राजू मिश्रा-
लखनऊ में तब तक मोहल्ला स्तर पर किसी भी अखबार के पास ऐसा कोई संजाल नहीं था कि हर छोटी-बड़ी घटना और समस्या पर केंद्रित समाचार मिल सके। एक दिन विनोद शुक्ल जी ने इस समस्या पर चर्चा की। कहा कि हम लोग यह नेटवर्क खड़ा करेंगे। नाम क्या दिया जाए? चार-पांच नामों पर चर्चा हुई।
आखिर में संवाद सूत्र के नामकरण पर सहमति बनी। भर्ती के लिए उसी दिन विज्ञापन दे दिया गया। अगले दिन बड़ी तादात में लोग सशरीर उपस्थित हो गए। सबको समझाया गया कि आवेदन पत्र दीजिए, सप्ताह भर के भीतर सूचित कर दिया जाएगा।
खूब आवेदन पत्र आये। गिरीश मिश्र जी को जिम्मेदारी दी गई कि वह इन आवेदन पत्रों की छानबीन करके योग्य अभ्यर्थियों का चयन कर प्रशिक्षण प्रारंभ कर दें। गिरीश जी ने जल्द ही योजना को मूर्त रूप दे दिया। वह रोज सबसे खबरें लिखवाते, कवर करवाते और फिर संपादित करके छपने को दे देते।
काफी थकाऊ काम था, लेकिन गिरीश जी ने बहुत ही श्रम पूर्वक इस कार्य को संपादित किया। संवाद सूत्रों को रूटीन से कतई बचने की हिदायत दी गई। गिरीश जी के बाद काफी दिनों तक बाबू साहब यानी अमर सिंह और वशिष्ठमुनि ओझा जी ने यह कार्य बखूबी संपादित किया।
पहली खेप में आये काफी लोग आगे चलकर अच्छे रिपोर्टर सिद्ध हुए। उन्हें स्थायी कर दिया गया। कुछ दूसरे अखबारों में चले गए। दरअसल विनोद जी बहुत पढ़ाकू थे। निरंतर अध्ययन की ही परिणति थी संवाद सूत्र नामक व्यवस्था का जन्म।
ऊपर तस्वीर में संवाद सूत्रों की पहली खेप के बीच बैठे गिरीश मिश्र जी चिर परिचित स्मित मुस्कान बिखेरते दिख रहे हैं। तस्वीर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अब इस दुनिया में नहीं। लेकिन, कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जो आज उच्च मुकाम पर हैं। मेहनत और लगन का फल मीठा होता है।
Vishwanath Tiwari- राजू भाई बेहतरीन तस्वीर कहाँ से खोज कर लाए है। साधुवाद. मुझे गर्व है मैं इस तस्वीर का हिस्सा हूँ।मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज जो भी हूँ उसकी शुरुआत यही से है।
Ghanshyam Bharti- बहुत खूब गुरु जी, मैं भी 1992 से लेकर 2005 तक फैजाबाद/अंबेडकरनगर के विभिन्न स्थानों से संवाद सूत्र रहा। तब आदरणीय सरल ज्ञाप्रटे जी ब्यूरो प्रमुख थे। उन्होंने खूब सिखाया। उन्हें मैं पत्रकारिता की पाठशाला मानता हूं।
फोटो में राजन परिहार सर, अजय श्रीवास्तव भैया, सुनीत श्रीवास्तव भैया, अरविंद मिश्रा भैया को पहचान गया.. दो और साथी, एक श्रीवास्तव जी.. एक तिवारी जी.. उनके नाम याद नहीं आ रहे हैं.. -विवेक त्रिपाठी
संवाद सूत्र का सफर तय करके बना संवाददाता चुने हुए सांसद की तरह जनाधार वाला जनप्रतिनिधि होता है, और सीधा संवाददाता या ब्यूरो संवाददाता बनने वाला जुगाड़ू राज्यसभा सदस्य की तरह होता है। -नवेद शिकोह
Manish Mishra- मैं जागरण में इसके पहले की खेप का संवाद सूत्र था। रूमा सिन्हा जी, नदीम भाई और राजकुमार भसीन जी मुझसे भी एक बैच सीनियर संवाद सूत्र बने थे। उन लोगों को ₹30 प्रति काॅलम सेंटीमीटर के हिसाब से पेमेंट मिलती थी। अखबार में ऊपर से नीचे तक 52 सेंटीमीटर का एक काॅलम होता है। टुकड़ों में इतनी लंबी खबर छापने के बाद ₹30 का मेहनताना मिलता था। वर्ष 1993 में जब मैं संवाद सूत्र के रूप में भर्ती हुआ तो मेहनताना ₹30 से बढ़कर ₹40 पर काॅलम सेंटीमीटर कर दिया गया। बावजूद इसके पूरे महीने में बा मुश्किल सौ सवा सौ रुपए मिलता था। इसके लिए भी खबर नापने वाले निगम जी की चिरौरी करनी पड़ती थी। कुछ समय बाद जब मुझे अपराध संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला और खबरें ज्यादा छपने लगी तो पेमेंट ₹500 फिक्स कर दिया गया।
