मजीठिया वेज बोर्ड मामले में प्रभात खबर के पत्रकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर किया

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में एक बड़ी खबर आ रही है। प्रभात खबर के आरा के ब्यूरो चीफ मिथलेश कुमार के मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले में कुछ कमियों को दूर करने के लिए उनके एडवोकेट दिनेश तिवारी ने माननीय सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर दिया है। इस खबर की पुष्टि मंगलवार 18 जुलाई को देर रात खुद मिथलेश कुमार ने फोन पर हुई बातचीत में किया है।

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा 19 जून 2017 को देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों के पक्ष में फैसला सुनाया गया था मगर इसमें कुछ कमियां रह गयी थी। दैनिक प्रभात खबर के बिहार के आरा के ब्यूरोचीफ मिथलेश कुमार के मामले में उनके एडवोकेट दिनेश तिवारी ने 18 जुलाई को सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर दिया है। मीडिया कर्मियों के कई वकीलों ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले में कुछ संशोधन की मांग को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने का ऐलान किया था। मिथलेश कुमार ने पुष्टि की है कि एडवोकेट दिनेश तिवारी ने उनके मामले में रिव्यू पीटीशन दायर कर दिया है।

माननीय सुप्रीमकोर्ट ने 19 जून 2017 को सुनाए अपने फैसले में साफ निर्देश दिया था कि अखबार मॉलिकों को हर हाल में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना ही पड़ेगा। साथ ही यह लाभ उन कर्मचारियों को भी देने का निर्देश दिया गया था जो ठेका पर काम करते हैं। मिथलेश कुमार का ट्रांसफर प्रभात खबर प्रबंधन ने कर दिया था जिस पर वे अपने एडवोकेट के जरिये सुप्रीमकोर्ट तक पहुंच गए थे। प्रभात खबर ने मिथलेश कुमार का ट्रांसफर झारखंड के चाईबासा में कर दिया था और वे सुप्रीमकोर्ट से अपने पक्ष में स्टे भी ले आये मगर फिर भी प्रभात खबर ने उन्हें पुरानी जगह पर ज्वाइन नही कराया। फिलहाल मिथलेश कुमार के मामले में रिव्यू पिटीशन दायर होने से मीडिया कर्मी अब सुप्रीमकोर्ट के अगले कदम पर नजर गड़ाए हैं।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट

9322411335

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मजीठिया पर ताजा फैसले के बाद मीडियाकर्मियों और लेबर कोर्ट की सक्रियता देख मालिकों की नींद हराम

यूपी के एक एडिशनल लेबर कमिश्नर ने जो बात कही, वह सच होता दिख रहा है। उनका कहना था कि मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर आये ताजा फैसले से मालिकानों की नींद हराम हो गई होगी। जाहिर सी बात है कि अब वे और उनके गुर्गे इस काम में लग गए हैं कि कैसे इन मजीठिया क्रांतिकारियों से पीछा छुड़ाया जाए। केस में आये पुराने वर्कर से तो वे परेशान हैं ही, अब नए लोगों यानि अंदर काम करने वाले वर्कर भी केस में आने की तैयारी कर चुके हैं। तय है कि जल्द ही नए केस लगने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी।

मजीठिया को लेकर आए फैसले का दिन ज्यों ज्यों बीतता जा रहा है, मालिकान की चिंता बढ़ती जा रही है। उन्होंने अब अपने प्यादों को वर्कर से बातचीत करने के लिए भी कहा है। पिछले दिनों कुछ लोगों से बतचीत भी हुई, लेकिन अभी वे खुलकर सामने नहीं आये हैं। अभी वे वर्कर का रुख क्या है, यह जानना चाहते हैं। आगे की राह वे उसी हिसाब से तय करेंगे, ऐसा माना जा सकता है। दूसरी ओर वर्कर हैं कि वे अपनी राह छोड़ना नहीं चाहते। वे माननीय सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं और उनके दिए रास्ते पर चलकर अपना रास्ता तय करने को आतुर हैं। सब केस में जायेंगे और आखरी दम तक लड़ेंगे। उन सब की तैयारी हो गयी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब लेबर कोर्ट और डी एल सी के यहाँ वर्करों की भीड़ जुटेगी।

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आये हालिया फैसले के बाद एक बात और देखी जा रही है। अब डी एल सी और लेबर कोर्ट जल्दी जल्दी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानते हुए अपनी कार्रवाई करने में जुटे हैं और जो भी केस अख़बार के दफ्तर से आता है, उस पर ध्यान देते हैं। पहले यूपी में दैनिक जागरण को ज्यादा तवज्जो मिलती थी, लेकिन अब उनके फैसले पर एएलसी स्टे दे देते हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। इस बात का प्रमाण है हालिया जागरण की आगरा यूनिट से दो लोगों के हुए ट्रांसफर का स्टे होना।

दरअसल हुआ यह था कि दैनिक जागरण, आगरा के प्रबंधन ने दो पत्रकारों सुनयन शर्मा और रूपेश कुमार सिंह का मजीठिया केस में होने के कारण किसी बहाने से पिछले दिनों तबादला कर दिया था। सुनयन चीफ सब एडिटर हैं और रूपेश डिप्टी चीफ सब एडिटर। आगरा से एक का स्थानान्तरण जम्मू कर दिया गया और दूसरे का सिलीगुड़ी। ऐसा होने पर जब ये दोनों डी एल सी कार्यालय गए, तो अथारिटी ने इनके तबादलों पर रोक का आदेश जारी कर दिया। ऐसा होने से जागरण प्रबंधन तिलमिलाया हुआ है और वहां के मैनेजर को भगाने की तैयारी में है। उसे लग रहा है कि प्रशासन ने इस स्टे के जरिए उसके गाल पर तमाचा मारा है, जबकि आगरा के ए एल सी ने कानून का सही पालन किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हर जिले में अख़बार कर्मियों के केस में ऐसा ही फैसला आएगा, जिससे मालिकानों का करार छिन जायेगा और वे एक दिन वर्कर के सामने घुटने टेकेंगे। पैसा और नौकरी दोनों देंगे, सो अलग।

सूत्र बताते हैं कि दैनिक जागरण अपने काम कर रहे वर्कर को मीठी गोली देने में जुटा है। मैनेजमेंट कहता है कि केस लड़ने वाले सुप्रीम कोर्ट में हार गए हैं। अब उनका कुछ नहीं होने वाला। अब उन्हें कौन बताये कि पढ़े लिखे लोग को माननीय सुप्रीम कोर्ट का आर्डर पढ़ना आता है, वे कंपनी की चाल समझ गए हैं और जो अभी तक नहीं समझे हैं, वे भी लोगों से पूछताछ करके जान लेंगे। मैनेजमेंट कर्मचारियों को खुश होकर जानकारी देने में तो जुटा है, लेकिन अंदर से उसका डर भी नहीं जा रहा है। वह यह भी बता देता है कि पैसा तो मिलेगा, पर कुछ वक्त लगेगा। इसके लिए वर्कर तैयार हैं। वह जानता है कि जितना पैसा मजीठिया का क्लेम लगाकर 3 या 4 साल में ले लेगा, उतना ज़िन्दगी भर काम करके वह नहीं जमा कर सकेगा। फिर ऐसी नौकरी से क्या फ़ायदा? फिलहाल सभी अख़बार समूह, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला, पंजाब केसरी आदि में इन दिनों वर्करों के बीच यही गणित चल रही है और मैनेजमेंट इन बातों को सुनकर परेशान हो रहा है। मालिकान का करार भी गायब है।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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(आखिरी पार्ट 5) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

26. अधिनियम के प्रावधानों में या वेजबोर्ड अवार्ड की शर्तों में ऐसा कुछ नहीं है, जो हमें अवार्ड के लाभ देने के लिए अनुबंध या ठेका कर्मचारियों को छोड़ कर, नियमित कर्मचारियों तक सीमित करेगा। इस संबंध में हमने अधिनियम की धारा  2(सी), 2(एफ) और 2(डीडी) में परिभाषित समाचारपत्र कर्मचारी, श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों की परिभाषा पर ध्यान दिया है। जहां तक वेरिएबल-पे का संबंध है, इस पर पहले ही उपरोक्त पैरा 7 में ध्यान दिया गया है और सारगर्भित किया गया है, जब यह न्यायालय वेरिएवल-पे की अवधारणा पर चर्चा की, तो विचार किया कि इस राहत का मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड में उचित और न्यायसंगत निरुपण किया गया है। इसलिए वेरिएबल-पे के संबंध में कोई अन्य विचार लेकर इस लाभ को दबाने/रोकने का कोई प्रश्र नहीं उठता है। वास्तव में अवार्ड के प्रासंगिक भाग का एक पठन यह दर्शाता है कि वेरिएबल-पे की अवधारणा, जो अवार्ड में लागू की गई थी, छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट में निहित ग्रेड-पे से ली गई है और इसका उद्देश्य अधिनियम के दायरे में आने वाले श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों को याथासंभव केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समतुल्य लाना है। जहां तक कि भारी नकदी हानि की बात है, हमारा मानना है कि बिलकुल वही भाव स्वयं इंगित करता है कि वह वित्तीय कठिनाइयों से अलग है और इस तरह की हानि प्रकृति में पंगु होने की सीमा से अलग, अवार्ड में निर्धारित समय की अवधि के अनुरुप होने चाहिए। यह तथ्यात्मक सवाल है जिसे केस टू केस या मामला दर मामला निर्धारित किया जाना चाहिए।

27. इस मामले में सभी संदेहों और अस्पष्टताओं को स्पष्ट करते हुए और यह मानते हुए कि किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान को, हमारे समक्ष मामलों के तथ्यों में, अवमानना करने का दोषी नहीं ठहरया जाना चाहिए, हम निर्देश देते हैं कि अब से मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू न किए जाने या अन्यथा के संबंध में सभी शिकायतों को अधिनियम की धारा 17 के तहत मुहैया करवाए गए तंत्र के अनुसार निपटाया जाएगा। न्यायालयों के अवमानना क्षेत्राधिकार या अन्यथा के इस्तेमाल के लिए दोबारा न्यायालयों से संपर्क करने के बजाय अधिनियम के तहत मुहैया करवाई गई प्रवर्तन/इन्फोर्समेंट और उपचारकारी मशीनरी द्वारा ऐसी शिकायतों का समाधान किया जाना अधिक उचित होगा। 

28. जहां तक कि तबादलों/ बर्खास्तगी के मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने वाली रिट याचिकाओं के रूप में, जैसा कि मामला हो सकता है, से संबंध है, ऐसा लगता है कि ये संबंधित रिट याचिकाकर्ताओं की सेवा शर्तों से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के अत्याधिक विशेषाधिकार रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल इस तरह के सवाल के अधिनिर्णय के लिए करना न केवल अनुचित होगा परंतु ऐसे सवालों को अधिनियम के तहत या कानूनसंगत प्रावधानों(औद्योगिक विवाद अधिनियमए 1947 इत्यादि), जैसा कि मामला हो सकता है, के तहत उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष समाधान के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।

