मीडिया पर कोबरापोस्ट की डाक्यूमेंट्री रिलीज, इसमें भड़ास वाले यशवंत भी! देखें वीडियो

Journalist Speak: Cobrapost documentary in solidarity with The UN #truthneverdies campaign!

जाने-माने खोजी पत्रकार अनिरुद्ध बहल के नेतृत्व में संचालित मीडिया कंपनी ‘कोबरापोस्ट’ ने इन दिनों दुनिया भर में मीडिया और मीडिया वालों की खराब स्थिति सुधारने को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चलाई जा रही मुहिम ‘सच कभी मरता नहीं’ का हिस्सा बनते हुए भारत में अपने खास अंदाज में अभियान को आगे बढ़ाया है. Continue reading

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नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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शातिराना अंदाज़ से मीडिया को बदनाम करने की साजिश

देश की आज़ादी से लेकर वर्तमान विकास तक जिस पत्रकारिता ने अपना अमूल्य योगदान दिया उसके साथ ही देश के संविधान ने सौतेला व्यवहार किया। यह संस्था वह कभी नहीं पा सकी स्थान नहीं पा सकी जिसकी यह हकदार थी।इस संस्था को पता ही नहीं चला कि कब इसके लोगों ने पत्रकारिता की पीठ में खंज़र भोंक दिया।आज भी चौथा स्तम्भ का अस्तित्व प्रसादपर्यंत है। आज चारों ओर पत्रकारिता के पेशे को बहुत ही घटिया नज़र से देखा जाने लगा है। जब कि आज भी यदि देश में कुछ अच्छा हो रहा है तो उसका पूरा श्रेय मीडिया को ही जाता है। लेकिन जो कुछ भी बुरा हो रहा है उसके लिए भी मीडिया ही जिम्मेदार है।

आज मीडिया एक मंडी बन चुकी है जहाँ रंडियों का राज है, खूब मोलभाव जारी है। कोई भी जाकर खरीदारी कर सकता है। हर वर्ग के लिए एक दूकान सजी है जिसके पास जितनी तथा है वह उतनी ही कथा सुन पा रहा है। कोई इससे अछूता नहीं। मीडिया की हालत और बद से बद्दतर होने वाली है क्योंकि मीडिया पर कब्ज़ा बड़े-बड़े व्यवसायी घरानों का है जिसे भेद पाना संभव नहीं। जाहिर है ऐसे में जो लोग मीडिया में आने की गलती कर चुके हैं वह किसी न किसी तरह अपने आप को जिन्दा रखना ही चाहेंगे। अब उनका जिन्दा रहना भी लोगों को अखरने लगा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मीडिया में गिरावट हो चुकी है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहाँ गिरावट न दर्ज की जा रही हो। मीडिया उससे अछूता कैसे रह सकता है।

मीडिया भी एक उद्योग बन चुका है। बहुत शातिराना अंदाज़ से मीडिया को बदनाम करने की साजिश सरकारें कर रही हैं। मीडिया को बाज़ार में बिकता कंडोम बना दिया है। यह जो है नहीं वह हमेशा से बताया गया। लिखत-पढ़त में संविधान के केवल तीन ही अंग है विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका चौथे को मीडिया बताया गया।  जिस आधार पर मीडिया को चौथा स्तम्भ कहा गया उस आधार पर देश का हर नागरिक पत्रकार है खासकर वर्तमान में जब सोशल मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है।  एक तरफ पूंजीपतियों का मीडिया पर कब्ज़ा है जिसे वही करना है जो सरकार चाहती है क्योंकि उनकी गर्दन सरकारों के हाथ में है। दूसरी ओर वह मीडिया वाले हैं जो अपने अखबार, न्यूज़ चैनल और अपने परिवार के जीवन यापन के लिए संघर्षरत हैं। इस दूसरे वर्ग के लिए न तो कोई मानदेय है और न ही कोई पूछनेवाला। अब इस दूसरे वर्ग की काबिलियत कहें या थेथरपन कि इनको गरियाते हुए ही सही कुछ समझ लिया जाता है।

आज सभी प्रोफेशन में या तो सैलरी है या फिर फीस. इस प्रोफेशन में न तो सैलरी है और न ही फीस। जैसे डाक्टर,वकील,इंजिनियर, आर्किटेक्ट, ज्योतिष, अध्यापक, मकैनिक  इन सबको या तो सरकार नौकरी देकर सैलरी देती है या फिर ये स्वयं मेहनत कर फीस लेकर काम करते हैं जिसे समाज और सरकार में मान्यता मिली है। अब बताईये पत्रकार क्या करे। कुछ पूंजीपतियों के यहाँ चाकरी करने वालों को छोड़ दें तो बाकी 80 फीसदी पत्रकार क्या करे और कहाँ जाए। सरकार के मानक पर खरे नहीं कि वह इन्हें विज्ञापन दे, जनता को इन्हें विज्ञापन देने से कोई लाभ नहीं।

सरकार ने बड़ी चालाकी से पत्रकारिता को छोड़ सभी प्रोफेशन में आने के लिए एक मानक तय की है लेकिन सम्पादक व पत्रकार बनाने के लिए उसके पास कोई मानक नहीं। भारत सरकार यह कभी नहीं पूछती कि अखबार या न्यूज़ चैनल चलाने वालों का शैक्षिक रिकार्ड क्या है। आखिर क्यों ? सरकार उसके अखबार,पत्रिका अथवा न्यूज़ चैनल के लिए मानक तय करती है। क्योंकि वह जानती है कि ये सब पूंजीपतियों का खेल है न कि बुद्धिजीवियों का। सरकारें यह भी जानती हैं कि कुछ दिनों में ही इनमे से 98 प्रतिशत बुद्धिजीवियों की जीविका बुद्धि पर आधारित न होकर सड़क से सदन तक दलाली और चाटुकारिता होकर सरकारी प्रतिनिधियों या नौकरों के तलवे चाटने को मजबूर होंगे। बाकी दो फीसदी बुद्धिजीवी केवल उधार की जिंदगी जीते हुए कभी सरकार को और कभी अपने आप को कोसते हुए पाए जायेंगे। इस तरह बिना सरकार के मर्ज़ी के कोई नहीं चल पायेगा वह चाहे करोड़पति हो या विपन्न पति। क्योंकि करोड़पति सरकारों से दोस्ती रखने को मजबूर है और विपन्नपति सरकार और सरकारी लोगों के रहमो – करम पाने को मजबूर है।

सबसे मजे की बात है कि अपने आपको चौथे स्तम्भ नामक अदृश्य पिलर के रक्षक होने का दावा विपन्न बुद्धिजीवी ही सबसे ज्यादा करते हैं। इनमे एक खास बात और है कि इनमे कुछ तो बुद्धिजीवी हैं और कुछ बनने का ढोंग करते हैं लेकिन कालांतर में यह फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि एक बेशर्मी से खा पीकर मोटा हो चुका है जिसे यह पता हो चला है कि ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं और वह खूब बोलता है, और दूसरे का पेट पीठ में धंसा चला जाता है जिससे बोलने की तो शक्ति छोड़िए जनाब सोचने की भी शक्ति क्षीण हो जाती है, और इसमें वह आगे निकल जाता है जो सिर्फ ढोंग करता था। अब आप सब स्वयं मंथन करो कि ऐसी दशा में आप पत्रकारिता से क्यों और कैसी उम्मीद करोगे? इसमें पत्रकारों का क्या दोष है? उन्हें तो गुमराह कर उनके कंधे का मात्र इस्तेमाल किया जा रहा है। और आपको नहीं लगता कि उपरोक्त दशा में उनका इस्तेमाल होना लाज़मी है।

लेखक शिव कृपाल मिश्र लखनऊ के पत्रकार हैं.

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परंजॉय गुहा ठाकुरता का इस्तीफा बताता है कि अब वैकल्पिक पत्रकारिता भी कारपोरेट दबाव से मुक्त नहीं

Amitaabh Srivastava : इकोनामिक और पालिटिकल वीकली की छवि एक अरसे से गंभीर वैकल्पिक और वैचारिक, विश्लेषणात्मक पत्रकारिता के झंडाबरदार वाली रही है। वरिष्ठ पत्रकार परंजाय गुहा ठाकुरता का इसके संपादक पद से इस्तीफ़ा और उसके पीछे सामने आई अब तक की वजहों से यह लगता है कि बदले माहौल में वैकल्पिक पत्रकारिता भी कारपोरेट दबाव से मुक्त नहीं है। Continue reading

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मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न। Continue reading

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मोदी राज में भारतीय मीडिया में नए तरह का खौफ, पत्रकार दबाव में : न्यूयार्क टाइम्स

भारत में मीडिया पर मोदी राज के खौफ को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाएं शुरू हो गई हैं. न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि 2014 में जबसे मोदी ने सत्ता संभाली, भारत के पत्रकारों को काफी दबाव का सामना करना पड़ रहा है. न्यूयार्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकालमें भारत के मीडिया में एक नए तरह का खौफ है. इन छापों ने भारतीय मीडिया के लिए खतरे की घंटी बजा दी है.

सबसे हास्यास्पद बात ये है कि न्यूयार्क टाइम्स के आरोपों का जवाब केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने दिया है, जो खुद सरकारी तोता के नाम से कुख्यात है. सीबीआई ने न्यूयार्क टाइम्स को पत्र लिखकर कहा है कि भारत को न्यूयार्क टाइम्स से प्रेस की आजादी के बारे में पाठ पढ़ने की जरूरत नहीं है. इस पूरे प्रकरण को कई अंग्रेजी-हिंदी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है. नीचे राजस्थान पत्रिका अखबार में प्रकाशित खबर की कटिंग दी जा रही है. साफ साफ पढ़ने के लिए न्यूज कटिंग के उपर ही क्लिक कर दें….

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दो मीडिया हाउसों के एचआर की कहानी- ”किसी की पैरवी है आपके पास?”

Hi all,

Although I didn’t want to share with you but now I feel it is must to share that how people from Hr Department waste job seeker candidates time. I guess they believe that they are equal to God and all job seekers are beggars.

Incident No-1

A friend of mine who is also a Hindi writer/journalist yesterday he received an interview call from India’s most trusted  media house that has both Hindi and English Language services for their readers. After completing the call the Hr said he is going to send him an SMS regarding Interview schedule, but he didn’t. Today Morning when my friend called him up regarding the interview schedule the Hr said that I thought I have sent you yesterday, its OK now I am going to send you an SMS…..

At the time of Interview my Friend was there in front of the Hr, Who took him to another room for written test. There my friend was given a laptop by some IT guy to do some translation job English to Hindi, to check his skills. As soon as my friend had stated his test he found there no Hindi Software in the given laptop, he asked the IT guy that where to get the Hindi Font?  Initially the IT guy was clueless, later some other person suggested him to the translation with the help of Google translation. My friend who is from a long time into Hindi Media knew everything but he was just observing the services or the system of their interview process. He started doing the translation with the help of Google tool. After completing the first paragraph…. all of sudden the laptop went off…. and he lost all his translated content as it was on Google tool.

He called the IT guy instantly who came and reacted very casually and after some technical exercise the laptop got started However he started doing the same task again the translation and after doing one and half paragraph translated the laptop went off again….

Now my friend became fed up with that, again he called up the IT Guy who was shocked and saying in Hindi “बंद कैसे हो गया ये?”   Before the IT Guy started the same IT Exercise again my friend asked him, that he wants to meet the Hr. Now the Hr has nothing to justify their services. He asked my Friend to wait outside after 5 minutes later the Hr came to my friend and said “YOU CAN LEAVE” without even saying sorry for his 3rd class services and for wasting someone’s precious time

Incident No-2

Around 6 months back another friend of mine who is also a Hindi writer/journalist received a call from one of the leading Hindi News paper. The female Hr told him that she got his CV from job portal and invited him for the interview. She sent him an email for the Interview scheduled.

While my friend reached their office he called the Hr before entering the office who answered him that she doesn’t sit at that office. However she guided him to go and meet the editor. My friend went to the reception of that Media House where he was guided towards the editor’s room. 

After some time he was sitting in front of the editor, the editor went through his CV and asked him 5 to 7 questions. Later the editor asked him “किसी की पैरवी है आपके पास?” My friend was shocked as he was called by their Hr Team; He said No, I got a call from your Company’s Hr department. The editor didn’t reply him anything… after that my friend was asked to wait and then he was finally answered actually there is no such post for which he was called, so he can leave. After coming out from the premises my friend called that female Hr to tell what he faced but she never received his call.

….AND THE MOST IMPORTANT THING IS THAT BOTH OF THE MEDIA HOUSE IS INDIA’S MOST POPULAR PUBLISHING HOUSES.

लेखक Vikash Rishi से संपर्क 9818868890 या vikash.makkar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

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राजकमल झा और इंडियन एक्सप्रेस की टीम को मेरा लाल सलाम

Samar Anarya : Most of the Indians in Panama Papers are patriots like Amitabh Bachchan, Adani who keep chanting Bharat Mata Ki Jai. Some of them are even Padma Awardees. Bharat Mata ki Jai. पनामा पेपर्स में सामने आए ज़्यादातर भारतीय नाम अडानी से अमिताभ बच्चन जैसे राष्ट्रवादियों के हैं जो अक्सर भारत माता की जय बोलते रहते हैं। कुछ तो पद्म पुरस्कृत भी हैं! भारत माता की जय।

Virendra Yadav : छात्रों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, सोशल एक्टिविस्टों और वामपंथियों के बाद अब अखबार भी ‘देशद्रोही’ होते जा रहे हैं. ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ का यह दुस्साहस कि ‘सदी के महानायक’ अमिताभ बच्चन, उनकी बहू ऐश्वर्या राय और अडानी आदि सरीखे ‘देशभक्तों’ को बेनकाब कर रहा है. जिन अमिताभ बच्चन की शपथ खाकर नैतिकता अपना कारोबार कर रही है, जो गुजरात के ब्रांड अम्बेसडर के रूप में अपनी आभा बिखेर रहे हैं और जिनकी महान छवि तले ज्ञानपीठ सम्मान भी कराह रहा है, ‘भारत माता’ के ऐसे भारत-पुत्र के बारे में राजकमल झा सरीखे अदना से अखबारनवीस का यह दुस्साहस कि वह ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ में यह न्यूजस्टोरी छापे. अच्छा ही हुआ कि राजकमल झा असफल उपन्यासकार सिद्ध हुए. लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व अंगरेजी उपन्यासों पर लिखे अपने लेख में मैंने इनके उपन्यास ‘दि ब्लू बेडस्प्रेड’ का पोस्टमार्टम किया था. साहित्य ने जिसे उलीच दिया वह पत्रकारिता का नगीना सिद्ध हुआ. तब मुझे नहीं पता था कि यह असफल उपन्यासकार एक दिन इतना साहसी और भंडाफोडू पत्रकार सिद्ध होगा. राजकमल झा और ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की टीम को मेरा लाल सलाम.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर और जाने माने आलोचक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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भारत को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा क्यों बन जाता है भारतीय मीडिया!

