दैनिक जागरण के कर्मचारी अब आरपार की लड़ाई के मूड में, काली पट्टियां बांधी, 17 को हड़ताल

दैनिक जागरण प्रबंधन की कर्मचारी विरोधी नीतियों, दंडात्मक कार्रवाइयों, मजीठिया वेतनमान पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानने आदि से नाराज कर्मचारी अब आमने सामने की लड़ाई में उतर चुके हैं। जागरण कर्मचारियों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक सीधे टकराव की लामबंदी के साथ नोएडा और दिल्ली में जागरण कर्मचारी आज पहली जुलाई को काली पट्टियां बांधकर काम कर रहे हैं। वह 17 जुलाई को 24 घंटे की हड़ताल पर रहेंगे। उसके बाद आगे के संघर्ष की रूपरेखा लागू की जाएगी। 

काली पट्टियां बांधकर दैनिक जागरण के नोएडा मुख्यालय पर आंदोलन की राह पर चल पड़े जुझारू कर्मचारी

गौरतलब है कि कर्मचारियों की तरफ से 8 जून 2015 को दैनिक जागरण प्रबंधन को नोटिस देकर पूर्व सूचना दे दी गई थी कि उनके मांग पत्र पर कोई विचार करने की बजाय प्रबंधन कर्मचारियों का लगातार उत्पीड़न कर रहा है। इसलिए अब वे एक जुलाई 2015 से काली पट्टियां बांध कर कार्य करेंगे। यह सिलसिला 16 जुलाई तक जारी रहेगा। अगले दिन 17 जुलाई को 24 घंटे तक कार्य बहिष्कार कर हड़ताल पर रहेंगे।   

जागरण कर्मचारियों द्वारा प्रबंधन को समय पूर्व दिया गया नोटिस

बताया गया है कि कर्मचारी 16 जुलाई तक इसी तरह अल्टीमेटम के तौर पर काली पट्टियां बांधकर काम करेंगे। 16 जुलाई को कर्मी चौबीस घंटे की हड़ताल पर चले जाएंगे। यह भी पता चला है कि अखबार की अन्य यूनिटों में भी ये आंदोलन पैर पसार सकता है। पूरे ग्रुप में कार्यरत कर्मचारी अखबार मालिकों के कट्टरतापूर्ण एवं उत्पीड़नात्मक रवैये से बुरी तरह आजिज आ चुके हैं। 

जागरण प्रबंधन, प्रशासन और सरकारों में अपनी जड़े जमाने के भरोसे ये उम्मीद पालकर चल रहा है कि वह कर्मचारियों की मांगों पर कत्तई विचार नहीं करेगा, चाहे उसे सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न सीधे आदेशित करे। कर्मचारी भी इस बार अपना इरादा ठान कर मैदान में उतर रहे हैं कि अब लड़ाई आर या पार होगी, चाहे कुछ भी हो जाए, इस दमनकारी अखबार मालिक की हरकतों के आगे कत्तई नहीं झुकना है। स्थिति काफी गंभीर नजर आ रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिन अखबार के लिए बड़े ही चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। 

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Comments on “दैनिक जागरण के कर्मचारी अब आरपार की लड़ाई के मूड में, काली पट्टियां बांधी, 17 को हड़ताल

  • पितामह भीष्म says:

    पहली बार दूसरो के अधिकारो के लिए लड़ने वाला मीडिया अपने अधिकारो के लिए लड़ रहा हैं। सुप्रीम कोर्ट इतना कमज़ोर नही की समाचार पत्र मालिको के आगे झुक जाए। एक ये ही पॉवर तो देश में शेष हैं जिससे न्याय की आस जिन्दा हैं।

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