29. उपरोक्त राशनी में, सभी अवमानना याचिकाओं के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई रिट याचिकाओं का उत्तर मिल गया होगा और उपरोक्त संबंध में इनका निपटारा किया जाता है।

नई दिल्ली
19 जून, 2017

अनुवाद : रविंद्र अग्रवाल, धर्मशाला
संपर्क: 9816103265

इसके पहले वाले पार्ट पढ़ें…

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एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया के लिए नया क्लेम लगाने वालों के लिए नया फार्मेट जारी किया

अखबार और न्यूज एजेंसियों के मीडियाकर्मियों के वेतन भत्ते प्रमोशन से जुड़े मामले से संबंधित जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा ने माननीय सुप्रीमकोर्ट के १९ जून २०१७ को आये फैसले के बाद उन पत्रकारों तथा गैर-पत्रकारों के लिये एक नया फार्मेट जारी किया है जिन्होंने अभी तक कामगार आयुक्त कार्यालय में अपने बकाये राशि और वेतन वृद्धि के लिये क्लेम नहीं लगाया है।

इस नये फार्मेट को सिर्फ वही पत्रकार और गैर पत्रकार भरेंगे जिन्होने पहले कामगार आयुक्त कार्यालय या सहायक कामगार आयुक्त कार्यालय में क्लेम नहीं लगाया है। १७ (१) के इस फार्मेट में १९ जून २०१७ को आये सुप्रीमकोर्ट के फैसले को समाहित करते हुये कई नये प्वाईेंट जोड़े गये हैं। जिन पत्रकारों और गैर पत्रकारों ने एडवोकेट उमेश शर्मा का पुराना फार्मेट वाला आवेदन पत्र कामगार विभाग में जमा कराया है उनको ये नया आवेदन पत्र नहीं जमा करना है। ये सिर्फ नये क्लैमकर्ताओं के लिये उमेश शर्मा ने जारी किया है। आप को बता दें कि एडवोकेट उमेश शर्मा ने देश भर के पत्रकारों और गैर-पत्रकारों की लड़ाई माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ी है।

Sample draft of the Majithia Application

BEFORE THE LABOUR COMMISSIONER/DEPUTY LABOUR COMMISSIONER/ASSISTANT LABOUR COMMISSIONER,DISTRICT ( Name of the district and address of the office)
In the matter of:
NAME & ADDRESS OF THE CLAIMANT:
Name
Present Post
Date of Employment
Address
Category of the post as per Majithia Award
NAME & ADDRESS OF THE MANAGEMENT:
Category of management as per Majithia award
APPLICATION UNDER SECTION 17 (1) OF THE WORKING JOURNALISTS ACT FOR ISSUANCE OF RECOVERY CERTIFICATE AGAINST THE STATUTORY DUES OF THE CLAIMANT.

Respectfully submitted as under:

1. The management named above is a newspaper establishment, the employees of the establishment are entitled to the benefits of the Majithia Wage Board notification w.e.f. 11/11/11 as notified by the Central Government. The details of the category of the management under the said wage board award is given above and the details of the post of the claimant employee as covered under the said Award is also given above.
2. That Majithia Wage Board was constituted by the Central Government under Section 10 of the WJ Act and the report of the same was accepted by the Central Government and notified on 11/11/2011 under Section 12 of the said Act hence the said award has a statutory force and the claimant is entitled to the benefits as granted under the said award. The said Award has subsequently been upheld by the Supreme Court of India and specific directions for implementation of the same has been issued hence no dispute in this regard can be raised by the employer as the same would amount to contempt of court.
4. The management along with several other newspapers challenged the Majithia Notification before Supreme Court of India instead of implementing the same. The Honble Supreme Court of India finally dismissed the petitions filed against Majithia Notification and issued specific directions for the release of the benefits of Majithia Wage Board notification vide its orders dated 7/2/2014 within a period of one year w.e.f. 7/2/2014 along with arrears, the operative part of the directions of Supreme Court are reproduced here under for ready reference and compliance:

    71) Accordingly, we hold that the recommendations of the Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.
    72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.
    73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March, 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April, 2014 onward.
    74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.

5.The management named above did not implement the aforesaid wage board notification and started extracting the signatures of the employees on pre-typed formats forcibly on threats of their jobs and started claiming that the recommendations of the wage board are not applicable on it. The aforesaid act of the management is in gross violation of Section 13 of the Working Journalists (C&S) and Misc. Provisions Act, 1955 as the working journalists are entitled to wages at rates not less than those specified in order. The provisions of Section 13 of the Act are very clear and are being reproduced for ready reference and compliance:

    13. Working Journalists entitled to wages at rates not less than those specified in the order.
    On the coming into operation of an order of the Central Government under Sec.12 every working journalist shall be entitled to be paid by his employer wages in the rate which shall, in no case, be less than the rate of wages specified in the order.

6. That the Working Journalists Act further protects the interest of the employees under Section 16 of the said Act by stating that any declaration, agreement etc which is inconsistent with the Act shall have no effect hence any claim being made by the employer regarding the declarations extracted by the employees is illegal on the face of it . The said provisions are reproduced here under for ready reference:

    16. Effect of laws and agreements inconsistent with this Act. (1) The provisions of this Act shall have effect notwithstanding anything inconsistent therewith contained in any other law or in the terms of any award, agreement or contract of service, whether made before or after the commencement of this Act :
    Provided that where under any such award, agreement, contact of service or otherwise a newspaper employee is entitled to benefits in respect of any matter which are more favorable to him than those to which he would be entitled under this Act, the newspaper employee shall continue to be entitled to the more favorable benefits in respect of that matter, notwithstanding that he receives benefits in respect of other matters under this Act.
    (2) Nothing contained in this Act shall be construed to preclude any newspaper employee from entering into an agreement with an employer for granting him rights or privileges in respect of any matter which are more favorable to him that those to which he would be entitled under this Act.

7. That the Supreme Court has considered all the contentions as raised before it in bunch of Contempt of court petitions and vide its orders dated 19/6/2017 reaffirmed that the newspaper establishments are under obligation to pay the Majithia Wage Board Award the remedy under Section 17 of the Working Journalists and Other Newspaper Employees (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Act, 1955 is prescribed and the employees claimant the said benefits can seek the same by filing such applications, hence the present application.

8. That the details of the claims of the employee is as under:
Sr No. Salary period Salary paid Salary as per Majithia Award Difference/ Dues

Total Total dues

9. That the management is liable to pay the aforesaid benefits to the employee but is withholding the same illegally hence liable to pay interest on the same @ 24 % from the date of entitlement till the date of realization .

10. That the management be also restrained from victimizing the employee during the pendency of the present claim as contemplated under Section 16 of the said Act as there is a complete restriction on the action of the management . The said provision of law is reproduced here under for ready reference:

    16-A. Employer not to dismiss, discharge, etc., newspaper employee.- No employer in relation to a newspaper establishment shall, by reason of his liability for payment of wages to newspaper employees at the rates specified in an order of the Central Government under Sec. 12 or under Sec. 12 read with Sec. 13-AA or Sec. 13-DD, dismiss, discharge or retrench any newspaper employee.

11. It is therefore prayed that the management named above be directed to pay the dues as detailed above failing which a recovery certificate be issued in favour of the claimant.
Applicant
Name
Post
Address
Contact No.

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(पार्ट 4) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

22. प्रत्युत्तर में दायर किए गए विभिन्न शपथपत्रों में समाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा अपनाए गए स्टैंड/कदम से, समय-समय पर विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों द्वारा दायर की गई रिपोर्टों में किए गए बयानों से, और साथ ही दायर की गई लिखित दलीलों से और आगे दखी गई मौखिक प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट होता है कि संबंधित समाचारपत्र प्रतिष्ठानों ने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड हिस्से में या नहीं कार्यान्वित किया है, इसके तहत क्या इन समाचारपत्र संस्थानों ने केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड, जिसे दी गई चुनौती को इस न्यायालय द्वारा रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 के फैसले/जजमेेंट में निरस्त कर दिया गया है, की गुंजाईश और दायरे को माना है। दृढ़मत है कि अवार्ड के गैर-कार्यान्वयन या आंशिक कार्यान्वयन को लेकर जो आरोप है, जैसा कि हो सकता है, स्पष्ट रूप से विशेष तौर पर संबंधित समाचारपत्र संस्थानों की अवार्ड की समझ से उपजा है, यह हमारा विचारणीय नजरिया है कि संबंधित प्रतिष्ठानों को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को दिए गए फैसले/जजमेेंट की जानबूझकर अव्हेलना का जिम्मेवार नहीं ठहरया जा सकता है। अच्छा रहेगा, कथित चूक को बदल कर इस न्यायालय द्वारा बरकरार रखे गए अवार्ड की गलत समझ के तौर पर जगह दी जाए। इसे जानबूझकर की गई चूक नहीं माना जाएगा, ताकि न्यायालय की अवमानना अधिनियम,1971 की धारा 2बी में परिभाषित सिविल अवमानना के उत्तरदायित्व को अकर्षित किया जा सके। यद्यपि कथित चूक हमारे लिए स्पष्टत: साक्ष्य है,किसी भी समाचारपत्र प्रतिष्ठान को जानबूझकर या इरादतन ऐसा करने के विचार की गैरमौजूदगी में अवमानना का उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर वे अवार्ड को इसकी उचित भावना और प्रभाव में, इस रोशनी के साथ कि हम अब क्या राय/समझौता प्रस्तावित करते हैं, लागू करने का एक और अवसर पाने के हकदार हैं।

23. मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को इस अदालत ने दिनांक 07.02.2014 को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिए गए फैसले में मंजूरी दे दी गई है। इसलिए, इस अवार्ड को पूर्ण रूप से लागू किया जाना है। हालांकि यह सही है कि संबंधित मुद्दों (i) खंड 20जे, (ii)क्या पुरस्कार अनुबंधित कर्मचारियों पर लागू होता है, (iii) क्या इसमें वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन शामिल है और (iv) वित्तीय क्षरण/घाटे की सीमा जो कि बकाए के भुगतान को रोकने के लिए उचित होगी, को विशेष रूप से किसी भी अवार्ड या इस न्यायालय के फैसले में नहीं निपटा गया है, इसमें कोई संदेह नहीं है हो सकता है कि अवार्ड की शर्तों के क्षेत्र और दायरे की पुनरावृत्ति जरूरी और उचित होगी। न्यायलय के आदेश(ओं) का उचित और पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हम इसके बाद ऐसा करने का प्रस्ताव करते हैं। 