 

(देर आए, दुरुस्त आए… गलत प्रचारित खबर की सच्चाई अब सामने ला रहा भारतीय मीडिया.. एक अखबार के मेरठ-बागपत संस्करण में प्रकाशित खबर…)


भारतीय मीडिया किस तरह अपने ही देश को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा जाने-अनजाने बन जा रहा है, इसे जानना-समझना हो तो आपको बागपत के साकरोद गांव का मामला समझ लेना चाहिए. इस गांव के बारे में इंग्लैंड समेत कई देशों में खबर प्रचारित प्रसारित कर दी गई कि यहां की खाप पंचायत ने दो बहनों के साथ रेप कर उन्हें नंगा घुमाए जाने का आदेश दिया है. इसका कारण यह बताया गया कि लड़कियों का भाई ऊंची जाति की शादीशुदा औरत के साथ भाग गया था, इसलिए बदले में लड़कियों को दंडित करने हेतु दोनों बहनों से रेप करने का फरमान सुनाया गया.

यह मसला देखते ही देखते इंग्लैंड की पार्लियामेंट में भी गूंज गया. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए आनलाइन पीटिशन दायर कर सिग्नेचर कैंपेन शुरू कर दिया जिस पर करीब बीसियों हजार लोगों ने दस्तखत कर भी दिए. ब्रिटिश संसद ने तो बाकायदा प्रस्ताव पारित कर खाप पंचाय के आदेश की निंदा की और बहनों को उचित सुरक्षा देने की भारत सरकार से मांग की. इतने बड़े लेवल पर हो हल्ला होने के कारण दबाव में आई भारतीय मीडिया ने भी जोर शोर से इस मसले को छापना उठाना शुरू कर दिया. दिल्ली से बस सौ किमी दूर स्थित बागपत के साकरोद गांव में मीडिया वालों ने जाना उचित नहीं समझा. पर विदेशी ताकतों के हल्ला करने से उनके प्रभाव में आते हुए दो बहनों के साथ अन्याय की खबर बढ़ाचढ़ा कर प्रकाशित करना दिखाना शुरू कर दिया. विवेकहीन भारतीय मीडिया की इस हरकत को लेकर बागपत से लेकर मेरठ तक के लोगों में भारी गु्स्सा है. कुछ ने तो इसी गुस्से में साकरोद की सच्चाई और मीडिया की भूमिका को लेकर फेसबुक पेज तक शुरू कर दिया है. लिंक ये https://www.facebook.com/SankrodBaghpatTruth है.

टाइम्स आफ इंडिया ने पहल करते हुए अपने रिपोर्टरों इशिता भाटिया और मदन राणा को मौके पर भेजा. इन पत्रकारों ने ग्राउंड रिपोर्टिंग की. इनने जांच पड़ताल के बाद अपनी बाइलाइन रिपोर्ट में बताया कि ऐसी कोई खाप पंचायत यहां हुई ही नहीं. गांव का कोई भी आदमी खाप पंचायत होने की बात नहीं स्वीकार कर रहा और रेप जैसे फरमान के बारे में इनकार कर रहा है. सबका कहना है कि यह सब मनगढ़ंत बातें हैं. इस घटना को स्थानीय लोगों ने पूरी तरह नकार दिया है. टीओआई में छपी खबर को पढ़ने के लिए इस लिंक http://goo.gl/WJYSGB पर क्लिक करें.

इस बारे में बागपत के पत्रकार सचिन त्यागी बताते हैं: ”बागपत के साकरोद गांव का जो मामला आ रहा है उसने यहाँ के सभी बुद्धिजीवियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. दो बच्चों की नादानी ने आज इस गांव की मर्यादा को खतरे में डाल दिया है. मामले की हकीकत चाहे कुछ भी रही हो लेकिन एक बात जरूर सामने आई है. गांव में न तो पंचायत की गयी ओर न कोई फरमान जारी किया गया. मीडिया भी सारी हकीकत जानने के बाद सच्चाई का साथ नहीं दे रहा. गांव में जाकर जिसने भी सच्चई देखी, सब मामला समझ जाते हैं. मैं अकेला इस मामले पर अपनी राय दूँ तो कहा जायेगा कि किसी एक परिवार का साथ दे रहा हूं. लेकिन आप ही फैसला लें. एक परिवार लड़के वाले का है जो हर प्रकार से सम्पन्न है. घर में दो लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं और एक की तैयारी चल रही है. दूसरी ओर लड़की का परिवार है जिसके पास न तो कोई जमीन का टुकड़ा है और न ही कोई अपना रोजगार. दूसरों के यहां मजदूरी कर परिवार चलता है. अब आप ही बतायें कौन किस पर भारी है. लड़की की शादी हो चुकी है. वह अपनी ससुराल में है. गरीब परिवार की लड़की को अगर इस तरह बदनाम किया जाएगा तो क्या होता है, यह आप सब जानते हैं. मैं आज ये सब इसलिए आप से साझा कर रहा हूं कि आप भी इस मामले को लेकर किसी प्रकार के भरम में ना रहें. साकरौद गांव में शांति है और लड़की का परिवार हर सुबह आज भी मजदूरी पर निकल जाता है.”

मेरठ से जुड़े उद्यमी जे. विशाल कहते हैं: ”It’s a laudable attempt by TOI to have sent a female journalist to Sakrond to get the first person account from the villagers. Its shameful on the part of Amnesty International to launch an slanderous anti-India false Campaign when no such incident took place. We should condemn Amnesty International and the western approach to interfere in our sovereignty. Hats off to TOI and the reporter. Kudos.”

ऐसा यह पहली बार नहीं है जब दुष्प्रचार के लपेटे में आकर मीडिया वाले दुष्प्रचार को और ज्यादा प्रचारित प्रसारित कर देते हैं. कम से कम पत्रकारीय तकाजा यह कहता है कि ऐसे मामलों में फौरन जमीनी तथ्य पता लगाना चाहिए और ग्राउंड रियल्टी को रिपोर्ट करना चाहिए. हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में भी इसी तरह का एक घटनाक्रम हुआ. प्रचारित कर दिया गया कि 16 अप्रैल को धर्मशाला में कॉलेज की एक छात्रा के साथ दुष्कर्म हुआ है. इसके बाद पुलिस ने पांच दिन बिना एफआईआर मामले की जांच की, क्योंकि मामले के संबंध में न तो कोई शिकायतकर्ता था और न ही दुष्कर्म की बात फैलाने वाला कोई था. लेकिन सोशल मीडिया में यह मामला इतना फैल गया कि पुलिस को 20 अप्रैल को इस संबंध में मामला दर्ज करना पड़ा. मामला दर्ज होने के साथ ही 21 अप्रैल को पुलिस के हाथ दुष्कर्म की अफवाह फैलाने वाली महिला लगी. साथ ही 21 अप्रैल शाम तक यह बात साफ हो गई कि धर्मशाला में कोई भी दुष्कर्म नहीं हुआ है, बल्कि यह मात्र एक अफवाह थी. अब जाकर पता चला है कि धर्मशाला कॉलेज में हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले का संदेश कानपुर से निकला था. पुलिस अधिकारियों की जांच में यह खुलासा हुआ है. सोशल मीडिया में देश-विदेश में हड़कंप मचाने वाले कथित दुष्कर्म मामले का पहला संदेश कानपुर के एक युवक ने सोशल मीडिया में फैलाया था. इसके बाद इस संदेश ने सबको हिलाकर रख दिया था. हैरत की बात तो यह है कि मामले को शांत हुए महीनों का समय बीत चुका है, उच्च न्यायालय ने भी इसकी एफआइआर निरस्त कर दी है. फिर भी हाल ही में मामले के संदेश में सोशल मीडिया नया मैसेज फैला है. सहायक पुलिस अधीक्षक शालिनी अग्निहोत्री ने बताया कि उनकी निजी जांच में पता चला है कि मामले के संबंध में सोशल मीडिया पर फैला मेसेज कानपुर से निकला था. इस संदेश को फैलाने वाले का कहना है कि उसे भी किसी से यह संदेश प्राप्त हुआ है. सोशल मीडिया में धर्मशाला दुष्कर्म का मामला इतना अधिक सक्रिय हो चुका था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को मामले को जानकारी हो चुकी थी. इसके साथ ही इंटरनेट के गूगल में भी जब भी धर्मशाला नाम डाला जाता था तो सबसे पहले कथित दुष्कर्म की कहानी व उसके विरोध में हुए आंदोलन की फोटो आती थी.

तो सबक ये है कि अगर कोई भी सूचना आप तक या हम तक किसी माध्यम से पहुंचती है तो उस पर तुरंत विश्वास कर आवेशित हो जाने की बजाय उस सूचना के तथ्यों की पड़ताल में जुटना चाहिए. आज के दौर में जब मोबाइल के जरिए हर शख्स तक सूचनाओं, संदेशों, खबरों, जानकारियों, अफवाहों की सीधी और तुरंत पहुंच है, हम सभी को बेहद जिम्मेदार व धैर्यवान बनकर सूचनाओं के जंजाल की पड़ताल कर लेनी चाहिए. विशेषकर मीडिया हाउसेज से तो यह अपेक्षा की ही जाती है कि कौवा कान ले गया कहावत की तर्ज पर विदेश से आई देश के किसी हिस्से की खबर पर आंख मूंदकर भरोसा करने की जगह खुद उस जगह जाकर पड़ताल करा लेना चाहिए नहीं तो दुनिया में भारत की पहले से ही बिगड़ी सामाजिक छवि को और ज्यादा धक्का लगेगा. साकरोद मामले में अब जाकर भारतीय मीडिया ने अपनी गलती को ठीक करना शुरू किया है और विदेशी दुष्प्रचार के सुर में सुर न मिलाते हुए मौके से जानकारी लेकर खाप पंचायत न होने की खबरों का प्रकाशन शुरू किया है.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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Paid news in India and underpaid media employees

Whenever India runs an electoral battle, the ‘paid news’ syndrome in radio and television continues to haunt the general populace, as well as the election authority. A number of cases are already registered against various political parties for allegedly bribing some selected media houses of the largest democracy in the world or for facilitating campaign related favourable coverage in expenses of cash (or kind).

The year 2014 was in a real sense the polling time for the populous country, where 814 million Indian voters experienced the electoral battles to form India’s lower house of Parliament (Lok Sabha). The world media focused on India as the nation with over a billion population progressed for a new regime in New Delhi.

A robust and vibrant Indian media was glued to the poll battles, which were estimated to be worth $4.9 billion (Rs 300 billion). Understanding the growing influence of newspapers and news channels on millions of electorates, the Election Commission of India took some strict measures that could prevent the unsolicited use of media command by various political parties for their selfish interests.

Even exit polls for 16th Lok Sabha election were banned by the Commission as the polling began on April 7 and continued till May 12. The then Chief Election Commissioner V S Sampath, in an interview even asserted that the paid news practice by some media enterprises should be recognised as an offense under the country’s electoral law, the Representation of the People Act.

The Commission was monitoring the candidates’ expenditures for campaigning in the polls as the limit for each candidate was fixed on $112,600 (Rs 7 million). The election related campaigning through advertisements on radio, newspapers, television channels and even on internet outlets that might have cost millions of Indian rupees was also on the radar of the Commission.

In the practice of paid news, the owners of a newspaper/news channel demand money from the political party leaders with some hidden understandings. Hundreds of cases have been registered with the Commission with the allegations that politicians spend a huge amount of money to manipulate the media house managements for their good coverage and if possible spreading negative news regarding their opponents.

The arrangement helps the political parties to prepare a relatively lower electoral budget with the advantages of ‘bought media space’.

“Simply put, paid news is a form of advertising that masquerade as news,” said Paranjoy Guha Thakurta, a scholar on Indian mainstream media adding that the corruption in the Indian mass media is a complex phenomenon where “paid news entails illegal payments in cash or kind for content in publications and television channels that appears as if it has been independently-produced by unbiased and objective journalists.”

Speaking to this writer, Guha Thakurta also claimed that black money, which is difficult to track, is usually involved in paid news.

“Today much of the media is dominated by corporate conglomerates that have a single goal of maximizing profits.  The autonomy and the independence of the media are compromised because of the corruption within,” asserted the media commentator based in New Delhi.

Low journalist wages is also a factor in media manipulation by politicians. Free food and ‘expenses envelopes’ are common for reporters covering elections and other events in India, offering incentives for a more favourable angle and compensating for low wages.

Amidst the wave of national polls, India’s apex court on April 9 made a strong ruling that journalist employees should get their pay hike under the recommendations of Majithia Wage Board.

Dismissing the plea of various media house owners seeking review of its earlier judgment in this respect, the Supreme Court of India directed them to implement the recommendations of the new wage board from November 11, 2011.

Mentionable is that the latest report of national wage board for working journalists and other newspaper employees under the guidance of Justice G R Majithia was presented to the Union government in New Delhi on December 31, 2010.

“A fine, fair and judicious balance has been achieved between the expectations and aspirations of the employees and the capacity and willingness of the employers to pay,” said Justice Majithia in an interview.

He further added that the report has made some suggestions for the consideration of the government on issues like post-retirement benefits, a forward looking promotion policy, measures to improve enforcement of the wage board etc.

“Journalists are paid a lump sum without any welfare benefits and they can be dismissed at will. Except for some newspapers the mainstream publications had, ever since the wage board¹s award came out in 2010, conducted only diatribes against the award,” said an editorial of Economic & Political Weekly, a credible publication of India in its March 29, 2014 issue.

Referring to India’s apex court’s decision to uphold the recommendations of Majithia Wage Board for journalists and non-journalists on their pay structure, the AHRC urged media houses to honour and implement the recommendations of the latest wage board as a matter of priority.

It also called upon the State governments to ensure a safe working atmosphere for journalists and make provisions for social benefits like health and life insurance for the media employees.

The editor of The Assam Tribune, P G Baruah was candid when he spoke about the wage board implementation, “We have given the employees their due. It is our duty and also the gesture to them.”

All Assam Media Employees Federation (AAMEF), while addressing the matter of livelihood for media workers in northeast India has meanwhile urged media house managements to show their respect to the Supreme Court by implementing the new wage board at the earliest.

Appreciating the Assam Tribune group for implementing the latest wage board recommendations for the first time in the country, the AAMEF declared, “It is now time for other media groups to show their gestures to their own employees. We have a model media house (The Assam Tribune) that has survived successfully for two years with the new wage board facilities to the employees. Now we will not accept any logic that the Majithia recommendations are not implementable. Ultimately one has to have the minimum commitment to the medium,” said Hiten Mahanta, president of AAMEF.

Speaking to this writer, Mahanta, an Assam based senior journalist, expressed dismay that most media groups in the country have made it a habit to show a loss-making balance sheet every year with an aim to avoid paying proper salaries to the employees.

“But except a few, it’s a common practice for all the media barons to divert the funds from the collected amount of money from the advertisers to other non-media enterprises owned by their families,” he asserted adding, “With this evil practice, media owners continue siphoning away the essential resource of the media groups for  their selfish interest to establish the media business as an unprofitable enterprise.”

