कोई मीडिया वाला अगर पत्रकारिता न कर रहा हो और गाड़ी पर प्रेस लिखवाए हो तो क्या वो भी जेल जाएगा?

Dinesh Choudhary : इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला गौरतलब है। आप प्रेसवाले नहीं हैं और प्रेस लिखते हैं तो चारसौबीसी के मामले में जेल जा सकते हैं। पर आप प्रेस वाले हैं और पत्रकारिता न कर कुछ और करते हैं, तब कौन-सा मामला बनता है?

थिएटर एक्टिविस्ट और जर्नलिस्ट दिनेश चौधरी की एफबी वॉल से.

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पत्रकारिता में शौक से आये हो या इसे अपना करियर बनाना चाहते हो?

‘भ्रष्ट इंडिया कंपनी’ से मुक्ति का मार्ग ‘आजादी का दूसरा संघर्ष’ है…  छब्बीस जनवरी बीते एक माह गुजर गया है और पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव का अंतिम दौर चल रहा है। इस एक महीने के अंतराल में भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप को लेकर अनेक तरह के विचार हवा में तैरते रहे। यह पहला मौका है जब चुनाव में न तो राष्ट्रीय फलक पर और न क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर ही कोई मुद्दा चर्चा में है। इसके बरअक्स निचले स्तर के सामान्य चुनावी प्रचारकों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के बडे़ नेताओं, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री की भी, भाषा-शैली के घटते स्तर को लेकर हर जागरूक व्यक्ति चिंतित और शर्मसार नजर आ रहा है।

चुनाव जैसे महत्वपूर्ण और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अभिन्न ‘पवित्र कर्मकाण्ड’ की बेला में प्रत्याशियों व अन्य प्रचारकों द्वारा लोक-कल्याण की भावना से उद्भूत विचारों से ओत-प्रोत भावी योजनाओं तथा र्कायक्रमों का खाका मतदाताओं के सम्मुख प्रस्तुत करने की अपेक्षा दूसरे की निन्दा-आलोचना करने, तंज कसने, मिथ्या आरोप मढ़ने, सामने वाले को निर्ममतापूर्वक कुचल देने की हिंसक प्रवृत्ति से भरी हुई अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज का प्रयोग सार्वजनिक रूप से करने से हमारे वैचारिक तथा नैतिक पतन की नई इबारत ही लिखी गई। देश व समाज की शक्ल-ओ-सूरत आगे कैसी बन जाने वाली है, यह पूरा घटनाक्रम इसकी स्पष्ट बानगी है।

वर्तमान भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर एक साधारण व्यक्ति के लिए सटीक एवं तार्किक रूप से कुछ कह पाना तो कठिन है लेकिन फिर भी संभवतः इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता है कि ‘विचारधारा’ की दृष्टि से देश भर के राजनैतिक-सामाजिक परिदृश्य से वैचारिकता का अवसान हुए दशकों बीत चुके हैं। हम भलीभाँति जानते हैं कि देश में कभी थे एक से बढ़ कर एक निश्चित सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राष्ट्रीय सुदृढ़ता के पक्षधर और विचारवान लोग। लेकिन अब न वैसे नेता रहे और न अन्य शक्तिसम्पन्न प्रभुवर्ग में ही कोई। सर्वत्र नैराश्यपूर्ण घटाटोप अंधकार के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता।

यदि हमारे वर्तमान समाज में कुछ है तो वह है–एक तरफ अभावग्रस्त शोषितों-वंचितों का सिसकियों और बेचारगी से भरा हुआ करुण-क्रंदन वाला ‘भारत’। तो दूसरी ओर वैध-अवैध साधनों से समेटी गई अकूत दौलत के अंबारों से लदे ओर लूट के जश्नों में दिन-रात मस्त शोषक वर्ग का ‘इंडिया’। जिसे भरपूर लूट से प्राप्त राग-रंग के हर्षोल्लास के कानफोड़ू शोर में अपने अतिरिक्त किसी दूसरे की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही है।

देश के आमजन के हिस्से सिर्फ और सिर्फ बीच-बीच में किसी सांपनाथ या उसी के भाई-बिरादर नागनाथ के पक्ष में मतदान कर अगले चुनाव तक तमाशाई बने रहने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं आता, सिवाय उस ‘इंडिया’ निवासी प्रभुवर्ग के अन्याय, शोषण, उत्पीड़न, घृणा, भ्रष्टाचार, अनैतिक, आपराधिक कुकर्मों से भरे क्रिया-कलापों को देखते-सुनते-भोगते रहने के। क्योंकि उसका जीवन-संघर्ष इतना तीव्र बना दिया गया है कि वह बस किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ भर कर लेने की विवशता से घिर गया है। उसके पास समय ही नहीं कि वह यह सोच भी सके कि गरीबी कोई ईश्वरीय देन या पिछले जन्म के कर्मों का प्रतिफल हर्गिज नहीं, बल्कि चंद सत्ताधीशों, पूँजीपतियों तथा उच्चाधिकारियों के नापाक गठजोड़ का नतीजा है।

संसार भर में बढ़ते उपभोक्तावाद ने विचार को तिजौरी में बंद कर दिया है। इसका ज्वलंत उदाहरण है देश में मुख्यधारा का मीडिया, जिस पर पूँजीपतिवर्ग कब्जा कर बुद्धिजीवी होने का दंभ पाले संपादकों-पत्रकारों को अपना टुकड़खोर बना कर मनमानी करवा रहा है। इसकी तस्दीक किसी भी चैनल व बड़े समाचार पत्र को देख कर की जा सकती है जिसमें से देश का बहुसंख्यक ग्रामीण, किसान, गरीब व मेहनतकश गायब है। हो भी क्यों नहीं; क्योंकि एक तो इस असंगठित क्षेत्र से उसे ‘बिजनैस’ नहीं मिलता और दूसरे, पत्रकारिता को ‘मिशन’ से इतर व्यवसाय बने अर्सा गुजर गया। अब सब कुर्सी या थैली की परिक्रमा कर उसे कामधेनु की तरह दुहने में ही हित-लाभ देख-समझ रहे हैं।

जहाँ तक किसी विचारधारा का प्रश्न है, अब राजनीति में न तो विचार ही रहे और न उनका कोई खास महत्व। एक व्यक्ति पल भर पहले किसी एक पार्टी में होता है और अगले ही क्षण किसी अन्य का दामन थाम लेने में उसे कोई लाज-शर्म का अनुभव नहीं हो पाता है। दलों के लिए भी घड़ी भर पहले जो महाभ्रष्ट और चोर-बेईमान था, वह अब उसका कंठहार बन जाता है। साम्यवाद हो या फिर चाहे कोई भी अन्य ‘वाद’ सबकी कलई खुल चुकी है।

राजनीति के शाही हम्माम में सभी नंग-धड़ंग हैं। यहाँ एक उदाहरण देना समीचीन होगा–जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक प्रभाष जोशी ने अपने एक नये-नये भर्ती हुए उप-संपादक को वामपंथी नेता ईएमएस. नंबूदरीपाद का साक्षात्कार लेने उनके पास भेजा। शुरुआती सामान्य वार्तालाप में ईएमएस. ने उनसे पूछा–’’पत्रकारिता में शौक से आये हो या इसे अपना करियर बनाना चाहते हो?’’ नौजवान पत्रकार से यह सुनने पर कि पत्रकारिता में ही भविष्य की राह तलाशनी है, ईएमएस. ने कहा–’’पत्रकारिता के पेशे में तुम्हें तब तक कामयाबी नहीं मिल पायेगी जब तक तुम भारत और कृष्ण को नहीं समझ लेते।’’ बस, वह साक्षात्कार शुरू होने से पहले यहीं पर समाप्त हो गया। आज हमारे बीच ऐसे विचारवान तथा अपनी जड़-जमीन से जुड़े कितने लोग बचे हैं?

दूसरा उदाहरण, विश्वप्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ (बर्ड वॉचर) सालिम अली ने भरतपुर पक्षी अभयारण्य (केवलादेव नेशनल पार्क) के निर्माण के साथ ही केरल की ‘साइलेंट वैली’ नेशनल पार्क के लिए खतरा बनी एक बांध परियोजना को रुकवाने पर काफी जोर दिया था। वे एक दिन प्राकृतिक सुषमा और वन संपदा से भरपूर इस घाटी को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का अनुरोध लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिले। चौधरी साहब खेत की मिट्टी पर पड़ने वाली पानी की पहली बूँद का असर जानने वाले नेता थे।

अतः बांध निर्माण से पर्यावरण के संभावित खतरों का जो चित्र सालिम अली ने उनके सामने रखा, उसने उनकी आँखें नम कर दीं। इस प्रकार एक अकेले इंसान की बातों का भी महत्व समझ कर चौधरी चरण सिंह ने उस बांध परियोजना को रोक देने का आदेश दे दिया। आज सालिम अली साहब हमारे बीच नहीं हैं और चौधरी साहब भी नहीं हैं। हमारे बीच अब कौन बचा है, जो सोंधी माटी पर उगी फसलों के मध्य एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा? कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख के बरफीले इलाकों में जीने वाले पक्षियों की ही नहीं बल्कि आम जन-जीवन की भी वकालत करेगा? अब तो राजनीतिक हवाओं का रुख हरियाली के चंद टापुओं की तरफ है बाकी के हिस्से तो सिर्फ झुलसाती रेगिस्तानी गर्म हवाओं ने ही आना है, जिसकी फिक्र किसी को नहीं।

एक अन्य उदाहरण डाॅ. भीमराव अंबेडकर का है, जिन्होंने बचपन में एक नौ वर्षीय कन्या से घरवालों द्वारा की गई पहली शादी वाली पत्नी के निधन के बाद फिर किसी दलित कन्या को अपनी जीवन-संगिनी बनाने की अपेक्षा इसके लिए एक सारस्वत ब्राह्मण युवती को चुना और अपना स्थाई निवास ‘राजगृह’ भी मुंबई के एक ब्राह्मण-बहुल मुहल्ले में बनाया। यहाँ सवाल उठता है कि जीवन-पर्यंत ब्राह्मणवाद से संघर्ष और दलितोद्धार के लिए समर्पित रहे अंबेडकर ने क्या सोच कर ये दोनों निर्णय लिए? उनके अपने निजी जीवन के इन दोनों फैसलों से दलित समुदाय या उनके पक्षधरों को क्या शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए?

निष्कर्षतः चूँकि भारतीय राजनीति आजादी के बाद अपने शुरुआती दौर से ही अनंत संभावनाओं तथा प्रभुवर्ग द्वारा सारी सुविधाओं और सुख के साधनों पर येन-केन-प्रकारेण कब्जा करने का खेल रही है; इसीलिए इसका चरित्र अभी भी वैसा ही बना हुआ है। इसी शक्ति-सम्पन्न वर्ग ने पहले से ही समाज को धर्म, संप्रदाय, जाति, बिरादरी आदि के विभिन्न खानों में विभाजित किया और अब तो अधिक छिन्न-भिन्न करने की ऐसी साजिश ‘सोशल इंजीनियरिंग’ जैसी संज्ञाओं द्वारा विभूषित की जाती है। इसके अलावा यह एक बड़ी विडंबना है कि उपभोक्तावाद ने वैश्विक स्तर पर जिस लूट-खसोट के महारोग को बहुत तीव्रता से बढ़ावा दिया, राजनीति उसका उपकरण बन कर शताब्दियों से ही शक्ति-सम्पन्न वर्ग द्वारा शोषित समाज का ही शोषण कर रही है।

इस भ्रष्ट इंडिया द्वारा फैलाये गये घटाटोप अंधकार से बाहर निकलने का समग्रता में एक उपाय ‘आजादी का दूसरा संघर्ष’ के तौर पर जेपी की समग्र क्रांति की तरह का एक सशक्त जनांदोलन हो सकता है, बशर्ते उसमें लालू, मुलायम, नीतीश जैसों की घुसपैठ को रोका जा सके।

श्यामसिंह रावत
वरिष्ठ पत्रकार
ssrawat.nt@gmail.com

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पत्रकारों को मिलता नहीं, तो रेलवे का प्रेस कोटा आखिर जाता कहां है?

रेलवे रिजर्वेशन में पत्रकारों को कोटा देती है, लेकिन ये कोटा कुछ ही पत्रकारों को मिल पाता है. जिस तरह अखबार मालिक और उनके चट्टे-बट्टे मैनेजर खुद को ‘संपादक’ या ‘रिपोर्टर’ बताकर ‘एक्रेडिटेशन कार्ड’ हथियाकर ‘सरकारी मान्यताप्राप्त पत्रकार’ बन जाते हैं और फिर सरकार की ओर से पत्रकारों को मिलने वाली मामूली से मामूली सुविधाएं भी हड़प लेते हैं, उसी तरह ये ‘तथाकथित पत्रकार’ रेलवे का रिजर्वेशन कोटा भी कब्जा लेते हैं. इसके अलावा कुछ ऐसे पत्रकार भी हैं, जो अपने लगे-सगे लोगों के लिए कोटा सुविधा का दुरुपयोग करते हैं. ऐसे में जो असली पत्रकार हैं और रेलवे कोटे जैसी सुविधाओं के असली हकदार हैं, वे बेचारे मुंह ताकते रह जाते हैं.

मुंबई में भी पिछले कई सालों से यही देखने को मिल रहा है. पता चला है कि अखबारों के दफ्तरों से रोज 2-4 सिफारिशी पत्र सेंट्रल और वेस्टर्न रेलवे के पीआरओ के पास पहुंचे रहते हैं. फोन और एसएमएस-व्हाट्सऐप की सिफारिशें अलग. अब ये पीआरओ उन्हीं लोगों की सिफारिश मंजूर करते हैं, जिन्हें वे ‘पहचानते’ हैं यानी वे मैनेजर या पत्रकार, जो उन्हें काम के लगते हैं, जो रोज उनके यहां उठते-बैठते हैं, दो-चार काम उनके भी करते हैं यानी रेलवे के खिलाफ न्यूज नहीं छापते और जैसी वे कहें, वैसी ‘पॉजिटिव’ न्यूज छापते हैं. पता चला है कि कई अखबारों के मैनेजर तो पीआरओ को यहां तक कह रखे हैं कि फलां-फलां के हस्ताक्षर से पत्र आए तो ही सिफारिश मंजूर करना, अन्यथा नहीं. अब ये जांच का विषय है कि क्या हर अखबार से 2-4-6 लोग रोजाना गांव आते-जाते हैं? हर अखबार भी नहीं कहना चाहिए, कुछ चुनिंदा अखबारों से? क्योंकि इन्हीं अखबारों से ज्यादातर सिफारिशें रोजाना पहुंची रहती हैं.