24. जहां तक कि अधिनियम के प्रावधानों के साथ पढ़े जाने वाले अवार्ड के अभी तक के अत्याधिक विवादास्पद मुद्दे क्लॉज 20(जे) का का स्वाल है, यह स्पष्ट है कि अधिनियम की धारा 2(सी) में परिभाषित प्रत्येक अखबार कर्मचारी को अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित और अधिसूचित वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन/मजदूरी प्राप्त करने की गारंटी का हकदार बनाता है। अधिसूचित वेतन/मजदूरी, जैसा कि हो सकता है, सभी मौजूदा अनुबंधों की जगह लेती है(supersedes करती है)।  हालाकि विधायिका ने धारा १६ के प्रावधानों को शामिल करके यह स्पष्ट कर दिया है कि मजदूरी तय होने और अधिसूचित होने के बावजूद , संबंधित कर्मचारी के लिए अधिनियम की धारा 12 की अधिसूचना के मुकाबले उसे अधिक फायदा देने वाले/अनुकूल किसी लाभ को स्वीकार करने का अवसर हमेशा खुला रहेगा। मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड का क्लॉज 20(जे), इसलिए, उपरोक्त रोशनी में पढऩा और समझना होगा। अधिनियम के तहत एक कर्मचारी को जो देय है, उससे कम प्राप्त करने के विकल्प की उपलब्धता पर  अधिनियम खामोश है। इस प्रकार का विकल्प वास्तव में आर्थिक छूट के सिद्धांत के दायरे में है, संबंधित कर्मचारियों के विशिष्ट स्टैंड/दृढ़मत को ध्यान में रखते हुए वर्तमान मामले में ऐसा मुद्दा नहीं उठता है, जो वर्तमान मामलों में उनके द्वारा तैयार की गई कथित रूप से अनैच्छिक प्राकृति की अंडरटेकिंग(परिवचन/वचन) से संबधित है। इसलिए अधिनियम की धारा 17 के तहत तथ्यों की पहचान करने वाली अथारिटी/प्राधिकरण द्वारा इसके तहत उत्पन हो रहे विवाद का निराकरण किया जाना चाहिए, जैसा कि बाद में व्यक्त/विज्ञापित किया गया है।

25. विधायिका के इतिहास से संबंधित किसी भी घटना में और अधिनियम को अधिनियमित/लागू करने से प्राप्त होने वाले उद्देश्य अर्थात अगर समाचारपत्र कर्मचारियों के लिए उचित मजदूरी नहीं है, तो न्यूनतम उपलब्ध करवाने के लिए, विजय कॉटन मिल्ज लि. और अन्य बनाम अजमेर राज्य (एआईआर1955 एससी 33) मामले में घोषणा/निर्णय के अनुपात के तहत न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत अधिसूचित तय मजदूरी को बिना-मोलभाव के कारण मौजूदा अधिनियम के तहत स्पष्ट रूप से नियंत्रित किया जाएगा।  बिजय कॉटेन मिल्ज़ लिमिटेड(सुप्रा) मामले की रिपोर्ट में पैरा चार, जोकि विशिष्ट सूचना के लिए उपरोक्त मुद्दे से जुड़ता है, नीचे दिया गया है:
“4. यह शायद ही विवादित हो सकता है कि श्रमिकों को जीने के लिए मजदूरी सुरक्षित करना, जो न केवल महज शारीरिक निर्वाह परंतु साथ ही स्वास्थ्य और मर्यादा का पोषण/अनुरक्षण करता है, जनता के सामान्य हित के अनुकूल है। हमारी संविधान के अनुच्छेद 43 में समाहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में से एक है। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि 1928 में जिनेवा में एक न्यूनतम मजदूरी फिक्सिंग सम्मेलन आयोजित किया गया था और इस सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्तावों को अंतरराष्ट्रीय श्रम संहिता में शामिल किया गया था। कहा जाता है कि इन प्रस्तावों को प्रभावी बनाने के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम परित किया गया था। साउथ इंडिया एस्टेट लेबर रेजोल्यूशंस आर्गेनाइजेशनबनाम स्टेट आफ मद्रास(एआईआर 1955 एमएडी45,पृष्ठ47) के अनुसार:
यदि श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के आनंद से सुरक्षित किया जाना है और वे अपने नियोक्ता के शोषण से सुरक्षित किए जाने हैं, तो यह पूरी तरह जरूरी है कि उनके अनुबंध की आजादी पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए और इन पावंदियों को किसी भी मायने में अनुचित नहीं ठहरया जा सकता। दूसरी ओर, नियोक्ताओं को शिकायत करते नहीं सुना जा सकता, अगर वे अपने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने को मजबूर करते हैं, भले ही मजदूर अपनी गरीबी और असहाय होने के कारण कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं।  (जोर/Emphasis हमारा है)       

बाकी अगले भाग में पढ़ें ……..

द्वारा: रविंद्र अग्रवाल
धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश
संपर्क: 9816103265


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(पार्ट थ्री) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

16. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों को स्वीकार करने और अधिसूचना जारी किए जाने के बाद श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत अपना वेतन/मजदूरी प्राप्त करने के हकदार हैं। यह, अवमानना याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की धारा 16 के साथ धारा 13 के प्रावधानों से होता है, इन प्रावधानों के तहत वेजबोर्ड की सिफारिशें, अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर, सभी मौजूदा अनंबधों के साथ श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट अनुबंध/ठेका व्यवस्था को अधिलंघित  (Supersedes) करती है या इसकी जगह लेती है।

वेजबोर्ड द्वारा अनुसंशित, जैसे कि केंद्र सरकार द्वारा मंजूर और स्वीकृत वेतन/मजदूरी को संबंधित श्रमजीवी और गैर पत्रकार कर्मचारियों के अधिनियम द्वारा गारंटी दी जाती है। केवल अधिक लाभकारी/फायदेमंद और अनुकूल दरों को अपना कर ही अधिसूचित वेतन/मजदूरी को निर्गत/खत्म किया जा सकता है। इसलिए, अवमानना याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पिछली मजदूरी संरचना द्वारा नियंत्रित किसी भी समझौता या परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग), जो मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा सुझाई गई सिफारिशों से कम अनुकूल है, वो वैध नहीं है। इसके अलावा, वाद-विवाद उठाया गया था कि कोई भी परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग) स्वैच्छिक नहीं है, इन्हें दबाव और स्थानांतरण/बर्खास्त किए जाने के खतरे के तहत प्राप्त किया गया है। इसलिए अवमानना याचिकाकर्ताओं का निवेदन है कि उपरोक्तानुसार न्यायालय द्वारा मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को स्पष्ट किया जा सकता है।

17. जहां तक कि वेरिएवल-पे, अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों, और वित्तीय क्षमता का संबंध है, अवमानना याचिकाकर्ताओं का मामला इस प्रकार से है कि उपरोक्त सभी मामलों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा पूरी तरह से निपटाया गया है। उन सिफारिशों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, तो कथित वजह पर कोई और बहस या विवाद के लिए कोई गुंजाईश नहीं है। अनुमोदित और अधिसिूचित वेजबोर्ड की सिफारिशें अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों सहित सभी श्रेणियों के कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन के हकदार होंगे और वेरिएवल पे के समावेश द्वारा सभी भत्तों की गणना करेंगे। सभी नियोक्ता निर्धारित अवधि से बकाया राशि का भुगतान करने के लिए भी बाध्य हैं, जब तक कि एक प्रतिष्ठान को अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पहले तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में भारी नकदी हानि का सामना करना पड़ रहा है, जो कि नियोक्ता द्वारा अनुमानित महज वित्तीय कठिनाइयों से अलग होना चाहिए। 

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मीडिया मालिकों के इस मुखबिर को भड़ास वालों ने दिया करारा जवाब

मजीठिया क्रांतिकारियों… सावधान… मीडिया मालिकों के मुखबिर नए नए रूप में टहलने लगे हैं… ऐसे ही एक मुखबिर ने भड़ास4मीडिया को झांस में लेने के लिए फर्जी आईडी से मीडिया हेल्पर बनने का दावा करते हुए इस उम्मीद से मेल भेजा कि भड़ास पर अच्छे खासे तरीके से छप जाएगा लेकिन भड़ास वालों ने इस मुखबिर की नीयत जान ली और इसे दिया करारा जवाब…

पढ़िए यह मुखबिर किस नए अंदाज में मुखबिरी पर निकला लेकिन इसका पाला भड़ास वालों से ऐसा पड़ा कि इसे न सिर्फ जवाब देकर इसकी औकात दिखा दी बल्कि इसकी नीयत का पर्दाफाश करते हुए प्रकाशन कर दिया जिससे मीडियाकर्मी सावधान रह सकें… कोई भी मीडियाकर्मी कभी उस किसी शख्स के झांसे में न आएं जो अपना नाम पहचान छुपाकर किसी किस्म की ‘क्रांति’ करने का आह्वान कर रहा हो. देखिए भड़ास वालों ने इस मुखबिर को किस तरह दिया है करारा जवाब…

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आप बाल-बाल बच गए हैं सर और इस वजह से हम प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल-बाल बचे!

19 जून को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया वेज बोर्ड का फैसला सुनाया था, उसमें मालिकान तो बाल-बाल बचे ही, मालिकानों के खास प्यादे भी बाल बाल बचे और ईश्वर को धन्यवाद किया. 19 को माननीय सुप्रीम कोर्ट की मीडिया पार्क में देश के तमाम मीडिया कर्मी आये हुए थे। सभी अपने अपने तर्कों से लैस थे। हर कोई अपनी बात को सच साबित करने में जुटा था। अभी दोपहर के बाद का 3 बजकर 20 मिनट हुआ था, देखा की कोर्ट के में गेट से सबसे पहले दैनिक जागरण के एक वकील और 2 प्यादे ऐसे बाहर निकले जैसे उनकी जान कोर्ट ने बख्श दी हो। तीनों के चेहरे पर बाल बाल बचने का भाव स्पष्ट दिख रहा था। वे सब यही सोचते आगे भाग रहे थे, क़ि यह खबर जल्दी से संजय गुप्ता को दें कि आप बाल बाल बच गए हैं सर और आपके बाल बाल बचने के साथ ही हम सब आपके प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल बाल बचे।

