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सुख-दुख

येचुरी मानने लगे थे कि गांधी-लोहिया के रास्ते कम्युनिस्ट चलते तो ज्यादा ताकतवर होते

रमा शंकर सिंह-

श्रद्धांजलि कॉमरेड!

सीता या कॉमरेड, अक्सर ही दोनों में से कोई एक संबोधन होता था मित्रों का, सीताराम येचुरी के लिये।

मेरे हमउम्र थे सीताराम येचुरी। जेएनयू में भी एक साथ एक ही बरस दाख़िला लिया था, मैंने एमए जर्मन भाषा में और सीता ने अर्थशास्त्र में पर तब जब तक मैं जेएनयू के अपने संक्षिप्त समय में मुलाक़ात नहीं कर पाया था। मैं उनसे कम उम्र में दिल्ली विवि के छात्रनेता के रूप में कुछ कुछ ख्याति भी पा चुका था और एक आंदोलन के कारण निष्कासित भी हो चुका था! जल्दी ही जेएनयू भी छूट गया और जेपी के आव्हान पर पढ़ाई भी! पूर्णकालिक आंदोलनकारी, उसके बाद आपातकाल में भूमिगत सक्रियता और तुरंत ही 1977 में मप्र का विधानसभा चुनाव लड़ने भेज दिया गया और मुझसे दिल्ली छूट गयी, संपर्क भी छूट गये टूट गये।

जब सीता राष्ट्रीय राजनीति के बड़े नेता हो गये तब मुझे लगता रहा था कि सीता मुझे नहीं जानते होंगें। इसलिये तमाम मित्रों से तो मुलाक़ात होती रही पर सीता से कभी नही।

कुछ बरस पहले जब समाजवादी समागम के कार्यक्रमों के सिलसिले में सीता को आमंत्रित करने की सोची तो बहुत हिचक से उनके दफ़्तर में फ़ोन लगाया। तत्काल फ़ोन पर ही सीता उधर से बोल रहे थे ‘हां रमा दफ़्तर आ जाओ अभी, बात कर लेंगें‘। मैं हैरान लेकिन फिर भी हिचक थी कि देखते हैं कैसी मुलाक़ात होती है।

ठोस लकड़ी की पुरानी मेज़ कुर्सी और छोटे से कमरे में सीपीएम का राष्ट्रीय महासचिव बैठा हुआ था। कोई इंतज़ार नहीं करना पड़ा, समय पर पहुँचा ही था और बैठते ही कहा कि क्या कार्यक्रम है। बताया और तुरंत जवाब मिला कि ठीक है मैं आऊँगा। मैं उठा कि जाऊँ बात हो गई अब वक्त क्यों लेना! अरे रुको चाय पियो, कितने बरसों से तुम्हारे बारे में सुनता था आज मुलाक़ात हुई है! दशकों का संकोच और बर्फ़ पिघलने में बमुश्किल पाँच मिनिट भी नहीं। दरअसल सीताराम येचुरी माकपा के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत की राजनीतिक शैली के छात्र रहे थे जो मिलने मिलाने और साथ में चलने का रास्ता खोजने में माहिर थे।

एक और बात जिस पर आज भी तमाम कम्युनिस्ट नेता अपनी फ़ालतू ज़िद में झूठा करार देंगें वह यह कि इन्हीं दिनों एक अनौपचारिक बातचीत में येचुरी यह मान कर कहने लगे थे कि भारत में गांधी का रास्ता कम्युनिस्टों के लिये भी रणनीतिक रूप से सही था और कि लोहिया की सामाजिक नीति पर कम्युनिस्ट यदि चलते तो कहीं ज़्यादा ताकतवर बने रह सकते थे। बेशक इसमें सैद्धांतिक सहमति नहीं दिखती पर गांधी लोहिया के विश्लेषण विवेचन का स्वीकार्य भी स्पष्ट होता है। सार्वजनिक रूप से कम्युनिस्ट इसे कभी नहीं कहते लेकिन उससे क्या ख़ास फ़र्क़ पड़ता है?

अभी दो हफ़्ते पहले ही प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल की पहल पर मुझे एक मर्यादित, सीमित विषय और निश्चित उद्देश्य की गोष्ठी का आयोजन दिल्ली में करना तय हुआ था जिसमें सिर्फ़ डॉ लोहिया की गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के बाबत दिग्भ्रमों पर साफ़गोई से तथ्यात्मक चर्चा होनी थी जिसके लिये सीताराम येचुरी की भागीदारी पर मुझे आरंभिक चर्चा करने जाना था।

सीताराम येचुरी के साथ मिलने का वह मौक़ा अब नहीं आयेगा। सिगरेट और शराब का कम्युनिस्टों में पहले से ही कोई भी किसी क़िस्म का निषेध नहीं रहा। निषेध अब तो खैर किसी पार्टी व संगठन में बचा ही नहीं है पर जीवन को जल्दी समाप्त करने वाली ये दोनों बुरी अस्वास्थ्यकर आदतें कैसे महत्वपूर्ण लोगों की कार्यकुशलता को भी कम कर देती हैं।

हम सोशलिस्ट चाहे कम्युनिस्ट विचारधारा से कितने ही असहमत हों पर आज भी कम्युनिस्ट सोशलिस्ट संवादों के ज़रिये कई आर्थिक विषयों पर गरीब के पक्ष में एक मज़बूत राय बनाई जा सकती है।

क्या सीपीएम में कोई बचा है जो व्यापक असहमतियों का सम्मान करते हुये समयबद्ध साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर विमर्श चला सके?

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