रेलवे विभाग को इस बात की जांच करनी चाहिए कि अखबारों की ओर से आने वाली सिफारिशें उसी अखबार में काम करने वाल जेनुइन पत्रकारों के लिए होती हैं या मैनेजरों के दोस्तों-रिश्तेदारों या फिर दोस्तों के दोस्तों के लिए? क्योंकि यह एक लूट है, जिसमें अखबार-मालिकों, मैनेजरों और रेलवे पीआरओ की मिलीभगत है? खबरें यहां तक हैं कि रेलवे के कुछ लोग और कुछ पत्रकार टिकट के दलालों से मिलकर कन्फर्म टिकट दिलाने के नाम पर इस सुविधा का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए करते हैं. इस तरह की खबरें सच हैं या नहीं, रेलवे को इसकी जांच करनी चाहिए. अगर इस सुविधा का इस्तेमाल जेनुइन पत्रकारों को ही न मिले और कुछ भ्रष्ट लोग इसकी आड़ में धंधा करें, तो इसका बंद हो जाना ही अच्छा है. अगर आरटीआई के माध्यम से जानकारी निकाली जाए कि किस अखबार की तरफ से पिछले 5 साल-10 साल में कितनी सिफारिशें आईं और कितनी मंजूर की गईं, उनके पीएनआर नंबर से पता किया जाए कि उस टिकट पर सफर करने वाला अखबार का कर्मचारी या उसके परिजन थे, या कोई और, तो मामले की पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी.

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यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

अगर आप भी बनारस जाएं तो ये बुजुर्ग लेकिन गरीब अखबार मालिक कोदई चौकी सड़क पर बैठे मिल जाएंगे. दहकता सूरज नामक अखबार का प्रेस कार्ड आप भी इन्हें पांच सौ या हजार रुपया देकर बनवा सकते हैं. इनके पास बाकायदे रसीद बुक होती है जिस पर वह एमाउंट चढ़ाते हैं और आपके पैसे के बदले आपको रसीद व प्रेस कार्ड देते हैं. मतलब कि काम बिलकुल ये पक्का वाला करते हैं. रास्ते से गुजरने वाले लोग रुक रुक कर इस दुकान को देखते हैं और कुछ लोग 500 से 1000 रुपया देकर प्रेस कार्ड बनवा लेते हैं तो कुछ लोग पत्रकारिता की हालत पर तरस खाते हुए बुजुर्ग शख्स को कोसते हुए आगे बढ़ लेते हैं.

ये बुजुर्ग अखबार मालिक न तो अपने किसी इंप्लाई का मजीठिया वेज बोर्ड वाला हक मारता है और न ही पेड न्यूज करता है, क्योंकि ये अपना अखबार अब छापता ही नहीं है. यह न तो झूठे प्रसार के आंकड़े बताता है और न ही सांठगांठ करके सरकारी विज्ञापन छापता है, क्योंकि ये अपना अखबार अब छापता ही नहीं है. यह तो बस दो चार प्रेस कार्ड बेचकर अपना व अपने परिवार का जीवन चला लेता है. बताइए, क्या यह आदमी पापी है या हम सब के पापों के आगे इसका पाप बहुत छोटा है?

वाराणसी से प्रहलाद मद्धेशिया की रिपोर्ट.

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PRESS से हो, तो क्या नियम-कानून तोड़ने का हक़ मिल गया तुम्हें?

Dinesh Dard : पलासिया से इंडस्ट्री हाऊस की ओर वाले पैदल पथ (फुटपाथ) पर यूँ तो अक्सर दुपहिया-चार पहिया वाहनों का दौड़ना चलता रहता है, जो नियम के ख़िलाफ़ है। मगर मान लो फुटपाथ खाली हो और आपका कहीं पहुँचना बहुत ही ज़रूरी हो, तो मजबूरी में उस पर से गुज़रना समझ में आता है। लेकिन उसमें भी एक अपराध बोध ज़रूर होना चाहिए कि उन्होंने पैदल यात्रियों का अधिकार छीना। मगर इनमें अपराध बोध तो दूर, इन्हें तो ये एहसास तक नहीं होता कि ये ग़लत कर रहे हैं।

पैदलपथ से दनदनाते हुए निकल जाना तो जैसे ये अपना अधिकार समझते हैं। उस पर बेशर्मी की हद ये, कि अगर कोई पैदल यात्री पैदलपथ पर चल रहा है, तो पीछे से हॉर्न बजा-बजाकर रास्ता देने को कहेंगे।

दुःख की बात तो ये है कि इन बेशर्मों में सबसे अव्वल तो वही युवा वर्ग है, जिनके दम पर हम फिर से विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं। अरे लानत है ऐसे बद्तमीज़ और पढ़े-लिखे अनपढ़ युवाओं पर, जो नियम-अनुशासन का पालन करना अपनी जवानी की तौहीन समझते हैं। यार विश्वगुरु के पथ पर बाद में क़दम बढ़ाना, पहले अपने शहर की सड़कों पर तो चलना सीख लो।

युवाओं के अलावा मैंने कई बार उन बेशर्मों की कारों को भी फुटपाथ से गुज़रते देखा है, जिनके काँच पर “+” (डॉक्टर) का निशान लगा होता है। एक बार मैंने रास्ता नहीं दिया, तो भीतर से ही दयनीय चेहरा बनाकर इशारा करने लगे कि, जैसे- “बस, यहीं तक जाना है।” आख़िर मुझे रास्ता देना ही पड़ा। और वो डॉक्टर अपने परिवार के साथ नियम-कानून का पोस्टमार्टम करता हुआ निकल गया।

इसी तरह नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों में शिक्षक वर्ग के तथाकथित अनपढ़ शिक्षक भी आते हों, तो कह नहीं सकता। क्योंकि इनके वाहनों पर तो डॉक्टर-वकील जैसा कोई निशान होता नहीं है, जो मैं पहचान जाऊँ।

ख़ैर, अब वो क़िस्सा बताता हूँ जिसकी वजह से आज मुझे इतना तल्ख़ लहजा अख्तियार करना पड़ा। दरअस्ल, आज फिर मेरा उसी फुटपाथ से गुज़रना हुआ। दोपहिया वाहन तो सड़क छोड़ मेरे अगल-बगल से गुज़र गए। मगर इस बार मेरे पीछे कार थी, जो हॉर्न दे-देकर चलना हराम किए दे रही थी। मैंने पलटकर देखा, तो ड्राईवर के बगल वाली सीट पर एक सांवली-सी मोटी औरत/लड़की बैठी थी। शायद वही पत्रकार हो। उसकी साइड वाली ही स्क्रीन पर लाल हर्फ़ों में लिक्खा था PRESS. अरे भई, PRESS वाले हो, तो क्या तुम्हें कानून-कायदा तोड़ने का लाइसेंस मिल गया ?

कार पर PRESS लिक्खा देखना था कि मेरा पारा चढ़ गया। आख़िर, मैं भी पत्रकारिता से जो तआल्लुक़ रखता हूँ। प्रेस का नुमाइंदा और इतना ग़ैरज़िम्मेदार। बस, यही सोचकर गुस्सा आ गया। मैंने सख़्त ऐतिराज़ जताते हुए उसकी ओर रुख़ किया। कार (MP09…..9767 पूरा नम्बर याद नहीं रहा) की खिड़की का शीश चढ़ा हुआ था। मैंने इशारे में ही उसको बताया कि “अक्कल के अंधे, सड़क के रास्ते जा ना। फुटपाथ पर क्या अंधे की तरह भटक रहा है।” बहरहाल, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या लाभ ? और यह सब ये लोग आगे इंडस्ट्री हाउस तिराहे पर “रेड सिग्नल” होने की वजह से करते हैं। ज़रा देर सिग्नल के ग्रीन होने का इंतेज़ार नहीं कर सकते।

ख़ैर, अब दिक्कत ये है कि पत्रकार जैसे ज़िम्मेदार लोग ही अगर ऐसी ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकत करेंगे, तो बाकी लोगों से उम्मीद ही क्या की जा सकती है ? मुझे तो लगता है कि ज़रूर ये कोई प्रेसनोटिया छाप और प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिफ़्ट के लिए लार टपकाने टाइप की पत्रकार रही/रहा होगी/होगा। चाहे जो भी हो, करते तो ये पत्रकार वर्ग की नुमाइंदगी ही है ना। समाज को आईना दिखाने वाला यही वर्ग अगर ऐसी गुस्ताख़ियाँ करेगा, तो ग़लत करने वाले दूसरे लोगों को किस मुँह से सच्चाई का पाठ पढ़ा सकेगा ? और मान लो, अगर तुम अव्वल दर्ज़े के बेशरम हो।

ख़ुद ग़लत होकर दूसरों को अनुशासित रहने का और सच्चाई का उपदेश (ज्ञान) दे रहे हो, तो अपनी आवाज़ में ईमानदारी वाला वज़न कहाँ से लाओगे ? वो वज़न तो तुमको तुम्हारी ईमानदारी और ज़मीर की ताक़त से ही मिलेगा, किसी ब्यूरोचीफ़ या संपादक की चरणवंदना करने से नहीं।

(बेजा लफ़्ज़ों के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ।)

इंदौर के युवा पत्रकार और गीतकार दिनेश दर्द के फेसबुक वॉल से.

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रस्साकसी मैच में पत्रकारों पर भारी पड़े प्रशासनिक अधिकारी

मऊ : स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों और पत्रकारों के बीच रस्साकसी प्रतियोगिता का आयोजन स्टेडियम में किया गया। 

दोपहर 12 बजे शुरू हुई प्रतियोगिता में दोनों टीमों के 15-15 खिलाड़ी मैदान में उतरे। सीटी बजते ही सभी ने दम भर जोर लगाया। पहले राउण्ड में ज्यादा दम दिखाते हुए पत्रकारों ने एक अंक हासिल किया। जबकि अगले दो राउण्ड में प्रशासनिक अधिकारी हावी रहे और उन्होंने 2-1 से मैच जीत लिया। प्रतियोगिता को लेकर सभी का उत्साह देखने लायक था।

हाकी कोच ओमेंद्र सिंह ने विजेता प्रशासनिक अधिकारियों की टीम के कप्तान जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव को विजेता ट्राफी प्रदान की। साथ ही उप विजेता पत्रकारों की टीम के कप्तान राहुल सिंह को उप विजेता ट्राफी प्रदान की।

प्रशासनिक अधिकारियों की टीम में जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव, पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार सिंह, अपर जिलाधिकारी समीर वर्मा, अपर पुलिस अधीक्षक सुनील कुमार सिंह, एसडीएम जगदम्बा सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट बसंत लाल साहू, सीओ सिटी अशोक कुमार यादव, डीआईओएस विनोद राय, बीएसए राकेश कुमार, ईओ विद्यासागर यादव, सूचना अधिकारी जितेंद्र सिंह आदि शामिल रहे।

पत्रकारों की टीम में नागेंद्र राय, राहुल सिंह, संतोष सिंह, अजय कुमार सिंह, आनन्द गुप्ता, दुर्गा किंकर सिंह, रंजीत राय, पुरुषार्थ सिंह, आनन्द मिश्रा, पुनीत श्रीवास्तव, अप्पू सिंह, मो. अशरफ, वीरेंद्र सरोज, अमित यादव, जाहिद इमाम, रविन्द्र सैनी, प्रवीण श्रीवास्तव आदि रहे।

साभार मऊ आजकल डॉट कॉम से

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कानपुर प्रेस क्लब पोलखोल : महामंत्री के बयान में सच को छिपाने की कोशिश

कानपुर प्रेस क्लब के वर्तमान स्वयंभू महामंत्री अवनीश दीक्षित ने अपने और अपने साथियों के अपराध को छिपाने के लिए कुछ ऐसे बयान दे दिए, जिन्होंने प्रेस क्लब की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए।  

दबंगई के बल पर कानपुर प्रेस क्लब पर फ़र्ज़ी प्रपत्रों और फ़र्ज़ी चुनाव के जरिये कब्ज़े की शिकायत कानपुर के अधिकारीयों के साथ प्रदेश के डीजीपी, मुख्यमंत्री और राजयपाल से की गई थी, लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। डिप्टी रजिस्ट्रार फर्म सोसायटीज एवं चिट्स ने जून में ही अवनीश दीक्षित को नोटिस जारी कर सुनवाई की डेट पर जवाब देने के लिए लिख दिया था, जिस पर विगत दो डेट में सुनवाई में दीक्षित ने अपना 25 बिन्दुओं पर जवाब प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने बचाव के लिए कुछ ऐसे बयान दिए, जिन्होंने कानपुर प्रेस क्लब की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं । 

दीक्षित ने अपने जवाब में कहा है कि कानपुर प्रेस का गठन एक निर्वाचन के बाद हुआ। उपनिबन्धक कार्यालय से प्राप्त नियमावली के अनुसार ही संस्था अपने दायित्व का निर्वाहन कर रही है। हम नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने किसी भी स्तर पर नियमों का उलंघन नहीं किया है। 12 दिसम्बर 2010 को भूपेन्द्र तिवारी की अध्यक्षता में आहूत विशेष बैठक का कोरम पूरा था तथा सभी फैसले न्याय संगत थे।  

जबकि 2013 में चुनाव कराये जाने व चुनाव अधिकारी की नियुक्ति का अधिकार संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति को ही पंजीकृत नियमावली के अनुसार था, क्योंकि वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति संस्था के नवीनीकरण के लिए संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति की जो सूचियां 2005 से 2013 तक की प्रस्तुत की गयी हैं, उन पर वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति के समस्त पदाधिकारियों/ सदस्यों ने अपने – अपने हस्ताक्षर कर 2013 तक उनकी वैधता को स्वयं प्रमाणित किया है। वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति द्वारा पंजीकृत नियमावली के बिन्दु 5 में सदस्यता की समाप्ति शीर्षक के अनुसार 2005 से 2013 तक की संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करने या पारित कराने का कोई प्रमाण नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष प्रस्तुत प्रपत्रों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि संस्था के सम्बन्ध में समस्त निर्णय लेने के अधिकार संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति के अलावा किसी को प्राप्त नहीं थे। 

2013 में चुनाव कराये जाने और चुनाव समिति, चुनाव अधिकारी व चुनाव समिति के सदस्यों के मनोनयन का निर्णय लेने के लिये वैध संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति के हस्ताक्षर चुनाव कार्यक्रम के निर्धारण की कार्यवाही के प्रपत्र पर न होने से यह स्वतः स्पष्ट है कि इस प्रपत्र में अंकित कार्यवाही का कोई निर्णय वैध नहीं है। इस प्रपत्र पर चुनाव अधिकारी के हस्ताक्षर न होने और वर्तमान महामंत्री और उनके सहयोगियों के ही हस्ताक्षर, प्रपत्र के कूटरचित होने और नवीनीकरण के लिये धोखाधड़ी के इरादे से हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ही बनाये जाने के हमारे सन्देह को बल प्रदान करते हैं। 