देखें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट से जो फैसला मजीठिया के बारे में आया है, उससे अभी तो8 मालिक बच गए हैं और इसी वजह से कर्मचारियों में निराशा का भाव है, क्योंकि उनका सोचना था कि इस मामले में मालिकानों में से कुछ को कोर्ट ज़रूर टांग देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वे बाल बाल बच गए। यहाँ उल्लेखनीय है कि मजीठिया देने से मालिकान बाल बाल नहीं बच पाएंगे। कल ये एकधारी तलवार पर चल रहे थे, अब ये दोधारी तलवार पर सवार हैं, जिसके डर से मालिकों की नींद फिर से जाने वाली है और मालिकों के प्रिय प्यादों को एक बार फिर जुगत ढूंढनी होगी बाल बाल बचने की। कुल मिलाकर यह तय है कि जब तक मजीठिया का मामला कोर्ट में रहेगा, मालिकान तो पैसा बचाने के लिए परेशान रहेंगे ही, उनके प्रिय प्यादे भी बाल बाल बचने के लिए सतर्क रहेंगे। क्योंकि कोर्ट ने प्यादों की स्थिति उस कटहर यानि कटहल जैसी बना दी है, जिसे पच्चर पका देता है। मालूम हो कि जब कटहल को अपने मन से पकाना होता है तो उसमें पच्चर यानि एक मोती कील नुमा लकड़ी खोंस यानि ठोंक देते हैं, जिससे कटहल तुरंत पक जाता है।

अब ये प्यादे जरा सा भी नौटंकी किये या सीनियर होने की हेकड़ी दिखाये, तो सभी कर्मचारी सीना तान के उनसे भिड़ जायेंगे कि रखो अपनी नौकरी, हम चले केस करने। चाहे वह कॉन्ट्रैक्ट वाला हो या वेज बोर्ड वाला या कोई भी। अब जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कम्पनी के प्रिय प्यादों को अपनी नौकरी बाल बाल बचानी मुश्किल होगी। यहाँ उल्लेखनीय बात यह भी है कि जो कर्मचारी, चाहे वह दैनिक जागरण, भास्कर, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान आदि का हो, अगर उसने 3 साल से अधिक समय गुजार लिया है, तो वह इस लड़ाई को बड़े मज़े से अंजाम दे सकता है। बस थोड़ा संयम से काम लेना होगा। यह कैसे संभव होगा या कैसे अच्छा होगा वर्कर के लिए, इस बारे में बात फिर कभी। फ़िलहाल यह तय है कि अब ये मालिकानों के प्यादे किसी कर्मचारी को डांटने, प्रताड़ित करने से बाल बाल बचेंगे और दिन रात अपना समय अपनी नौकरी बचाने में लगाएंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट द्वय उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी दायर करेंगे पुनरीक्षण याचिका

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसला पर मीडियाकर्मियों में बहस-विचार-चर्चा जोरों पर है. ताजी सूचना ये है कि मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई से जुड़े रहे दो वकीलों उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर करने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों वकील अलग-अलग रिव्यू पिटीशन दायर करेंगे. इनकी पुनरीक्षण याचिकाओं में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न माने जाने का बिंदु तो होगा ही, ट्रांसफर-टर्मिनेशन जैसे मसलों पर स्पष्ट आदेश न दिया जाना और इस मजीठिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर न आने की सलाह देने जैसी बातों का भी उल्लेख होगा. इन समेत ढेर सारे बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करते हुए फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी द्वारा रिव्यू पिटीशन दायर करने के ऐलान के बाद मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून को आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मीडियाकर्मियों और वकीलों का एक हिस्सा निराश है. शोषण, उत्पीड़न और अवमानना के आरोपी मीडिया मालिकों के साथ सुप्रीम कोर्ट का नरम व्यवहार चर्चा का विषय बना हुआ है. पीड़ित मीडियाकर्मियों को फौरी तौर पर कोई राहत सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नहीं दी है और सभी को एक बार फिर लेबर कोर्ट का रुख करा दिया है जहां लड़ाई वर्षों चल सकती है. इन सब बिंदुओं को देखते हुए देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून के फैसले पर पुनर्विचार के लिए माननीय सुप्रीमकोर्ट में मीडियाकर्मियों के पक्ष में रिव्यू पिटीशन दायर करने का फैसला किया.

एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया क्रांतिकारी और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह से बातचीत में साफ़ कहा कि वे मीडियाकर्मियों की लड़ाई को अधूरा नहीं छोड़ेंगे और वे इस फैसले में छूटी हुई कई बातों-खामियों को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. इसके लिए उनकी पूरी टीम तैयारी में लगी है. उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश में कई खामियां हैं जिन पर सुप्रीमकोर्ट से गुहार लगाई जाएगी कि वे इन कमियों पर पुनर्विचार कर उन्हें दूर करें. एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा रिव्यू पिटीशन लगाए जाने की खबर से देश भर के मीडियाकर्मियों के चेहरे पर चमक आ गयी है. आपको बतादें कि उमेश शर्मा ने सुप्रीमकोर्ट का फैसला आने से पहले ही बता दिया था कि लीगल प्वाइंट की डफली ज्यादा बजेगी तो अखबार मालिक बच निकलेंगे. उनके इस पुराने इंटरव्यू को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : Advocate Umesh Sharma interview

देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों के वेतन और भत्ते तथा एरियर से जुड़ा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का मामला एक बार फिर सुप्रीमकोर्ट पहुंच रहा है. 19 जून को आये सुप्रीमकोर्ट के फैसले में यूं तो ज्यादातर फैसले मीडियाकर्मियों के पक्ष में आये हैं लेकिन कुछ फैसलों में सुप्रीमकोर्ट ने अखबार मालिकों को राहत दी है. इस फैसले में हुयी कुछ कमियों को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे एक अन्य वकील का नाम दिनेश तिवारी है.

एडवोकेट दिनेश तिवारी ने खुद इस खबर की पुष्टि पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह से फोन पर हुयी बातचीत में की है. उन्होंने कहा कि वे जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के 19 जून फैसले में कुछ कमी देख रहे हैं और इन कमियों को लेकर वे सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. दिनेश तिवारी बिहार के आरा के प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ मिथलेश कुमार का केस माननीय सुप्रीमकोर्ट तक लेकर आये थे. प्रभात खबर प्रबंधन ने मिथलेश कुमार का ट्रांसफर जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मांगने के कारण झारखण्ड के चाईबासा में कर दिया था.

इसके बाद वे एडवोकेट दिनेश तिवारी की मदद से सुप्रीमकोर्ट की शरण में गए थे. सुप्रीमकोर्ट ने उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दिया था. एक प्रश्न के उत्तर में एडवोकेट दिनेश तिवारी ने कहा कि उन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबार मालिकों के खिलाफ लगाए गए अवमानना मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिए गए 19 जून के फैसले को अच्छी तरह पढ़ लिया है. ये फैसला वैसे तो अखबार कर्मियों के पक्ष में है लेकिन कुछ प्वाइंट हमारे खिलाफ गए हैं. अखबार कर्मियों के खिलाफ गए फैसले में कई खामियां है जिसका लाभ अखबार मालिक उठाएंगे. इसलिए वे रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. वे और उनकी पूरी टीम रिव्यू पिटीशन के लिए दिन रात तैयारी कर रही है. एडवोकेट दिनेश तिवारी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट किसी के मौलिक अधिकार को ब्लॉक नहीं कर सकता और किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट बार-बार न्याय के लिए जाने से रोक नहीं सकता.

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(पार्ट टू) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

11. इस चरण में मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के खंड 20जे, जो मौजूदा कार्यवाही में विवाद के मुख्य क्षेत्रों में से एक है, पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा सकता है।

“20जे संशोधित वेतनमानसभी कर्मचारियों पर 1 जुलाई 2010 से लागू होगा। हालांकि यदि कोई कर्मचारी इन अनुशंसाओं के प्रवर्तन के लिए अधिनियम की धारा 12 के तहत सरकारी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से तीन हफ्तों के भीतर अपने मौजूदा वेतनमान और वर्तमान परिलब्धियों/प्रतिभूतियों को बनाए रखने का विकल्प चुनता है, तो वह अपने मौजूदा वेतनमान तथा ऐसी परिलब्धियों को बनाए रखने का पात्र होगा।”

12. मजीठिया वेजबोर्ड ने यह भी विनिर्दिष्ट/दर्शाया किया था कि तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में जो प्रतिष्ठान लगातार भारी नकदी हानि से पीडि़त हैं उन्हें बकाए के भुगतान में छूट दी जाएगी, जो अवार्ड के क्लॉज/खंड 21 से स्पष्ट होता है नीचे सारगर्भित किया गया है।

“पूर्वव्यापी/भूतलक्षी प्रभाव के क्रियान्वित किए जाने के कारण इस अवार्ड/पंचाट के प्रवर्तन/लागू होने की तारीख से देय बकाया, यदि हो, का भुगतान इस अवार्ड के प्रवर्तन की तरीख के प्रत्येक छह माह बाद तीन समान किश्तों में किया जाएगा तथा पहली किश्त का भुगतान तीन महीने के भीतर होगा; बशर्ते,इस अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पूर्व के तीन लेखा वर्षों में लगातार भार नकद नुकसान झेल रहे समाचारपत्र प्रतिष्ठान को किसी भी बकाए के भुगतान से छुट दी जाएगी। हालांकि, इन समाचारपत्र प्रतिष्ठानों को इस अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख  अर्थात 1जुलाई 2010 से, अपने कर्मचारियों का वेतन पुनरीक्षित वेतनमान में नोशनल/अनुमानित आधार पर निर्धारित करना होगा।”

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें (पार्ट वन)

अखबार प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान न दिए जाने और माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश न मानने पर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई 83 अवमानना याचिकाओं और तीन रिट पेटिशनों का निपटारा करते हुए 19 जून, 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है, उसे कुछ कर्मचारी साथी मालिकों के पक्ष में बताकर निराशा का माहौल पैदा करने में जुटे हुए हैं। हालांकि इस निर्णय में मालिकों के पक्ष में सिर्फ एक ही बात गई है, वो यह है कि कोर्ट ने इनके खिलाफ अवमानना को स्वीकार नहीं किया है और जिन अखबार मालिकों ने मजीठिया वेजबोर्ड अधूरा लागू किया है और जिनने नहीं लागू किया है उन्हें एक और मौका दिया गया है।

इसके अलावा कोर्ट ने अपने फैसले में अधिकतर बातें कर्मचारियों के हित में ही लिखी हैं। इनका जिक्र यहां करना मुनासीब नहीं होगा, क्योंकि इस पर अब तक सोशल मीडिया, साइटों और व्हाट्सएप ग्रुपों में बड़ी चरचा हो चुकी है। अफवाहों और निराशा के दौर में मेरा इतना ही कहना है कि अखबार मालिक भले ही अवमानना से बच गए हों, मगर वेजबोर्ड देने से नहीं बचे हैं। अब भी उन्हें  कानूनी शिकंजे में फंसाया जा सकता है। इसके लिए हमारे कुछ साथी जुट चुके हैं। अब सभी साथियों से एक ही अनुरोध रहेगा कि वे १९ जून की जजमेंट का हिंदी अनुवाद पढ़ कर स्वयं ही यह तय करें कि यह निर्णय हमारे पक्ष में है या नहीं। काफी लंबा और कानूनी मामला होने के कारण बड़ी कुशलता और मेहनत से अनुवाद करने की कोशिश की गई है। इसकी पहली किश्त प्रस्तुत है। बाकी का हिस्सा अगली किश्तों में जारी किया जाता रहेगा।

