न्याय मांगने वालों को याचिकाएं वापस ले लेनी चाहिए क्योंकि अदालतें मनी मैन लोगों के लिए हैं!

वाह सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने आप जान लिया है वे ना समझदार हैं… देश की न्यायपालिका पर नहीं ऐसे गरीब लोगों पर तरस आती है जो इस पर विश्वास करते हैं और यहां न्याय मांगने की भूल कर बैठते है। दरअसल कोर्ट बड़े लोगों के लिए है आम लोगों का गुस्सा सरकार पर या पूंजीपतियों के खिलाफ ना भड़के इसके लिए अंग्रेजों ने कोर्ट बनाया। मजीठिया वेज वोर्ड के फैसले को देखकर भ्ज्ञी ऐसा ही लगता है।

बिना बताए कैसे पता चला कि उन्होंने जाने में अवमानना नहीं की? सुप्रीम के जज रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को यह कैसे पता चल गया कि प्रेस मलिकों ने जानबूझकर अवमानना नहीं की। जबकि किसी प्रेस मालिक ने कोर्ट में यह दलील नहीं दी कि हमें पता नहीं था या हम मजीठिया वेज बोर्ड को समझ नहीं पाए। ना ही किसी ने कोर्ट में क्षमा मांगी।  चूंकि प्रेस मालिकों को पता था इसलिए मजीठिया वेज बोर्ड को चुनौती दी थी। और सुपीम कोर्ट में हार गए थे। जिसके बाद अवमानना का मामला दायर किया था। यदि प्रेस मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में पता नहीं होता तो वे नोटिफिकेशन के विरुद्ध कोर्ट जाते ही नहीं। हां प्रेस मालिक यह जरूर करते रहे कि मजीठिया वेज बोर्ड लागू करना संभव नहीं है। कई कर्मचारियों ने 20 जे के तहत साइन कर इसे लेने से इंकार कर दिया है।

कैसे लागू होगा फैसला.. अवमानना के मामले में कोर्ट ने यह कहा कि मजीठिया लागू होगा। वित्तीय घाटे का रोना नहीं रो सकते। भैया लागू कराने के लिए भी अवमानना याचिका लगाई गई थी। आप भी बताए कि कैसे लागू होगा। अब 6 साल सुप्रीम कोर्ट में भटके। इसके बाद अब लेबर कोर्ट भटके, फिर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट और अंत में कुछ नहीं।

जज के खिलाफ बनता है अवमानना… वास्तव में यहां पर जज के खिलाफ अवमानना का मामला बनता है। क्योंकि अपने ही फैसले को लागू ना करा पाना यह कोर्ट की अवमानना है। और प्रेस मालिकों की खुद पैरवी कर रंजन गोगोई की खंडपीठ ने न्यायपालिका के प्रति आम नागरिकों के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। इसलिए जस्टिस कर्णन के समान रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेकर अवमानना का मामला चलाना चहिए। इस मामले में तो सीजेआई और राष्ट्रपति को दखल देना चहिए कि जज है तो कुछ भी फैसला दे देगा। जो ना तो कानून में लिख है ना ही ऐसी कोई दलील दी गई है जिसके कारण उसे पता चल गया। और 3 साल में आवेदकों को न्याय क्या दिलाया। हां न्याय के नाम पर देरी कर आरोपी को जरूर फायदा पहुंचाया। मुझे तो लगता है कि जितने आम नागरिक कोर्ट में न्याय मांगने गए हैं उन्हें अपनी याचिकाएं वापस ले लेनी चहिए। क्योंकि यह मनी मैन लोगों के लिए है।

रमेश मिश्र

पत्रकार

swargeshmishra@rediffmail.com

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