उप निबन्धक फर्म चिट्स एवं सोसायटीज के कार्यालय से प्राप्त प्रमाणित प्रतिलिपि की क्रमांक 5 पर संलग्न छायाप्रति का भी अवलोकन करने की कृपा करें। जिसमें स्क्रीनिंग कमेटी का कार्यवृत अंकित है, इस अभिलेख पर भी स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन एवं सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं हैं। प्रबन्धकारिणी समिति की वर्ष 2011-2012 व 2012-2013 की सूची पूर्व में संलग्नक क्रमांक 6 व 7 में अंकित प्रबन्धकारिणी संमिति के किसी भी पदाधिकारी और सदस्य के हस्ताक्षर भी नहीं है। इस अभिलेख में यह भी अंकित नहीं है कि स्क्रीनिंग कमेटी का गठन और इसके चेयरमैन एवं सदस्यों का मनोनयन कब किसके द्वारा किस तिथि को किया गया था ? उपरोक्त प्रपत्र पर किसी भी पदाधिकारी और सदस्य के हस्ताक्षर न होने तथा स्क्रीनिंग कमेटी के गठन की तिथि अंकित न होने से यह भी संदेह होता है कि यह अभिलेख भी कूट रचित है और धोखाधड़ी के इरादे से बनाया गया है। 

वर्तमान महामंत्री अवनीश दीक्षित का उपरोक्त अंकित स्पष्टीकरण भी कई कारणों से असत्य और भ्रामक होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। 2013 में पंजीकृत नियमावली के बिन्दु संख्या 9 में प्रबन्धकारिणी समिति के पदाधिकारियों का अधिकार व कर्तव्य शीर्षक में अंकित अध्यक्ष के अधिकार के अनुसार उप समितियों के गठन का अधिकार तत्कालीन अध्यक्ष के पास था। नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति की जो सूचियाॅ 2005 से 2013 तक की प्रस्तुत की गयी है उन पर वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति के समस्त पदाधिकारियों/सदस्यों ने अपने – अपने हस्ताक्षर कर 2013 तक उनकी वैधता को स्वयं स्वीकार व प्रमाणित किया है। वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति द्वारा पंजीकृत नियमावली के बिन्दु 5 में सदस्यता की समाप्ति शीर्षक के अनुसार 2012 के अध्यक्ष श्री अनूप बाजपेई के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करने या पारित कराने का कोई प्रमाण नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष प्रस्तुत प्रपत्रों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि स्क्रीनिंग कमेटी नामक उप समिति के गठन और उसके चेयरमैन तथा सदस्यों के मनोनयन का निर्णय लेने का अधिकार केवल तत्कालीन अध्यक्ष के अलावा किसी को भी प्राप्त नहीं था। 

स्क्रीनिंग कमेटी नामक उपसमिति के गठन की कार्यवाही 2012 के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अनूप बाजपेई द्वारा किये जाने का कोई भी प्रपत्र नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष प्रस्तुत प्रपत्रों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि सक्षम अधिकारी द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी का न तो गठन किया था और कमेटी के चेयरमैन और सदस्यों का मनोनयन भी नहीं किया था। महामंत्री ने अपने स्पष्टीकरण के बिन्दु 7 में यह अंकित कर कि जनपद के सभी पत्रकारों ने विधान को ठेंगा दिखाते हुए सभी नियमों के प्रतिकूल पदों पर बने रहने व चुनाव न कराने की धाॅधली से आजिज आकर ही स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया था। वर्तमान महामंत्री अवनीश दीक्षित ने उपरोक्त सत्य को स्वयं स्वीकार भी किया है। वर्तमान महामंत्री ने अपने उपरोक्त कथन को प्रमाणित करने के लिए जनपद के पत्रकारों द्वारा भी स्क्रीनिंग कमेटी के गठन की कार्यवाही का कोई भी प्रपत्र नवीनीकरण के समय आपके समक्ष प्रस्तुत न करने के कारण स्क्रीनिंग कमेटी का गठन, महामंत्री की कल्पना मात्र ही प्रतीत होता है। 

उपरोक्त बिन्दु में अंकित तथ्यों से यह स्पष्ट हो चुका है कि सक्षम अधिकारी और तत्कालीन अध्यक्ष अध्यक्ष श्री अनूप बाजपेयी द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी का गठन नहीं किया गया है और जनपद के पत्रकारों द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी के गठन का कोई प्रमाण अब तक वर्तमान महामंत्री द्वारा प्रस्तुत नहीं करने के कारण यह भी स्पष्ट हो चुका है कि स्क्रीनिंग कमेटी का गठन महामंत्री की कल्पना मात्र ही है। यह प्रश्न फिर भी बना हुआ है कि स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन श्री अंशुमान तिवारी ने दिनांक 19.10.2012 को प्रेस क्लब में कार्यवृत्त जारी करने हेतु क्या वास्तव में कोई बैठक की थी ? और स्क्रीनिंग कमेटी ने कोई कार्यवृत्त भी क्या वास्तव मे ही जारी किया था ? कार्यवृत्त पर श्री अंशुमान तिवारी के ही हस्ताक्षर न होने और वर्तमान कार्यकारिणी के पदाधिकारियों और सदस्यों के ही हस्ताक्षर होने से इस प्रपत्र को नवीनीकरण के लिये धोखाधड़ी के इरादे से हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ही बनाये जाने के हमारे सन्देह को बल मिलता हैं। 

उपरोक्त बिन्दु में अंकित तथ्यों से यह स्पष्ट हो चुका है कि स्क्रीनिंग कमेटी का गठन वर्तमान महामंत्री अवनीश दीक्षित की मात्र कल्पना ही है। यह प्रश्न तो अब भी बना हुआ है कि स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन श्री अंशुमान तिवारी ने दिनांक 19.10.2012 को प्रेस क्लब में कार्यवृत्त में स्मृति पत्र के बिन्दु 4 में अंकित उद्देश्यों को किस आधार पर अतिकृमित कर ? किसके आदेश ? और किस अधिकार से केवल 3 वर्ष पूर्व पंजीकृत दैनिक समाचार पत्रों के वेतन भोगी पत्रकारों को ही सदस्यता प्रदान करने का निर्णय लिया ? उपरोक्त के सम्बन्ध वर्तमान महामंत्री के बिन्दु दो में अंकित स्पष्टीकरण में कुछ भी नहीं है। कार्यवृत्त पर श्री अंशुमान तिवारी के ही हस्ताक्षर न होने और वर्तमान कार्यकारिणी के पदाधिकारियों और सदस्यों के ही हस्ताक्षर होने से इस प्रपत्र को भी नवीनीकरण के लिये धोखाधड़ी के इरादे से हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ही बनाये जाने के हमारे सन्देह को बल मिलता है। 

वर्तमान महामंत्री का कहना है कि उनके द्वारा क्रमांक 8 में समविष्ट स्मृति पत्र के किसी भी तथ्य को अतिक्रमित नहीं किया गया है। वर्तमान कार्यकारिणी पत्रकारों के हर दुःख सुख में सदैव सहभागी है। संस्था के महामंत्री व अन्य पदाधिकारी कानून व समाज का हमेशा ध्यान और सम्मान रखते हैं। कभी भी कोई फरेब, हिंसा व कूट रचना जैसा अमानवीय कृत्य कारित नहीं किया है। दीक्षित ने स्पष्टीकरण के बिन्दु संख्या 4 में अंकित कथन में स्मृति पत्र के बिन्दु संख्या 4 में अंकित उद्देश्यों को उनकी काल्पनिक स्क्रीनिंग कमेटी के स्वहस्ताक्षरित कार्यवृत्त दिनांक: 19.10.2012 में अतिक्रमित करने के कारणों का कोई युक्ति युक्त स्पष्टीकरण अंकित नहीं किया है। वर्तमान महामंत्री का बिन्दु संख्या 4 में अंकित कथन भ्रामक होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। 

एसआर न्यूज़ से साभार

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कारपोरेट मीडिया घरानों के दबाव में तीसरे प्रेस आयोग के गठन पर सरकार चुप

एक बार फिर तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग उठी है। कहा जा रहा है कि मीडिया के बदलते चरित्र को देखते हुए तीसरे प्रेस आयोग का गठन किया जाए। इससे पहले भी कई मौकों पर तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग की जा चुकी है, पर सरकार ने कभी उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सरकार की इस चुप्पी पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। कहा जा रहा है कि क्या मीडिया घरानों के दबाव ने सरकार को चुप रहने के लिए विवश किया।

2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान पेड न्यूज का मसला जोर-शोर से उठा था। इसी दौरान मीडिया के मालिकाना हक, मीडिया में एकाधिकारी प्रवृत्ति, मीडिया का मुनाफा आदि का मामला भी उठा। मीडिया में कॉरपोरेट निवेश, कॉरपोरेट हिस्सेदारी, मीडिया घरानों का मुनाफा, इनके सामाजिक दायित्व आदि को लेकर सवाल उठाए गए। चूंकि पश्चिम के देशों में ये सवाल बहुत पहले उठे थे, बहसें हुर्इं और वहां की सरकारें इस पर कानून बना चुकी हैं, इसलिए भारत में समय के साथ यह सवाल उठना स्वाभाविक था।

भारत में मीडिया का कारोबार कई हजार करोड़ रुपए का हो चुका है। चूंकि अब सवाल सिर्फ पेड न्यूज तक सीमित नहीं है, इसलिए तीसरे प्रेस आयोग की मांग हो रही है। पेड न्यूज, मीडिया घरानों के अन्य कारोबार, पत्रकारों की स्थिति पर संसदीय समिति भी अध्ययन कर चुकी है। रक्षा राज्यमंत्री राव इंद्रजीत के नेतृत्व वाली संसदीय समिति ने इस संबंध में अपनी विस्तृत रिपोर्ट मई, 2013 में दे दी थी। पर उस रिपोर्ट की सिफारिशों को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। ट्राई यानी भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने भी अगस्त, 2014 में मीडिया स्वामित्व, कारोबार और मुनाफे आदि को लेकर तीन अध्ययन रिपोर्टें और विस्तृत सिफारिश पेश की थी। लेकिन उस रिपोर्ट पर भी सरकार ने आज तक कोई कदम नहीं उठाया है।

तीसरे प्रेस आयोग के गठन को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को प्रस्ताव भेजा गया था। तब उनके मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने इस पर ठोस कार्रवाई का आश्वासन दिया था। मगर बाद में सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं किया। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने तीसरे प्रेस आयोग के गठन के लिए खुद मनमोहन सिंह को एक ज्ञापन दिया था। लेकिन तब भी उन्होंने आश्वासन देने के बाद चुप्पी साध ली थी।

मीडिया में विशुद्ध मुनाफा और व्यापार का खेल 1990 के आसपास खुल कर शुरू हुआ। इसका एक बुरा परिणाम पेड न्यूज के रूप में सामने आया। मीडिया घरानों ने व्यापारिक लाभ के चक्कर में सिर्फ पेड न्यूज का खेल नहीं किया, बल्कि प्रिंटिंग, टेक्सटाइल्स, तेल, होटल, रियल एस्टेट और बिजली उत्पादन में निवेश भी किया। कुछ मीडिया घराने फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ एयरलाइन के क्षेत्र में भी चले गए। आज मीडिया कंपनियों का होटल, सीमेंट, शिक्षा, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, क्रिकेट, सूचना तकनीक और रियल एस्टेट में भारी निवेश है।

यही नहीं, मीडिया घरानों पर आर्थिक अपराधों के आरोप ने मीडिया की साख पर बट्टा लगाया है। मीडिया घरानों पर लगे आर्थिक अपराधों के आरोप के बाद मीडिया की सिर्फ सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, इनके आर्थिक मुनाफे को भी परिभाषित करने की मांग की जाने लगी है। इसे रोकने के लिए नए कानून बनाने की मांग उठ रही है।

तीसरा प्रेस आयोग क्यों चाहिए? इसके ठोस कारण हैं। आबादी के हिसाब से भी 1947 और अब की स्थितियों में काफी अंतर है। 1947 में भारत की आबादी साढ़े चौंतीस करोड़ थी, आज सवा करोड़ तक पहुंच गई है। 1947 में देश में अठारह प्रतिशत लोग साक्षर थे, आज साक्षरता की दर पचहत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई है। 1947 में देश में कुल दो सौ चौदह अखबार छपते थे। इसमें चौवालीस अंगरेजी के अखबार थे, वर्तमान में सत्तर हजार अखबार छप रहे हैं। अब पाठक संख्या के प्रामाणिक आंकड़े हैं, जबकि 1947 में इसके आंकड़े तक उपलब्ध नहीं थे। इस समय पूरे देश में चौंतीस करोड़ लोग अखबारों के पाठक हैं। 1947 में पूरे देश में छह रेडियो स्टेशन थे, आज छह सौ रेडियो स्टेशन हैं। दूरसंचार क्रांति ने मीडिया का रूप बदला और आज भारत में सैकड़ों टीवी चैनल चल रहे हैं। 1947 में देश में कोई टीवी चैनल नहीं था, आज करीब साढ़े आठ सौ टीवी चैनलों को लाइसेंस प्राप्त है। इन टीवी चैनलों की पहुंच सत्तर करोड़ लोगों तक है।

इस समय देश में जिन टीवी चैनलों को लाइसेंस प्राप्त है, उनमें से करीब साढ़े छह सौ चैनल चालू स्थिति में हैं। इनमें से करीब साढ़े तीन सौ टीवी चैनलों पर समाचार प्रसारित होते हैं। इन बदलती परिस्थितियों में मीडिया में एकाधिकारी प्रवृत्ति देश के हित में नहीं कही जा सकती। आज ऐसी कई कंपनियां हैं, जिनके पास टेलीविजन नेटवर्क है, उन्हीं के पास प्रिंट का मालिकाना हक भी है, उनके पास एफएम रेडियो भी है।

इसे रोकने के लिए कोई नियम नहीं है। इसमें किसका पैसा लगा है, उसकी पूरी जानकारी न तो जनता के पास है, न ही सरकार के। यह गोपनीयता इस हद तक है कि आपको यह नहीं पता चलता कि आप जो अखबार पढ़ या जो चैनल देख रहे हैं, उसमें कहीं अपराध जगत का पैसा तो नहीं लगा है? मीडिया का मुनाफा, उसका एकाधिकार, पेड न्यूज एक ज्वलंत विषय है। इनकी परिभाषा निर्धारित करना और इसके लिए नए कानून बनाना समय की मांग है। इसलिए तीसरे प्रेस आयोग का गठन जरूरी है।

‘जनसत्ता’ से साभार

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मारे जा रहे पत्रकारों की हृदयविदारक खबरों के बीच मीडिया और सत्ता के अश्लील लेन-देन

जब-जब इस देश में चुनाव का मौसम आता है निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाते नोएडा में तमाम नए समाचार चैनल कुकरमुत्ते की तरह पनपने लगते हैं. इन चैनलों का एकमात्र उद्देश्य चुनाव के समय पैसा बटोर कर बंद हो जाना होता है।

फरवरी-2015 की गुनगुनी धूप और निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाता नोएडा का सेक्टर-63… दिन के बारह बज रहे हैं और एक बेरोजगार पत्रकार तिपहिया ऑटो से एक पता खोज रहा है. उसने सुना है कि यहां कोई नया समाचार चैनल खुलने वाला है. किसी माध्यम से उसे यहां मालिक से मिलने के लिए भेजा गया है. कांच के इस जंगल में करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद उसे वह इमारत मिल जाती है. हर इमारत की तरह यहां भी एक गार्ड रूम है. रजिस्टर में एंट्री करने के बाद उसे भीतर जाने दिया जाता है. प्रवेश द्वार एक विशाल हॉल में खुलता है, जहां लकड़ी रेतने और वेल्डिंग की आवाज़ें आ रही हैं. एक खूबसूरत-सी लड़की उसे लेने आती है. ‘आप थोड़ी देर बैठिए, सर अभी मीटिंग में हैं’, उसे बताया जाता है. वह ऐसे वाक्यों का अभ्यस्त हो चुका है.

