठाकुर थोड़ा सेकुलर किस्म का सवर्ण है। वह बोला-अरे कैसे भस्म करेंगे। बेचारे खुदै फँस गए हैं। विरोध करेंगे तो हिंदुत्व का फलूदा नहीं निकल जाएगा। इस पर सब चुप हो गए। सबको पता है, सही कहा है ठाकुर ने।

उधर भोले शंकर भी भनभनाया हुआ है। आज शाम को प्राइम टाइम का एजेंडा उसने यही सेट किया है- मीडिया में मेरिट चलना चाहिए या क़ोटा। उसने गेस्ट भी सावधानी से चुने हैं ताकि वह अपनी लाइन को आगे बढ़ा सके। दिखाने के लिए एक यादव जी को बैठा रहा है, मगर दूसरे मेहमानों के साथ मिलकर उन्हें कैसे घेरना है, इसकी रणनीति बना ली है।

गोस्वामी खुलकर खेलता है। वह निष्पक्ष दिखने के फेरे में नहीं पड़ता। कोई भी विषय हो उसे सीधे-सीधे हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय साज़िश से जोड़ देने भर से छप्पर फाड़ टीआरपी आ जाती है। कोई हिंदू-मुसलमान या पाकिस्तानी एंगल मिल जाए तो फिर कहना ही क्या है। जाति जनगणना को भी उसने हिंदू धर्म पर ख़तरे से जोड़ दिया है।

राष्ट्रवादी पत्रकारिता की ध्वजाधारी झलकी वर्मा ने इसे ईसाईयत, रोम और इटली से जोड़ दिया है। उसके यू ट्यूब वीडियो का थमनेल है-हिंदुओं को बाँटने की अंतरराष्ट्रीय साज़िश। इशारा सोनिया गाँधी की तरफ़। किसी का नाम लेने की ज़रूरत नहीं। दर्शक समझदार हैं और समझदार को इशारा काफी होता है।

लेकिन मामला दूसरी तरफ जा रहा है। सोशल मीडिया पर एक फौज गोला-बारूद से हमेशा लैस रहती है, जो मौका मिलते ही अपने ड्रोन लेकर टूट पड़ती है। वहां इन पत्रकारों की जाति और जातिवादी सोच का पोस्टमार्टम किया जा रहा है। मनुवादी पत्रकार का तमगा दिया जा रहा है।

चैनलों और अख़बारों में सरकार की तरफ से जो टूल किट आया था उसमें इसका तोड़ ही नहीं था। अब उच्च वर्णीय पत्रकार क्या करें, कैसे जाति छिपाएं, इन पत्थरबाज़ों से कैसे बचें? लाओ लाओ भाई, टॉपिक चेंज करो। इसरायल की बात करों। हमास के बहाने मुसलमानों के ख़िलाफ़ विषवमन करो। दर्शकों को इसमें या उसमें उलझा दो।

वर्ल्ड कप की बात करो, रोहित, कोहली की बात करो। चुनाव पर बहस कराओ मगर जातिवार जनगणना पर बिल्कुल नहीं। उन्हें जनगणना और आरक्षण के बारे में सोचने ही मत दो। हम जातिवाद विरोधी हैं, इसलिए जाति के बारे में बात ही नहीं करेंगे। जय गोडसे, जय सावरकर।

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