एशिया रेडिया टुडे डॉट कॉम में प्रकाशित नवा ठाकुरिया का विश्लेषण. साभार: AisaRadioToday.com

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भारत का मीडिया TRP के लिए दंगा, फसाद, हत्या, बलात्कार, धरना-प्रदर्शन, आगजनी और लूट के कार्यक्रम प्रायोजित करेगा!

Ajit Singh : पकिस्तान जब भारत से हारा तो पाकिस्तानियों ने अपने TV फोड़ दिए। ऐसा हमको मीडिया ने बताया। हम लोगों ने भी खूब चटखारे लिए। पाकिस्तानियों को इसी बहाने certified चूतिया घोषित कर दिया। बड़ा मज़ा आया। अब मीडिया ने दिखाया कि हिन्दुस्तान में भी लोगों ने TV फोड़ दिए। मैंने इस खबर को बड़े गौर से देखा। मीडिया ने ये भी बताया कि लोग आंसू बहा रहे हैं। उनके आंसू भी देखे । लोग tv सड़कों पे पटक रहे हैं। प्रश्न ये है कि लोग news channel के कैमरा को दिखाने के लिए टीवी फोड़ रहे हैं क्या ? लोगों ने tv खुद फोड़े या मीडिया ने स्टोरी बनाने के लिए फुड़वाये? पुराने टंडीरा TV हैं। साफ़ दिखाई दे रहा है। क्या ये नहीं खोजा जाना चाहिए कि ये नाटक किसने कराया? क्यों कराया? टीवी फोड़ने की घटना किसने शूट की? टीवी कहाँ से आये? कौन लोग थे जिनने अपना TV फोड़ा। जिन लोगों ने TV फोड़ा उन ने अपने घर से कभी संडास का mug भी फेंका है? रोने वालों में कुछ लोग तो स्टेडियम में बैठे हैं। बाकी जो बाहरी लोग दिल्ली मुम्बई में दिखाए जा रहे है वो बहुत घटिया acting कर रहे हैं। मीडिया वाले अपनी दुकानदारी चमकाने के चक्कर में सारी दुनिया को ये बताना चाहते है की सिर्फ पाकिस्तानी ही नहीं हम हिन्दुस्तानी भी certified चूतिया हैं ……ISO मार्का ….. हम भी किरकिट जैसे फर्जीवाड़े पे अपना TV फोड़ सकते हैं।

 

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खुशवंत सिंह ने एक बार लिखा था। किसी शहर के लोगों का बौद्धिक स्तर आंकना हो तो उसकी bookshops देखो। बड़ा सटीक आकलन है। इसी प्रकार किसी कौम, किसी मुल्क का बौद्धिक स्तर नापना हो तो उसका tv देखो, उसके entertainment चैनल देखो, उसके news channels देखो। सुविख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार Arthur Hailey ने News, पत्रकारिता और पत्रकारों की दुनिया पे एक बेहतरीन उपन्यास लिखा है- The evening news. ये उन दिनों की कहानी है जब रोज़ाना शाम को tv पे या रेडियो पे 15 मिनट के समाचार आया करते थे। उपन्यास में ये जद्दोजहद दिखाई है की किस प्रकार मात्र 15 मिनट में दिन भर की और देस और दुनिया जहान की खबरें दिखानी होती थी। उसमे कितनी ही महत्वपूर्ण खबरें छूट जाती थीं। कितनी काट छाँट दी जाती। इसके लिए Arthur Hailey ने एक टिप्पणी की थी- its like putting 10 pounds of shit in an 8 pound carry bag . It keeps coming out. अब ज़माना बदल गया है। भारत देश में तो न्यूज़ का स्तर इस कदर गिर चुका है की जिस खबर को डेढ़ मिनट में दिखा के खत्म करना चाहिए उसे आधे घंटे में दिखाया जाता है। एक ही clipping बार बार हर बार रिपीट होती रहती है. । एक ही वाक्य को 3 -3 बार बोलते हैं anchor. Indian media carries a spoon ful of shit in a 10 pound carry bag.

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70 के दशक में मशहूर उपन्यासकार Irving Wallace ने एक उपन्यास लिखा था। The Almighty. Almighty का अर्थ होता है सर्वशक्तिमान। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा जाता है। उपन्यास का कथानक कुछ यूँ है कि एक मीडिया tycoon अपने अखबार और न्यूज़ channel की TRP बढ़ाने के लिए पहले जघन्य हत्याएं और अपराध करवाता है और फिर अन्य अखबारों और news channels से पहले प्रसारित कर के TRP अर्जित करता है। पिछले दिनों देश में बेमौसमी बरसात हुई। ओले पड़े। फसलों को भी नुक्सान हुआ। मीडिया ने खूब घड़ियाली आंसू बहाये। अपने खेत की मेढ़ पे सिर पकडे बैठे किसान दिखाए। मेरी समझ में ये नहीं आया कि किसान और मीडिया का कैमरा एक साथ खेत पे पहुंचे कैसे? भारत मैच हार गया ऑस्ट्रेलिया से। मीडिया ने कबाड़ी की दूकान से कबाड़ के TV फोड़ने का प्रायोजित कार्यक्रम करवा के प्रसारित किया। लोग आंसू बहा रहे हैं। किरकिट के खेल में हार के देस शोक मगन है। इससे पहले हमारा मीडिया फ़र्ज़ी sting operation दिखाता आया है। एक चैनल ने इसी प्रकार दिल्ली की एक स्कूल टीचर पे human traffiking और prostitution में लिप्त होने का फ़र्ज़ी आरोप एक फ़र्ज़ी स्टूडेंट द्वारा लगवाया था। इसका नतीजा ये हुआ कि उस girls school के अभिभावक वो फ़र्ज़ी खबर देख के उस स्कूल के गेट पे एकत्र हो गए और उन्होंने उस बेचारी निर्दोष स्कूल टीचर से मारपीट की। और उस चैनल ने ये पूरा तमाशा लाइव दिखाया। इस फ़र्ज़ी sting और इस प्रायोजित आक्रोश और मारपीट का नतीजा ये निकला कि उस महिला और उनके परिवार भर का दिल्ली में रहना दूभर हो गया। कल्पना कीजिये कि एक मीडिया चैनल की बदमाशी के कारण आपके घर की माँ बहन बेटी बहू देश भर में वेश्या और वेश्याओं की दलाल घोषित हो जाए। बाद में जब जांच हुई तो पाया गया कि एक भांड चैनल ने एक free lancer सड़क छाप पत्रकार द्वारा एक फ़र्ज़ी प्रशिक्षु पत्रकार को उस स्कूल की फ़र्ज़ी छात्रा बना कर फ़र्ज़ी झूठे आरोप लगाए थे। बाद में दोनों पत्रकारों की गिरफ्तारी भी हुई और चैनल सिर्फ माफ़ी मांग के बच निकला। वो दिन दूर नहीं जब भारत का मीडिया TRP के लिए दंगा, फसाद, हत्या, बलात्कार, धरना, प्रदर्शन, आगजनी और लूट के कार्यक्रम (घटना) भी आयोजित प्रायोजित करेगा।

सोशल एक्टिविस्ट अजीत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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एक न्यूज चैनल जहां महिला पत्रकारों को प्रमोशन के लिए मालिक के साथ अकेले में ‘गोल्डन काफी’ पीनी पड़ती है!

चौथा स्तंभ आज खुद को अपने बल पर खड़ा रख पाने में नाक़ाम साबित हो रहा है…. आज ये स्तंभ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रहा है… खासकर छोटे न्यूज चैनलों ने जो दलाली, उगाही, धंधे को ही असली पत्रकारिता मानते हैं, गंध मचा रखा है. ये चैनल राजनेताओं का सहारा लेने पर, ख़बरों को ब्रांड घोषित कर उसके जरिये पत्रकारिता की खुले बाज़ार में नीलामी करने को रोजाना का काम मानते हैं… इन चैनलों में हर चीज का दाम तय है… किस खबर को कितना समय देना है… किस अंदाज और किस एंगल से ख़बर उठानी है… सब कुछ तय है… मैंने अपने एक साल के पत्रकारिता के अनुभव में जो देखा, जो सुना और जो सीखा वो किताबी बातों से कही ज्यादा अलग था…. दिक्कत होती थी अंतर आंकने में…. जो पढ़ा वो सही था या जो इन आँखों से देखा वो सही है…

कहते हैं किताबी जानकारी से बेहतर प्रायोगिक जानकारी होती है तो उसी सिद्धांत को सही मानते हुए मैंने भी उसी को सही माना जो मैंने अपनी आखों से देखा…  बहुत सुंदर लगती थी ये मीडिया नगरी बाहर से…. पर यहां केवल खबर नहीं बिकती… कुछ और भी बिकता है… यहाँ सिर्फ अंदाज़ नीलाम नहीं होते, यहां बिकता है स्वाभिमान… यहां क्रोमा के साथ और भी बहुत कुछ कट जाता है… यहां कटते हैं महिला पत्रकार के अरमान… यहां बलि चढ़ती है उसकी अस्मिता…. कामयाबी दूर होती है, लेकिन उसे पास लाने के यहां शॉर्टकट भी बहुत हैं… और उसे नाम दिया जाता है समझौता…

जब पहली बार एक नेशनल न्यूज़ चैनल के दफ्तर में कदम रखा तो सोचा था की अपनी काबलियत और हुनर के बलबूते बहुत आगे जाउंगी… आडिशन दिया… पीसीआर में खड़े लोगों ने अपनी आखों से ऐसे एक्सरे किया जैसे मेट्रो स्टेशन पर लगी एक्सरे मशीन आपके सामान का एक्सरे करती है… सिलेक्शन हुआ और शुरू हुआ मेरा भी करियर….. कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अपनी काबिलियत के बलबूते शायद मैं कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनने लगी…

जब एक नन्हा परिंदा खुले आसमान में उड़ने की कोशिश करता है तब उसी आसमान में उड़ती हुई चील उस पर झपट्टा मारकर उसे अपना शिकार बनाने की कोशिश करती है… कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होने लगा… मैं परेशान होकर सबसे पूछती फिरती कि आखिर बात क्या है… लेकिन किसी से जवाब नहीं मिलता… हार कर सीधे चैनल के मालिक से मिलने पहुंच गई… सोचा था कि यहाँ से तो हल जरूर मिलेगा.. लेकिन दिलो-दिमाग़ को तब 440 वोल्ट का झटका लगा जब ये पता चला कि मालिक से मिलने के बाद उनके साथ अंतरंग में एक कप काफ़ी पीनी पड़ेगी जो मेरे काम भी करा देगी, साथ ही साथ प्रमोशन और सैलरी में अच्छी खासी बढ़ोतरी करा देगी… ऑफिस की कई लड़कियां वो काफ़ी पी चुकी हैं… तब समझ आया कि जिनको JOURNALISM का J नहीं आता वो कैसे इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गये… जाहिर है सारा कमाल उस गोल्डन काफ़ी का था…

अब दो आप्शन थे मेरे सामने… या तो नौकरी छोड़ दूं या उस काफ़ी का एक सिप ले लूं… लेकिन मैं बेचारी, अपने काबिलियत को एक कप काफ़ी की कीमत से नहीं तौल पाई… और नौकरी छोड़ दी मैंने…. अब दूसरे संस्थान में हूं… ये कैसा सच है, जिसे सब जानते हैं लेकिन सब झूठ मानकर अपनी नौकरी बचाने के लिए चुपचाप बस देखते हैं… आंखें बंद कर लेते हैं… बात होती भी है तो बड़ी गोपनीयता से अपने विश्वसनीय सहयोगी के साथ.. प्राइम टाइम में गला फाड़-फाड़ कर दुनिया भर को बात-बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बातें करते समय शायद अपने चरित्र के बारे में भूल जाते हैं….  मैंने कहा था ना….. यहाँ सब बिकता है….. नैतिकता भी…..चरित्र भी….

एक युवा महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. महिला पत्रकार ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. उन्होंने जिस न्यूज चैनल के बारे में उपरोक्त बातें लिख कर भेजा है, वह चैनल कई वजहों से कुख्यात और विवादित रहा है. चैनल के बारे में कहा जाता है कि नाम बड़ा और दर्शन छोटे. चैनल हिंदुत्व के नाम पर चलाया जाता है और जमकर मीडियाकर्मियों का शोषण किया जाता है.

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हिलाने वाले पत्रकारों की खुद की कुर्सियां क्यों हिलने लगी?

आमतौर पर खोजी पत्रकारिता नेताओं की कुर्सियाँ हिलाती है, लेकिन पिछले सप्ताह भारतीय समाचारपत्र, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एक ख़बर छपने के बाद से अब पत्रकारों की कुर्सियाँ हिल रही हैं. ख़बर के मुताबिक़ कई पत्रकार एस्सार नाम की कंपनी के ख़र्चे पर टैक्सी जैसे फ़ायदे उठाते रहे हैं. आरोप मामूली हैं, लेकिन फिर भी अनैतिकता स्वीकारते हुए एक महिला और एक पुरुष संपादक ने अपने-अपने अखबारों से इस्तीफ़ा दे दिया है. एक टीवी समाचार चैनल में काम करने वाली एक और महिला पत्रकार को आंतरिक जाँच के चलते काम से हटा दिया गया है.

भारतीय पत्रकारों पर पहली बार उँगली नहीं उठ रही है. 2009 में भी कुछ फोन टेप सामने आए थे. आयकर विभाग की चंद पत्रकारों और सियासी बिचौलियों की फ़ोन पर बातचीत की गुप्त रिकॉर्डिंग से लग रहा था कि वो पत्रकारिता कम और दलाली ज़्यादा कर रहे थे. वैसे तो नेताओं और उद्योगपतियों से अख़बारों की साँठ-गाँठ का सिलसिला पुराना है, लेकिन भारतीय पत्रकारों के चाल-चलन में मूल्यों की व्यापक गिरावट ख़ासतौर से पिछले 25 सालों में आई है. इसके चार प्रमुख कारण हैं. पहला, पत्रकारों को मिले विशेष क़ानूनी संरक्षण का पतन. दूसरा, ख़बर की बजाए मुनाफ़े को प्राथमिकता. तीसरा, समाचार संगठनों में उद्योगपतियों का निवेश. और चौथा, पत्रकारों के निजी स्वार्थ.

पत्रकारिता की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में वर्किंग जर्नलिस्ट एंड अदर न्यूज़पेपर एम्पलॉइज़ एक्ट बनाया था. इस क़ानून ने पत्रकारों की मनमानी बर्ख़ास्तगी पर रोक लगा दी और ज़मीर का हवाला देते हुए पत्रकार के इस्तीफ़े को स्वत: लेबर विवाद का दर्जा दिया. नियुक्तियों, छुट्टियों और पदोन्नति इत्यादि के नियम निर्धारित किए. कानून ने सरकार को ज़िम्मेदारी दी कि तनख़्वाह में बढ़ोतरी तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज की अध्यक्षता में मालिक और कर्मचारी यूनियनों को लेकर एक ट्राइब्यूनल बनाए जो स्वतंत्र रूप से वेतनमान तय करे.