करीब आधे घंटे बाद लड़की उसे एक कमरे में लेकर जाती है. सामने की कुर्सी में बिखरे बालों वाला अधेड़ उम्र का एक वजनी शख्स धंसा हुआ है. ‘आइए… वेलकम… मौर्या ने मुझे बताया था आपके बारे में.’ बातचीत कुछ यूं शुरू होती है, ‘आप तो जानते ही हैं, हम लोग उत्तरी बिहार के एक खानदानी परिवार से आते हैं. अब बिहार से दिल्ली आए हैं तो कुछ तोड़-फोड़ कर के ही जाएंगे, क्यों?’ पत्रकार लगातार गर्दन हिलाता रहता है. हर दो वाक्य के बाद बगल में रखे डस्टबिन में वह शख्स पान की पीक थूकता है. ‘हम सच्चाई की पत्रकारिता करने वाले लोग हैं. हमें खरा आदमी चाहिए, बिलकुल आपकी तरह. बस इस महीने रुक जाइए, रेनोवेशन का काम पूरा हो जाए, फिर आपकी सेवाएं लेते हैं.’ पत्रकार आश्वस्त होकर निकल लेता है. उसके भरोसे की एक वजह है. चैनल का मालिक बिहार में एक जमाने के मकबूल कवि कलक्टर सिंह केसरी का पौत्र है. केसरी हिंदी की कविता में नकेनवाद के तीन प्रवर्तकों में एक थे. उसे लगता है कि हो न हो, आदमी साहित्यिक पृष्ठभूमि का है तो गंभीर ही होगा.

छह महीने बीत चुके हैं और उसके पास कोई फोन नहीं आया. उसे वहां भेजने वाले मौर्या ने पूछने पर बताया कि ‘न्यूज सेंट्रल’ नाम का यह चैनल खुलने से पहले ही बंद हो गया क्योंकि फंडर ने हाथ खींच लिया. दो महीने बाद बिहार विधानसभा के चुनाव हैं और ‘सच्चाई की पत्रकारिता’ करने वाले केसरी जी के पोते किसी नए जुगाड़ में हैं. जब-जब इस देश में कोई चुनाव आया है, यह कहानी हर बार तमाम लोगों के साथ दुहराई गई है,  दिल्ली में बीते साल 19 फरवरी से ‘डी6 टीवी’ की शुरुआत हुई थी. करीब छब्बीस लोगों के साथ शुरू हुए इस चैनल के बारे में अफवाह थी कि चैनल में कांग्रेसी नेता कपिल सब्बल का पैसा लगा है. चैनल से जुड़ने वाले पत्रकारों से कहा गया कि यह एक वेब चैनल है, आगे चलकर इसे सैटेलाइट करने की योजना है. उस दौरान यह चैनल सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए खोला गया था. यह बात कई कर्मचारी बखूबी जानते थे. चैनल के मालिक अशोक सहगल ने कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए. चुनाव के बाद मालिक ने बिना किसी पूर्व सूचना के 14 कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया. आज चैनल बंद पड़ा है और दर्जनों कर्मचारी सड़क पर हैं.

चुनावों और चैनलों का रिश्ता इस देश में उतना ही पुराना है जितनी टीवी चैनलों की उम्र है, लेकिन समय के साथ यह रिश्ता व्यावसायिक होता गया है जो आज की तारीख में विशुद्ध लेनदेन का गंदा धंधा बन चुका है. हर चुनावी चैनल के खुलने और बंद होने की पद्धति एक ही होती है. मसलन, किसी छोटे/मझोले कारोबारी को अचानक कोई छोटा/मझोला पत्रकार मिल जाता है जो उसे चैनल खोलने को प्रेरित करता है. उसे दो लोभ दिए जाते हैं. पहला, कि चुनावी मौसम में नेताओं के विज्ञापन व प्रचार से कमाई होगी. दूसरा, राजनीतिक रसूख के चलते उसके गलत धंधों पर एक परदा पड़ जाएगा. एक क्षेत्रीय चैनल खोलने के लिए दस करोड़ की राशि पर्याप्त होती है जबकि चिटफंड, रियल एस्टेट, डेयरी, खदान और ऐसे ही धंधे चलाने वाले कारोबारियों के लिए यह रकम मामूली है. शुरुआत में किराये पर एक इमारत ली जाती है और उपकरणों की खरीद की जाती है. अधिकतर मामलों में आप पाएंगे कि उपकरणों को खरीदने के लिए जिन व्यक्तिों या एजेंसियों की मदद ली जाती है, वे आपस में जुड़े होते हैं या एक होते हैं. आर्यन टीवी, मौर्या टीवी, कशिश टीवी, समाचार प्लस, बंसल न्यूज, खबर भारती, न्यूज एक्सप्रेस, महुआ न्यूजलाइन, आदि में मशीनरी के शुरुआती ठेकेदार एक ही थे. यह पैसा बनाने का पहला पड़ाव होता है. मसलन, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर इन्हीं तीन राज्यों में प्रसारण के लिए 2011 में एक चिटफंड समूह द्वारा खोले गए चैनल ‘खबर भारती’ में शुरुआत में विदेश से जो कंप्यूटर आए, वे होम पीसी थे. बाद में इन्हें लौटाया गया और इससे पैसा बनाया गया. इसी तरह विजुअल देखने के लिए पीआरएक्स नाम का जो सॉफ्टवेयर खरीदा गया, वह महीने भर बाद ट्रायल संस्करण निकला.

उपकरण खरीद के बाद संपादक मनचाहे वेतनों पर मनचाही भर्तियां करता है. फिर आती है लाइसेंस की बारी. कुछ चैनल लाइसेंस के लिए आवेदन कर देते हैं तो कुछ दूसरे चैनल या तो किराये पर लाइसेंस ले लेते हैं या खुले बाजार से कई गुना दाम पर खरीद लेते हैं. जैसे, ‘न्यूज एक्सप्रेस’ ने खुले बाजार से काफी महंगा लाइसेंस खरीदा था जबकि कुछ दूसरे छोटे चैनल ‘साधना’ से किराये पर लाइसेंस लेकर प्रसारण कर रहे थे. लाइसेंस किराये पर देने का भी एक फलता-फूलता धंधा चल निकला है. नोएडा से खुलने वाला हर नया समाचार चैनल ‘साधना’ के लाइसेंस पर चलता सुना जाता है. बहरहाल, पैसे कमाने का अगला पड़ाव चैनल का वितरण होता है. यह सबसे महंगा काम है. अधिकतर चैनल इसी के चलते मात खा जाते हैं. इन तमाम इंतजामों के बाद किसी भी नए चैनल को ऑन एयर करवाने में अधिकतम दो से तीन माह लगते हैं, जब पेड न्यूज का असली खेल शुरू होता है.

आजकल प्रायोजित खबरों यानी पेड न्यूज की कई श्रेणियां आ गई हैं- प्री-पेड न्यूज, पोस्ट-पेड न्यूज और हिसाब बराबर होने के बाद टॉप-अप. जितना पैसा, उतनी खबर. जितनी खबर, उतना पैसा. छत्तीसगढ़ में आज से तीन साल पहले सरकारी जनसंपर्क विभाग द्वारा ऐसे घालमेल का पर्दाफाश हुआ था, जिसके बाद पिछले साल जनवरी में राज्य के महालेखा परीक्षक (एजी) ने राज्य सरकार को टीवी विज्ञापनों के माध्यम से उसके प्रचार पर 90 करोड़ के ‘अनावश्यक और अतार्किक’ खर्च के लिए झाड़ लगाई थी. एक जांच रिपोर्ट में एजी ने कहा था कि समाचार चैनलों को जो भुगतान किए गए, वे कवरेज की जरूरत के आकलन के बगैर किए गए थे और कुछ मामलों में तो इनके लिए बजटीय प्रावधान ही नहीं था. केवल कल्पना की जा सकती है कि अगर एक राज्य एक वित्त वर्ष में 90 करोड़ की धनराशि चैनलों पर अपने प्रचार पर खर्च कर सकता है, तो किसी भी कारोबारी को इसका एक छोटा सा अंश हासिल करने में क्या गुरेज होगा. चुनावों के बाद बेशक कमाई के न तो साधन रह जाते हैं, न ही चैनल को जारी रखने की कोई प्रेरणा. एक दिन अचानक चैनल पर ताला लगा दिया जाता है और सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर आ जाते हैं.

जाहिर है, इसका असर खबरों पर तो पड़ता ही है क्योंकि ऐसे चैनल खबर दिखाने के लिए नहीं, बल्कि विशुद्ध कमाई के लिए खोले जाते हैं. झारखंड में पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान रांची में चुनाव आयोग ने वहां के एक समाचार चैनल ‘न्यूज 11’ के खिलाफ गलत खबर के प्रसारण पर एक मामला दायर किया था. चुनाव आयोग ने खबर को आचार संहिता के खिलाफ और बदनीयती माना था. इस चैनल ने मतदान के एक दिन पहले यह खबर चला दी थी कि सदर विधानसभा सीट पर भाजपा को टक्कर कांग्रेस नहीं, निर्दलीय प्रत्याशी दे रहा है. काफी देर तक चली इस खबर का असर मतदान पर पड़ा और नतीजतन अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रेस से हटकर निर्दलीय प्रत्याशी की ओर हो गया.

समाचार चैनलों को टिकाए रखना कितना घाटे का सौदा है, यह हाल में बंद हुए या संकटग्रस्त कुछ चैनलों की हालत से समझा जा सकता है. चिटफंड समूह पर्ल ग्रुप द्वारा संचालित ‘पी7’ के मामले को देखें तो कह सकते हैं कि देश के इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी चैनल पर कर्मचारियों ने कब्जा कर लिया और परदे पर यह सूचना चला दी, ‘सैलरी विवाद के कारण पी7 न्यूज हुआ बंद.’ इसी तरह ‘टीवी-9’ के एक एंकर ने बुलेटिन के बीच में ही वेतन भुगतान का मामला उठा दिया था और चैनल की स्थिति का पर्दाफाश कर दिया था. सहारा समूह का ताजा मामला हमारे सामने है जहां हजारों कर्मचारियों की आजीविका दांव पर लगी हुई है. नोएडा के श्रम आयुक्त के सामने एक माह का वेतन देने संबंधी हुए समझौते के बावजूद उसका पालन नहीं किया गया है जबकि वेतन छह माह का बाकी है. मीडिया के बड़े-बड़े नामों को अपने साथ जोड़ने वाले न्यूज एक्सप्रेस, भास्कर न्यूज, जिया न्यूज और सीएनईबी बंद पड़े हैं. एक और चिटफंड समूह का चैनल ‘लाइव इंडिया’ बंदी के कगार पर है, उसके बावजूद उसने अपने अखबार और पत्रिका को रीलॉन्च करने के लिए लोगों को टिकाए रखा है जबकि रीलॉन्च के लिए मुकर्रर तीन तारीखें गुजर चुकी हैं. कुख्यात दलाली कांड के बाद खुला नवीन जिंदल का ‘फोकस न्यूज’ बंद होने के कगार पर है जबकि ‘इंडिया न्यूज’ के क्षेत्रीय चैनल वितरण की मार से जूझ रहे हैं और प्रसारण के क्षेत्रों में ही वे नहीं दिखते. घिसट रहे चैनलों में एक तरफ हजारों मीडियाकर्मी हैं जिनके सिर पर लगातार छंटनी और बंदी की तलवार लटकी है, तो दूसरी ओर बंद हो चुके चैनलों से खाली हुए तमाम पत्रकार हैं जो ऐसी ही किसी जुगत में फंडर या नए बरसाती मेंढकों की तलाश कर रहे हैं.

समाचार चैनलों की बदनाम हो चुकी दुनिया इसके बावजूद थकी नहीं है. उत्तर प्रदेश के चुनावों के ठीक बाद नोएडा फिल्म सिटी में ‘महुआ’ के चैनल ‘न्यूजलाइन’ में पत्रकारों की सबसे पहली सफल हड़ताल हुई थी. इस बारिश में वहां से एक नया कुकुरमुत्ता उग रहा है. तीन साल के दौरान तीन चिटफंडिया चैनलों में भ्रष्ट मालिकों के संसर्ग का तजुर्बा ले चुके एक मझोले कद के पत्रकार कहते हैं, ‘छह महीने का टारगेट रखा है मैंने… एक लाख का प्रस्ताव दे दिया है. मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो अपना क्या जाता है.’ इस चैनल की कमान एक पिटे हुए पत्रकार के हाथ में है जो सहारा से लेकर अरिंदम चौधरी के प्लानमैन मीडिया तक घाट-घाट का पानी पी चुके हैं. इस दौरान ‘न्यूज सेंट्रल’ से निकलने के बाद मौर्या नाम का शख्स एक नए ‘प्रोजेक्ट’ पर काम कर रहा है- नाम है ‘ग्रीन टीवी.’ वह कहता है, ‘क्या करें भाई साहब… कुछ तो करना ही है.’

बिहार चुनाव तो सिर पर है, लेकिन बंगाल और उत्तर प्रदेश के चुनाव में अभी काफी वक्त बाकी है. वहां भी नए ‘प्रोजेक्ट’ की तलाश में पुराने पत्रकार नए मालिकों को बेसब्री से तलाश रहे हैं. यहां चुनावी चैनलों की आहट तो फिलहाल नहीं सुनाई दे रही है, लेकिन पर्ल समूह की पत्रिका ‘शुक्रवार’ को लखनऊ में नया मालिक मिल चुका है और राज्य सरकार की छत्रछाया में ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ का प्रकाशन शुरू हो चुका है जिसके पहले अंक में मुलायम सिंह यादव को भारत का फिदेल कास्त्रो बताया गया है. हर दिन यहां मारे और जलाए जाते पत्रकारों की हृदयविदारक खबरों के बीच मीडिया और सत्ता की अश्लील लेन-देन मुसलसल जारी है. आकाश में टकटकी लगाए टिटिहरी पत्रकारों को बस चुनावी बूंदें टपकने का इंतजार है.

