रवीश कुमार-
इस फ्रेम को ग़ौर से देखिए। एक पिता अपने बेटे की याद में पुरस्कार समारोह का समापन भाषण पढ़ रहे हैं। पीछे बेटे की याद में दिया जाने वाला पुरस्कार बड़े-बड़े अक्षरों में पढ़ा जा सकता है।
अख़्तर सिद्दीक़ी जब सभी का धन्यवाद कर रहे थे, मैं उन्हें सुनने और देखने लगा। उनके पीछे दानिश सिद्दीक़ी की तस्वीर झांक रही थी। दानिश की तस्वीर बहुत सुंदर लग रही थी। जैसे वो दुनिया से गया ही नहीं है। उसके चेहरे का इक़बाल बुलंद था और ज़मीर का खुरदरापन आँखों में अटका था। ऐसे लायक़ बेटे को खो देने का दर्द केवल पिता का तो नहीं है। समाज का भी है। नहीं है तो होना चाहिए।
अपने काम के फ़न में माहिर दानिश की चर्चा हर तरफ थी। दानिश ने अपने लिए बड़े ख़तरे चुने और वह गोलियों का शिकार हुआ। उसके पीछे अख़्तर सिद्दिक़ी का जीवन कैसे गुज़र रहा है, मुझे भनक तक नहीं है।
जिस अख़बार में बेटे की रिपोर्ट आने का इंतज़ार किया करते होंगे, वो अख़बार अब घर आता है या नहीं। मुझे कुछ पता नहीं है। मैं बस एक पिता को देख रहा था। जो अपनी बहुत ही धीमी और सधी हुई अंग्रेज़ी में सबका धन्यवाद कर रहे थे। ख़ुद को समेटे हुए, संभाले हुए समापन भाषण पूरा कर रहे थे।

जैसे-जैसे वे आख़िरी पंक्तियों की तरफ़ बढ़ रहे थे, उनका ख़ालीपन बढ़ता जा रहा था। उन्हीं पलों में एक बार के लिए मुड़ कर देख लिया अपने बेटे को। बेटे ने भी पिता को देखा होगा।
मुझे जनाब अख़्तर सिद्दीक़ी साहब के चेहरे पर दुख के महासागर का संतोष दिख रहा था, जिसकी लहरें दानिश से कह रही थीं कि तुम्हारे पिता ने अपना फ़र्ज़ पूरा किया है। तुम्हारे अधूरे सपनों को दूसरों में पूरा किया है।
दानिश के नाम का यह पुरस्कार एक पिता के कलेजे से निकल कर जब पाँच महिला पत्रकारों के हाथों में गया होगा तब ज़रूर उन सभी का जीवन उपलब्धियों के बोध से भर गया होगा। उनके जीवन में बधाइयाँ आई, ख़ुशियाँ आईँ। उनकी हर हँसी के साथ थोड़े उदासदा हो गए होंगे अख़्तर साहब। थोड़ा इत्मिनान भी हुआ होगा। बेटे की आवाज़ सुनाई दे रही होगी। अब्बा…आप भी।
इन पांच महिला पत्रकारों को मिला दानिश सिद्दीकी पत्रकारिता पुरस्कार- पढ़ें…