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट ने पत्रकारों को निष्पक्ष काम करने का साहस दिया. संपादकों की मनमानी इतनी आसान और आम नहीं थी जितनी आज है. अख़बार मालिकों की भी न्यूज़रूम में घुसपैठ कम थी. अस्सी के दशक का अंत आते-आते माहौल बदलने लगा. ट्राइब्यूनल द्वारा निर्धारित वेतन से तीन-चार गुना पगार पाने के आकर्षण में पत्रकारों ने स्वेच्छा से वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट छोड़ कर ठेके पर नौकरी करना मंज़ूर किया. इस तरह उनकी नौकरी एक झटके में असुरक्षित हो गई. साथ ही संपादकों ने अख़बार मालिकों के इशारों पर चलना शुरू कर दिया.

पुराने दौर में पत्रकारों का अख़बार के नफ़ा-नुक़सान के बारे में सोचना भी अनैतिक था लेकिन जब नौकरियाँ ठेके पर दी जाने लगीं तो न्यूज़रूम पर बाज़ार का क़ब्ज़ा हो गया. किसी ज़माने में दिग्गज बुद्धिजीवी, साहित्यकार और अर्थशास्त्री अख़बारों के संपादक होते थे. अब अख़बार के मालिक वफ़ादारों को संपादक बनाकर उन्हें मुनाफ़े की ज़िम्मेदारी देने लगे. अख़बार के पन्नों में ख़बर से अधिक विज्ञापन को प्राथमिकता मिलने लगी. विज्ञापन की ललक के चलते कॉरपोरेट सेक्टर की धांधलेबाज़ी की ख़बरें कम होती गईं. संपादक की पगार से अधिक मार्केटिंग और सेल्स के मैनेजरों की पगार होने लगी.

अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में लेटरप्रेस की जगह ऑफ़सेट प्रिंटिंग ने ले ली और क़लम-दवात की जगह कम्प्यूटर ने. नई तकनीक से छपाई की गुणवत्ता में सुधार आया. कम समय में अधिक प्रतियां छापना संभव हुआ. रंगीन छपाई शुरू हुई. साथ ही अख़बार छापने के लिए कर्मचारियों की ज़रूरत भी बहुत कम हुई. कुल मिलाकर अख़बार का धंधा मुनाफ़े के लिए मुफ़ीद होने लगा. लिहाज़ा ख़बर वो होने लगी जो बिकती थी. मनोरंजन, ग्लैमर, फ़ैशन, क्रिकेट के रंगीन परिशिष्ट छपने लगे. अख़बार का पहला पन्ना कभी पत्रकार का मंदिर होता था. नए दौर में उस पर कुबेर देवता का वास होने लगा.

कॉरपोरेट जगत से हाथ मिलाकर उनके प्रायोजन से अख़बारों ने सेमिनार और कॉन्फ़्रेंस वग़ैरह करवाने शुरू किए. पत्रकारों ने राज़ी-ख़ुशी इनमें कॉरपोरेट मैनेजरों के साथ कंधा मिला कर काम करना शुरू किया. इक्कीसवीं शताब्दी में समाचार टीवी चैनलों का विस्तार हुआ. ये शुरू से ही कॉरपोरेट विज्ञापनदाता के मोहताज रहे जो ख़बर के कार्यक्रमों को प्रायोजित करने लगे. विज्ञापन खोने के भय से अख़बारों का रुख़ और बाज़ारू होता गया.

एक वक़्त था जब अख़बार का सालाना ख़र्चा कमोबेश बिक्री और विज्ञापन से निकल ही आता था, लेकिन टीवी चैनल लगाने और चलाने के विशाल ख़र्चे विज्ञापन से पूरे नहीं हो सकते थे. ऐसे में बड़े उद्योगपतियों ने धंधे में पूँजी लगाना शुरू किया. इस तरह औद्योगिक व्यवस्था का प्यादा बन गए पत्रकार से निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की अपेक्षा बेतुकी और अनुचित है. वो पत्रकार नहीं “मीडियाकर्मी” है. उसका काम अख़बार की बिक्री और समाचार टीवी चैनल की रेटिंग बढ़ाना है. और ऐसा भी नहीं कि आज पत्रकार इस उत्तरदायित्व से क़तराना चाहता है बल्कि हर पत्रकार आगे बढ़ कर मैनेजर की ज़िम्मेदार ओढ़ने की कामना रखता है. आख़िरकार धंधे में ऊपर चढ़ने की अब यही एक सीढ़ी है.

वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही का यह आलेख बीबीसी डाट काम में प्रकाशित हो चुका है.

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मजीठिया वेज बोर्ड : यशवंत के साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए

Rajendra Hada


मंगलवार, 20 जनवरी 2015 की शाम भड़ास देखा तो बड़ी निराशा हुई। सिर्फ 250 पत्रकार मजीठिया की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए? दुर्भाग्य से, जी हां दुर्भाग्य से, मैंने ऐसे दो प्रोफेशन चुने जो बुद्धिजीवियों के प्रतीक-स्तंभ के रूप में पहचाने माने जाने जाते हैं। वकालत और पत्रकारिता। दुर्भाग्य इसलिए कि दुनिया को अन्याय नहीं सहने की सलाह वकील और पत्रकार देते हैं और अन्याय के खिलाफ मुकदमे कर, नोटिस देकर, खबरें छापकर मुहिम चलाते हैं लेकिन अपने मामले में पूरी तरह ‘चिराग तले अंधेरा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। अपनी निजी भलाई से जुडे़ कानूनों, व्यवस्थाओं के मामले में बुद्धिजीवियों के ये दो वर्ग लापरवाही और अपने ही साथियों पर अविश्वास जताते हैं। यह इनकी निम्नतम सोच का परिचय देने को काफी है।

दस साल तक दैनिक नवज्योति अखबार और उसके बाद दस साल तक दैनिक भास्कर अखबार में रहते हुए साथियों के अनुभव से मैंने यही जाना कि सेठ यानि मालिक सिर्फ मालिक होता है और आप सिर्फ नौकर। आप मालिक के साथ कितनी भी भलाई करें, मालिक अगर आपको दूध में मक्खी की तरह निकालना होगा तो, निकालकर ही मानेगा। मेरे साथ गनीमत रही कि जहां भी रहे, अपनी योग्यता के बल पर टिके रहे। पार्ट-टाइम रहते हुए भी जब जी चाहा तब तक नौकरी की और इच्छा होने पर बाकायदा एक महीने का नोटिस दिया। नोटिस में दी तारीख से अखबार के दफ्तर जाना छोड़ दिया। मालिक या संपादक के फैसले का इंतजार नहीं किया। इसीलिए नोटिस और इस्तीफे आज तक संभाल कर मेरे पास रखे हुए हैं।

हां, तो मैं बात कर रहा था साथियों की। मजेदार बात यह है कि मालिक के मुहंलगे, हां में हां मिलाने वाले, चमचागिरी कर यसमैन बने पत्रकार भी जरूरत पड़ने पर ऐसे आंखे फेर लेते हैं जैसे साथियों को जानते तक नहीं। हालात ऐसे होते हैं कि कई बार तो वह मालिक तो क्या शहर के एमएलए और अफसरों के तलुए चाटते दिखते हैं लेकिन अपने साथियों को इस कदर उपेक्षित करते हैं कि वे सोचने को मजबूर हो जाते हैं। यह और बात है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती और जो अन्याय खुद अपने साथियों के साथ करते हैं, कुछ समय बाद उनके साथ वैसा तो क्या उससे बुरा भी होता है। भले ही वह झूठी शान में मरे जाते हैं परंतु उनकी हकीकत किसी से छिप नहीं पाती। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं, भगवान ने चाहा तो बहुत जल्द बाकायदा नाम सहित आपके सामने वे नंगे खड़े होंगे। कुछ ऐसा ही हाल वकालत में है परंतु वह फिर कभी।

अभी तो जमाना यह है कि आप बेइमान को बेइमान, घोटालेबाज को घोटालेबाज और चोर को चोर भी कह नहीं सकते। ऐसा कहते ही वे आपसे बात करना छोड़ देते हैं। आपको देखते ही मुंह फेर लेते हैं। उन्हें लगता है जैसे आंख बंद कर ली है तो अंधेरा हो गया है। उनके घर में एक पैसे की मेहनत की कमाई नहीं होती परंतु करोड़ों के मकान में रहते हैं, बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं। कुर्सी पर जब भी ये लोग जमे तो फर्जीवाड़े ऐसे-ऐसे किए कि आज तक हाथ पैर चलाए बिना उन बेनामी ट्रांजेंक्शंस की फसले काट रहे हैं। तुर्रा यह कि बनते ऐसे ईमानदार हैं कि दुनिया में राजा हरीशचंद्र के बाद पैदा ही वे हुए हैं। कई संस्थाओं में पैसा लगा हुआ है। नरेंद्र मोदी की नकल में ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसे नारे लगा रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे आखिर कहना क्या चाह रहा हूं। दोस्तों यह भड़ास ही है जिस पर आपके सामने इन बेइमानों, घोटालेबाजों, चोरों के गिरोह के सभी लोगों को नंगा करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा कहने की हिम्मत भी इसलिए है कि यह यशवंत और उनका भड़ास ही है कि कई मुद्दे इस पर उठाए जा चुके हैं और उठाए जाएंगे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इनके पैरोकारों में तो वह ताकत रही नहीं कि कुछ लिखा जाए। वे खुद तो इतने पंगु है कि गलत होते हुए भी उसे गलत कहने का साहस नहीं रखते, अगर आप उस बारे में कुछ लिख देते हैं तो उसे छापने की हिम्मत भी नहीं रखते। अगर वह हिम्मत रखते हैं तो उनका सेठ इसकी इजाजत नहीं देता। परंतु वे कुर्सी पर जमे रहते हैं।

यशवंत से अपनी रूबरू मुलाकात सिर्फ दो दफा, और फोन व भड़ास के माध्यम से कई दफा की है। यशवंत को इतना विश्वास है कि अपन कभी गलत खबर नहीं भेजते और ना भेज सकते हैं। इसी कारण उन्होंने आज तक कोई इंक्वायरी नहीं की कि खबर क्यों छापी जाए। जो भेजा वह छापा। आप लड़ते हैं, यशवंत आपका साथ देते हैं। अजमेर से सवा तीन सौ किलोमीटर दूर बैठे और शायद आठ सौ किलोमीटर दूर के मूल बाशिंदे पर इतना विश्वास सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि यशवंत आपके लिए लड़ते हैं। जब मामला आपका निजी हो तो भी वे जी जान लगा देते हैं और आप हैं कि खुद ही पीछे हट जाते हैं। जैसे कि इस बार मजीठिया के मामले में कर रहे हैं।

मजीठिया मिलने और सुप्रीम कोर्ट जाने से यशवंत को कुछ नहीं मिलने वाला। वे आपके लिए लड़ रहे हैं। ऐसे में आप उनके साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने का साहस कीजिए। आप खुशनसीब हैं कि आपको यशवंत के रूप में आपका कोई हमदम, कोई दोस्त है। उस दोस्त की कद्र कीजिए। उस पर विश्वास कीजिए। दोस्तों जिंदगी में अवसर कभी कभार दस्तक देता है। इस अवसर को मत चूकिए। मजीठिया की लड़ाई लड़ने की पहल यशवंत ने की है। आप कम से कम साथ तो दीजिए। साथ ना सही पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए। 

राजेंद्र हाड़ा
वरिष्ठ पत्रकार और वकील
अजमेर
राजस्थान
संपर्क : 09829270160, 09549155160
rajendara_hada@yahoo.co.in


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दीपक सरीखे पत्रकारों को सोशल मीडिया की गलियों में खोना नहीं है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

: “पंडित जी, बीपीएल या बीएमडब्ल्यू… चुनना तो एक को ही पड़ेगा” : धारदार पत्रकारिता से मात तो मीडिया को ही देनी है दीपक शर्मा! : बीपीएल या बीएमडब्ल्यू। रास्ता तो एक ही है। फिर यह सवाल पहले नहीं था। था लेकिन पहले मीडिया की धार न तो इतनी पैनी थी और न ही इतनी भोथरी। पैनी और भोथरी। दोनों एक साथ कैसे। पहले सोशल मीडिया नहीं था। पहले प्रतिक्रिया का विस्तार इतना नहीं था। पहले बेलगाम विचार नहीं थे। पहले सिर्फ मीडिया था। जो अपने कंचुल में ही खुद को सर्वव्यापी माने बैठा था। वही मुख्यधारा थी और वही नैतिकता के पैमाने तय करने वाला माध्यम। पहले सूचना का माध्यम भी वही था और सूचना से समाज को प्रभावित करने वाला माध्यम भी वही था। तो ईमानदारी के पैमाने में चौथा खम्भा पक़ड़े लोग ही खुद को ईमानदार कह सकते थे और किसी को भी बेईमानी का तमगा देकर खुद को बचाने के लिये अपने माध्यम का उपयोग खुले तौर पर करते ही रहते थे।

बंधु, लेकिन अंतर तो पहले भी नजर आता था। कौन पत्रकार बीपीएल होकर पत्रकारिता करने से नहीं हिचकता और किसकी प्राथमिकता बीमडब्ल्यू है। लेकिन पहले कोई विस्तार वाला सार्वजनिक माध्यम भी नहीं था जिसके आसरे बीएमडब्ल्यू वाली पत्रकारिता का कच्चा चिट्टा सामने लेकर आते।

यह ठीक है लेकिन हमारे समाज का भी तो कोई सोशल इंडेक्स नहीं है। जिसे जितना कमाना है वह कमाये। जिसे जितना बनाना है वह बनाये। कोई रोक-टोक नहीं है। दिल्ली में तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, जो पेशे से वकील हैं या रहे हैं, एक पेशी के 20 से 40 लाख रुपये तक लेते हैं। संपादक की पहुंच पकड़ अगर सत्ताधारियों के बीच है तो उसका पैकेज करोड़ों में होता है। किसी भी धंधे में कोई कमाते-खाते हुये यह कहने से नहीं कतराता है कि अगर उसके पास करोड़ों है तो वह उसकी सफेद कमाई के हैं। अब आप करोगे क्या।

बंधु, एक चैनल पत्रकारों का हो इसके लिये तो आपको करोड़पति होना होगा, उसके बाद आप पत्रकार हैं या चिट-फंड वाले या बिल्डर या दलाल। सरकार की नीतियों तक तो इसका असर पड़ता नहीं है। तो फिर इस बीपीएल और बीएमडब्ल्यू के रास्ते की बात करने का मतलब है क्या। हां अब हालात इस मायने में जरुर बदले है कि दलाल पत्रकारों को सत्ता अपने साथ सटने नहीं दे रही है। लेकिन इसका दूसरा सच यह भी है कि दलालों के तरीके और उसकी परिभाषा बदल रही हैं। काबिलियत की पूछ तो अब भी नहीं है। या यह कहें कि देश में सत्ता बदली है तो नये सिरे से नये पत्रकारों को सत्ता अपने कटघरे में ढाल रही है। तब तो यह बीच का दौर है और ऐसे मौके का लाभ पत्रकारिता की धार के साथ उठाना चाहिये। बिलकुल उठाना चाहिये।