अभिषेक श्रीवास्तव के एफबी वाल से

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पत्रकारों के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में जाने पर पाबंदी

नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से पत्रकारों को रक्षा, गृह, विदेश, वित्त मंत्रालय के बाद अब संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय इलेक्ट्रॉनिक्स निकेतन में भी जाने पर मौखिक आदेश के जरिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। पत्र सूचना कार्यालय भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों को भी इन मंत्रालयों में जाने पर सुरक्षाकर्मी तभी अंदर जाने देते हैं जब अधिकारी चाहें।

पत्र सूचना कार्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों को गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा जांच के बाद कार्ड इस उद्देश्य से जारी किए जाते हैं कि पत्रकार सूचना एकत्र करने के लिए विभिन्न मंत्रालयों में बिना रोक-टोक जा सकें। लेकिन बीते कुछ महीनों में कई मंत्रालयों से जब सरकार के खिलाफ खबरें मीडिया में आने लगी तो मौखिक तौर पर सुरक्षाकर्मियों को निर्देश ‌दे दिया गया कि किसी भी पत्रकार को सीधे मंत्रालय में अंदर नहीं जाने दिया जाए।

सुरक्षा से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक पहले हम मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सीधे जाने देते थे। लेकिन अब हमें मौखिक तौर पर निर्देश दिया गया है कि किस अधिकारी के पास जाना है उससे बात करने के बाद ही अंदर जाने दिया जाए। साथ ही इस बात के भी निर्देश दिए गए हैं कि जिस अधिकारी से बात हुई है उसके अलावा किसी अन्य अधिकारी से मिलने की अनुमति नहीं है।

सूत्रों के मुताबिक संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में भी सरकार से जुड़ी कई जानकारियां रहती हैं। ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि इस मंत्रालय में कोई पत्रकार बिना अनुमति के घुसने पाए। अगर अनुमति मिलती है और किसी प्रकार की सूचना लीक होती है तो उसके लिए संबंधित अधिकारी जिम्मेवार होंगे।

आउटलुक से साभार

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…. क्योंकि उसका प्रेस, सरकार, पैसा, ज़मीन, कारख़ाने और कोर्ट पर क़ब्ज़ा

देखो भई तुम उसे फाँसी देना चाहते थे, ३० को ही सुबह सुबह देना चाहते थे तुमने दे दी । जो रोकना चाहते थे वे हार गये तुम जीत गये ।

कांग्रेस वाले भी एक कश्मीरी को ऐसे ही फाँसी पर लटकाने में “जीत” चुके हैं । दोनों पार्टियों ने “देशभक्ति” साबित की और दोनों ने देश के कुछ सिरफिरों, बेवक़ूफ़ों , देशद्रोहियों की बात नहीं सुनी । कोर्ट ने भी नहीं सुनी, राष्ट्रपति जी ने भी नहीं सुनी । देश बच गया ! ऊपर वाले का लाख लाख शुक्र , वरना …….मुझे नहीं मालूम क्या हो जाता ?

अब ! 

क्या सीमा पर सीजफायर नहीं टूटेगा ? हमारे संतरी स्निपर के शिकार नहीं होंगे ? घुसपैठ बन्द हो जायेगी ? पाकिस्तानी और ISIS के झंडे कश्मीर में नहीं फहरेंगे ? फिर गुरुदासपुर /बंबई नहीं होगा ? या इनमें से एकाध भी कम हो जायेगा ?

या अनपढ़ अधपढ़ हिन्दू नौजवान FB/Twitter पर अपनी जीत की ग़लतफ़हमी में और भड़काऊ पोस्ट्स डालेगा ? हिन्दुओं एक हो पे और तेज़ी से जुटेगा ? प्रशान्त भूषण / रवीश जैसों को निबट लेने/ निबटा देने के आह्वान तेज़ करेगा ?

मुस्लिम धर्मांन्ध नौजवान और बेचैन नहीं होगा?हिन्दुओं और हिन्दुस्तान से और नफ़रत नहीं पालेगा ?अपने आप और अपने मज़हब के दायरे में घेरा और तंग नहीं कर लेगा ? अपने ही देश से और बेगाना नहीं हो जायेगा ?

समाज का एक हिस्सा/वर्ग अभी जश्न के मूड में है । वह समझता है कि उसकी कुटिलता कुटिलता न होकर उसकी योग्यता है । उसका प्रेस, सरकार, पैसा, ज़मीन, कारख़ाने और कोर्ट पर क़ब्ज़ा है । वह दलितों के नरसंहार के मामलों से बरी हो जाता है । आदिवासियों की हिंसक बेदख़ली पर भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता । सांप्रदायिक दंगों में रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी वह आज़ाद है ।

वह जीतता जा रहा है और जीत उसकी आदत बन चुकी है , उसे भ्रम नहीं यक़ीन है कि वह कभी हार नहीं सकता । वह जीत के लिये ही बना है । उसे अपने डी एन ए पर पक्का भरोसा है !

आप क्या समझते हैं ? उसकी जीत शाश्वत है ?

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह के एफबी वाल से

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अमौसी एयरपोर्ट के सीसीटीवी फुटेज में दिखने के बाद कहां गायब हो गया जाकिर

लखनऊ : रिहाई मंच ने आजमगढ़ के ग्राम मोमारिजपुर निवासी मोहम्मद जाकिर के पिछले 13 जून से अमौसी एयरपोर्ट लखनऊ से गायब होने पर अब तक पुलिस द्वारा उन्हें ढूढंने में नाकाम होने को सूबे में ध्वस्त कानून व्यवस्था का नजीर बताया है। 

रिहाई मंच कार्यालय पर हुई पत्रकार वार्ता में जाकिर के भाई मोहम्मद शाहिद ने कहा कि एक महीने से लगातार अमौसी एयरपोर्ट, थाना सरोजिनीनगर व शासन-प्रशासन के तमाम अधिकारियों का चक्कर लगाने के बावजूद उनके भाई का अब तक न पता चलने से पूरा परिवार सकते में है। जाकिर के भाई मोहम्मद शाहिद ने पत्रकार वार्ता में बताया कि 6 जुलाई को अमौसी एयरपोर्ट के अधिकारियों ने पुलिस की मौजूदगी में उन्हें 13 जून का जो सीसीटीवी फुटेज दिखाया। उसमें उनका भाई एयरपोर्ट से निकलते हुए दिखा। 

उन्होंने चिंता जताई कि जब मेरा भाई लखनऊ एयरपोर्ट तक आया और वहां से निकलते हुए उसका फुटेज है तो उसके बाद वह कहां गायब हो गया। उन्होंने कहा कि एक महीने होने जा रहे हैं और मैंने मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, लखनऊ के पुलिस प्रशासन समेत तमाम लोगों को प्रार्थना पत्र भेजकर अवगत कराया है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया के जरिए मैं फिर से इस मामले का संज्ञान लेने के लिए मुख्यमंत्री और प्रदेश के डीजीपी से दरख्वास्त करता हूं। रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि जाकिर पिछले एक महीने से गायब है और यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब उसका गृह जनपद आजमगढ़ है। मुस्लिम नौजवानों और खास तौर से आजमगढ़ के रहने वालों को लेकर यह तथ्य पुष्ट है कि पुलिस, खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां उन्हें फर्जी मामलों में फंसाती हैं, जिसे प्रदेश की सपा सरकार भी मानती है। ऐसे में जब सपा सरकार सत्ता में है और मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से सांसद हैं तब ऐसे में मुलायम सिंह को अपने क्षेत्र के नौजवानों की सुरक्षा की गांरटी करना चाहिए। 

रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि जिस तरह एनएचआरएम घोटाले में नवनीत सहगल के खिलाफ रिपोर्ट लिखने के कारण पत्रकार अनूप गुप्ता पर कल सीबीआई कोर्ट में गुंडा तत्वों द्वारा हमले की कोशिश की गई और उन्हें मार डालने की धमकी दी, वह साबित करता है कि ब्यूरोक्रेसी और सत्ता का गठजोड़ भ्रष्टाचार का सवाल उठाने वालों को व्यापम घोटाले का पर्दाफाश करने वालों की तरह ही मारने पर उतारू हो गया है। शिवपाल यादव प्रदेश में हो रही सांप्रदायिक घटनाओं के पीछे भाजपा का हाथ होने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन खुद उनकी सरकार ने जिस व्यक्ति जगमोहन यादव को डीजीपी बनाया है, उन्होंने भाजपा व अन्य हिन्दूत्वादी संगठनों को खुली छूट देकर 2012 में फैजाबाद में सांप्रदायिक हिंसा को फैलाया था जिसकी वजह से उन्हें उनके पद से हटाया भी गया था। 

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PRESS CLUB CONDEMNS KILLING OF JOURNALIST SANDEEP KOTHARI

Mumbai : The Mumbai Press Club expresses its shock over the killing of Madhya Pradesh-based journalist Sandeep Kothari, who has been burnt to death for exposing the sand mafia.

Kothari, 40, hailed from Balaghat district and was writing for several Jabalpur-based newspapers as a tehsil correspondent. He was a good journalist and had been relentlessly exposing criminals and the sand mafia in particular.

The burnt body of Sandeep Kothari, who was abducted from Katangi tehsil in Balaghat district two days back, was found lying near railway tracks at Sindi town in Wardha district of Vidarbha region.

We request the governments of Madhya Pradesh and Maharashtra to order a joint police investigation into this sordid killing of a member of the Fourth Estate. The Club also demands that the Maharashtra government, in whose jurisdiction the body was found, ensure that the culprits are subject to the maximum punishment – be it the foot-soldiers or the masterminds.

Kothari was abducted on June 19 night when he was headed towards Umri village with his friend on his bike.His bike was hit by a four-wheeler and its occupants bundled him inside the vehicle and fled before beating up Kothari’s friend Rahandle who was riding pillion. His body was also found on June 21. The family of Kothari is an a state of shock.

This incident of setting afire of a journalist comes in the wake of freelance journalist Jagendra Singh by members of the UP police, who acted at the behest of Uttar Pradesh’s minister for backward Classes Welfare, Ram Murti Verma. Jagendra Singh was mercilessly set afire after kerosene was poured on him by the goons, and he died a horrific death on 8 June.The attack on the journalist on 1 June in Shahjahanpur was organized by the minister after Jagendra Singh exposed Ram Murti Verma in a series of Facebook posts accusing him of involvement in illegal mining activities and land grabbing.

These two back-to-back incidents has come as a shock to the journalist fraternity in India. At the time of crisis, we stand behind both the families and condemn the killing in strongest possible words and urge for speedy investigation and trial.

It is to be mentioned here that these two incidents must not be treated separately – and by and large there has been a trend on increasing number of attacks on journalists in cities as well as rural areas. The reasons may be varied. Even we can cite the recent incident of Mumbai photojournalist Amey Kharade being manhandled by policemen.

The Mumbai Press Club over the last several years – particularly since the killing of journalist J Dey – have been demanding that incident of attacks on journalists must be made non-bailable and congnizable.

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सरकार के इशारे पर पत्रकार की लाश पर दूकानें खोल दीं बड़े पत्रकारों ने

पत्रकारों की लड़ाई नहीं, पत्रकारिता को कलंकित करने में जुटे हैं बड़े नेता। इन नेता जी की जिम्‍मेदारी मानी जाती है कि वे कम से कम अपनी बिरादरी के लोगों के प्रति थोड़ी संवेदनशीलता और संवेदना रखेंगे और पत्रकारों पर होने वाले अन्‍याय-अत्‍याचार पर अपनी आवाज निकालेंगे। लेकिन खुद को बड़ा पत्रकार मानने-कहलाने वाले यह पत्रकार-अगुआ लोग न सिर्फ इस मसले पर चुप्‍पी साधे हुए हैं, बल्कि जागेन्‍द्र की लाश को खरीदने-बेचने की गुपचुप कवायद में भी जुटे हैं। जागेन्‍द्र सिंह के जिन्‍दा-दाहकाण्‍ड वाले हौलनाक हादसे के बाद इन इस पत्रकार-शिरोमणि ने ठीक वही स्‍टैण्‍ड लिया, जो सरकार के इशारे पर यूपी पुलिस कर रही है। बजाय इसके कि जिन्‍दा जागेन्‍द्र को मौत की नींद सुलाने वाले अपराधियों पर यह पत्रकार-नेता आंदोलन करते और हुंकारें भरते, इन लोगों ने पूरे मामले की आग पर ही पानी फेर दिया। पत्रकारिता को कलंकित करते इन पत्रकारों ने इस मामले में जो करतूत की है, उससे बड़े से बड़ा दलाल भी शरमा जाएगा।

 

दरअसल, शाहजहांपुर की खबरों में जिन्‍दा कौम बन चुके जागेन्‍द्र की खबरें इतनी तीखी होती थीं कि उसके खिलाफ यहां के पत्रकार ही नहीं, पुलिस, अपराधी, प्रशासन और व्‍यापारी नेता तक एकजुट हो गये थे। इसीलिए उसे जिन्‍दा फूंकने तक की खबरों में मीडिया ने उसे पत्रकार मानने से ही इनकार कर लिया था। लेकिन शाहजहांपुर जाकर जब मैंने इस दर्दनाक हत्‍याकाण्‍ड का पर्दाफाश करते हुए प्रत्‍यक्ष प्रमाण हासिल किये, कि जागेन्‍द्र सिंह एक बेबाक पत्रकार था, तो सोशल साइट्स पर हंगामा हो गया। आक्रोश और निन्‍दा का सैलाब उमड़ने लगा। सहारनपुर से लेकर बलिया, बहराइच से लेकर बांदा और बनारस और जौनपुर से लेकर मथुरा-अलीगढ तक पत्रकारों ने अपना गुस्‍सा प्रदर्शित करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, दबाव तो इतना बढ़ गया कि भारतीय प्रेस परिषद ने हस्‍तक्षेप करते हुए अपने तीन सदस्‍यों की एक टीम भेजकर रिपोर्ट मंगवायी। उधर दिल्‍ली में पत्रकारों ने 19 जुलाई-15 को जन्‍तर-मन्‍तर से मुलायम सिंह यादव के आवास तक प्रदर्शन जुलूस निकालने का फैसला किया है। 

यह है कि जागेन्‍द्र हत्‍याकाण्‍ड पर आम पत्रकार का आक्रोश, लेकिन देश के श्रमजीवी पत्रकार संघ के सचिव पद पर सुशोभित कर रहे के-विक्रम राव और उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति में अध्‍यक्ष और सचिव की कुर्सी पर पिछले तीन साल से कब्‍जाए हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस ने इस मसले पर एक शब्‍द तक नहीं निकाला, बल्कि इसके उलट शाहजहांपुर के पत्रकारों को समझाना शुरू कर दिया कि वे जागेन्‍द्र सिंह के परिजनों को समझायें और उन्‍हें बतायें कि बड़े अफसर और आला नेता उन्‍हें इस मौत का मुआवजा देने पर राजी हैं।

हैरत की बात है कि शाहजहांपुर काण्‍ड के बाद से ही के-विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस लगातार खामोश हैं। के-विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस की इस तिकडी ने इस मसले को अपनी पत्रकार-बिरादरी पर हुए हमले के तौर नहीं लिया और न ही इस मामले को समझने के लिए शाहजहांपुर जाने तक की जहमत समझी। और तो और, लखनऊ में उन्‍होंने पत्रकारों को एकजुट करने या कोई विरोध-प्रदर्शन तक करने की कोशिश नहीं की। हां, खबर इतनी जरूर है कि इस काण्‍ड पर इन लोगों ने सरकार और शासन के नजरिये का ही पूरा समर्थन किया। मुझे पक्‍की खबर है कि हेमन्‍त तिवारी ने कई जिलों में जाकर जागेन्‍द्र की हत्‍या को आत्‍मदाह के तौर पर साबित करने के लिए पूरी पैरवी की, जहां इस प्रकरण पर जनमानस बहुत विह्वल और आक्रोशित था।