Ajay Dayal- आदरणीय गिरीश जी मेरे भी प्रथम गुरु हैं। उस वक्त मैं भी उनकी टीम का एक सदस्य था। बहुत सीखा उनसे, सबसे बढ़कर एक पत्रकार का व्यवहार कैसा हो, संयम, साहस और सकारात्मकता। एक पहल कॉलम भी वे देखते थे, जिसमें मैं लिखता था, 100 रु. मिलते थे। किसी नौजवान को आगे बढ़ाना कोई उनसे सीखे। राजू भैया, गिरीश जी, वाकई अद्भुत व्यक्तित्व के धनी हैं।
Manoj Varshney- मैं इसमें आरंभ में ही जुड़ गया था, दिनेश दीनू जी के हाथ का दिया आइकार्ड आज भी है मेरे पास। मेरी चार किताबें अब तक आ चुकी हैं। हिंदी के लगभग सभी अखबारों में 35 सालों से छप रहा हूं। नवज्योति में 22 साल फीचर एडिटर रहा। मलय समीर, कमलेश रघुवंशी, प्रदीप मिश्र, दिनेश मिश्र, शेखर त्रिपाठी (सभी के आगे जी लगा है) और खुद हुकुम राजू सर की मेहनत है मेरी सफलता। हां, कृष्ण मोहन मिश्र सर का तो अंदाज ही निराला था।
Naresh Dixit- हिन्दी पत्रकारिता का वह दौर ही अलग था। आदरणीय विनोद शुक्ल जी लखनऊ में पत्रकारों के भीष्म पितामह थे। लखनऊ हिन्दी पत्रकारिता का कल भी गढ़ था और आज भी है। देशभर के विभिन्न हिन्दी अखबारों में काम कर रहे कलमकारों में अधिकतर की शुरुआत लखनऊ या कानपुर में दैनिक जागरण अखबार से ही हुई होगी। आदरणीय शुक्ल जी पत्रकारों के बुरे समय के संकटमोचक थे। मैं स्वयं जब भी संकट में आया, उन्होंने कई बार मुझे नौकरी दी। वह स्वभाव से जितना सख्त थे, पत्रकारों का दुःख – दर्द समझने में उतने ही संवेदनशील। मालिकों को दरकिनार कर अखबार हित में सारे छोटे – बड़े फैसले खुद लेने वाले संपादक व महाप्रबंधक कब ढूंढे नहीं मिलेंगे। संवाद सूत्रों की शुरुआत का दौर मैंने भी देखा है।
Raju Govind- पत्रकारों को बंधुआ मजदूर बनाने की घोषित व्यवस्था का शुरुवाती चरण
Kumar Peyush- तस्वीर में दिख रहे Kaustubh Kishor व Shailendra Kumar बाद में मेरे साथ हिंदुस्तान, रांची में थे। शैलेंद्र दैनिक जागरण, आगरा में साथ रहा। Girish Misra की टीम ने पत्रकारिता ने मानदंड स्थापित किये। इसी का अनुकरण कर हिंदी व अंग्रेजी के अखबारों ने संवाद सूत्रों/ स्टिंगरों की भर्ती की। आजकल हर अखबार, खाकसार ग्रामीण पत्रकारिता में यही संवाद सूत्र रीढ़ की हड्डी हैं।
Peeyush Tripathi- अच्छी व्यवस्था थी जिसमें संस्थान का सबसे अधिक फायदा हुआ। एक मजबूत नेटवर्क खड़ा हो गया जिसमें संस्थान की कोई पूंजी नहीं लगती थी। लेकिन इस व्यवस्था ने शोषण की नई परम्परा को भी जन्म दिया। संवाद सूत्र को बगैर उचित मेहनताना दिए लम्बे समय तक काम लेते रहना और हिकारत भरी नजर से देखना। बेशक उसमें कुछ अच्छे पत्रकार भी निकले जिनमें शोषण सहने की क्षमता और धैर्य था। आगे चलकर लगभग हर संस्थान ने इस व्यवस्था को अपना लिया जिसका अंग्रेजी नामकरण स्ट्रिंगर हुआ।
Asheesh Bajpai- जो पत्रकारिता की हकीकत नहीं जानते हुए इसमें आते थे उनका शोषण यहीं से शुरू होता था… बिना दाम करो काम…..
Shekhar Pandit- संवाद सूत्र का तंत्र मंत्र शोषण का प्रतीक मटिया पलीद हो चुका है अब!



Sameer tiwari
October 13, 2025 at 6:54 pm
गर्व है कि आगे चलकर इस कड़ी में हमें भी शामिल होने का सुअवसर अवसर प्राप्त हुआ। संवाद सूत्र के जनक को सादर नमन। अविस्मरणीय यादों को सहेजने और साझा करने के लिए आदरणीय श्री राजू मिश्रा सर को साधुवाद…भड़ास मीडिया मंच को भी धन्यवाद…