-रविंद्र अग्रवाल
मजीठिया क्रांतिकारी
हिमाचल प्रदेश
संपर्क नंबर : 9816103265


जजमेंट का अनुवाद भाग-1

1. श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 (यहां संक्षिप्त में अधिनियम) देश भर के श्रमजीवी पत्रकारों और समाचारपत्र स्थापनाओं में कार्यरत अन्य व्यक्तियों सेवा की शर्तों को विनियमित/रेगूलेट करने के लिए किया गया था। यह अधिनियम अन्य विषयों में(इंटर एलिया), ग्रेच्यूटी के लिए पात्रता,  काम के घंटे, छुट्टी के साथ-साथ श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार अखबार कर्मियों को देय वेतन/मजदूरी निर्धारण के निपटारे के लिए कानून की एक व्यापक रचना है, जैसा कि हो सकता है।  

जहां तक कि वेतन/मजदूरी के निर्धारण और संशोधन का संबंध है, अधिनियम की धारा 9 के तहत गठित वेतन बोर्ड द्वारा श्रमजीवी पत्रकारों से जुड़े वेतनमान/मजदूरी के ऐसे निर्धारण या संशोधन का कार्य किया जाता है। वेतनबोर्ड की सिफारिशों को अगर स्वीकार किया जाता है, तो अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा इसे अधिसूचित किया जाता है। अधिनियम की धारा 12 के तहत जारी केंद्र सरकार के आदेश के संचालन में आने पर प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार को उस दर पर वेतन/मजदूरी दी जाएगी, जो इस आदेश में इस आदेश में निर्दिष्ट की गई दर से कम नहीं होगी, यह प्रावधान धारा 13 मुहैया करवाती है। अधिनियम का अध्याय 2 क (Chapter IIA) समाचारपत्र स्थापनाओं के गैरपत्रकार कर्मचारियों से  जुड़े एक समान((pari materia/श्रमजीवी पत्रकारों की तरह) प्रावधानों को समाहित किए हुए है।

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बुरे फंसे अखबार मालिक, सुप्रीम कोर्ट ने बचने के सभी दरवाजे बंद किए

अखबार मालिक एक साल में नहीं सुधरे तो मीडियाकर्मियों के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट जाने का मार्ग खुलेगा… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून 2017 को दिए गए फैसले को अगर गंभीरता से पढ़ें तो माननीय सुप्रीमकोर्ट ने अखबार मालिकों को बचाया नहीं है बल्कि उन खांचों को बंद कर दिया है जिनसे निकलकर वे बच निकलते थे। अब अखबार मालिकों ने एक साल के अंदर जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया तो मीडियाकर्मी फिर उनके खिलाफ अवमानना का सुप्रीमकोर्ट में केस लगा सकते हैं।

मजीठिया वेज बोर्ड में सरकारी महकमे द्वारा कुछ कमियां छोड़ दी गईं थी जिसमे सबसे बड़ा पेंच था क्लासिफिकेशन का। अखबार मालिक अलग-अलग यूनिट का सीए से बैलेंसशीट बनवा कर लेबर विभाग में जमा कर साफ़ कहते थे कि साहब ये यूनिट तो पांचवे ग्रेड में आती है और एड रेवेन्यू कम होने से हम दो ग्रेड नीचे गए हैं। सुप्रीमकोर्ट ने अलग-अलग यूनिट को अलग-अलग मानने से इंकार कर दिया। यानी अब तक जो अखबार मालिक अलग-अलग यूनिट की अलग-अलग बैलेंसशीट दिखाते थे, अब उनको क्लब करना पड़ेगा। इससे कर्मचारी को बहुत फायदा होगा।

दूसरा इश्यू था 20जे का। अखबार मालिकों ने कर्मचारियों से जबरी 20जे के फार्मेट पर साइन करा लिया था जिस पर माननीय सुप्रीमकोर्ट ने साफ़ कह दिया कि मिनिमम वेतन से कम पर किया गया समझौता मान्य नहीं होगा। यानि एक तरीके से सुप्रीमकोर्ट ने 20जे को खारिज कर दिया। अखबार मालिक कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मांगने पर उनका ट्रांसफर और टर्मिनेशन करते थे। सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में भी साफ़ तौर पर लेबर कोर्ट को निर्णय लेने का अधिकार दे दिया है। इसके पहले कई राज्यों में ट्रांसफर टर्मिनेशन पर स्टे देने के अधिकार को लेकर स्पष्टता नहीं थी। सिर्फ महाराष्ट्र के लेबर कोर्ट को ये अधिकार था।

अखबार मालिक इस मामले में भी बुरी तरह फंस गए कि उन्हें ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना पड़ेगा। इसके लिए बाकायदे अखबार प्रबंधन को ठेका कर्मचारियों की सूची भी कामगार विभाग को देना पड़ेगा। साथ ही उनके बैंक खाते में जमा किये गए राशि का डिटेल भी देना पड़ेगा। अब तक अखबार मालिक स्थाई कर्मचारियों को सीटीसी या ठेका पर वेतन बढ़ाने का प्रलोभन देकर ले आते थे। इस प्रथा पर रोक लगेगी। साथ ही ठेका कर्मचारी अब जल्दी निकाले नहीं जाएंगे क्योंकि मालिक उनको निकालेंगे तो निश्चित ही वे भी अपने बकाये राशि की मांग करेंगे।

इस फैसले में उन अखबार मालिकों की भी सांस टंग गयी है जिन्होंने ये लिखकर कामगार आयुक्त को दिया था कि फाइनेंसियल रीजन से वे जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं दे पा रहे हैं। अब उन अखबार मालिकों को भी अपने कर्मचारियों को लाखों रुपये का बकाया देना पड़ेगा। आर्डर के तथ्यों को विश्लेषकों की नजर से देंखे सुप्रीमकोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने में आ रही कमियों कमियों की व्याख्या कर दी है। कुछ जानकार साफ़ कहते हैं कि कोई भी अदालत किसी को अपना अधिकार मांगने से नहीं रोक सकती। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में तो अखबार मालिकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वो सारे दरवाजे बंद कर दिए जिससे वे बच निकलते थे।

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न्याय की जहां से आस थी, वह मंदिर बाजार हो गया….!

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट से आए हालिया फैसले को लेकर बरेली के मजीठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा एडवोकेट की कविता पेश-ए-खिदमत है…

मेरे भरोसे का दर्पण आज यारों चकनाचूर हो गया

मनोज शर्मा एडवोकेट

मेरे भरोसे का दर्पण आज यारों चकनाचूर हो गया
न्याय की जहां से आस थी वह मंदिर बाजार हो गया
जालिमों ने अदा कर दी मजलूमों की आहों की कीमत
सिसक रहा है सच, झूठ के सिर सेहरा हो गया
इस दौर में हक की आवाज उठाना जुल्म है यारो
हर सिंहासन यहां सौदागरों की जागीर हो गया
किसी के बच्चे भूख से बिलखते हैं तो बिलखा करें
हाकिमों का मकसद सिर्फ दौलत कमाना हो गया
लग रहा है भगवान ने भी अपना पाला बदल लिया
बेईमान और मक्कारों के कदमों में जमाना आ गया
हजारों सीनों में दहकती आग कब शोला बनेगी
जज, अफसर, नेता नीलाम सबका ईमान हो गया
गैरत बेच दी ओहदेदारों ने कानून सिर्फ दिखावा है
धन बल के आगे बौना देश का संविधान हो गया!


रचनाकार-

मनोज शर्मा एडवोकेट
मजीठिया क्रांतिकारी
हिंदुस्तान, बरेली

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मीडियाकर्मियों के हित में है सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश!

”सुप्रीम कोर्ट द्वारा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के संबंध में सोमवार, 19 जून 2017 को दिये गये फैसले का मैं स्वागत करता हूं। यह निर्णय पूरी तरह से कर्मचारियों के पक्ष में दिया गया फैसला है। इतना ही नहीं इस फैसले ठेके पर काम करने वाले पत्रकारों (कांट्रेक्टचुअल जर्नालिस्ट) को भी फायदा होगा।” यह कहना है समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार अजय मुखर्जी का।

एडवोकेट अजय मुखर्जी

श्री मुखर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अध्ययन करने के पश्चात उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह साफ किया है कि ठेका पत्रकारों को भी वो सभी सुविधाएं मिलेगी, जो मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार मिलना चाहिए। यदि किसी भी संस्थान/समाचार पत्र ने कम वेतन पर किसी कर्मचारी से कांट्रेक्ट कराया भी होगा तो वह अमान्य होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ-साफ कहा है कि सभी कर्मचारियों को मिनिमम वेजबोर्ड देना ही होगा; चाहे वह ठेका कर्मचारी हो या स्थायी कर्मचारी। मिनिमम वेजबोर्ड से तात्पर्य है किसी भी कमचारी का वह वेतन जो जस्टिस मजिठिया वेजबोर्ड के नियमानुसार होना चाहिए। साथ ही समाचार पत्र या प्रबंधन जिन किसी कर्मचारियों का ट्रांसफर, टर्मिनेशन ये समय पूर्व रिटायर किया वे सभी तत्काल प्रभाव से अमान्य होंगे। रही बात समय सीमा की तो वह सुप्रीमकोर्ट ने अपने वर्ष 2016 के फैसले में ही टाइमबाउंड को लिख दिया था- ”Labour court Expeditely decide”

इस आदेश के तहत लेबरकोर्ट को हर स्थिति में इन मामलो की सुनवाई के लिए बांध दिया था और यही  आदेश अब भी मान्य होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामले लेकर कोर्ट को हस्तांतरित कर दिए हैं। अत: सभी संस्थानों को निर्धारित एरियर एवं वेतन का भुगतान लेबर कोर्ट के आदेश के अनुसार करना होगा। कोई भी संस्थान अपने ग्रास रिेवेन्यू में भी हेर फेर नहीं कर सकता क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि यदि कोई संस्थान इसमें हेरफेर करने का प्रयास करता है तो एबीसी/डीएवीपी एवं अन्य सरकारी महकमों में दिए गए ग्रास रेवेन्यू से मिलान किया जाएगा।

चूंकि आदेश सुप्रीम कोर्ट के डबल बेंच ने दिया है अत: समाचार संस्थान हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट भी नहीं जा सकते हैं और न ही किसी प्रकार का स्टे ले सकते हैं। ऐसा करने की स्थिति में उनपर कोर्ट का समय बर्बाद करने का मामला बनेगा और उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा। यदि कोई संस्थान एरियर एवं वेतन के भुगतान में आनाकानी या हीलाहवाली करता है, लेबर कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करता है तो उसकी तुरंत आर.सी काटने को निर्देश सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश में है। साथ ही तत्काल प्रभाव से संबंधित संस्थान के बैंक खाते भी सीज किए जा सकते हैं। हां समाचार संस्थानों के मालिक इस बात से खुश हो सकते हैं सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश उन्हें जेल नहीं भेजा। इस तरह हम देखे तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पूरी तरह से कर्मचारियों के हित में है।

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

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मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले पर एडवोकेट उमेश शर्मा की ये है टिप्पणी

Umesh Sharma
Advocate, Supreme Court


Analysing the order passed by the Supreme Court in the contempt petitions filed by employees against the newspaper establishments, it is evident that the core issue of wilful contempt, deliberate non-compliance of the directions issued by Supreme Court on 7/2/2014 and subsequent acts done by the newspaper establishments in discouraging the employees from claiming money to wage board benefits has escaped the attention of Supreme Court.