मिली पुख्‍ता खबरों के मुताबिक हेमन्‍त तिवारी ने शाहजहांपुर के कई पत्रकारों को फोन करके बताया था कि सरकार और उसके अफसर इस मामले में रहमदिल हैं और पीडि़त परिवार को राहत पहंचाने की कोशिश करा रहे हैं। हेमन्‍त तिवारी के इस प्रस्‍ताव पर इस पत्रकार ने जब पूछा कि राहत के तहत क्‍या-क्‍या पैकेज मिल सकता है तो, इस पत्रकार के मुताबिक, हेमन्‍त ने जवाब दिया कि बीस लाख रूपया तक का मुआवजा वगैरह राहत दी जा सकती है। हेमन्‍त तिवारी ने इस पत्रकार से कहा कि अमुक-अमुक बड़े-बड़े अफसर तुम्‍हें अभी फोन करेंगे, तो उनसे बात कर लेना।

अब सवाल यह है कि हेमन्‍त तिवारी को अगर जागेन्‍द्र सिंह के परिजनों तक पहंचाना था, उसके लिए उन्‍होंने चन्‍द पत्रकारों को अपना माध्‍यम क्‍यों बनाया। बेहतर तो यह होता कि हेमन्‍त तिवारी इस मुआवजा का ऐलान सरेआम करते, पत्रकारों की मीटिंग आयोजित कराते और ऐसी मीटिंग में राहत दिलाने वाले अधिकारी या मन्‍त्री वगैरह को सरेआम गुलदस्‍ता पेश कर उन्‍हें सम्‍मानित करते। आपको खूब याद होगा कि बड़े मंत्री और अफसरों को बात-बात पर गुलदस्‍ता पेश करना उनकी खास अदा-स्‍टाइल है।

1- सवाल यह है कि शाहजहांपुर काण्‍ड पर हेमन्‍त तिवारी, के-विक्रम राव व सिद्धार्थ कलहंस आदि लोग आखिरकार खामोश क्‍यों हैं।

2- क्‍यों जागेन्‍द्र सिंह के पीडि़त परिजनों के बीच स्‍थानीय पत्रकारों को दलाल-बिचौलिया बनाया जा रहा है?

3- क्‍या वजह है कि जागेन्‍द्र के हत्‍या का विरोध नहीं कर रहे हैं यह पत्रकार नेता?

4- हत्‍यारों की गिरफ्तारी की मांग आखिरकार क्‍यों नहीं कर रहे हैं यह पत्रकार नेता?

5- शाहजहांपुर काण्‍ड को ले‍कर पुलिस ने 11 दिन बाद ही एफआईआर दर्ज नहीं की थी, क्‍या यह हालत पत्रकारों की बिरादी के लिए शर्मनाक नहीं था?

6:- जागेन्‍द्र काण्‍ड को आज 18 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन पुलिस ने अब तक किसी अपराधी को क्‍यों नहीं पकड़ा?

7- फेसबुक पर जागेन्‍द्र सिंह कई बार लिख चुका था कि उप्र सरकार के मन्‍त्री राममूर्ति वर्मा उसे जान से मारने की साजिश कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद के-विकम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे बड़े पत्रकार नेता अपनी खामोशी क्‍यों नहीं तोड़ रहे हैं?

8- लखनऊ सिविल अस्‍पताल में अपनी जिन्‍दगी और मौत के बीच जूझ रहे और दर्द से छटपटाते हुए जागेन्‍द्र सिंह ने कई लोगों से बयान दिया था कि उसे राममूर्ति वर्मा की साजिश में कोतवाल श्रीप्रकाश राय और कई पुलिसवालों समेत गुफरान, अमित भदौरिया आदि ने उस पर तेल डाल कर जिन्‍दा फूंक डाला था। इस बयान को कई लोगों ने अपने मोबाइल पर रिकार्ड किया और आज ऐसे वीडियो सोशल साइट्स पर वायरल हो चुके हैं। फिर के-विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस किस ओर खड़े हैं, पत्रकारों के बीच जुझारू नेता की भूमिका में, अथवा अफसरों-मंत्रियों की भद्दी दलाली की पटरी पर?

9- क्‍या पत्रकारों के नेता बने इन नेताओं का यह दायित्‍व नहीं होता कि विधानसभा अध्‍यक्ष और मंत्री-मुख्‍यमंत्री समेत डीजीपी के रवैये पर ऐतराज दर्ज कराने के लिए अपनी-अपनी यूनियनों-समिति की बैठक बुलाते और सरकार-शासन को मजबूर करते कि पत्रकार के हत्‍यारों पर तत्‍काल जेल भेजा जाए?

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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बरेली आई नेक्‍स्‍ट के कार्यालय में ही दो सीनियर मीडियाकर्मियों में पटका-पटकी

दैनिक जागरण के बच्चा अखबार आई नेक्‍स्‍ट बरेली में स्थितियां कंट्रोल के बाहर हो रही हैं। कम सैलरी और काम के बोझ के तले यहां का स्‍टाफ कुंठित हो गया है। गत दिनो यहां के दो वरिष्ठ मीडियाकर्मी ऑफिस में ही भिड़ गए। 

सूत्रों के अनुसार संडे आधी रात को डेस्‍क के दो सीनियर्स में पहले खूब गर्मागर्म बहस हुई। इसके बाद बहस गालियों और मारपीट में तब्‍दील हो गई। माहौल किस बात पर बिगड़ा, इसका पता नहीं चल पााया है। उस वक्‍त ना तो नए इंचार्ज ऑफिस में थे, न ही रिपोर्टिंग का कोई बंदा। केवल डेस्‍क का ही स्‍टाफ था। 

बताया जा रहा है कि दोनों में जमकर हाथापाई हुई। यहां तक कि एक ने तो न छोड़ने की धमकी देते हुए आफिस के बाहर एक घंटे तक इंतजार किया। डेस्‍क के दूसरे साथियों ने समझाबुझा कर उसे रवाना किया। वह काफी देर तक मारने के लिए खड़ा रहा। 

मजे की बात यह है कि इस वारदात की भनक दूसरे साथियों और दैनिक जागरण को नहीं लगी। अगले दिन सोमवार को सबको यह बात पता चली। इस मामले को खूब दबाने की कोशिश की गई। अब पूरे दैनिक जागरण में इसकी चर्चा है। सूत्रों ने बताया कि आई नेक्‍स्‍ट में इस वक्‍त कुछ अच्‍छा नहीं चल रहा है। रिपोटर्स परेशान हैं, अखबार में खूब गलतियां जा रही हैं। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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इंदौर प्रेस क्लब : मिशन से क्रिमीलाइजेशन तक पहुंच गई है आज की पत्रकारिता

इंदौर (म.प्र.) : राज्यसभा टेलीविजन के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि इस समय पत्रकारिता अंधी सुरंग से गुजर रही है। अस्सी का दशक प्रिंट मीडिया और नब्बे का दशक इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए स्वर्णिम रहा था। वैसे उम्मीद की किरण अभी भी बाकी है। ‘पत्रकारिता : कल, आज और कल’ विषय पर परिसंवाद में वक्ताओं ने कहा कि आज पत्रकारिता मिशन से सेंसेशनल, कमीशन और क्रिमीलाइजेशन तक पहुंच गई है। इंदौर प्रेस क्लब के 54वें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर हाल ही में जनसंपर्क विभाग द्वारा सम्मानित पत्रकारों का अभिनंदन भी किया गया।

इंदौर प्रेस क्लब के स्थापना दिवस समारोह में सम्मान की एक झलक

इंदौर प्रेस क्लब के 54वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए राजेश बादल ने कहा कि एक समय में इंदौर पत्रकारिता का गढ़ रहा है। यहां से राहुल बारपुते, प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर जैसे मूर्धन्य संपादकों ने पत्रकारिता की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की, जिसने देशभर में इंदौर घराने का नाम रोशन किया। 

वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी ने कहा कि आज सूचनाओं का तूफानी दौर चल रहा है। ऐसे में खबरों को विश्वसनीयता के साथ प्रकाशित और प्रसारित करना पत्रकारों के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने नई पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि पत्रकारों में कुछ अलग करने का जज्बा हो और वह पैशन रखें तथा अपने काम के प्रति ईमानदार रहें।

इस अवसर पर ‘पत्रकारिता : कल, आज और कल’ विषय पर परिसंवाद का आयोजन भी किया गया। परिसंवाद को वरिष्ठ पत्रकार शशीन्द्र जलधारी, कीर्ति राणा, नवनीत शुक्ला, दिनेश सोलंकी एवं छाया चित्रकार अखिल हार्डिया आदि ने संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता मिशन से सेंसेशनल, कमीशन और क्रिमीलाइजेशन तक पहुंच गई है। आज के दौर में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की बहुतायत हो गई है, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता कम होती जा रही है। संपादक नाम की संस्था का समाप्त होना भी एक अहम कारण है। नई पीढ़ी के पत्रकार अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाएं और पढऩे की आदत डालें। 

परिसंवाद का संचालन प्रो. प्रतीक श्रीवास्तव ने किया। इससे पूर्व इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने स्वागत उद्बोधन दिया। कार्यक्रम का संचालन महासचिव अरविंद तिवारी ने और अतिथियों का स्वागत सुनील जोशी, तपेन्द्र सुगंधी, सतीश जोशी, कमल कस्तूरी, अतुल लागू ने किया। आभार संजय लाहोटी ने व्यक्त किया। 

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मजीठिया वेज बोर्ड के नाम पर मीडिया मालिकानों के मुनाफे की हंसी और घाटे के घड़ियाली आंसू

मजीठिया वेज अर्थात कम से कम 40 हजार वेतन, इतनी बड़ी राशि सुनने के बाद अधिकांश लोगों की जुबान से यही बात निकलती है कि इतना वेतन कोई नहीं दे पाएगा, प्रेस बंद हो जाएंगे। जो पूरी तरह मिथ्या है। मुनाफे की हंसी के साथ घाटे के घड़ियाली आंसू दिखाना मीडिया मालिकों का घातक स्वांग है।

हाल में पेश समाचार पत्रों की सरकुलेशन रिपोर्ट को सभी समाचार पत्रों ने बढ़-चढ़कर छापा। मैं राजस्थान पत्रिका का सरकुलेशन देख रहा था, जिसमें कहा गया था कि 2 करोड़ 40 लाख का प्रसार है अर्थात् इतना पेपर प्रति दिन छपता है, वो भी रंगीन। 12 पेज के एक अखबार की कीमत कम से कम 10 से 12 रूपए पड़ती है और दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका जिस क्वालिटी के रंग और पेपर का उपयोग करते हैं, उसकी कीमत 20 से 25 रूपए पड़ती है। सोचो, जो प्रतिदिन 2 करोड़ 40 लाख कापी छापता है तो उसकी लागत क्या होगी। 

जी हां, यदि 10 रूपए के हिसाब से जोड़ें तो 24 करोड़ रूपए प्रतिदिन का खर्च आता है। और एक माह में यह आंकड़ा 7 अरब 20 करोड़ पहुंचता है और साल में 8640 करोड़ रुपए। अब साधारण सी बात है, जो मालिक एक दिन में 24 करोड़ खर्च कर सकता है वो कर्मचारियों को एक माह में 24 करोड़ का अतिरिक्त वेतन नहीं दे सकता क्या। दे सकता है लेकिन वर्षों की मानसिकता की जिद के आगे कोई झुकने को तैयार नहीं।  

कोई घाटे में नहीं

मजीठिया वेतन के नाम पर हर प्रेस मालिक घाटे का रोना रोता है। प्रेस बंद होने की दुहाई देता है लेकिन सच्चाई ये है कि किसी को घाटा नहीं हो रहा है। यदि होता तो पाठकों को हर माह गिफ्ट नहीं बांटे जाते। नए एडीशनों की लांचिंग नहीं होती। दैनिक भास्कर और जागरण शेयर मार्केट में पंजीबद्ध हैं, जो एक हजार करोड़ से अधिक का कारोबार दर्शाते हैं। माना मजीठिया वेतनमान देने पर वास्तव में घाटा होता है तो गुमास्ता एक्ट का पालन करो। रविवार का समाचार पत्र संस्थान बंद रखो लेकिन अखबार तो रविवार को भी छापना है, इसके लिए रविवार पेज के नाम से अलग से पंजीयन होता है और उस दिन विज्ञापनों का बारिश का मौसम रहता है। तब घाटा कैसे होता होता है ? दरअसल मजीठिया वेतनमान को लेकर पत्रकारों के मन में यह भ्रम बनाने की कोशिश की जा रही है कि इतने वेतनमान से प्रेस बंद हो जाएगा। इसी चालाकी से प्रेस मालिक फायदा उठा रहे हैं। पत्रकारों को पहले जागरूक होना जरूरी है। 

इतनी जिद क्यों?

सच यह है कि 1955 से आज तक किसी ने वेजबोर्ड की मांग ही नहीं की। इंडियन एक्सप्रेस और नवभारत के कर्मचारी यूनियन ने सफल आंदोलन कर वेज प्राप्त किया, जिससे सबक लेते हुए प्रेस संस्थान नौकरी ज्वाइन करते ही हर व्यक्ति को मौखिक फरमान सुनाने लगे कि आप किसी संगठन से नहीं जुड़ोगे, जो सरासर अन्याय है। अभी पत्रकार साथी मजीठिया वेतनमान को लेकर संशय में हैं और अपने हक के लिए ज्यादा तत्परता नहीं दिखा रहे हैं लेकिन जनवरी 2016 में मजीठिया वेतनमान अप्रासंगिक हो जाएगा, क्योंकि जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार पत्रकारों का वेतन किसी भी हालत में केन्द्रीय कर्मचारियों के सेकेंड क्लास अधिकारी से कम नहीं होना चाहिए। और तब तक राजपत्रित अधिकारियों का वेतन 1,50,000 रूपए हो जाएगा। तब क्या होगा पत्रकारों का! ये सवाल गंभीर है।

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चंडीगढ़ प्रेस क्लब के चुनाव में बलविंदर-नलिन ग्रुप की फतह

चंडीगढ़ : प्रेस क्लब चुनाव में गत दिनो कुल 396 वोट पड़े । प्रधान पद के लिए बलविंदर सिंह जम्मू ,जनरल सेकेट्री नलिन आचार्य ,संजीव महाजन सैकेट्री, वाइस प्रेसिडेंट मंजीत सिद्दू , ज्वाइंट सैकेट्री जोगिन्दर सिंह ने प्रतिद्वंदियों को पराजित कर दिया। इस तरह चुनाव में बलविंदर सिंह जम्मू- नलिन आचार्य ग्रुप को रिकार्ड जीत मिल गई। सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सजंय शर्मा ,वाइस प्रेसिडेंट अर्चना सेठी, ज्वाइंट सैकेट्री राजेश ढल्ल और कैशियर राकेश गुप्ता पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं।

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Journalists & Press Workers Call for Unified Action

New Delhi : A Joint Extended meeting of the Executive Committee of the Press Unity Centre and the Delhi Union of Journalists has resolved through a reorganized structure to move jointly in matters pertaining to the serious situation effecting hundreds of journalists and press workers in Delhi in particular with the widest possible national alliance based on agreed principles and a minimum programme. This it felt was necessary taking into account various management schemes all over the country, which included schemes of getting rid of 50 per cent of the staff and carrot and stick contracts in circulation.

