पाली स्थित दैनिक भास्कर ऑफिस को लेकर उठ रही अंदरूनी कलह की खबरें मीडिया सर्कल में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई यहां संपादकीय टीम गुटों में बंट गई है, या यह केवल अफवाहों का मायाजाल है?
बताया जा रहा है कि संपादकीय टीम के भीतर मतभेद इस कदर गहराए कि ऑफिस दो गुटों में बंट गया। एडिटर और चीफ रिपोर्टर के बीच चली खींचतान से कामकाज प्रभावित हुआ है।
सूत्रों की माने तो इस विवाद की शुरुआत कुछ क्राइम रिपोर्टिंग को लेकर हुई, जिसने धीरे-धीरे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का रूप ले लिया। मामले की गूंज भोपाल और जयपुर तक पहुंची, जिसके बाद मैनेजमेंट ने जांच के लिए भीलवाड़ा से क्लस्टर एडिटर को भेजा। जांच रिपोर्ट के बाद चीफ रिपोर्टर का तबादला कर दिया गया। इस फैसले से नाराज होकर उन्होंने ऑफिस में विरोध जताया और माहौल तनावपूर्ण हो गया।
इधर, ऑफिस से जुड़े विवादों ने मालिकों के लिए भी कानूनी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। हाल ही में एक मामले में पॉक्सो पीड़िता की पहचान उजागर करने पर मुकदमा दर्ज हुआ, जबकि रायपुर के एक कारोबारी और प्रमुख विज्ञापनदाता मुकेश माली ने मानहानि का नोटिस भेजा है। सूत्र बताते हैं कि यह दोनों खबरें उसी विवादित क्राइम रिपोर्टर के जिम्मे थीं, जिस पर पहले भी पक्षपात और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लग चुके हैं।
भड़ास4मीडिया ने इस पूरे मामले पर तीन अहम लोगों से सीधे बात की—चीफ रिपोर्टर मनीष शर्मा, क्लस्टर हेड अरविंद शर्मा और जांच प्रभारी बताए जा रहे भीलवाड़ा संपादक अजय रावत।
- मनीष शर्मा ने साफ कहा कि “विवाद जैसी कोई बात नहीं है। मैं इन दिनों व्यक्तिगत कारणों से छुट्टी पर हूँ।”
- अरविंद शर्मा का कहना था कि “पाली यूनिट सामान्य रूप से काम कर रही है। अंदरूनी कलह की बातें महज अफवाह हैं।”
- अजय रावत ने तो और भी स्पष्ट किया—“मैं भीलवाड़ा में हूं, पाली जांच करने गया ही नहीं था और न ही मुझे जांच प्रभारी बनाया गया था।”
इन तीनों बयानों के बाद सवाल और गहरे हो जाते हैं—
- अगर विवाद है ही नहीं तो फिर बार-बार “पाली विवाद” की आहट क्यों सुनाई दे रही है?
- क्या स्थानीय स्तर पर आपसी टकराव को दबाने की कोशिश हो रही है?
- क्राइम रिपोर्टिंग को लेकर उठे विवाद का सच क्या है?
- कानूनी मुकदमों और मानहानि नोटिस का रिश्ता क्या वास्तव में पाली यूनिट से है, या इसे जोड़कर देखा जा रहा है?
स्पष्ट है कि आधिकारिक तौर पर सबकुछ सामान्य बताया जा रहा है, लेकिन लगातार उठती अटकलें और कानूनी पेंच यह इशारा कर रहे हैं कि मामला सतह पर भले शांत दिख रहा हो, भीतर कहीं न कहीं हलचल जरूर है।
अब देखना यह होगा कि क्या पाली ऑफिस का यह विवाद वाकई “अफवाह” है या फिर भड़ास के फोन के बाद सामने आए बयान सिर्फ “डैमेज कंट्रोल” का हिस्सा?
पाली से कुछ पत्रकारों द्वारा भड़ास को भेजे गए इनपुट्स पर आधारित


