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दलाली के दफ्तर बन्द हो गए!

अमरेंद्र किशोर-

आज अपने एक मित्र ने बताया कि उन्हें हिंदुस्तान अखब़ार के एक प्रतिनिधि के हवाले से पता चला है कि इस अखबार का सासाराम कार्यालय हमेशा के लिए बन्द हो गया फर्नीचर तक कौड़ियों के मोल बिक गए। अब सारे काम पटना से ही होंगे।

सच तो यही है कि मीडिया ने जो किया उसी का ख़ामियाजा आज भुगत रही है। कोई बारह साल पहले संस्करणों का किया गया इतना विस्तार ही गलत था। शहर शहर अखबारों के दफ्तर खुल गए। धड़ाधड़ रिपोर्टर औने पौने दरमाहा पर लगाये गए। ककहरा की तमीज से बेखबर युवा शहर की तस्वीर लिखकर तक़दीर बदलने का दम्भ पाल बैठे। एक एक पालिटिकल रिलीज के साथ 20-20 नामों की फेहरिस्त का मतलब साफ था पत्रकारिता नहीं पीआर हो रहा है।

इसमें जमकर वसूली भी हुई। धर्मशाला रोड पर किसी प्रयोजन से मिठाई खरीदने गया तो तीसों साल पुरानी पहचान का दुकानदार अपने परिवार में हुए हादसे को लेकर रोने लगा। पुलिस से ज्यादा पत्रकारों ने उगाही की। उसने जिन लोगों के नाम बताए, सब अपने ही लोग थे। अपने मतलब शहर के लोग, जिनसे कभी कभार दुआ सलाम की नौबत आ जाती थी।

आज हर अखबारों की कहानी एक जैसी हो गयी है। एडिशन बन्द हो रहे हैं। कुछ लगनशील पत्रकार भी इसी कत्लेआम के शिकार हुए। खैर उनके लिए फर्क नहीं पड़ेगा। सूखे वेतन पर सूफियाना अंदाज में जीनेवाले लोग आजीविका ढूंढ लेंगे। दलाल पत्रकारों का क्या होगा?

सब कुछ बदल रहा है। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रक्रिया है, लोग छाँटे जा रहे हैं। नाम मंदी का लें या मोदी के अधिनायकवाद का जिक्र करें कि सरकार मीडिया को पनपने नहीं देगी। सरकार नहीं चाहती मीडिया रहे। सवाल है कि किस सरकार ने चाहा कि मीडिया आजाद रहे। मीडिया को सरकार और बड़े कारोबारियों की महरी बनानेवाले खुद संपादक हैं। संपादकों ने अखबार कम चलाये,मालिक के कारोबार में बिचौलिए ज्यादा बन गए। ऐसे में धंधा पर जा टिके लालाओं ने अखबार को दरकिनार किया। तो उसके संस्करण अपनी मौत मर रहे हैं।

कभी आलम यह था कि शहर का स्टाफ रिपोर्टर, केवल सासाराम का नहीं, सीधी मुंह बात नहीं करता था। यानी दिल्ली में प्रधान संपादक मृणाल पांडे और स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी से मिलना आसान था किंतु इन स्टाफ रिपोर्टर से आपकी बात का सही जवाब मिलना मुश्किल था। तो ऐंठ रऐसा ही होना था। जब ऊपर हलाली हुई है तो नीचे ऐसे झटके में कत्लेआम होना ही था। जाओ दलालों, आईने में अपनी शक्ल देख लो। अब भी समय है मेहनत से खाने कमाने की आदत डालो।

मान लो, अखबारों के स्थानीय दफ्तर खोलकर जो उगाही की गई है समय ने तुम्हारा एनकाउंटर किया है।अब तुम्हारा पुनर्जन्म होगा।

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