The marathon meeting which concluded late on March 31 has blamed both the centre and the state governments of dithering in implementation of the wage board award sanctified by the supreme court judgment. It is of the view that the situation has led to a grave crisis for the survival of security of service reducing labour laws like the Working Journalists Act to a farce.

The meeting took note of the struggle in various units of Jagran and the multiplying contempt cases pertaining to non-implementation from the Delhi Labour Commissioner’s office to various courts and spreading to Noida and neighbouring areas.

The two bodies jointly appealed to the All India Newspaper Employees Federation to join on a minimum programme. It welcomed all efforts of the Confederation of News agencies & Newspaper employees organizations headquarters in Delhi for joint moves and called for an approach of combining collective action with the struggle in the court  to save the newspaper industry from a variety of sources, national and international.

The meeting chaired by the General Secretary DUJ and the President of the Press Unity Centre agreed on a common code of functioning and the broad structure for a 30 person executive comprising an equal number from both the bodies. Joint notices to various newspaper bodies were finalized. It was decided to meet within the next fortnight for announcing a phased united plan. Various plant unions in Delhi have agreed to cooperate.

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नदीम अहमद काजमी ने बिल्डर से कांट्रैक्ट साइन करने की इच्छा के कारण प्रेस क्लब इलेक्शन टलवाया?

: Raise a voice against delay in elections and demand immediate elections : New Delhi : On March 23, 2015, the office bearers and managing committee of the PRESS CLUB OF INDIA (PCI) held a meeting in which it was decided to postpone the Club’s elections, which were originally scheduled to take place in March. 

It is learnt that this is all the game-plan of the Club’s current Secretary General Nadeem Ahmad Kazmi, who wants to inordinately postpone the elections, so that he gets the chance to sign the contract with a builder to construct the new building for the Press Club, and, pocket hefty commission amount. I urge upon all the Press Club members to raise a voice against this (delay in elections), and demand immediate elections.

Press Club’s Assange… a whistle-blower…

(एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित)

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Surveillance on Press Will Not Be Tolerated

New Delhi : S K Pande, General Secretary The Delhi Union of Journalists (DUJ) condemns ominous moves to post security personnel in the Lok Sabha Press Gallery ostensibly to keep a watch on journalists covering the proceedings in the House.  This, we feel is tantamount to snooping on journalists and interfering in their professional duties.

This is not limited to the Press Gallery alone. It has been reported that even in places where normal access is granted to the press, curbs and checks have increased. In fact there we have also receive information that a journalists a tab is being kept on them in the Central Hall of parliament.

Such surveillance is uncalled for and will not be tolerated. The DUJ calls upon the entire media fraternity to rise in protest against this illegal shadowing of the media. A letter is also being sent to the Lok Sabha Speaker, Sumitra Mahajan, protesting against this.

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फ़्री प्रेस सोसाइटी ने पैगंबर का कार्टून बनाने वाले विल्क्स को किया सम्मानित

डेनिश फ़्री प्रेस सोसाइटी ने पैग़ंबर मोहम्मद का कार्टून बनाने वाले स्वीडिश कार्टूनिस्ट लार्स विल्क्स को ‘सैफ़ो’ पुरस्कार से सम्मानित किया है. 

विल्क्स को डेनमार्क के संसद में आयोजित एक समारोह में पुरस्कार दिया गया. पिछले महीने उनके कार्टून पर कोपनहेगन के यहूदी पूजा स्थल सिनेगॉग में बहस के दौरान एक बंदूकधारी ने हमला किया, जिसमें दो लोग मारे गए थे. पुलिस ने बाद में उस बंदूकधारी को गोली मार दी थी.

दक्षिणपंथी संगठन डेनिश फ़्री प्रेस सोसाइटी ने उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करने के लिए यह पुरस्कार दिया है. विल्क्स ने पुरस्कार लेते हुए कहा, ”कुछ लोगों का मानना है कि मेरा कार्टून ईशनिंदा है लेकिन मैं इसे कला मानता हूं. 

अब लोगों पर निर्भर है कि वे इसकी व्याख्या कैसे करते हैं.” विल्क्स पहली बार वर्ष 2007 में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाकर सुर्ख़ियों में आए थे, जिसे डेनमार्क की पत्रिका ‘ज़ाइलैंड्स पोस्टन’ ने छापा था. मुसलमान समुदाय में पैगंबर का चित्र बनाना ईशनिंदा माना जाता है.

(बीबीसी से साभार)

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डीएम की कांफ्रेंस में सूचना अधिकारी ने पत्रकारों को बुलाया ही नहीं

देवरिया : जिलाधिकारी शरद कुमार सिंह की प्रेस वार्ता में उस समय अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई, जब कुछ पत्रकारों से उन्हें पता चला कि सूचना अधिकारी ने कांफ्रेंस के संबंध में सूचित ही नहीं किया था। जिलाधिकारी ने सूचना अधिकारी की हरकत पर नाराजगी जताते हुए पत्रकारों से खेद व्यक्त किया। 

गत दिनो जिलाधिकारी ने अपने कैम्प कार्यालय पर निर्वाचन आयोग के निर्देश पर मतदाता सूची से सम्बन्धित एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया था। जिलाधिकारी ने सभी पत्रकारों को बुलाए जाने के निर्देश दिए थे। आपसी गुटबाजी के चलते सूचना अधिकारी रविन्द्र पाण्डे ने कुछ पत्रकारों को सूचना नहीं दी, जिनमें लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्रों के संवाददाता एवं मान्यता प्राप्त पत्रकार और न्यूज एजेन्सी के पत्रकार भी शामिल थे। रविन्द्र पाण्डे का कहना है कि केवल लीडिंग न्यूज पेपर वालों को ही बुलाने का निर्देश मिला था। यह निर्देश किसने दिया था, वह जिलाधिकारी के पूछने पर नहीं बता पाए।

बताते है कि प्रेस वार्ता की जानकारी जब छूटे हुए उन पत्रकारों को हुई तो उन्होंने एक साथ जाकर प्रेस वार्ता के दौरान ही सूचना अधिकारी की करतूत की जानकारी जिलाधिकारी को दी। जिलाधिकारी ने कहा कि सूचना अधिकारी ने उन्हें बदनाम करने के लिए यह कुत्सित प्रयास किया है। 

गौरतलब है कि वर्तमान समय में जिले के सूचना अधिकारी द्वारा गुटबाजी किए जाने की शिकायतें अक्सर आती रहती है। सूचना अधिकारी इस समय जिले के विकास से सम्बन्धित सूचना कुछ चुनिन्दा प्रेस वालों तक ही पहुंचवाते हैं, जिससे अधिकांश पत्रकारों में उनके प्रति रोष है। सूचना कार्यालय में समाचारों की कटिंग भी समय से नहीं की जाती है और न ही जिलाधिकारी तक पहुंचायी जाती है। यही नहीं आरोप है कि पत्रकारों को मान्यता दिलवाने में भी सूचना अधिकारी द्वारा भेद भाव किया जाता है। बताया जाता है कि कुछ पत्रकारों ने उक्त घटना की सूचना, सूचना निदेशक लखनऊ को प्रेषित करते हुए कार्रवाई की मांग की है। 

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शिक्षामित्र, पुलिसमित्र…. और अब प्रेसमित्र !

आज आप को तीन मित्रों की कहानी बताता हूं. दो मित्र तो पहले से हैं लेकिन तीसरे मित्र की एंट्री मैं कराऊंगा. एंट्री कराना लाजमी भी है क्योंकि तीसरे मित्र की विशेषता भी पहले दो मित्रों की ही तरह है. वह दो मित्र हैं शिक्षामित्र और पुलिसमित्र। जिस मित्र की एंट्री हो रही है, वह है प्रेसमित्र. शुरुआत करते हैं शिक्षामित्र से.

शिक्षको के सहयोग में कुछ दिन पहले भर्तियाँ की गयीं जो पार्षदों द्वारा हुईं, जिनको नाम मिला शिक्षामित्र. स्वाभाविक है पार्षद उन्ही को फायदा दिलाएंगे जिनसे उनका फायदा हो. यह वो लोग  हैं जो क्षेत्र के दबंग और इलाके में दबदबा रखने वाले होते हैं, जो पार्षदों के वोटबैंक पर असर डाल सकते है. लेकिन बदलते परिवेश में शिक्षामित्र मेहनत करते हैं और पठन-पाठन पर ध्यान भी देते है. अब बात आती है पुलिसमित्र की. पुलिसमित्र बनना बिलकुल ही आसान है. कहा तो यह भी जा रहा है कि पुलिस के मुखबिरों को ही तमगा दिया गया है पुलिसमित्र का. फिर धीरे-धीरे समाज संगठन से जुड़े लोग भी पुलिसमित्र बनाए गए और कुछ लोगो को बनाने की कवायद चल रही है. यह वही समाज संगठन से जुड़े लोग हैं जो त्यौहारो पर चौराहे, धर्मस्थलों या भीड़-भाड़ वाले जगहों पर डंडा या माइक से जनता से पुलिस का सहयोग करने के लिए अपील करते दिखते है. अब स्थिति यह है कि कई पुलिस चौकियों पर समाज संगठन या पुलिस मित्रो का दबदबा है. पुलिसमित्र पुलिस के भ्रमण दस्ता (फैंटम ) पर होमगार्डो का स्थान लेते दिख रहे है. कांस्टेबल होमगार्डो के स्थान पर अब पुलिसमित्र के साथ क्षेत्र भ्रमण में खुद को सहज महसूस कर रहे है. फैंटम दस्ता पर बैठने के बाद पुलिसमित्र वायरलेस सेट और पुलिस डंडे से लैस हो जाते हैं, मानो पूरे कानून को कांस्टेबल ताख पर रख देता है. अब कांस्टेबलों की वसूली के स्थान पर यही पुलिसमित्र ही जाने लगे हैं. यदि सरसरी निगाह दौड़ाएं तो पता चलता है कि अधिकांश पुलिसमित्र वही हैं जो अव्वल दर्जे के आवारा या फिर अपने इलाके का बदनाम. खैर अब बारी प्रेसमित्र की. 

अब तक प्रेसमित्र का कोई पद नही है मगर आप सोच रहे होंगे कि मै प्रेसमित्र की एंट्री क्यों करा रहा हूं. तो आइए आप को गहराईयों तक ले चलते हैं. यह सब देख रहे हैं कि प्रत्येक शहर में “प्रेस” लिखी गाड़ियों की भरमार है. प्रत्येक शहर में झोले में पत्रकार संगठन चल रहे हैं. जिनका पत्रकारों के हित से कोई वास्ता नही है. बस इनके घर की सब्जी आने से मतलब है. ऐसे संगठन और छोटे अखबार के लोग प्रेस कार्ड बेचकर आसानी से पैसे कमा लेते हैं. ऐसे लोग चाय, पान, सब्जी, दूध बेचने वालों और इलाके के बदनामों को भी चन्द पैसों के लिए आसानी से प्रेस कार्ड उपलब्ध कराते हैं. ऐसे लोगों का अखबार की खबरों, अख़बार के विकास से कोई मतलब नहीं, इनको चाहिए सिर्फ भौकाल. आज पत्रकारों की जो भी प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है, उनके पीछे मुख्य कारण यही है. ऐसे ही कार्डधारक गाड़ी पर मोटे अक्षर में “प्रेस” लिखवाकर अवैध कार्य करते हैं और थाने – चौकियों की दलाली करते हैं. कई जनपदों में प्रेस लिखी गाड़ियों से दूध और कपडे़ भी ढोए जाते हैं. अब कुल लाकर ऐसे कार्डधारक को आप भी कहेंगे- यह है प्रेसमित्र.

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अजयमेरु प्रेस क्लब में पत्रकारों का रंगोत्सव

अजमेर। रंग-पर्व पर अजयमेरु प्रेस क्लब में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और वेब मिडिया पत्रकारों ने जमकर होली मनाई।

अजमेरु प्रेस क्लब में पत्रकारों का होली मिलन समारोह

 होली के दिन 11 बजे से ही पत्रकारों का जमावड़ा होने लगा। वरिष्ठ पत्रकारों के पहुंचते ही रंग और गुलाल का दौर शुरू हो गया। सभी पत्रकारों ने एक-दूसरे को गले लगाया। इसके बाद हँसी-मजाक, चुटकलेबाजी, होली गायन, अल्पाहार और ठंडाई का सिलसिला चला। इस अवसर पर अजमेरु प्रेस क्लब के अध्यक्ष डॉ.रमेश अग्रवाल, एस.एन.जाला, प्रताप संकट, राजकुमार पारीक, एस.पी.गांधी, राजेंद्र गांधी, सुनील गर्ग, विजय शर्मा, उमाकांत जोशी, कमल, हिम्मत सिंह चौहान, रजनीश, अखिलेश जैन, आनन्द शर्मा, राजेंद्र गुंजल, रमेश डाबी, दिनेश गर्ग आदि पत्रकारों की मौजूदगी उल्लेखनीय रही। 

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बिजनौर प्रेस क्लब में गंगा-जमुनी होली

बिजनौर : गंगा-जमुनी तहजीब कायम रखते हुए बिजनौर प्रेस क्लब की ओर से ऐजाज अली हाल की लाइब्रेरी में अध्यक्ष ज्योति लाल शर्मा की अध्यक्षता व मरग़ूब रहमानी के संचालन में होली मिलन कार्यक्रम आयोजित किया।

बिजनौर प्रेस क्लब में गंगा-जमुनी होली-मिलन कार्यक्रम की एक झलक ।

इस अवसर पर पत्रकारों ने एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर दिया। कार्यक्रम में पत्रकारों ने गजलें और चुटकुले सुनाए। बड़ी संख्या में मुस्लिम पत्रकार भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वीरेशबल , योगेश राज, विनय शर्मा,अनूप खन्ना , नरेंद्र मारवाड़ी , फहीम शेख,गुफरान मुस्तकीम ,वसीम अख्तर , कमरूदीन फारुखी , अरशद जैदी, खुशनूद हसन, जितेंद्र शर्मा, अनुराग शर्मा, राजेन्द्र राजपूत, प्रवीण कुमार, इमरान अंसारी, नीरज कुमार ,दीपक कुमार, मिंटू आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर उपजा ने मनाया समारोह, पत्रकारिता की जीवंतता पर छिड़ी बहस