लेकिन इसके लिये सिर्फ सोशल मीडिया को तो माध्यम बनाया नहीं जा सकता। सोशल मीडिया एक कपडे उघाडने का मंच है। कपडे पहनकर उसके अंदर बाहर के सच को बताने का माध्यम तो है नहीं। नहीं आप देख लो। मनमोहन सिंह के दौर के तुर्रम संपादक मोदी के आने के बाद सिवाय सोशल मीडिया के अलावा और कहां सक्रिय नजर आ रहे हैं। लेकिन वहां भी तो भक्तों की मंडली पत्रकारो की पेंट उतारने से नहीं चुकती। सही कह रहे हैं, लेकिन इस सच को भी तो समझें कि रईसी में डूबे सत्ता की चाशनी में खुद को सम्मानित किये इन पत्रकारो ने किया ही क्या है। तब तो सवाल सिर्फ मनमोहन सिंह के दौर के पत्रकारो भर का नहीं होना चाहिये। हमने देखा है कैसे वाजपेयी की सरकार के बाद बीजेपी कवर करने वाले पत्रकार ही कद पाने लगे । और लगा कि इनसे बेहतर पत्रकार कोई है ही नहीं। पत्रकारिता खबर ब्रेक करने पर टिकी। सत्ता ने खबर ब्रेक अपने पत्रकारों से करायी। और खबर का मतलब ही धीरे धीरे सत्ता की खबर ब्रेक करने वालों से होने लगी। सोनिया गांधी पीएम बनना नहीं चाहती हैं। या अंबानी बंधुओं में बंटवारा हो रहा है । वाजपेयी मुखौटा है। आडवानी संघ के चहते हैं। इन खबरो को ब्रेक करने वाला ज्यादा बड़ा पत्रकार है या साईंनाथ सरीखा पत्रकार, जो किसानो की बदहाली के बीच सत्ता की देशद्रोही नीतियों को बताना चाहता है। यह सवाल तो अब भी मौजूं है। खाता कोल कर सीधे गरीब के एकाउंट में पैसा पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिये या यूरिया बाजार में उचित दाम पर मिल जाये । पीएमओ की ताकत के सामने कैबिनेट भी नतमस्तक कैसे हो चली है, यह छुपाया जाये और सत्ता की नीतियों के एलान को ही मीडिया के भोपूं के जरीये दुनिया तो ज्यादा जोर सुनाया जाये। और इसे ही पत्रकारिता मान लिया जाये। यही सवाल तो महत्वपूर्ण है। तो फिर धार का पैमाना हो कैसा।

यार आप बात देश की कर रहे हो और हर दिन जिस वातावरण में नौकरी करनी पड़ती है, उसमे चापलूसी , अपने प्यारे को ही आगे बढ़ाने की सोच, अपनी कुर्सी को ही सबसे विद्दतापूर्ण बताने जताने का खुला खेल। खुद को बचाते हुये हर दिन अपने ही इर्द-दिर्द ऐसी खबरो को तरजीह देना जो आपकी समझ में आती हों। जो आपके अपनों की हो। और स्क्रीन पर वही चेहरा-चेहरे, जिससे आपको प्यार है उस वातावरण में आपका पूरा दिन तो सिवाय जहर का घूंट पीने के अलावे और किसमें गुजरेगा। इतना ही नहीं, आपकी लायी बेहतरीन खबर की भी हत्या करने में कितना वक्त लगेगा। डाक्यूमेंट पूरे नहीं हैं। प्रतिक्रिया हर किसी की चाहिये। फायदा क्या है दिखाने का। कौन देखना चाहता है यह सब। टीआरपी मुश्किल है। हुजुर हजारों हथियार है नाकाबिल एडिटर के पास।

फिर भी यार भीतर रह कर लड़ा जा सकता है। बाहर निकलकर हम आप तो कहीं भी काम कर लेंगे । लेकिन जिन संस्थानों में जो नयी पीढी आ रही है, उनका भी सोचिये। या नाकाबिलों के विरोध करने की हिम्मत कहां बच रही है। नाकाबिल होकर मीडिया में काम आसानी से मिल सकता है। बंधु सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं है। सत्तादारी भी तो नहीं चाहते है कि कोई उनसे सवाल करे। तो वह भी भ्रष्ट्र या चार लाइन ना लिख पाने या ना बोल पाने वाले पत्रकारों को ज्यादा तरजीह देते हैं। जिससे उनकी ताकत, उनकी नीतियां या उनकी समझ पर कोई उंगुली उठाता ना दिखे। यह ऐसे सवाल हैं, जिन पर बीते दस बरस से कई कई बार कई तरीको से बात हुई।

जी, यह उस बातचीत का हिस्सा है जो 2004 में पहली बार मुलाकात के वक्त मीडिया को लेकर सवाल हों या पत्रकारिता करने के तरीकों को जिन्दा रखने की कुलबुलाहट होती थी और जब सांप-छछुंदर की खबरों ने पत्रकारीय पेशे को ही दिन भर चाय की चुस्की या हवाखोरी में तब्दील करते हुए दिल्ली से दूर निकल जाने के लिये खूब वक्त मुहैया कराया था। या फिर जैसे ही देश में मनमोहन सरकार की बत्ती गुल होने की खुशी के वक्त चर्चा में मोदी सरकार को लेकर कुछ आस जगाने की सोच हो। या फिर अंबानी-अडानी की छाया में दिल्ली की सत्ता तले सियासी बहस के दौर में मीडिया की भूमिका को लेकर उठते सवालों के बीच धारदार पत्रकारिता कैसे हो, इसका सवाल हो। आपसी चर्चा तो राडिया टेप पर पत्रकारों की भूमिका को लेकर भी खूब की और पत्रकार से मालिक बनते संपादकों की भी की और मालिको का पत्रकार बनने के तौर तरीको पर खूब की।लेकिन हर चर्चा के मर्म में हमेशा पत्रकारिता और जीने के जज्बे की बात हुई। इसलिये राबर्ट वाड्रा पर पहले कौन राजनेता अंगुली उठायेगा और जब नरेन्द्र मोदी ने पहली बार खुले तौर पर वाड्रा को कठघरे में खड़ा किया तो भी विश्लेषण किया कि कैसे बीजेपी का भी दिल्ली में कांग्रेसीकरण हो गया था और मोदी क्यो अलग है।

चर्चा मनमोहन सिंह के दौर के क्रोनी कैपटिलिज्म के दायरे में पत्रकारों के खड़े होने पर भी बात हुई। फिर मुज्जफरनगर दंगों में सैफई के नाच गानों के बीच यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा करने का जज्बा हो। या मोदी सरकार के महज एलानिया सरकार बनने की दिशा में बढते कदम। हर बार ईमानदार-धारदार पत्रकारिता को ही लेकर बैचेनी दिखायी दी। लेकिन जैसे ही यह जानकारी मिली की बारह बरस बाद दीपक शर्मा आजतक छोड़ रहे हैं और यह कहकर छोड़ रहे हैं कि कुछ नया,कुछ धारदार करने की इच्छा है तो पहली बार लगा कि मीडिया संस्थान हार रहे हैं। जी दीपक शर्मा की अपनी पत्रकारिता है या पत्रकारिता को जीने के हर सपने को बीते बारह बरस में बेहद करीब से या कहें साझीदार होकर जीने के बीच में यह सवाल बार बार परेशान कर रहा है कि जिसके लिये पत्रकारिता जीने का अंदाज है। जिसके लिये ईमानदार पत्रकारिता जीने का नजरिया हो। जिसके लिये तलवार की नोंक पर चलते हुये पत्रकारिता करना जिन्दगी का सुकुन हो, वही ऐसे वक्त पर यह क्यों कह रहा है कि दिल्ली आया था तो अकबर रोड भी नहीं जानता था। आजतक में काम करते हुये आजतक ने अकबर बना दिया। अब दुबारा रोड पर जा रहा हूं। यह बेचैनी दीपक से पत्रकारिता के लिये कोई वैकल्पिक रास्ता निकलवा ले तो ही अच्छा है । क्योंकि दिल्ली में अब सवाल अकबर रोड का नहीं रायसीना हिल्स पर खड़े होकर बहादुरशाह जफर मार्ग को देखने समझने का भी है। और शायद भटकते देश को पटरी पर लाने का जिम्मा उठाने का वक्त भी है। इसलिये दीपक सरीखे पत्रकारों को सोशल मीडिया की गलियों में खोना नहीं है और हारे हुये मीडिया से शह पाकर मात भी उसी मीडिया को देनी है जो धंधे में बदल चुका है।

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.


मूल पोस्ट….

आजतक को अलविदा कह दिया दीपक शर्मा ने

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7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

इस अदभुत आर-पार की लड़ाई में मीडियाकर्मी अपनी पहचान छुपाकर और नौकरी करते हुए शामिल हो सकते हैं व मजीठिया का लाभ पा सकते हैं. बस उन्हें करना इतना होगा कि एक अथारिटी लेटर, जिसे भड़ास शीघ्र जारी करने वाला है, पर साइन करके भड़ास के पास भेज देना है. ये अथारिटी लेटर न तो सुप्रीम कोर्ट में जमा होगा और न ही कहीं बाहर किसी को दिया या दिखाया जाएगा. यह भड़ास के वकील उमेश शर्मा के पास गोपनीय रूप से सुरक्षित रहेगा. इस अथारिटी लेटर से होगा यह कि भड़ास के यशवंत सिंह आपके बिहाफ पर आपकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ सकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में आपका नाम कहीं न खुलेगा न कोई जान सकेगा. दूसरी बात. जो लोग अपने नाम पहचान के साथ लड़ना चाहते हैं, उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं है. उनका तहे दिल से स्वागत है. ऐसे ही मजबूत इरादे वाले साथियों के साथ मिलकर भड़ास मजीठिया की आखिरी और निर्णायक जंग सुप्रीम कोर्ट में मीडिया हाउसों से लड़ेगा.

बतौर फीस, हर एक को सिर्फ छह हजार रुपये शुरुआती फीस के रूप में वकील उमेश शर्मा के एकाउंट में जमा कराने होंगे. बाकी पैसे जंग जीतने के बाद आपकी इच्छा पर निर्भर होगा कि आप चाहें भड़ास को डोनेशन के रूप में दें या न दें और वकील को उनकी शेष बकाया फीस के रूप में दें या न दें. यह वैकल्पिक होगा. लेकिन शुरुआती छह हजार रुपये इसलिए अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपये लगते हैं, लेकिन एक सामूहिक लड़ाई के लिए मात्र छह छह हजार रुपये लिए जा रहे हैं और छह हजार रुपये के अतिरिक्त कोई पैसा कभी नहीं मांगा जाएगा. हां, जीत जाने पर आप जो चाहें दे सकते हैं, यह आप पर निर्भर है. बाकी बातें शीघ्र लिखी जाएगी.

आपको अभी बस इतना करना है कि अपना नाम, अपना पद, अपने अखबार का नाम, अपना एड्रेस, अपना मोबाइल नंबर और लड़ाई का फार्मेट (नाम पहचान के साथ खुलकर लड़ेंगे या नाम पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ेंगे) लिखकर मेरे निजी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर भेज दें ताकि यह पता लग सके कि कुल कितने लोग लड़ना चाहते हैं. यह काम 15 जनवरी तक होगा. पंद्रह जनवरी के बाद आए मेल पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद सभी से अथारिटी लेटर मंगाया जाएगा. जो लोग पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर भेजना पड़ेगा. जो लोग पहचान उजागर कर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें केवल याचिका फाइल करते समय उस पर हस्ताक्षर करने आना होगा.

हम लोगों की कोशिश है कि 15 जनवरी को संबंधित संस्थानों के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा की तरफ से लीगल नोटिस भेजा जाए कि आपके संस्थान के ढेर सारे लोगों (किसी का भी नाम नहीं दिया जाएगा) को मजीठिया नहीं मिला है और उन लोगों ने संपर्क किया है सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए. हफ्ते भर में जिन-जिन लोगों को मजीठिया नहीं मिला है, उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतनमान देने की सूचना दें अन्यथा वे सब लोग सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने को मजबूर होंगे.

हफ्ते भर बाद यानि एक या दो फरवरी को उन संस्थानों के खिलाफ याचिका दायर कर दी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट से इस अनुरोध के साथ कि संबंधित संस्थानों को लीगल नोटिस भेजकर मजीठिया देने को कहा गया लेकिन उन्होंने नहीं दिया इसलिए मजबूरन कोर्ट की शरण में उसके आदेश का पालन न हो पाने के चलते आना पड़ा है.

और, फिर ये लड़ाई चल पड़ेगी. चूंकि कई साथी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर जीत चुके हैं, इसलिए इस लड़ाई में हारने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मुझसे निजी तौर पर दर्जनों पत्रकारों, गैर-पत्रकारों ने मजीठिया की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के तरीके के बारे में पूछा. इतने सारे सवालों, जिज्ञासाओं, उत्सुकताओं के कारण मुझे मजबूरन सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा जी से मिलना पड़ा और लड़ाई के एक सामूहिक तरीके के बारे में सोचना पड़ा. अंततः लंबे विचार विमर्श के बाद ये रास्ता निकला है, जिसमें आपको न अपना शहर छोड़ना पड़ेगा और न आपको कोई वकील करना होगा, और न ही आपको वकील के फीस के रूप में लाखों रुपये देना पड़ेगा. सारा काम आपके घर बैठे बैठे सिर्फ छह हजार रुपये में हो जाएगा, वह भी पहचान छिपाकर, अगर आप चाहेंगे तो.

दोस्तों, मैं कतई नहीं कहूंगा कि भड़ास पर यकीन करिए. हम लोगों ने जेल जाकर और मुकदमे झेलकर भी भड़ास चलाते रहने की जिद पालकर यह साबित कर दिया है कि भड़ास टूट सकता है, झुक नहीं सकता है. ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है जिसके खिलाफ खबर होने पर हम लोगों ने भड़ास पर प्रकाशित न किया हो. ऐसे दौर में जब ट्रेड यूनियन और मीडिया संगठन दलाली के औजार बन चुके हों, भड़ास को मजबूर पत्रकारों के वेतनमान की आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए एक सरल फार्मेट लेकर सामने आना पड़ा है. आप लोग एडवोकेट उमेश शर्मा पर आंख बंद कर भरोसा करिए. उमेश शर्मा जांचे परखे वकील हैं और बेहद भरोसेमंद हैं. मीडिया और ट्रेड यूनियन के दर्जनों मामले लड़ चुके हैं और जीत चुके हैं.

दुनिया की हर बड़ी लड़ाई भरोसे पर लड़ी गई है. ये लड़ाई भी भड़ास के तेवर और आपके भरोसे की अग्निपरीक्षा है. हम जीतेंगे, हमें ये यकीन है.