Going into the background of the matter, it is evident that all the newspaper establishments have challenged the Majithai Wage Board award as notified by the Central government directly before the Supreme Court in a writ petition under Article 32 of the Constitution of India. Supreme Court heard the aforesaid writ petitions at length and finally wide its orders of 7/2/2014, dismissed all the writ petition thereby upholding the notification of the Central Government.

The Supreme Court further issued time-bound directions for implementation of the said award and payment of the benefits due under the aforesaid award to the employees within one year in four equal quarterly installments. Supreme Court further issued directions for payment of the benefits of midget wage board with effect from first of April 2014. The operative part of the historic order is as under:

71) Accordingly, we hold that the recommendations of the Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.

72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.

73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April 2014 onwards.

74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.

It was for the first time that Supreme Court has upheld the legality of any Wage Board Award and issued specific directions for the implementation of the same. The legal effect of the same is that the award merged in the orders of the court. As was expected, none of the newspaper establishments complied with the aforesaid directions issued by Supreme Court and resorted to dishonest and myriad devices to overreach the specific time-bound directions issued by the Supreme Court. Not all but a handful of newspaper employees on the basis of the orders of Supreme Court demanded their benefits under the aforesaid order.

As expected, the newspaper establishments refused to release the benefits despite very clear and specific directions of Supreme Court and more clear notification issued by the Central government which categorizes the newspaper establishment on the basis of its gross revenue and places the employees on the basis of their duties and posts in particular category. Most of the employees demanding the aforesaid benefits were either denied the said benefits or harassed, victimized for their such demands. Instances of large-scale transfer, termination, discharge took place in various newspapers establishments for obvious reasons of discouraging the employees from claiming their rights under the wage board award.

Since the wage board award was upheld by the Supreme Court and specific directions were issued by the Supreme Court for implementation of the wage board award, the non-compliance of the aforesaid orders and non-implementation of the award clearly amounted to contempt of the orders of Supreme Court dated 7/2/2014 in Writ Petition No. ( C) 246 of 2011. A large number of employees, unions, representative of employees approached the honorable Supreme Court against the employers claiming that the employers have committed contempt of court by not implementing the orders of the court and by not granting the benefits accrued to them under the wage board award.

In total around 82 such petitions involving thousands of employees were filed and taken on board for hearing by the Supreme Court. The hearing in such matters commenced and the Supreme Court passed various interlocutory orders seeking compliance or non-compliance of the orders. As expected, most of the newspaper establishments resorted to twisting of facts, misrepresentations and raising frivolous legal objections before the court and the matter drifted from the core issue of deliberate, willful and intentional non-compliance of the orders of Honorable Supreme Court to some legal issues such as payment of VDA, entitlement of contractual employees, extraction of signatures on clause 20 (j) of the Majithia Wage Board Award besides several other related issues.

Since these issues were mainly raised on behalf of the employees, the employers got the golden opportunity to create controversy on the understanding of the wage board and proper implementation thereby creating an alibi of dispute and non-entitlement of the employees besides various other fake issues of serious losses, incapacity to pay the wage board recommendations etc. With the advancement of arguments on these issues the employees were very happy about arguments by their counsels on these issues and became very hopeful that Supreme Court is going to hold all these issues in their favor.

The emphasis also drifted away from the main and core issue of deliberate non-implementation of the orders on the fancy arguments presented by some of the counsels on behalf of the employees. The courts have limited powers under contempt of court jurisdiction, the raising of such unrelated issues was a strategic mistake on the part of the counsels for employees which opportunity was grabbed by the team of lawyers deputed by the newspaper establishments to defend themselves.

At one stage of the matter, the judges were very aggressive and particular to get their orders implemented however in the absence of any specified machinery and due to the raising of unrelated issues, the courts drifted away from the intention of seeking the compliance of the orders through labor authorities. Earlier labor commissioners, as well as the Chief Secretaries of the respective states, were directed to file reports with regard to the implementation of the orders.

After some time the said process was found to be ineffective by the Supreme Court hence dropped. The main reason for dropping the said procedure is the raising of various legal issues from the side of the employees which suited the teleological concept of justice and the judges also got drifted with the same. It is a matter of record that in some of the reports submitted by the labor authorities before Supreme Court, it was reflected on the records that some of the establishments have not implemented the aforesaid orders of Supreme Court. It was a clear case of contempt however the Supreme Court lost sight of the aforesaid facts once detailed arguments on several legal issues were raised on behalf of the employees.

After prolonged hearings, the Supreme Court finally reserved the matters on 3rd of May 2017 for orders and finally pronounced the same on 19th of June 2017. The court wide its orders held that the employers are not guilty of deliberate contempt. The court however delved upon the various issues as raised on behalf of the employees and recorded positive findings on the same. The court upheld that the signatures on any declaration accepting the pay scales benefits lower than the multitier wage board are not binding on the employees and will have no legal effect.

The court also held that the contractual employees have not been separately categorized under the Majithia Wage Board Award hence there is nothing on record to show that they are not entitled to the benefits of midget wage board. The court also recorded of the finding of grant of VDA to the contractual employees. The court mainly discussed the provisions of the Working Journalists Act, 1955 and upheld that various provisions of the aforesaid act are enough protection for the rights of the employees.

The court emphasized that the entire mechanism as provided under the aforesaid Act can be invoked by the employees for claiming their benefits. While discussing the provisions of section 17 of the aforesaid Act, the court has observed that the said section takes care of the claims of the employees. It is however painful that court has not made any qualifying determination with regard to the machinery provided under section 17 (1) of the said Act and section 17 (2) of the said Act because both these remedies are very distinct from each other.

A plain and simple reading of the provisions of section 17 (1) of the said Act would say that the employee has a right to claim its due under the act before the labor authorities who would recover the same by issuing a recovery certificate. The impact of the aforesaid provision is wide, as it gives sweeping powers to the labor Commissioner to recover the dues of the employees. A further construction of the aforesaid section would clarify that section 17 one of the Act specifically empowers the labor Commissioner to issue a recovery certificate for the dues of the employees.

As the dues under the Majithia Wage Board Award are statutory dues based on the classification of the newspaper establishment and classification of the employee based upon the nature of his duties, to my understanding, the same can be recovered reliably by issuance of a recovery certificate by the labour authorities despite any dispute being raised by the newspaper establishment because any such dispute raised by the newspaper establishment in this regard is liable to be treated as a sham or fake dispute as the claim of the employees based upon the statutory wage board which was intimately upheld by the Supreme Court.

Having ignored a discussion on this crucial provision and non-issuance of any specific direction by the Supreme Court, the field is open for the employers to create a dispute in every claim thereby making the aforesaid provision ineffective. It is worthwhile to mention that during the last three years, several recovery certificates have been issued by the labor commissioners on the basis of the claims filed by the employees.

So far as section 17 (2) of the Act is concerned, the same contemplates adjudication of the claim of the employee by the labor court. The said machinery is the most effective mechanism for determining the dues of the employees however given the prolonged period of adjudication and complexities of the adjudication process, ultimately the same proves to be ineffective and the employees remains at the receiving and by filing such claims. Another painful aspect of this matter is that Pandora of litigation by the resourceful employers is launched in the process of adjudication by the labor court and even after the final adjudication, the matter drags before the High Courts, then to the Supreme Court on various Perry Farrell issues.

The observations made by the Supreme Court in its orders dated 19th of June 2017 regarding the availability of the machinery for enforcement of the orders under section 17 two of the said aActare nothing but an attempted to wash off its hands despite clear and recorded violation done by some of the establishments in non-implementing and ignoring the orders of Supreme Court.

On general evaluation of the aforesaid judgement dated 19th of June 2017 by the Supreme Court it also shows the ineffectiveness and limitations of the Indian legal system in balancing the equities between the haves and the have-nots. The Supreme Court has written a very positive judgement but it only reaffirms and reiterates the various provisions available to the employees and painfully drifts away from the core issue of deliberate, intentional nonimplementation of the wage board award and the directions issued by the Supreme Court on seventh of February 2014. The core issue of contempt being pushed in the background, the discussion as done by the Supreme Court remains only an academic exercise which does not grant any relief to the employees of the newspaper establishments.

Coming to the point of implementation of the award of Majithia Wage Baord and the directions of the Supreme Court issued on 7/2/2014, the machinery as described under section 17 (1) and 17 (2) of the working journalists act is the only remedy now available to the employees. The issue of contempt therefore can be held to have been decided against the employees as the Supreme Court has specifically observed that there is no wilful violation of the order hence there is no contempt committed by the employers. Now the employees have the remedy to invoke the aforesaid provisions of section 17 (1) as well as 17 (2) as the case may be. This needs to be done in very planned and united manner by the employees.

A simple reading of section 17 (1) of the said act would show that even the union or any person authorised on behalf of the employee can file an application before the labour authorities for recovery of the dues of the employees. A construction of this provision would be that any union can file the claim application on behalf of employees of the establishment and ask the labour authorities to issue a recovery certificate against their dues.

The process for recovery of the said dues or for filing of such applications as suggested by be earlier is that the employee would prepare a chart of all its dues on the basis of its entitlement under the Majithia Wage Board Award. The said chart needs to be very specific showing various columns of the receipts made by the employees and the dues accruing under the Award and the balance dues to be recovered under the recovery certificate.

The same needs to be prepared meticulously giving the entire details thereby leaving no scope for any dispute on the such amount. The application under section 17 (1) of the Working Journalists Act can be filed before the labour authorities and followed by the unions if the employees are not in a position to make the said application.

The employees themselves can approach the High Court for giving a time bound direction for disposal of their applications by the labour authorities. In the event of the application is being referred by the labour authorities to the labour court for adjudication under the industrial disputes machinery, the entire process is liable to be delayed inordinately however in the absence of any other specific remedy, the same is the only remedy available to the employees now. All the unions, leaders need to formulate a clear strategy in this regard.