लखनऊ। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया जगत, खासकर अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों का आह्वान किया है कि वे अच्छी खबरें लिखकर समाज में सकारात्मक सोच पैदा करें। माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया काउंसिल की पुरजोर वकालत की। पाण्डेय रविवार को राजधानी में राष्ट्रीय प्रेस दिवस समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) और इसकी स्थानीय इकाई ‘लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ ने संयुक्त रूप से किया था।

शीघ्र ही राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त होने जा रहे प्रदेश के वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी, भारतीय प्रेस काउंसिल के सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी, राज्य के सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के लखनऊ ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी, पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना, ‘उपजा’ के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित, महामंत्री रमेश चन्द्र जैन आदि ने निडर एवं फ्री प्रेस की महत्ता पर अपने गम्भीर विचार रखे और प्रेस की मजबूती तथा स्वतंत्रता के अलावा पत्रकारों के आर्थिक हितों व उनकी सुरक्षा पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ल ने किया।

सप्रू मार्ग स्थित उद्यान विभाग सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करने वाले उप्र विधानसभा के अध्यक्ष पाण्डेय ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि लोकतंत्र में ‘पब्लिक ओपिनियन’ का बहुत महत्व होता है। इस प्रणाली में विशेष रूप से प्रिण्ट मीडिया जनता की राय बनता है। लिहाजा उसके पत्रकारों को चाहे वे संवाददाता हों, अथवा डेस्क पर कार्यरत सम्पादक, उन्हें बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि उनकी लिखी और सम्पादित खबरें सनद व दस्तावेज बन जाती हैं जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग तो अपने समाचार प्रस्तुत करने के बाद उसे हटा भी लेते हैं।

पाण्डेय ने कहा कि खबरों, पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर भी अंकुश रखने तथा उन्हें मार्गदर्शित करने के लिए प्रेस परिषद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु इसका विस्तार किया जाना चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा खबरिया चैनल भी इसकी परिधि में आ सकें। इस सम्बन्ध में उन्होंने मीडिया काउंसिल बनाये जाने की पुरजोर वकालत की। उन्होने कहा कि एसोसिएशन के माध्यम से मीडिया काउंसिल के गठन के लिए एक प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार के पास भेजना चाहिए।

इसके साथ ही पाण्डेय ने, जिनकी समाज में एक समाजवादी ‘एक्टिविस्ट’ के रूप में अहम भूमिका रही है, पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा बढाये जाने की जरूरत पर बल दिया। विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पाण्डेय ने पूर्व में एक बार  विधानसभा में  पत्रकारों के लिए पेश पेंशन विधेयक के  पूर्ववर्ती एक सरकार द्वारा वापस ले लेने पर अफसोस जताते हुए कहा कि पत्रकारों के लिए सरकार को कुछ अलग से देने के लिए सोचना चाहिए । पाण्डेय ने कहा कि समाज के सजग प्रहरी के नाते मीडिया के लोग खुद अपने लिए आचार संहिता बनाएं, साथ ही अपने कर्त्तव्यों को सही ढंग से समाज के व्यापक हित में निभाएं।

उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के अध्यक्ष जावेद उस्मानी ने (जिन्हें शीघ्र राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालना है) इस अवसर पर अत्यन्त विस्तार से पत्रकारिता के स्वरूप व इसकी महत्ता की विवेचना की। उस्मानी ने कहा कि मीडिया सर्चलाइट के समान है। स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग, घटक तथा कडी है। यह सूरज की रोशनी की मानिन्द ‘समाज के अंधेरे’ में पहुंचकर उसके सभी विकारों को खत्म कर सकता है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मीडिया और सूचना के अधिकार अधिनियम का उपयोग लोकतंत्र में शासन-प्रशासन तथा प्रणाली की खामियों को दुरुस्त करने में करें।

राज्य के मुख्य सचिव रह चुके उस्मानी ने कहा कि अच्छे पत्रकारों को चाहिए कि वे अपनी बौद्धिकता तथा साधनों का इस्तेमाल उन लोगों के विरुद्ध करें जो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए समाज तथा जन के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रेस की भूमिका समाज हितैषी बातों तथा सुझावों को नीति निर्माताओं तक पहुंचाना और उनकी पैरोकारी करना होनी चाहिए। प्रेस के लोग शासन के कार्यों की सही मॉनिटरिंग करें। इस मौके पर  उस्मानी ने उपस्थित पत्रकार-समुदाय को आश्वस्त किया कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालने पर वे देखेंगे की जनता को सूचनाएं मिलने में कहां अवरोध हैं और उन्हें यथासम्भव दूर करने की कोशिश करेंगे।

एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके व प्रेस काउंसिल के नव मनोनीत सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी ने अपने सम्बोधन में पत्रकारों के संकल्प तथा विजन पर जोर दिया, साथ ही कहा कि केवल लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता सम्भव हैय लिहाजा प्रेसकर्मियों, कर्मचारियों और नियोक्ताओं में बेहतर समझ होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे छद्म जीवन का मोह न रखें, और अपने कार्यों को विश्वास व समझ के साथ पूरा करें तभी प्रेस काउंसिल बनाने का लक्ष्य पूरा होगा और इसे सशक्त बनाया जा सकेगा।

सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को पत्रकारों के लिए ब्रम्हास्त्र बताया और इसके उपयोग से हो रहे नित खुलासों के प्रति सन्तोष प्रकट किया है। उन्होने कहा कि आरटीआई के प्रयोग से पत्रकार पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने की दिशा में काम कर सकता है। स्वदेश कुमार ने सोशल मीडिया, प्रिण्ट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दायित्व की चर्चा करते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सक्रियता ने अखबारों पर दबाव बढा दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के व्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने समाज को दिशा तथा निर्देशन में मीडिया की अहमियत को रूपांकित करते हुए लोकतंत्र में इसकी भूमिका पर जोर दिया एवं यह भी कहा कि मीडिया और इसके लोग भी अपने गिरेबान में झांकें।  वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का कहना था कि समय तथा समाज में तेजी से बदलाव के साथ पत्रकारिता में भी जबर्दस्त गिरावट आयी है। आवश्यक है कि पत्रकार नैतिक मूल्यों पर ध्यान दें। वीरेन्द्र सक्सेना ने समूची मीडिया में बढते व्यवसायीकरण को चिन्ताजनक बताया तथा कहा कि इससे पत्रकार जगत को भारी क्षति हो रही है। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने मीडिया पर शासन प्रशासन तथा मीडिया पर कारपोरेट घरानों के बढते प्रभुत्च वर चिंता व्यक्त की। महामंत्री रमेश चन्द्र जैन ने कहा कि प्रेस काउंसिल के दायरे में अभी सिर्फ प्रिण्ट मीडिया है, इसके स्वरूप में परिवर्तन कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसकी परिधि में ले आया जाना चाहिए।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों माता प्रसाद पाण्डेय,जावेद उस्मानी, प्रज्ञानन्द चैधरी , स्वदेश कुमार व विधानसभा के  प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को अंगवस्त्रम और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।  इसके पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि व अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस मौके पर षेयसी पावगी ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन एलजेए के महामंत्री के0के0वर्मा ने किया। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों सर्वश्री पी.के. राय, पी.बी. वर्मा, डॉ. प्रभाकर शुक्ल, सुनील पावगी, प्रदेश उपाध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह, वीर विक्रमबहादुर मिश्र, कोषाध्यक्ष प्रदीप कुमार शर्मा , मंत्री सुनील त्रिवेदी, एलजेए के उपाध्यक्ष भारतसिंह, सुशील सहाय, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिंह, विकास श्रीवास्तव कोषाध्यक्ष  मंगल सिंह और समेत अनेक गणमान्य लोगों के आलावा प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये पत्रकार इस समारोह में बडी तादाद में जिलों से वाराणसी से अनिल अग्रवाल,आगरा से अशोक अग्निहोत्री ,पंकज सचदेवा,राजीव सक्सेना,सुभाष जैन,सुल्तानपुर से अरूण जायसवाल,शहजहांपुर से सरदारशर्मा, जरीफ मलिक, राजबहादुर, बराबकी से सलीम और फरहत भाई, प्रतापगढ से सन्तोष गंगवार हरीश सैनी आदि उपस्थित रहे।        
प्रेस रिलीज    

अरविन्द शुक्ला
अध्यक्ष
लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

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Report of the Press Council on threats to media in Telangana

The Report of three-member Committee consisting of Shri Rajeev Ranjan Nag as Convenor and S/Shri Krishna Prasad and K. Amarnath as Members constituted on 12.9.2014 by the Chairman, Press Council of India to probe threats to the media in Telangana following remarks reported to have been made by the Chief Minister of the State, Shri K. Chandrasekhar Rao, in Warangal City on 9th September, 2014 was adopted by the Council in its meeting held on 27.10.2014 at New Delhi. 

An open enquiry was made by the Committee with the journalists/Journalists’ Unions and State Government officers. On the basis of evidence and arguments at Hyderabad and Warangal, the Committee gave its findings and recommendations observing that no media person/house/journalist/journalist’s union denied that the Chief Minister had made the comments. They were of the firm opinion that the CM had deliberately and wilfully made these threats to browbeat the media so that it would not critically scrutinize his policies, programs and actions, and so that other media may fall in line, or else.

The Committee attempts to meet the CM of Telangana, the Chief Secretary and DGP to elicit their views on the points of reference made to the Committee was not successful.  While making general observation that those in public life and power politics to exercise restraint and behave in irresponsible and glacial manner, the Committee recommended that-

The PCI and the Government of India should impress upon the CM of Telangana state that blatant threats to the media and media personnel violates the oath of office he took to protect and defend the Constitution of India and follow the rule of law.

The CM of Telangana should be directed to restrain himself from making provocative statements against journalists or in saluting and supporting organizations which seek to limit the flow of information to the people, on the basis of nativity or domicile status.

The State Government of Telangana should be directed to take immediate action to create the conditions and atmosphere where free and fair journalism can be practiced by print and electronic journalists without fear of retribution by the State or the sword of ‘business terrorism’ by non-state actors.

All the cases registered against journalists for participating the protest actions should be withdrawn or fast tracked. Prompt action should be taken against the police official responsible for attacking the journalists and roughing up women journalists at Hyderabad and Warangal.  The photographers and videographers whose equipment was damaged during the police action should be compensated.

The State should not discriminate against the journalists on the ground of their nativity. 

The State Government should immediately take steps to enable MSOs to withdraw their illegal blackout of TV9 and ABN Andhra Jyothy in the interest of freedom of media and people’s right to know, as enshrined in the Constitution.

Print and electronic media organizations must put in place sterner mechanisms for greater editorial scrutiny of public interest journalist.
   
The Council, adopting the report decided to release in the public domain.

PR/3/14-15-PCI.

Dated: 27.10.2014.

Press Release

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उत्तराखंड का हाल : क्राइम रिपोर्टर बन कर रहा था ड्रग्स का धंधा, प्रेस ल‌िखी कार में ले जा रहा था चरस

कपकोट (बागेश्वर) :  बागेश्वर पुलिस ने मंगलवार देर रात कर्मी मार्ग के बेलंग पुल के पास एक कार से चार किलो अवैध चरस के साथ कथित पत्रकार और उसके एक अन्य साथी को गिरफ्तार किया है। जिस कार से चरस के साथ गिरफ्तार किया गया उस पर प्रेस लिखा हुआ था। पुलिस के अनुसार पकड़ी गई चरस की कीमत चार लाख रुपए है। कार को सीज कर दिया गया है। दोनों को सीजेएम चंद्रमणि राय की अदालत में पेश करने के बाद अदालत के आदेश पर उन्हें अल्मोड़ा भेज दिया गया।

थानाध्यक्ष एसपी रायपा ने बताया कि रात करीब 8.10 बजे बेलंग पुल के पास गश्त चल रही थी तभी अंबेसडर की तलाशी ली गई। कार में बैठे दो लोगों में पवन कुमार (45) निवासी मोहल्ला मकबरा नजीबाबाद (बिजनौर) के काले रंग के बैग से तीन किलो चरस और चालक अशोक कुमार निवासी हरिपुरकला थाना रायवाला (देहरादून) के बैग से एक किलो चरस मिली। पुलिस ने बताया कि पवन ने अपने को सहारनपुर से प्रकाशित होने वाली एक साप्ताहिक पत्रिका का क्राइम रिपोर्टर बताया। उसके पास से प्रेस कार्ड भी बरामद हुआ है।

सीओ धनी राम भी सूचना के बाद मौके पर पहुंचे। पुलिस ने बताया कि दोनों का 8/20 एनडीपीएस एक्ट के तहत चालान कर दिया गया है। चरस पकड़ने वाली टीम में दारोगा चंचल सिंह, हेड कांस्टेबल जगत सिंह रौंकली, कांस्टेबल गणेश सिंह, प्रकाश टम्टा, गोविंद सिंह और प्रमोद दीपक आदि शामिल थे। उधर, पुलिस कप्तान एसपी नपलच्याल ने कहा कि प्रेस की आड़ में इस तरह का कार्य सहन नहीं किया जाएगा। एसपी ने कहा कि अनाधिकृत रूप से प्रेस लिखे वाहनों की सघन जांच करवाई जाएगी।

पुलिस के शिकंजे में आया कथित पत्रकार पवन अब अपनी करनी पर पछता रहा है। उसने बताया कि सरयू घाटी के महेश और विक्की नाम के दो युवकों का हरिद्वार आना जाना था। वहीं पर कथित पत्रकार की उनसे मुलाकात हुई थी। दोनों ने उससे इस धंधे से जुड़कर बड़ी कमाई करने का लालच दिया था। कहा क‌ि उसने पहली बार इस धंधे में कदम रखा है। उनके बहकावे में आकर इस धंधे में पहला कदम रखते ही पुलिस के हत्थे चढ़ गया। थानाध्यक्ष ने कहा कि आरोपियों के तार किसी बड़े गिरोह से भी जुड़े हो सकते हैं। कथित पत्रकार यूपी का है, जबकि उसके नाम की कार हरिद्वार जिले के नंबर की है। मामले की जांच रीमा चौकी के प्रभारी जगदीश सिंह ढकरियाल को सौंपी गई है।

साभार- अमर उजाला

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प्रिंट एवं ईलेक्ट्रॉनिक मिडिया के पत्रकारों के लिए रामगढ़ प्रेस क्लब का गठन

रामगढ़ (झारखंड) जिले में प्रेस क्लब के गठन को लेकर 11 सदस्यीय तदर्थ कमेटी का गठन किया गया है। कमेटी के निर्देशन में चलाया जा रहा सदस्यता अभियान अंतिम दौर में है। लगभग 130 पत्रकारों को इस संस्था से जोड़ने के प्रयास के तहत सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। सदस्यता शुल्क के रूप में सहयोग राशी 51 रू. रखी गई है। दुर्गा पूजा के बाद संभवतः इसी माह में चुनाव होने की संभावना है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि जब प्रिंट एवं ईलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी पत्रकार एक संगठन के लिए कार्य करेंगे।

 

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