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सियासत

अमेरिका से झिड़की मिलने के बाद फिर रूस–चीन की गोद में भारत

अमेरिका को खुश करने की तमाम कवायद—हीरे तोहफ़े से लेकर हथियार सौदों और चुनावी प्रचार तक—जब झिड़की और दबाव में बदल गई तो विदेश नीति ने अचानक करवट ले ली। अब मास्को और बीजिंग की ओर रुख है, दोस्ती की नई कहानियां गढ़ी जा रही हैं और “एशिया की सदी” का पुराना नारा फिर से चमकाया जा रहा है।

लेकिन हकीकत यही है कि रणनीति की जगह ‘झूला कूटनीति’ खेली जा रही है, जिसमें किसान, व्यापार और दीर्घकालिक सोच सबसे पहले बलि चढ़ते हैं।


वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह जी इस मसले पर लिखते हैं-

यह एकदम ताज़ा चित्र है! फ़ाइल चित्र नहीं है। अमरीका के नेताओं के आगे पिछले ग्यारह साल तक परिक्रमा करने, अनगिनत झप्पियां पाने,एक राष्ट्रपति की बीवी को हीरा भेंट करने, दूसरे का चुनाव प्रचार करने के लिए भारतीय समुदाय की रैली करने, उनके महंगे महंगे हथियार ख़रीदने के बावजूद जब वहाँ से सिर्फ़ झिड़की और दंड मिला तो विदेश नीति सीधे 180 डिग्री घूम गई।

अब पुनः रूस में पुराने मित्रवत् रिश्तों की दुहाई दी जा रही है। NSA मास्को घूम आए हैं और पुतिन के भारत दौरे की तैयारियों की खबरें विदेश मंत्रालय बीच-बीच में मीडिया में लीक कर रहा है।

विदेश मंत्री चीन जा पहुँचे, जहां वे लंबे समय तक राजदूत रहे हैं और उनके विदेश मंत्री को बुला लिया, जो आजकल हमारे नेताओं के साथ चित्र खिंचवा रहे हैं, रुके हुए व्यापार पुनः खोले जा रहे हैं और नये व्यापारिक रिश्ते बनाने के आश्वासन फिजां में हैं। एशिया की सदी के नारे पर जमी धूल झाड़ी जा रही है।

यह हमारी झूला विदेश नीति का मार्मिक प्रहसन है। लेकिन चूँकि दिल अमरीका में ही बसता है इसलिए देसी कपास के किसानों को बलि चढ़ाकर (इंपोर्ट ड्यूटी हटाकर)अमरीका को खिड़की से हरी घास आफर की गई है!

हमने पढ़ा सुना था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनय दीर्घकालिक रणनीति पर स्थापित होते हैं लेकिन देख रहे हैं कि वे झूला भी झूल सकते हैं यदि कमान विश्वगुरू लेवल की हो!

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