मीडिया पर कोबरापोस्ट की डाक्यूमेंट्री रिलीज, इसमें भड़ास वाले यशवंत भी! देखें वीडियो

Journalist Speak: Cobrapost documentary in solidarity with The UN #truthneverdies campaign!

जाने-माने खोजी पत्रकार अनिरुद्ध बहल के नेतृत्व में संचालित मीडिया कंपनी ‘कोबरापोस्ट’ ने इन दिनों दुनिया भर में मीडिया और मीडिया वालों की खराब स्थिति सुधारने को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चलाई जा रही मुहिम ‘सच कभी मरता नहीं’ का हिस्सा बनते हुए भारत में अपने खास अंदाज में अभियान को आगे बढ़ाया है.

इसी क्रम में ताजातरीन ये है कि कोबरापोस्ट द्वारा भारत में पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति दर्शाने के लिए एक डाक्यूमेंट्री का निर्माण किया गया है. इसमें दर्जन भर से ज्यादा पत्रकारों से कुछ चुनिंदा सवाल पूछे गए और उनके जवाब को कंपाइल किया गया. इन पत्रकारों में सब के सब अंग्रेजी के हैं या अंग्रेजी में जवाब दिए, सिवाय भड़ास वाले यशवंत के. इस डाक्यूमेंट्री में पत्रकारों ने खुद के अनुभव, पीड़ा, इच्छा, सोच, सपने को कैसे बयान किया, देखने के लिए नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें :

यूनेस्को मुख्यालय में अनिरुद्ध बहल ने भारत में मीडिया की स्थिति पर रखी अपनी बात

अगस्त महीने में कोबरपोस्ट के एडिटर अनिरुद्ध बहल ने यूनेस्को में पेड न्यूज़ पर चर्चा की थी. पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में कोबरापोस्ट के एडिटर अनिरुद्ध बहल ने खोजी पत्रकारिता के जोखिम और ख़ासकर भारतीय मीडिया में पेड न्यूज़ के प्रचलन पर विस्तार से अपनी बात रखी.

इस दौरान प्रश्नोत्तर सत्र में अनिरुद्ध बहल ने कहा कि स्कूलों में खासकर ग्रेड छह से लेकर आठ तक के बच्चों को विवेचनात्मक तौर पर मीडिया को समझने के गुर सिखाने होंगे. बहल ने ज़ोर देकर कहा कि स्कूल पाठ्यक्रम में ‘मीडिया कन्सम्प्शन’ को बतौर सब्जेक्ट शामिल किया जाना चाहिए. खोजी पत्रकारिता के बारे में अनिरुद्ध बहल ने कहा कि तहकीकात को अंजाम तक पहुंचाने के लिए योग्यता, वक़्त, किस्मत और संसाधनों का मिश्रण जरूरी है. इस दौरान बहल से कोबरापोस्ट द्वारा की गई खबरों और उनके परिणाम पर भी चर्चा की गई.

भारत सरकार ने मीडिया की आजादी का गला घोंटने के लिए विज्ञापनों में कटौती कर दी!

कोबरा पोस्ट ने भारत में मीडिया को सरकार किस तरह हैंडल करती है, इस पर एक स्टोरी प्रकाशित की है, ”Exclusive for Cobrapost: Government Curtails Ads to Curtail Press Freedom” शीर्षक से. पत्रकार Prateek Sibal की इस स्टोरी में भारत में अंग्रेजों के समय मीडिया की शुरुआत से लेकर उसे दंडित किए जाने के घटनाक्रम को छूते-रेखांकित करते हुए वर्तमान की संवेदनशील स्थिति पर प्रकाश डाला गया है. कोबरापोस्ट की इस एक्सक्लूसिव रिसर्च स्टोरी की शुरुआत कुछ यूं है :

There are many ways to muzzle the press. The British shut down the Bengal Gazette, India’s first newspaper, only a year after James Hicky had started it in 1870. The government did not like the idea that the paper should criticize the East India Company and its officials. Such cases of seizing printing presses or banning newspapers or magazines abound throughout India’s struggle for freedom from the British yoke. Post-Independence, while governments today may not resort to seizing printing presses, the abuse of legal and financial tools to censor the press continues unabated. Every few weeks there are stories of editors being fired or journalists being attacked for doing their jobs. Bobby Ghosh, the editor of Hindustan Times, was eased out of office after his sustained coverage of hate crimes in the country. Even newspapers owned by trusts are not immune to external pressure. Harish Khare, editor of The Tribune, resigned after a tumultuous relationship with the trust. Under Khare’s leadership, the paper exposed major lapses in the government’s citizen data protection system. Similarly, Paranjoy Guha Thakurta, the former editor of Economic and Political Weekly, a journal owned by Sameeksha Trust, had to demit office after differences with the board over an article that examined alleged impropriety by the Adani group. Ironically, academics like Andre Beteille, Dipankar Gupta and Romilla Thapar are among the trustees….

इस लंबी-चौड़ी और आंख खोलने वाली स्टोरी को पढ़ने के लिए नीचे की तस्वीर पर क्लिक करें :

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