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देश और समाज की बर्बादी के लिए मीडिया को माना जाएगा सबसे अधिक जिम्मेदार!

चरण सिंह राजपूत-

जनता तक सही जानकारी पहुंचाने का काम मीडिया का रहा है। सत्ता की नकेल पत्रकार, साहित्यकार और लेखक कसते रहे हैं। नेताओं पर लोग विश्वास इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि ये लोग तो राजनीति कर रहे हैं। अपनी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। वह कलमकार ही है जिसकी बात जनता सुनती है, उस पर विश्वास करती है।

निश्चित रूप से मीडिया हाउस धंधेबाज लोगों के हैं। निश्चित रूप से कलमकार को भी अपने बच्चे पालने हैं। मीडिया हाउस के मालिक अपने धंधे के लिए सत्ता से पंगा नहीं लेना चाहते हैं। रोजी रोटी की चिंता करने वाले पत्रकारों की मैं मजबूरी मान सकता हूं। पर जो पत्रकार लखपति या करोड़पति हैं उन्हें तो नौकरी की चिंता नहीं है। यदि उन्हें अपनी संपत्ति या अपनी चिंता है तो उन्हें पत्रकार कहने का कोई हक नहीं।

आजादी की लड़ाई में जितनी बड़ी जिम्मेदारी कलमकारों ने निभाई। उतने ही उदासीन अब हैं। कलमकारों को जितना सम्मान आजादी की लड़ाई में मिला उतनी ही दुत्कार आने वाले समय में मिलने वाली है। आज के सामाजिक, नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक पतन का सबसे बड़ा जिम्मेदार और जवाबदेह कलमकारों को माना जाएगा। क्योंकि लोग भ्रमित हैं तो कलमकारों के नैतिक पतन की वजह से। यदि आज लोग अंधभक्त हैं तो सत्ता के दलाल कलमकारों की वजह से। यदि लोगों तक जमीनी हकीकत नहीं पहुंच रही है तो इसका सबसे बड़ा जिम्मेदार, स्वार्थी और समझौतावादी मीडिया ही है।

आज के इस दौर में यदि कोई पत्रकार, साहित्यकार या लेखक जमीनी हकीकत पर लिखने या दिखाने का नैतिक साहस जुटा रहा है तो वह वंदनीय है। अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से बचने वाला व्यक्ति कायर है। आज देश जिस नाजुक मोड पर खड़ा है उसे देशभक्ति ही बचा सकती है। ये मान लो कि सुरक्षित ये कायर, चाटुकार और गैर जिम्मेदार लोग भी नहीं हैं।

राजनीति जाति और धर्म की हो रही है। कोई हिंदुओं का ठेकेदार बना घूम रहा है तो कोई मुस्लिमों का। कोई पीडीए का राग अलाप रहा है तो कोई दलितों का और कोई ओबीसी का। कोई देश और समाज की बात करने को तैयार नहीं। काम करने को तैयार नहीं। मानवता और इंसानियत की बात करने को तैयार नहीं।

यदि स्वार्थ, लालच त्यागकर नैतिक साहस न जुटा पाए तो अपनी बर्बादी होते हुए खुद देखोगे। अपने बच्चों को तड़पते हुए खुद देखोगे। देश में जाति और धर्म की आग ऐसे सुलगाई जा रही है कि जैसे किसी को किसी की जरूरत ही न हो। जो लोग देश को तीसरी अर्थव्यवस्था बता रहे हैं वे भलीभांति समझ लें कि गिने चुने लोगों के पास पैसा है। जनता को तो बेवकूफ ही बनाया जा रहा है।

विदेश नीति गड़बड़ाने की वजह से भारत चीन अमेरिका के बीच फंसने जा रहा है। जो गलती पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को मित्र समझकर की थी वही गलती शी जिनपिंग को मित्र बनाकर करने जा रहे हैं। सत्ता को कोई रोकने टोकने वाला नहीं है तो बेलगाम हो गई है। पीएम मोदी जो जी में आ रहा है वह कर रहे हैं। संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाई गई एजेंसियां तो मोदी को ब्रांड बनाने में लगी हैं।

विपक्ष में बैठे नेताओं को बस सत्ता दे दो। जन समस्याओं से इन्हें कोई मतलब नहीं। अभी भी न चेते तो ये मुट्ठीभर लोग नई पीढ़ी को पंगु बना देंगे। मानसिक रोगी बना देंगे। जनता को बेबस बना देंगे।

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