आप के सवालों और सुझावों का स्वागत है.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
+91 9999330099
+91 9999966466
yashwant@bhadas4media.com


मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना आर्टकिल यूं है…

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50 से ज्यादा मासूमों-गरीबों के हत्यारे ये बोडो वाले ‘आतंकवादी’ ना होकर ‘उग्रवादी’ बने रहते हैं!

Nadim S. Akhter : सिर्फ पाकिस्तान, कश्मीर, अमेरिका और मुंबई जैसी जगहों पर लोगों के मरने पर इस देश के लोगों का खून खौलता है. बाकी टाइम देश में शांति छाई रहती है. अमन-चैन कायम रहता है. मीडिया-सरकार-सोशल मीडिया, हर जगह. कोई शर्मिंदिगी नहीं जताता, कोई अफसोस नहीं करता, कोई कविता नहीं लिखता, कोई मोमबत्ती की फोटुक नहीं लगाता, कोई अपनी जातीय-मजहबी पहचान को लेकर पश्चाताप-संताप नहीं करता.

कोई बदला लेने की बात नहीं बोलता, कोई किसी को नीचा दिखाने का भाषा का इजाद नहीं करता, कोई एंकर या रिपोर्टर सुपर-चार्ज नहीं होता, किसी सम्पादक का खून नहीं खौलता, किसी की आंख का पानी नहीं मरता, कोई मातम नहीं मनाता, कोई 2 मिनट का मौन नहीं रखता, कोई अतिउत्साही फेसबुकीय-ट्विटरीय प्राणी अपना मौन व्रत नहीं तोड़ता और कोई अपनी मर चुकी भावनाओं-एहसास को अल्फाज नहीं देता….. सब के सब मौन हैं. घुप सन्नाटा…गहरा सन्नाटा…कुछ भारत रत्न के अलंकरण के प्रकाशोत्सव में नहाए हुए और कुछ अपने डेली रूटीन में बिजी. रगों में दौड़ते रहने के ना थे जी तुम कायल, अब असम को देख तुम्हारी आंख से जो ना टपका, फिर वो लहु क्या है…?

नवभारत टाइम्स के वेब संस्करण की हेडलाइन है- ”बोडो उग्रवादियों ने असम में 50 लोगों की हत्या की.” अब 50 से ज्यादा मासूमों-गरीबों को अंधाधुंध गोलियों से छलनी करने के बाद भी अगर ये बोडो वाले –आतंकवादी— ना होकर —उग्रवादी— बने रहते हैं तो भारत के लोगों और भारत की मीडिया, आपकी मर्जी.

वक्त आ गया है कि -उग्रवादी- -चरमपंथी- जैसे शब्दों का त्याग करके आप सीधे -आतंकवादी- शब्द का इस्तेमाल शुरु करें. और हे भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जी, इस बार तो दुश्मन-कातिल सरहद पार से नहीं आए हैं. आपके अपने ही देश में छिपे-घुसे बैठे हैं. ढूंढकर क्यों नहीं निकालते उनको? अब कौन सा बहाना है आपके पास??!!!

आप अमेरिका और इस्राइल की तारीफ करते नहीं थकते. अगर वहां देश में रह रहे ऐसे आतंकवादियों ने 50 मासूमों की जान ले ली होती तो क्या अमेरिका या इस्राइल जैसा देश खामोश रहता. ओसामा बिन लादेन को उन्होंने हजारों किमी दूर दूसरे देश पाकिस्तान में ढूंढकर और घुसकर मारा. और आप लोग क्या कर रहे हैं??!!!

शोले के वीरू की भाषा में कहूं तो एक-एक को चुन-चुनकर मारता. जरूर मारता. लेकिन आप तो अपने घर में बैठे इन आतंकवादियों को ना तो मार सकते हैं और ना पकड़ सकते हैं. और रही मीडिया की बात. तो अभी वह अपने शैशवकाल में है. बेचारे -अक्ल के धनी- अभी यही फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि ये चरमपंथी हैं, उग्रवादी हैं या फिर आतंकवादी ??!!! हम भारत के लोग इस मानवीय त्रासदी को जब सही-सही लिख भी नहीं पा रहें हैं तो बोलेंगे क्या और करेंगे क्या ???!!!

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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श्वेता प्रसाद बसु का मीडिया के नाम खुला पत्र… क्या किसी संपादक में जवाब देने की हिम्मत है?

मीडिया वालों ने श्वेता प्रसाद बसु को वेश्या बता दिया लेकिन कोर्ट ने वेश्यावृत्ति के आरोपों को खारिज कर दिया. अब कहां गये मीडिया वाले. क्या वे श्वेता प्रसाद बसु की इज्जत से खेलने के आरोपी नहीं बन चुके हैं. श्वेता प्रसाद बसु ने खुद को बरी किए जाने के बाद मीडिया वालों को एक खुला पत्र लिखा और बेहद कड़े टोन में ऐसी तैसी की है. अगर मीडिया वालों में, मीडिया के संपादक लोगों, मीडिया के टीआरपी खोरों में थोड़ी भी शरम बाकी हो तो उन्हें इस खुले पत्र का खुला जवाब जरूर लिखना चाहिए. श्वेता का मीडिया के नाम खुला पत्र इस प्रकार है….

Dear,

Members of Media,

I grew up admiring some great journalists and reporters who, some times report even live from war-torn borders, natural disaster sites, terror attacked locations, etc. without hesitating a bit. These heroes inspired me to pursue my degree in Mass Media and Journalism degree too. I always thought, ‘wow! These guys, the media, actually risk their lives to bring us the truth’. And boom! You create a mess in my very life. Well done.

I understand that everything was a chain of reaction and versions of the incident with several mis-leading stories were picked up along with my………..wait, NOT MY ‘statement!’, which said:

“I have made wrong choices in my career, and I was out of money. I had to support my family and some other good causes. All doors were closed, and some people encouraged me to get into prostitution to earn money. I was helpless, and with no option left to choose, I got involved in this act. I’m not the only one who faced this problem, and there are several other heroines who have gone through this phase”

Seriously?? Whoever you are, who imagined this statement, were you smoking funny cigarettes at work? Who talks like that? This sounds like a dialogue from some 80’s Bollywood film. And why so many ‘and’ in that statement, go back to school amateur!

Thankfully my family, my friends and my circle of people didn’t believe this statement. They know I do not speak like that. But, for the rest of India or anyone, anywhere on planet, for the last time : THIS IS NOT MY STATEMENT!

The problem with our society is, as long as I was given sympathy and everyone went ‘awwww’, ‘poor girl’, ‘so sad’ and so on, everybody was supporting me. But, as soon as people understand that they got carried away by a false statement and a girl of 23 can be strong and can stand on her own feet without any sympathies, the society feels that she is lying?? What’s my fault if the news were the way they were? I cannot force anyone to like or respect me. These happen naturally. What happened was beyond my control.

After my detainment, I went straight to the rescue home where I stayed for 59 and a half days. (60th day, I came home), then where and how did I give a statement to media? My phone was confiscated, I made few last calls to Maa and few other close friends. I had absolutely no access to newspapers, television, internet or radio for those 2 months. I had no clue what was going on outside Prajwala rescue home, Mehboob Nagar (outskirts of Hyderabad). Although I had a lovely time there teaching kids Hindi, English and Hindustani Classical vocals. I always do and I always will count those children in my prayers. I also read 12 books in those 2 months. Yes 12. Spent my time very productively.

But, after I came back home in Mumbai on 30th October 2014, I came across all the reports that had been around for those 2 months when I was absent and I was more amused than disappointed!

A report also said that ‘the cops’ said I gave that ‘statement’, which was denied by the Police in Hyderabad when I confronted them. One of the Police said, that no press notes were released by the department of Police, Hyderabad, of any such statement made by me. And anyway, Police is not allowed to reveal identity in such cases, so it was not possible by them to reveal any such statement. It’s against the law. And how could they, firstly this statement does not exist. I was absent in the scene and that was an advantage for it to do the rounds.

And who are these business men in my life? I am just as curious as all of you!
So, here is the riddle: Why were the business men names who were caught ‘along with me’ not revealed?
Clue: Were there any business men with me in that room at the time of detainment in the first place?

Think Think.

PROVE IT!

I was in Hyderabad for Santhosham Awards, which was conducted on 30th August. I was never encouraged to get into commercial sex and no agent booked my tickets and stay there! My tickets and accommodation was done by the award event organizers. The hotel where I stayed with other guests of the award ceremony was a hospitality partner with the event. I still have the itinerary in my email inbox.

My parents did not want me to act after Iqbal (2005). My parents’ bigger concern was me passing my 10th and 12th grade properly and not jumping into movies at 16! We don’t dine at Wasabi every other weekend but that doesn’t mean my parents have not done enough to bring me up well. I had the best possible education, birthday gifts, family vacations, Sports clubs for playing a sport and enrollment at Music Institute for learning music (I learn The Sitar from Sangit Mahabharati, Juhu, Mumbai), everything that a normal upper-middle class parents can do.

I did few south films (Telugu and Tamil) when I was about 18 and then past 3 and half years I had been busy making a documentary film called Roots on Indian Classical music, starring interviews of Ustad  Amjad Ali Khan, Pt Shiv Kumar Sharma, Shubha Mudgal, A R Rahman, Vishal Bhardwaj, Dr L Subramaniam, Pt Hari Prasad Chaurasia to name a few. In fact, in June 2014 along with a friend, Adhiraj Bose I also co-produced and acted in a 12 minute short film named INT. CAFÉ NIGHT that starred myself along with Shernaz Patel, Naseeruddin Shah and Naveen Kasturia, which is doing rounds of film festivals right now. I have been auditioning for acting assignments as well. So what ‘doors’ were closed? Please get your facts right before jumping into conclusions!

However, on 5th December 2014 the Metropolitan Sessions Court, Nampally, Hyderabad, gave me clean chit in the case and withdrew the charges and stay order against me made by the trial court.To all those who supported me through out all this, thank you so much, extending a big hug to all of you.

Anyway, enough said, enough heard. I have completely gone past the whole incident and I overlook everyone who picked up false statement(s) and encouraged mis-leading stories without verifying it’s authenticity. I overlook, because this episode does not deserve any more attention!

-ShwetaBasu Prasad
6/12/2014

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दृष्टिहीन युवा बेटे की मौत के बाद समीर जैन कुछ-कुछ आध्यात्मिक हो गए!

: लेकिन हरिद्वार छोड़ते ही वे एकदम हार्डकोर बिजनेसमैन बन जाते हैं : देश की सबसे ज्यादा कमाऊ मीडिया कंपनी है – बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी। यह कंपनी टाइम्स ऑफ इंडिया, इकॉनोमिक्स टाइम्स, महाराष्ट्र टाइम्स, नवभारत टाइम्स, फेमिना, फिल्मफेयर जैसे अनेक प्रकाशनों के अलावा भी कई धंधों में है। टाइम्स ऑफ इंडिया जो काम करता है, उसी की नकल देश के दूसरे प्रमुख प्रकाशन समूह भी करते है। यह कंपनी अनेक भाषाओं के दैनिक अखबार छापना शुरू करती है, तो दूसरे अखबार मालिक भी नकल शुरू कर देते है। दैनिक भास्कर समूह, दैनिक जागरण समूह, अमर उजाला समूह, राजस्थान पत्रिका समूह जैसे ग्रुप ‘फॉलो द लीडर’ फॉर्मूले के तहत चलते है। टाइम्स ने मुंबई टाइम्स शुरू किया, भास्कर ने सिटी भास्कर चालू कर दिया।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने जैकेट एड चालू किए, दूसरे अखबारों ने भी कर दिए। टाइम्स ऑफ इंडिया ने  8  की बजाय 10 कॉलम शुरू किए। दूसरे अखबारों ने भी विज्ञापनों में 10  कॉलम चालू कर दिए। टाइम्स ऑफ इंडिया रंगीन हुआ, तो दूसरे अखबार भी रंग-बिरंगे हो गए। टाइम्स ऑफ इंडिया ने क्लासीफाइड सेक्शन के फोन्ट का साइज छोटा किया तो दूसरे अखबारों ने भी नकल शुरू कर दी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जितने पुलआउट शुरू किए है, धीरे-धीरे हिन्दी के प्रमुख अखबारों ने भी किसी न किसी रूप में उससे मिलते-जुलते पुलआउट शुरू कर दिए। टाइम्स ऑफ इंडिया ने टीवी चैनल, इंटरनेट संस्करणों, नए पोर्टल, मोबाइल एप, रेडियो आदि शुरू किए, तो सब की निगाहें इस तरफ चली गई। टाइम्स ऑफ इंडिया देश के तमाम मीडिया घरानों के लिए ‘प्रॉफिट मेकिंग मीडिया कंपनी का मॉडल’ है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के हिन्दी अखबारों में भाषा की दुर्गति शुरू हुई, तो दूसरे हिन्दी प्रकाशनों ने भी उसे अपना लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रिंट और इंटरनेट संस्करणों में सेमी पोर्नो कंटेंट शुरू हुआ, तो सभी ने इसे सक्सेसफुल  बिजनेस फॉर्मूले की तरह अपना लिया।

मैंने 15 साल से भी ज्यादा इस समूह में काम किया है। दावे से कह सकता हूं कि नौकरी करने के लिए इससे अच्छी कंपनी अभी तक नहीं मिली। यहां सरकारी कानूनों का अधिकतम पालन होता है। पत्रकारों को दूसरे जगह की तुलना में ज्यादा आजादी है। वेतन के बारे में इतना कहना ही काफी होगा कि इस कंपनी के 100  प्रतिशत कर्मचारी आयकर दाता है। टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह में काम करने वाले चपरासी भी आयकर दाता है। एक जमाना था जब यह ग्रुप टाइम्स आई फाउंडेशन के नाम से एक संस्था चलाता था और नेत्रदान को बढ़ावा देने का काम करता था। पुस्तकों के विज्ञापन इसके प्रकाशनों में 50  प्रतिशत छूट पर छपते थे। विधवा महिलाओं के वैवाहिक विज्ञापन नाम मात्र की कीमत पर छापे जाते थे। अब न तो टाइम्स आई फाउंडेशन की गतिविधियां है और न ही पुस्तकों को बढ़ावा देने की कोई पहल। भारतीय ज्ञानपीठ के पीछे इसी समूह का प्रमुख योगदान रहा है।

अब जो टाइम्स ऑफ इंडिया या बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी बची है, वह ऐसी कंपनी के रूप में जानी जाती है, जिसका एक मात्र और केवल एक मात्र लक्ष्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना है। इस कंपनी के वार्षिक मुनाफे का आकार हजार करोड़ से ऊपर है। अभी भी इसके प्रकाशन मुनाफा कमाने की दृष्टि से शीर्ष प्रकाशन की श्रेणी में रखे जा सकते है। इस कंपनी की चेयरमैन है श्रीमती इंदु जैन। जो एक परम विदुषी महिला है और जिनका दुनियाभर में बहुत सम्मान है। उनके बड़े बेटे समीर जैन इस कंपनी के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। समीर के छोटे भाई विनीत जैन इस कंपनी के एमडी हैं। इसके अलावा समीर जैन की बेटी-दामाद भी कंपनी के डायरेक्टरों में शामिल हैं। भारत की इस सबसे कमाऊ मीडिया कंपनी के सर्वे-सर्वा इन दिनों जमकर माल कूट रहे हैं। कंपनीज एक्ट 1956 के सेक्शन 217 (2ए) के अनुसार किसी भी कंपनी के उन सभी कर्मचारियों और डायरेक्टरों के नाम उजागर करना आवश्यक है, जिनका वेतन 5 लाख रुपए या उससे अधिक प्रतिमाह है।

बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी की सालाना 2013-14  की रिपोर्ट में बताया गया है कि कंपनी 81 लोगों को इस श्रेणी में रखती है, जो पांच लाख रुपए प्रतिमाह से अधिक पाते है। दिलचस्प बात यह है कि इन 81 लोगों में से तीन लोग ऐसे है जो इसका आधे से भी ज्यादा हिस्सा पा रहे है। ये तीन लोग 58 प्रतिशत राशि पा रहे है और बचे हुए 78 लोग 46 प्रतिशत। इन बचे हुए 78 लोगों में से भी कंपनी के वाइस चेयरमैन विनित जैन की बेटी तृष्ला जैन और उनके पति सत्यन गजवानी भी शामिल है।

सन् 2013-14 में कंपनी की चेयरमैन श्रीमती इंदु जैन ने 15 करोड़ 53 लाख रुपए मेहनताना पाया। उनके बड़े बेटे और वाइस चेयरमैन समीर जैन ने 37 करोड़ 52 लाख रुपए पाए। इन दोनों से ज्यादा कमाई कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर विनीत जैन की रही जिन्होंने 31 मार्च 2014 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में 46 करोड़ 38 लाख रुपए वेतन पाया। विनीत जैन को इसके अलावा 17 करोड़ 50 लाख रुपए ‘वन टाइम स्पेशल बोनस’ रुपए भी दिए गए। इस तरह विनीत जैन की कमाई 63 करोड़ 88 लाख रुपए रही। समीर जैन की बेटी ने इस वित्तीय वर्ष में 69 लाख रुपए पाए। जबकि उनके पति ने 51 लाख। बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी पब्लिक लिमिटेड कंपनी है, जिसे अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करना ही पड़ती है, जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की कई कंपनियां ऐसी है जो प्रायवेट लिमिटेड कंपनी है।

विनीत जैन का मेहनताना कंपनी ने लगातार बढ़ाया है। 2010-11 की तुलना में 2013-14 में उन्होंने 184 प्रतिशत ज्यादा वेतन पाया है। 2010-11 में समीर जैन सबसे ज्यादा तनख्वाह पाने वाले संचालक थे, जिन्होंने 18 करोड़ 70 लाख रुपए कमाए थे। उनके छोटे भाई विनीत ने 16 करोड़ 30 लाख और उनकी माता श्रीमती इंदु जैन ने 15 करोड़ 39 लाख रुपए मेहनताना पाया था। 2010-11 में समीर जैन के दामाद सत्यन गजवानी ने 93 लाख रुपए वेतन पाया था, तब वे कंपनी के सीईओ रवीन्द्र धारीवाल के एक्जीक्यूटिव आसिस्टेंट थे।

यह जरूरी नहीं कि इस रिपोर्ट में दिखाया गया धन ही सी2सी (यानि कॉस्ट टू कंपनी) हो। बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी में करीब 11 हजार कर्मचारी काम करते है। जिनमें सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले गैर जैन अधिकारी है। कंपनी के सीईओ रवीन्द्र धारीवाल। उन्हें कुल मिलाकर 2013-14 में पांच करोड़ 58 लाख रुपए मिले। 4 साल पहले उनका वेतन 3 करोड़ 8 लाख रुपए था। इस कंपनी के अन्य हाइली पैड अधिकारियों में अरुणाभदास शर्मा (ईडी एंड प्रेसीडेंट) है. जिन्हें 3 करोड़ 66 लाख वेतन मिला है। सीओओ श्रीजीत मिश्रा को 2 करोड़ 91 लाख, आर. सुन्दर को 2 करोड़ 64 लाख, जॉय चक्रवर्ती को 2 करोड़ 29 लाख रुपए वेतन मिला।

इन 81 उच्चतम वेतन पाने वालों में संपादकीय विभाग के 10 लोग भी नहीं है। 11वें नंबर पर टाइम्स ऑफ इंडिया के एडिटोरियल डायरेक्टर जयदीप बोस है, जिन्हें 1 करोड़ 94 लाख रुपए मिले, जबकि सन 2010-11 में उनका वेतन 4 करोड़ 24 लाख रुपए था। इस बारे में बताया गया है कि उनका मेहनताना लगभग आधा नहीं किया गया, बल्कि पूर्व के वेतन भत्तों में से कुछ एडजस्ट किया गया है। इकोनॉमिक्स टाइम्स के एडिटोरियल डायरेक्टर राहुल जोशी, इकोनॉमिक्स टाइम्स के ही आर. श्रीधरण, निकुंज डालमिया सीनियर एडिटर, शैलेन्द्र स्वरूप भटनागर चीफ एडिटर मार्केट एंड रिसर्च, संतोष रामचंद्र मेनन असिस्टेंट एक्जीक्यूटिव एडिटर, बोधीसत्व गांगुली डेप्यूटी एक्जीक्यूटिव एडिटर, ओमर कुरैशी सीनियर वीपी और नबील मोहिद्दीन उन लोगों में शामिल है, जिन्हें कंपनी ने सबसे ज्यादा वेतन पाने वालों में गिना है। इन 81 लोगों में हिन्दी-मराठी के किसी भी प्रकाशन का कोई भी व्यक्ति नहीं है।

यह कोई छोटी बात नहीं है कि जब दुनियाभर में अखबार प्रकाशित करने वाली कंपनियां मुनाफे के लिए संघर्ष कर रही है, तब टाइम्स ऑफ इंडिया समूह देश का सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाले समूह के रूप में अपनी धाक जमा रहा है। इस पूरी कंपनी पर जैन परिवार का ही नियंत्रण है। कंपनी की वित्तीय स्थितियों के बारे में जानकारियां कम ही बाहर आ पाती है। अब इस कंपनी के शेयर देश के शेयर बाजारों में लिस्टेड है। इस समूह में बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी के अलावा 63 कंपनियां शामिल है।

इस कंपनी की तरक्की की तेजी की शुरूआत 1987 में हुई जब अशोक कुमार जैन से उनके बेटे समीर जैन ने कामकाज संभाला। समीर जैन ने आक्रामक तरीके से समूह के कारोबार को फैलाया आदर्शवादी नीति को उन्होंने दरकिनार कर दिया और मुनाफे, केवल मुनाफे पर ध्यान केन्द्रित किया। वे सारे प्रकाशन, जो समूह के कुल मुनाफे का 2 प्रतिशत या उससे कम देते थे, बंद कर दिया गया। इलेस्ट्रेटेट वीकली ऑफ इंडिया, इवनिंग न्यूज ऑफ इंडिया, धर्मयुग, पराग, सारिका, यूथ टाइम्स, दिनमान,  टाइम्स ईयर बुक आदि बंद कर दिए गए।

अपने दृष्टिहीन युवा बेटे की मृत्यु के बाद समीर जैन कुछ-कुछ आध्यात्मिक हो गए और हरिद्वार में एक कोठी बनवाकर गंगा किनारे काफी समय बिताने लगे, लेकिन वे आध्यात्मिक तभी होते हैं जब उनका ठिकाना हरिद्वार में हो। हरिद्वार छोड़ते ही वे एकदम हार्डकोर बिजनेसमैन बन जाते हैं। अब उम्र के छह दशक पूरे करने वाले समीर जैन ने अपने छोटे भाई विनीत को प्रमुख जिम्मेदारियां सौंप दी हैं। विनीत जैन भी बिजनेस के मामले में अपने पिता या मां पर नहीं, बड़े भाई पर गए हैं। समीर जैन से भी ज्यादा आक्रामक और तेजी से फैसले लेने वाले विनीत जैन ने एक अमेरिकी पत्रिका को इंटरव्यू में कहा कि हम कोई मीडिया या न्यूज के बिजनेस में नहीं है, हम है विज्ञापन के बिजनेस में। अगर हमारी इनकम का 90 प्रतिशत हिस्सा विज्ञापनों से आता है तो हमें यह कहने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि हम विज्ञापन की दुनिया के लोग हैं।

लेखक प्रकाश हिन्दुस्तानी  करीब तीन तीन दशकों से पत्रकारिता में हैं. डेढ़ दशक उन्होंने टाइम्स समूह के धर्मयुग और नवभारत टाइम्स में बिताया है. यह लेख उनके ब्लॉग  http://prakashhindustani.blogspot.in से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. प्रकाश हिंदुस्तानी से संपर्क +91 98930 51400 के जरिए किया जा सकता है.

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर उपजा ने मनाया समारोह, पत्रकारिता की जीवंतता पर छिड़ी बहस

लखनऊ। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया जगत, खासकर अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों का आह्वान किया है कि वे अच्छी खबरें लिखकर समाज में सकारात्मक सोच पैदा करें। माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया काउंसिल की पुरजोर वकालत की। पाण्डेय रविवार को राजधानी में राष्ट्रीय प्रेस दिवस समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) और इसकी स्थानीय इकाई ‘लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ ने संयुक्त रूप से किया था।

शीघ्र ही राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त होने जा रहे प्रदेश के वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी, भारतीय प्रेस काउंसिल के सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी, राज्य के सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के लखनऊ ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी, पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना, ‘उपजा’ के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित, महामंत्री रमेश चन्द्र जैन आदि ने निडर एवं फ्री प्रेस की महत्ता पर अपने गम्भीर विचार रखे और प्रेस की मजबूती तथा स्वतंत्रता के अलावा पत्रकारों के आर्थिक हितों व उनकी सुरक्षा पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ल ने किया।

सप्रू मार्ग स्थित उद्यान विभाग सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करने वाले उप्र विधानसभा के अध्यक्ष पाण्डेय ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि लोकतंत्र में ‘पब्लिक ओपिनियन’ का बहुत महत्व होता है। इस प्रणाली में विशेष रूप से प्रिण्ट मीडिया जनता की राय बनता है। लिहाजा उसके पत्रकारों को चाहे वे संवाददाता हों, अथवा डेस्क पर कार्यरत सम्पादक, उन्हें बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि उनकी लिखी और सम्पादित खबरें सनद व दस्तावेज बन जाती हैं जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग तो अपने समाचार प्रस्तुत करने के बाद उसे हटा भी लेते हैं।

पाण्डेय ने कहा कि खबरों, पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर भी अंकुश रखने तथा उन्हें मार्गदर्शित करने के लिए प्रेस परिषद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु इसका विस्तार किया जाना चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा खबरिया चैनल भी इसकी परिधि में आ सकें। इस सम्बन्ध में उन्होंने मीडिया काउंसिल बनाये जाने की पुरजोर वकालत की। उन्होने कहा कि एसोसिएशन के माध्यम से मीडिया काउंसिल के गठन के लिए एक प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार के पास भेजना चाहिए।

इसके साथ ही पाण्डेय ने, जिनकी समाज में एक समाजवादी ‘एक्टिविस्ट’ के रूप में अहम भूमिका रही है, पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा बढाये जाने की जरूरत पर बल दिया। विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पाण्डेय ने पूर्व में एक बार  विधानसभा में  पत्रकारों के लिए पेश पेंशन विधेयक के  पूर्ववर्ती एक सरकार द्वारा वापस ले लेने पर अफसोस जताते हुए कहा कि पत्रकारों के लिए सरकार को कुछ अलग से देने के लिए सोचना चाहिए । पाण्डेय ने कहा कि समाज के सजग प्रहरी के नाते मीडिया के लोग खुद अपने लिए आचार संहिता बनाएं, साथ ही अपने कर्त्तव्यों को सही ढंग से समाज के व्यापक हित में निभाएं।

उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के अध्यक्ष जावेद उस्मानी ने (जिन्हें शीघ्र राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालना है) इस अवसर पर अत्यन्त विस्तार से पत्रकारिता के स्वरूप व इसकी महत्ता की विवेचना की। उस्मानी ने कहा कि मीडिया सर्चलाइट के समान है। स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग, घटक तथा कडी है। यह सूरज की रोशनी की मानिन्द ‘समाज के अंधेरे’ में पहुंचकर उसके सभी विकारों को खत्म कर सकता है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मीडिया और सूचना के अधिकार अधिनियम का उपयोग लोकतंत्र में शासन-प्रशासन तथा प्रणाली की खामियों को दुरुस्त करने में करें।

राज्य के मुख्य सचिव रह चुके उस्मानी ने कहा कि अच्छे पत्रकारों को चाहिए कि वे अपनी बौद्धिकता तथा साधनों का इस्तेमाल उन लोगों के विरुद्ध करें जो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए समाज तथा जन के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रेस की भूमिका समाज हितैषी बातों तथा सुझावों को नीति निर्माताओं तक पहुंचाना और उनकी पैरोकारी करना होनी चाहिए। प्रेस के लोग शासन के कार्यों की सही मॉनिटरिंग करें। इस मौके पर  उस्मानी ने उपस्थित पत्रकार-समुदाय को आश्वस्त किया कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालने पर वे देखेंगे की जनता को सूचनाएं मिलने में कहां अवरोध हैं और उन्हें यथासम्भव दूर करने की कोशिश करेंगे।

एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके व प्रेस काउंसिल के नव मनोनीत सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी ने अपने सम्बोधन में पत्रकारों के संकल्प तथा विजन पर जोर दिया, साथ ही कहा कि केवल लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता सम्भव हैय लिहाजा प्रेसकर्मियों, कर्मचारियों और नियोक्ताओं में बेहतर समझ होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे छद्म जीवन का मोह न रखें, और अपने कार्यों को विश्वास व समझ के साथ पूरा करें तभी प्रेस काउंसिल बनाने का लक्ष्य पूरा होगा और इसे सशक्त बनाया जा सकेगा।

सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को पत्रकारों के लिए ब्रम्हास्त्र बताया और इसके उपयोग से हो रहे नित खुलासों के प्रति सन्तोष प्रकट किया है। उन्होने कहा कि आरटीआई के प्रयोग से पत्रकार पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने की दिशा में काम कर सकता है। स्वदेश कुमार ने सोशल मीडिया, प्रिण्ट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दायित्व की चर्चा करते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सक्रियता ने अखबारों पर दबाव बढा दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के व्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने समाज को दिशा तथा निर्देशन में मीडिया की अहमियत को रूपांकित करते हुए लोकतंत्र में इसकी भूमिका पर जोर दिया एवं यह भी कहा कि मीडिया और इसके लोग भी अपने गिरेबान में झांकें।  वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का कहना था कि समय तथा समाज में तेजी से बदलाव के साथ पत्रकारिता में भी जबर्दस्त गिरावट आयी है। आवश्यक है कि पत्रकार नैतिक मूल्यों पर ध्यान दें। वीरेन्द्र सक्सेना ने समूची मीडिया में बढते व्यवसायीकरण को चिन्ताजनक बताया तथा कहा कि इससे पत्रकार जगत को भारी क्षति हो रही है। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने मीडिया पर शासन प्रशासन तथा मीडिया पर कारपोरेट घरानों के बढते प्रभुत्च वर चिंता व्यक्त की। महामंत्री रमेश चन्द्र जैन ने कहा कि प्रेस काउंसिल के दायरे में अभी सिर्फ प्रिण्ट मीडिया है, इसके स्वरूप में परिवर्तन कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसकी परिधि में ले आया जाना चाहिए।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों माता प्रसाद पाण्डेय,जावेद उस्मानी, प्रज्ञानन्द चैधरी , स्वदेश कुमार व विधानसभा के  प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को अंगवस्त्रम और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।  इसके पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि व अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस मौके पर षेयसी पावगी ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन एलजेए के महामंत्री के0के0वर्मा ने किया। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों सर्वश्री पी.के. राय, पी.बी. वर्मा, डॉ. प्रभाकर शुक्ल, सुनील पावगी, प्रदेश उपाध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह, वीर विक्रमबहादुर मिश्र, कोषाध्यक्ष प्रदीप कुमार शर्मा , मंत्री सुनील त्रिवेदी, एलजेए के उपाध्यक्ष भारतसिंह, सुशील सहाय, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिंह, विकास श्रीवास्तव कोषाध्यक्ष  मंगल सिंह और समेत अनेक गणमान्य लोगों के आलावा प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये पत्रकार इस समारोह में बडी तादाद में जिलों से वाराणसी से अनिल अग्रवाल,आगरा से अशोक अग्निहोत्री ,पंकज सचदेवा,राजीव सक्सेना,सुभाष जैन,सुल्तानपुर से अरूण जायसवाल,शहजहांपुर से सरदारशर्मा, जरीफ मलिक, राजबहादुर, बराबकी से सलीम और फरहत भाई, प्रतापगढ से सन्तोष गंगवार हरीश सैनी आदि उपस्थित रहे।        
प्रेस रिलीज    

अरविन्द शुक्ला
अध्यक्ष
लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

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कैमरों का गरीब के भूखे पेट की जगह लड़कियों के क्लीवेज पर शिफ्ट होना!