So far as the dispute of fitment and gross revenue of r newspaper establishments is concerned, no dispute on the same can be upheld before the labour court as the Majithia Wage Board Award has specifically defined about the nature of duties and the fitment of a particular employee, the claimant employee can very well produce evidence of his duties wide various records, emails, office orders etc and claim the benefits of a particular post.

Any dispute regarding the fitment of the newspaper establishment in a particular category based on its revenue will not stand as the declaration done by the said newspaper establishments before the Registrar of newspapers, income tax authorities, DAVP and other statutory authorities will disclose the gross revenue receipts of the said newspaper establishment. The employees or the union needs to proceed very careful in this matter by preparing a clear draft of the claim application supported by documents in evidence and someone all the documents in this regard before the labour authorities.

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न्याय मांगने वालों को याचिकाएं वापस ले लेनी चाहिए क्योंकि अदालतें मनी मैन लोगों के लिए हैं!

वाह सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने आप जान लिया है वे ना समझदार हैं… देश की न्यायपालिका पर नहीं ऐसे गरीब लोगों पर तरस आती है जो इस पर विश्वास करते हैं और यहां न्याय मांगने की भूल कर बैठते है। दरअसल कोर्ट बड़े लोगों के लिए है आम लोगों का गुस्सा सरकार पर या पूंजीपतियों के खिलाफ ना भड़के इसके लिए अंग्रेजों ने कोर्ट बनाया। मजीठिया वेज वोर्ड के फैसले को देखकर भ्ज्ञी ऐसा ही लगता है।

बिना बताए कैसे पता चला कि उन्होंने जाने में अवमानना नहीं की? सुप्रीम के जज रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को यह कैसे पता चल गया कि प्रेस मलिकों ने जानबूझकर अवमानना नहीं की। जबकि किसी प्रेस मालिक ने कोर्ट में यह दलील नहीं दी कि हमें पता नहीं था या हम मजीठिया वेज बोर्ड को समझ नहीं पाए। ना ही किसी ने कोर्ट में क्षमा मांगी।  चूंकि प्रेस मालिकों को पता था इसलिए मजीठिया वेज बोर्ड को चुनौती दी थी। और सुपीम कोर्ट में हार गए थे। जिसके बाद अवमानना का मामला दायर किया था। यदि प्रेस मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में पता नहीं होता तो वे नोटिफिकेशन के विरुद्ध कोर्ट जाते ही नहीं। हां प्रेस मालिक यह जरूर करते रहे कि मजीठिया वेज बोर्ड लागू करना संभव नहीं है। कई कर्मचारियों ने 20 जे के तहत साइन कर इसे लेने से इंकार कर दिया है।

कैसे लागू होगा फैसला.. अवमानना के मामले में कोर्ट ने यह कहा कि मजीठिया लागू होगा। वित्तीय घाटे का रोना नहीं रो सकते। भैया लागू कराने के लिए भी अवमानना याचिका लगाई गई थी। आप भी बताए कि कैसे लागू होगा। अब 6 साल सुप्रीम कोर्ट में भटके। इसके बाद अब लेबर कोर्ट भटके, फिर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट और अंत में कुछ नहीं।

जज के खिलाफ बनता है अवमानना… वास्तव में यहां पर जज के खिलाफ अवमानना का मामला बनता है। क्योंकि अपने ही फैसले को लागू ना करा पाना यह कोर्ट की अवमानना है। और प्रेस मालिकों की खुद पैरवी कर रंजन गोगोई की खंडपीठ ने न्यायपालिका के प्रति आम नागरिकों के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। इसलिए जस्टिस कर्णन के समान रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेकर अवमानना का मामला चलाना चहिए। इस मामले में तो सीजेआई और राष्ट्रपति को दखल देना चहिए कि जज है तो कुछ भी फैसला दे देगा। जो ना तो कानून में लिख है ना ही ऐसी कोई दलील दी गई है जिसके कारण उसे पता चल गया। और 3 साल में आवेदकों को न्याय क्या दिलाया। हां न्याय के नाम पर देरी कर आरोपी को जरूर फायदा पहुंचाया। मुझे तो लगता है कि जितने आम नागरिक कोर्ट में न्याय मांगने गए हैं उन्हें अपनी याचिकाएं वापस ले लेनी चहिए। क्योंकि यह मनी मैन लोगों के लिए है।

रमेश मिश्र

पत्रकार

swargeshmishra@rediffmail.com

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यही फैसला सुनाना था तो इतना ड्रामा क्यों किया जज साहब!

खोदा पहाड़ निकली चुहिया वो भी मरी हुई… कुछ ऐसा ही हाल पत्रकारों के लिए गठित वेजबोर्ड मजीठिया का है। इसके पहले गठित सभी आयोग की सिफारिशें औंधे मुंह गिरी हैं। लगभग सभी में अखबार के मालिकानों ने अपनी माली हालत खस्ता होने का रोना रोकर आयोग की सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डलवाया है। हां यह अलग बात थी कि इस आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए अखबारकर्मियों ने आर पार की लड़ाई लड़ी है।

अब एक नजर अदालती कार्यवाही पर। संसद के दोनों सदनों से पास होने और राष्ट्रपति की मुहर लगाने के बाद जब इसने कानून का रूप ले लिया। इस कानून के विरोध में कुछ अखबार के मालिकों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। झेलाऊ अदालती प्रक्रिया से गुजरने के बाद फैसला आया। फैसला लागू न होने पर बड़ी संख्या में पत्रकार और पत्रकार संगठन कोर्ट गए कि अखबारों के मालिक आपके आदेश को नहीं मान रहे हैं यानि उसकी अवमानना कर रहे हैं। अब दो साल से अधिक अवमानना का मामला चला। फैसला आया। मिला क्या “बाबा जी का ठुल्लू”।

अगर देश की सर्वोच्च अदालत को यही फैसला (पत्रकार लेबर कोर्ट जाएं, अवमानना का स्पष्ट मामला बनता नहीं) सुनाना था तो इतना ड्रामा क्यों किया जज साहब। जब अवमानना को लेकर बड़ी संख्या में पत्रकार अदालत की शरण में आये थे तब ही मामले को खारिज़ कर दिया होता। जब मामला अवमानना का बनना नहीं था तो एडिशनल एफिडेविट क्यों मांगा था। एक बात और गौर करने की है वह यह कि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्रकार /गैर पत्रकार आयोग की संस्तुतियों के अनुसार वेतन और अन्य परिलाभ के लिए लेबर कोर्ट जाएं। मामला सुप्रीम कोर्ट में था। उसकी सलाह पर हम/मैं लेबर कोर्ट जाएं, वहां हार जाएं तो हाईकोर्ट जाएं। हाईकोर्ट में हारें तो उसके फैसले के खिलाफ फिर सुप्रीम कोर्ट जाएं।

एक सवाल केंद्र सरकार से। जब वह खुद के द्वारा गठित आयोग की सिफारिशों को लागू नही करा पाती है तो वह वेजबोर्ड का गठन ही क्यों करती है। क्या सरकार का दायित्व सिर्फ और सिर्फ वेजबोर्ड का गठन करना ही है। प्रसंगवश एनडीटीवी ने मजीठिया वेजबोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न केवल खबर का हिस्सा बनाया बल्कि प्राइम टाइम में उसे अलग से स्थान दिया। (एनडीटीवी इसके लिए बधाई का पात्र है।) जिन लोगों ने एनडीटीवी पर ही इसे देखा वे गद्गगद होंगे। हालांकि जाते जाते चैनल इसकी बारीकियो का चीरहरण कर गया। उसके अनुसार कोर्ट ने तिथि निर्धारित नहीं} की कि, अखबार मालिक कब तक सिफारिशों को लागू करें। यानि अखबारकर्मियों में दम है तो वे ले लें।

ध्यान देने वाली बात यह है कि, सरकार हर दस साल पर अपने कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग का गठन करती है। आयोग की सिफारिशें केंद्रीय कर्मचारियों के लिए होती हैं। राज्य सरकारें बाध्य नहीं हैं उसे लागू करने के लिए पर देर-सबेर लागू करतीं हैं नहीं तो कर्मचारी संगठन बाध्य कर देते हैं लागू करने को। अखबारों के मालिक वेतन आयोग की संस्तुतियों के अनुसार वेतन और अन्य परिलाभ नही देते हैं तो हम उसे लागू करा भी तो नहीं पाते हैं।

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून
arun.srivastava06@gmail.com

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कोर्ट के फैसले से निराश न हों मजीठिया क्रांतिकारी, लेबर कोर्ट के जरिए लेंगे अपना हक

मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मिलेगा और जरूर मिलेगा, लेकिन सिर्फ क्रांतिकारियों को ही. उन पत्रकार साथियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ अवश्य मिलेगा जिन्होंने रिस्क लेकर इस लड़ाई में कूदने का साहस किया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट का 19 जून 2017 का फैसले सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया जाना चाहिए। हालांकि इस मामले में माननीय कोर्ट ने वह सख्त फैसला नहीं दिया जिसकी अपेक्षा पत्रकारों ने की थी। माननीय कोर्ट ने मीडिया मालिकान को सिर्फ संदेह का लाभ देते हुये उन्हें वेज बोर्ड के कार्यान्वयन का एक और मौका दिया है।

हालांकि मालिकान अपनी धूर्तता का परिचय देंगे और कानूनी पेचीदगियों का लाभ लेते हुये लेबर कोर्ट से लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट तक देय रकम को लेकर लड़ाई को लंबी खींचेंगे। वे लड़ाई को इतना लंबा कर देंगे कि श्रमजीवी पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड शब्द भूल जाएं। यानी इसका लाभ आखिरकार उन मजीठिया क्रांतिकारियों को ही मिलेगा जो सबकुछ दाव पर लगाकर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं। माननीय कोर्ट की यह टिप्पणी सराहना योग्य है जिसमें कहा है कि वेज बोर्ड का लाभ सभी पत्रकारों को मिलेगा, चाहे वे नियमित हों या फिर कांट्रैक्ट पर हों।

जो पत्रकार नौकरी दाव पर लगाकर कोई अन्य कार्य करने की क्षमता रखते हैं, वे अब सीधे लेबर कोर्ट में मजीठिया के हिसाब से वेतनमान के लिये और बकाये एरियर के भुगतान के लिये दावा कर सकते हैं। अगर वेज बोर्ड का लाभ मांगने के कारण उन्हें ट्रांसफर / टर्मिनेट / फोर्स रिजाइन की कार्यवाही का शिकार होना पड़ता है तो इसका केस भी लेबर कोर्ट में डालना होगा। लड़ाई 5-10 वर्षों तक खिंच सकती है लेकिन बहाली भी होगी और मोटी रकम भी पाएंगे। हां, इस समयावधि में हम सबको रोजगार के अन्य साधनों पर विचार करना होगा।