इस देश में ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके लिये मरने का दिल करता है….। दिल को छू कर गुजरने के बजाय दिल में उतर गईं ये लाइनें मिली ‘फुगली’ से..। जी हां फुगली मूवी से यूं तो बहुतों ने फुगली देखी होगी लेकिन उस के पीछे का संदेश शायद ही कोई समझा होगा..। फिल्म में एक जगह पृष्ठभूमि से आवाज आती है कि ‘क्या एक लड़की की इज्जत बचाने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी..।’ अफसोस ये आवाज एक न्यूज चैनल पर चल रही खबर की लाइन है..। और इस पर अफसोस इस बात का है कि मीडियाकर्मी पुलिस प्रशासन, नेताओं पर आरोप लगाते हैं कि वो अपना काम सही से नहीं कर रहे..। काश कि ये कहने से पहले वो जरा अपने गिरेबान में भी झांक लेते..।

क्या किसी को याद है कि कब कैमरे गरीब के भूखे पेट की जगह लड़कियों के क्लीवेज पर शिफ्ट हुये…। क्या कोई बता सकता है कि 80% गरीबों को छोड़ कर कब माइक 10 % सेलिब्रिटीज की तरफ मुड़ गया..। क्यों स्क्रिप्ट में किसानों मजदूरों की समस्याओं की जगह एंटीलिया और बीएमडब्ल्यू आ गये..। क्यों हर खबर टीआरपी को ध्यान में रखकर दिखाई जाती है..। क्यों संवेदनाओं और मानवीयता का प्रयोग अपने फायदे के लिये ही किया जाता है..।क्या यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है कि अपने ही कर्मचारियों से बंधकों की तरह काम लें और आवाज उठाने पर नौकरी से निकाल दें..। नेता और पुलिस का गठजोड़ तो नाली और कीड़े की तरह है इस पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है… लेकिन सवाल वही है कि जब हर कोई अपने फायदे के लिये ही जी रहा है तो किस से उम्मीद लगायें.. और क्यों लगायें..।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने दशकों पहले कहा था कि हम भारतीय लोग रेल के डिब्बे की तरह हैं हमें आगे बढ़ने के लिये इंजन की जरूरत होती है..। इंजन चुनते भी हमीं हैं लेकिन जब वही इंजन गलत ट्रैक पर सरपट भागने लगता है तो हम चुपचाप पीछे पीछे चलते जाते हैं और चिल्लाते जाते हैं कि ये रास्ता गलत है गलत है..। सीधी भाषा में कहें तो क्या चूतियापा है ये..। रास्ता गलत है तो छोड़ दो बदल दो वो इंजन जो गलत ट्रैक पर जाये..। और इंजन बदलें क्यों.. क्यों हमें जरूरत है इंजन की क्या हममें इतनी भी काबिलियत नहीं है कि हम अपना रास्ता खुद बना सकें…। और अगर है काबिलियत तो इच्छाशक्ति क्या उधार लेनी पड़ेगी.।

नेताजी, आजाद, शहीद ए आजम ने हमें गोरों की गुलामी से इसीलिये आजाद कराया था कि लुटेरों का रंग बदल जाये बस और हम यूं ही लुटते रहें..। नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है हम लुटने के लिये नहीं बने बस जरूरत है हमें खड़े होने की और समाज की सारी बुराइयों से एकजुट होकर लड़ने की..। और इसकी शुरुआत भी हमें खुद से ही करनी पड़ेगी.। पहचानना पड़ेगा उन्हें जो महिला सशक्तिकरण पर लंबे लंबे भाषण देखते हैं और लड़की देखते ही कहते हैं वाह क्या माल है.। बेइमानों को जी भर भर के गालियां देते हैं और खुद मौका मिलते ही पैसा बनाने लगते हैं..। आदर्शों की दुहाई देंगे और अपने फायदे के लिये आदर्शों की तिलांजलि दे देते हैं..।  जब तक हम ऐसा नहीं करते तब तक हमें किसी के काम में कमी निकालने का कोई हक नहीं है..।

पत्रकार चंदन सूरज पांडेय का विश्लेषण. संपर्क:  chandu.suraj11@gmail.com

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गनीमत है, मीडिया अभी साहिब के हगने मूतने को खबर नहीं मानता

: यू नो, आई एम सीरियस :

दिनेशराय द्विवेदी जी मेरे अच्छे फेसबुक मित्रों में हैं. उनका, उनके विचारों का काफी सम्मान करता हूं लेकिन आज उनकी एक पोस्ट जरूरत से ज्यादा निचले स्तर की लगी. इस तरह की अपेक्षा ऐसे विद्वानजनों से नहीं की जाती. हर पेशे का सम्मान होना चाहिए अन्यथा आपको ऐसे जवाब के लिए तैयार रहना चाहिए. द्विवेदी जी फेसबुक पर वनलाइनर लिखते हैं- ”गनीमत है, मीडिया अभी साहिब के हगने मूतने को खबर नहीं मानता।”

यह टिप्पणी रॉबर्ट वाड्रा के ताजा विवाद या वीआईपीज को जरूरत से ज्यादा खबरों में रखने की मीडिया की आदत पर की गई है. नो प्राब्लम. आलोचना करने का अधिकार है लेकिन इन शब्दों में नहीं कि आप उसके पेशे को हगना मूतना कहने लग जाएं. संकेत साफ है कि इस तरह की टिपपणी मीडिया के खबर देने के उसके अधिकार या खुद पर हुए हमले का शालीन तरीके से विरोध कर खबर दिखाने के बुनियादी हक पर बुलडोजर चलाने जैसा है. साहब. सवाल पूछना तो मीडिया का अधिकार है. आपको पसंद नहीं है, नो कमेंट कह दीजिये लेकिन अगर आपने यानि राबर्ट वाड्रा या नवीन जिंदल जैसे लोगों ने हाथ उठाने की चेष्टा की तो हमसे साधु बनने की उम्मीद मत करिए.

सवाल पूछना हमारा पेशा है. साहब से अवैध जमीन से जुड़े उस विवाद पर सवाल था जिस पर सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं. कौन सा हमने साहब से यह पूछ लिया था कि बताइये आपके पिता और भाई बहन ने आत्महत्या क्यों कर ली. मीडिया को आमंत्रण मिला था इसलिए संवाददाता उस होटल में पहुंचा. अब सवाल तो उठेंगे ही. आपको जवाब नहीं देना है मत दीजिये. लेकिन हाथ उठाने का अधिकार तो आपको नहीं है. हर पेशे का सम्मान होना चाहिए गनीमत है रिपोर्टर ने साहब का गला नहीं पकडा. इस विवेक की तारीफ होनी चाहिए ना कि इसे हगना मूतना कहना चाहिए.

और हां, हगना-मूतना भी दिखाएंगे यदि वह देश और समाज के हित में होगा. मसलन कुंभ के मेले में गंगा नदी के किनारे खुले में जब आप जैसे लाखों लोग हगते-मूतते हैं, तो मीडिया उसे पर्यावरण के प्रति अन्याय के तौर पर पेश करता दिखाता है. इससे भी आगे, जिस दिन लोग अपने घरों के संडास को छोडकर खुलेआम सड़क पर हगना-मूतना शुरू करेंगे तो भी दिखाएंगे साहब. क्योंकि यह हमारी ड्यूटी है और उससे दगा तो नहीं कर सकते. मत छेड़िए साहब वरना चड्ढी उतारना और नंगा करना बखूबी जानते हैं. यू नो. आई एम सीरियस.

लेखक अनिल द्विवेदी रायपुर, छत्तीसगढ के वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा उनसे इस नम्बर 09826550374 पर संपर्क किया जा सकता है.

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भारत के मोदी पेड मीडियाकरों और पत्रकारों के ध्यानार्थ…. जरा अमेरिकी मीडिया की इस तथ्यपरक रिपोर्टिंग को भी देख-पढ़ लें

Mohammad Anas : भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा की शुरुआत हो चुकी है. भारतीय मीडिया ने मोदी के दौरे को त्यौहार की तरह मनाने का निर्णय लेते हुए बहुत से पत्रकारों को अमेरिका भेज दिया. कई बड़े मीडिया घराने मोदी की यात्रा को चौबीस घंटे की कवरेज तक दे रहे हैं. ऐसे में अमेरिका के दो बड़े मीडिया समूह में मोदी की अमेरिकी यात्रा पर चर्चा की कितने ख़बरे दिखाई जा रही हैं इसका पता लगाया जाना ज़रूरी हो गया है. भारतीय एंकर और रिपोर्टर पूरे अमेरिका को मोदीमय बता रहे हैं,ठीक वैसे ही जैसे पूरे भारत को मोदीमय बताते रहे हैं. लेकिन हक़ीकत ये है की मोदी से जुड़ी ख़बरों को पढ़ने के लिए सर्च इंजन में जा कर मोदी लिखना पड़ रहा है,आँखों के सामने ट्रेंड नहीं हो रही ख़बरें.

1- The Washington Post के वेब पोर्टल पर मोदी की अमेरिकी यात्रा की ख़बर ट्रेंड ही नहीं कर रही है. पहले पेज पर मोदी और उनकी यात्रा खोजने पर भी नहीं मिलती. जब आप सर्च बाक्स में ‘मोदी’ की वार्ड डालेंगे तो तीन ख़बरे दिखाई पड़ती हैं. पहली ख़बर में गुजरात के दंगे, अफगानिस्तान के हालात, देवयानी खोब्रागेड और न्यूक्लियर समझौते का ज़िक्र किया गया है. दूसरी ख़बर में नरेंद्र मोदी द्वारा अमेरिका में डिनर न करने के पीछे की वजह पर चर्चा की गई है. पोस्ट लिखता है कि, ‘मोदी एक समर्पित और पवित्र हिंदू हैं इसलिए वे नवरात्री का व्रत रखते हैं,लेकिन अमेरिका में डिनर के मौके पर ही सारे बड़े फैसलों के लिए माहौल बनता है पर ऐसे अवसर पर मोदी की प्लेट खाली रहेगी.’ पोस्ट की अगली ख़बर जो सर्च करने के बाद मिलती है वो है ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत. इस ख़बर में विदेशी निवेशकों के लिए भारत के वर्तमान हालात पर चर्चा हुई है.

2- The Washington Post के ओपिनियन कॉलम में फरीद ज़कारिया ने मोदी के तमाम पक्ष और विपक्ष पर अपने विचार रखे हैं. 18 सितंबर को लिखे गए इस विचार में मोदी के हनीमून पीरियड के खत्म होने और हाल के उपचुनाव के बाद उनकी ताकत घटने की बात ज़कारिया ने लिखी है. इस हिसाब से देखा जाए तो अमेरिकी मीडिया ने भारतीय मीडिया के पागल पन को पूरी तरह से नकारते हुए ख़बर और विचार को जगह दी है. मोदी के तमाम पक्ष और विपक्ष पर संतुलित रिपोर्टिंग का बेहतरीन नमूना पेश करते हुए

3- The New York Times ने अपने पोर्टल पर मोदी विजिट की ख़बर को पांचवे नंबर पर रखते हुए सिर्फ एक ख़बर लगाईं है. टाइम्स ने मंत्रियों,नौकरशाहों आदि पर पीएमओ की दखलअंदाज़ी और उनकी मुखबिरी से लेकर गुजरात दंगे,मोदी वीसा मामला, चाइना द्वारा सीमा पर हस्तक्षेप एवं चाइनीज राष्ट्रपति की भारतीय यात्रा का विवरण मिलता है. न्यूयार्क टाइम्स मोदी से आर्थिक नीतियों में किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद को लेकर फिलहाल उम्मीद नहीं लगता ,इसके पीछे की वजह वह मोदी द्वारा किसी और पर विश्वास न करने को बताता है. टाइम्स का कहना है की अभी तक पॉलिसी मेकर तक की नियुक्ति नहीं की है मोदी सरकार ने.

भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया के महान दिग्गजों को यदि देश की वाकई फ़िक्र होती तो वह सच दिखाते न कि मेला. मेला एक दिन का होता है. बच्चे मेला में जा कर खुश होते हैं. देश की जनता भी खुश है. असली तस्वीर तो कहीं और है. मैं आशावादी नहीं बड़ा प्रैक्टिकल इंसान हूं. फिर भी इस यात्रा को लेकर थोड़ी बहुत उम्मीद है कि कुछ तो आएगा देश में. लेकिन इसके बदले में बहुत जाएगा भी. जल -जंगल-ज़मीन और आम गरीब भारतीय के ऊपर निर्मित ‘मेक इन इंडिया’ उतना भी हसीं नहीं जितना दिखाया जा रहा है. खैर .. फेसबुक और टीवीफोबिया से इतर भी दुनिया है …

पत्रकार और एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

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मोदी के खिलाफ अमेरिकी सम्मन ने गुजरात दंगों के घाव को हरा किया

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