माननीय कोर्ट ने यह माना है कि वेज बोर्ड को लेकर भ्रम के कारण मीडिया मालिकान ने इसे लागू नहीं किया। चूंकि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया, लिहाजा अवमानना का मामला नहीं बनता। देशभर के मजीठिया क्रांतिकारी माननीय कोर्ट के फैसले से निराश न हों बल्कि और मजबूती से लड़ने का संकल्प लें, क्योंकि मालिकान को तकनीकी लाभ मिला है न कि उन्हें वेज बोर्ड कार्यान्वयन मामले में क्लिन चिट दी गई है।

वेद प्रकाश पाठक
मजीठिया क्रांतिकारी
गोरखपुर
8004606554
cmdsewa@gmail.com

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फैसले के बाद कांट्रेक्ट वाले कर्मचारियों को निकालने से बचेंगे अखबार मालिक

माननीय सुप्रीमकोर्ट के 19 जून को आये फैसले ने सबको कुछ न कुछ दे दिया है। निराश किसी को नहीं किया है। मॉलिकों को जहाँ जेल जाने से बचा दिया वहीं देश भर में सबसे ज्यादा अखबारों में कांट्रेक्ट कर्मचारी हैं उनको भी जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देने का निर्देश दे दिया। इससे एक चीजे तो साफ़ हो गयी की अब अखबार मॉलिकों को उन कांट्रेक्ट कर्मचारियों को भी उनका एरियर और मजीठिया के अनुसार वेतन देना पड़ेगा।

साथ ही अखबार मालिक कांट्रेकट कर्मचारियों को नौकरी से निकालने से बचेंगे। अगर निकाल दिया उनको काम निकालते समय  तो हर हाल में  उनका बकाया एरियर्स देना पड़ेगा वह भी मजीठिया के हिसाब से। अगर अखबार मालिक बिना एरियर के कांट्रेक्ट कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं तो ये कर्मचारी लेबर विभाग  या लेबर कोर्ट जाएंगे और अपने बकाये की मांग करेंगे।

इस स्थति में अखबार मालिक हर हाल में कांट्रेक्ट कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने से बचेंगे साथ ही अगर कांट्रेक्ट कर्मचारी कोर्ट गया तो संभव है उसे स्थायी करने का भी विकल्प कोर्ट से मिले। अब अखबार मालिक कांट्रेक्ट कर्मचारियों के पेंच में ऐसे फंस गए हैं या ऐसे कहें कि सुप्रीमकोर्ट ने उन्हें ऐसे फंसा दिया की इससे निकलना अखबार मॉलिकों के लिए टेढ़ी खीर होगा। सो कांट्रेक्ट कर्मचारियों को बधाई।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335
shashikantsingh2@gmail.com

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मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट का आज आया पूरा फैसला इस प्रकार है…

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सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया को लेकर मीडियाकर्मियों की लड़ाई को लेबर कोर्टों के हवाले किया

सुप्रीम कोर्ट ने दिया साफ संदेश- ”मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लेबर कोर्ट में लड़िए”. मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं करने पर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज जो फैसला सुनाया है उसका स्पष्ट मतलब यही है कि आगे से इस मामले में कोई भी सुप्रीम कोर्ट न आए और जिसे अपना हक चाहिए वह लेबर कोर्ट जाए. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रंजन गोगोई व जस्टिस नवीन सिन्हा की खंडपीठ से मीडियाकर्मियों ने जो उम्मीद लगाई थी, वह दोपहर तीन बजे के बाद मुंह के बल धड़ाम से गिरी. दोनों जजों ने फैसला सुनाते हुए साफ कहा कि वेजबोर्ड से जुड़े मामले संबंधित लेबर कोर्टों में सुने जाएंगे. वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर समेत वेतन भत्ते संबंधित मामले लेबर कोर्ट या अन्य कोर्ट में ही तय किए जाएं. संबंधित कोर्ट इन पर जल्दी से जल्दी फैसला लें.

वेज बोर्ड में सबसे विवादित बिंदू 20-जे के संबंध में कोर्ट ने कहा कि 20-जे को लेकर एक्ट में कोई विशेष प्रावधान नहीं है, इसलिए इसका फैसला भी संबंधित कोर्ट ही तय करेगी. कोर्ट ने कहा कि अवार्ड को गलत समझने के चलते मीडिया संस्थानों पर अवमानना के मामले नहीं बनते. अवमानना याचिकाओं में दायर ट्रांसफर, टर्मिनेशन व अन्य प्रताडऩाओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्देश नहीं दिए. कोर्ट ने वेजबोर्ड से संबंधित एरियर वेतन भत्ते कर्मचारियों की प्रताडऩा आदि से संबंधित मामलों की जिम्मेदारी लेबर कोर्ट पर डाली है. अब लेबर कोर्ट ही पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मामले में फैसला देगा. 36 पेजों में दिए फैसले में कोर्ट ने मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना को नहीं माना. ढाई साल से वेजबोर्ड के लिए देश के हजारों पत्रकार व गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे. पर नतीजा आज पूरी तरह मीडिया मालिकों के पक्ष में रहा.

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एनडीटीवी ने मजीठिया मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भ्रामक खबर चलाई

एनडीटीवी ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर केवल मीठी मीठी खबर ही अपने यहां चलाई ताकि मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी दी जा सके. भड़ास में जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सारांश प्रकाशित कर इसे एक तरह से मीडियाकर्मियों की हार और मीडिया मालिकों की जीत बताया गया तो देश भर के मीडियाकर्मी कनफ्यूज हो गए. वे चर्चा करने लगे कि किस खबर को सच मानें? एनडीटीवी की या भड़ास की? एनडीटीवी ने जोर शोर से टीवी पर दिखाया कि सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोई उनसे पूछे कि भइया मजीठिया लागू करने का निर्देश कोई नया थोड़े है और न ही यह नया है कि ठेके वालों को भी मजीठिया का लाभ दिया जाए.

(आज हुए फैसले पर एक वेबसाइट पर छपी मीठी-मीठी खबर)

(एनडीटीवी पर चली मीठी-मीठी पट्टी.)

कांग्रेस के जमाने वाले केंद्र सरकार की तरफ से पहले ही मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को कानून बनाकर नोटिफाई कर दिया गया था और इसके खिलाफ वर्षोंं चली सुनवाई के बाद मीडिया मालिकों की आपत्ति को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के आदेश दे दिए थे. ये सब पुरानी बातें हैं. ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देने के खिलाफ अवमानना याचिका का था. फिलहाल जो मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था वह यह था कि मीडिया मालिक मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं कर रहे हैं इसलिए उन्हें अवमानना का दोषी माना जाए और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, संभव हो तो जेल भेजा जाए ताकि आगे से ऐसी हिमाकत न कर सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी नहीं माना. दूसरा मामला यह था कि जिन हजारों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनके संस्थानों ने नहीं दिया, उनको लाभ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कई बड़ी पहल करे, आदेश करे. जैसे एक संभावना यह थी कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तरह नेशनल मजीठिया ट्रिब्यूनल बना दिया जाए और यह ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में डे टुडे सुनवाई करके सारे क्लेम को अंजाम तक पहुंचाकर मीडियाकर्मियों को न्याय दिलाए. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने सारी जिम्मेदारी लेबर कोर्टों पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.

अरे भाई, लेबर कोर्ट तो पहले से ही मीडिया मालिकों से फिक्स थे और हैं. लेबर विभाग और कोर्ट मीडिया मालिकों के इशारे पर काम करते हैं, यह कोई नई बात नहीं है. कायदे से सुप्रीम कोर्ट को दोषी लेबर कमिश्नरों को टांगना चाहिए था जो इतने समय बाद भी मीडियाकर्मियों को उनका क्लेम नहीं दिलवा सके. एनडीटीवी की तरफ से फैसले के नतीजे को बताने की जगह मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी देने के लिए केवल मीठी मीठी बातें ही प्रकाशित प्रसारित की गई.

भड़ास का मानना है कि तथ्यों को सही तरीके से और पूरे सच के साथ रखना चाहिए ताकि हकीकत और हालात की पूरी तरह समीक्षा के बाद संबंधित पक्ष अपनी-अपनी अगली और रायलीस्टिक रणनीति तय कर सकें. जो मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे थे, उनके लिए रास्ते बंद नहीं हुए हैं. लेबर कोर्टोंं में सबको लड़ना है और अच्छे से लड़ना है, बड़े वकीलों द्वारा बनाई गई रणनीति (इस बारे में शीघ्र खबरें भड़ास पर प्रकाशित होंगी या सभी को मेल कर बता दिया जाए) के तहत लड़ना है और मीडिया मालिकों को हराकर अपना हक लेना है. अगर लेबर कोर्ट और लेबर डिपार्टमेंट दाएं बाएं करेंगे तो उनको टांगा जाएगा, उनकी कुंडली निकाली जाएगी और उन्हें नंगा किया जाएगा ताकि वह किसी भी प्रलोभन या दबाव में मीडिया मालिकों का पक्ष न लेकर पूरे मामले में सच और झूठ का फैसला कर न्याय करें.

मूल खबर…

इस लड़ाई के अंजाम के बारे में भड़ास संपादक यशवंत ने पिछले साल अगस्त में ही ये लिख दिया था…

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मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई मीडियाकर्मी हारे, मीडिया मालिकों के पक्ष में खड़ा हो गया सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के प्रिंट मीडिया के कर्मियों को निराश किया है। मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आज दिए फैसले में सारे चोर मीडिया मालिक साफ साफ बच गए। सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मीडिया मालिक को अवमानना का दोषी नहीं माना। वेजबोर्ड के लिए लड़ने वाले पत्रकारों को लेबर कोर्ट जाने और   रिकवरी इशू कराने की सलाह दे डाली।

एक तरह से ऐसा लग रहा जैसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह मीडिया मालिकों के पक्ष में एकतरफा फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद देश भर के मजीठिया क्रांतिकारियों में मायूसी छाई है। अब सबको अपनी अपनी निजी लड़ाई लेबर कोर्ट जाकर लड़नी पड़ेगी। जजों ने लंबे चौड़े फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न मानने के पक्ष में लंबी चौड़ी दलीलें पेश की हैं लेकिन मीडियाकर्मियों के खून के आंसू इन न्यायाधीशों को नहीं दिखे। कहा जा सकता है कि आज मीडियाकर्मी नहीं हारे बल्कि लोकतंत्र हारा है, कानून की हार हुई है, न्याय व्यवस्था की हार हुई है, हक़ के लिए लड़ाई की हार हुई है। फैसले पर मीडियाकर्मियों के वकीलों ने भी निराशा जाहिर की है।

इस लड़ाई के अंजाम के बारे में भड़ास संपादक यशवंत ने पिछले साल अगस्त में ही ये लिख दिया था…

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