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डीजीपी की गाली वाला वीडियो देखने के बाद मन विचलित हो गया!

हद है : ऐसी पत्रकारिता और उसके गिरते स्तर का … ‘तानाशाह होते अधिकारी’ जिम्मेदार कौन?

पटना : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दर्जा पाने वाली पत्रकारिता और उनके पत्रकार का स्तर अब दिन पर दिन गिरते चला जा रहा है। एक वक्त वह भी था जब पत्रकार नाम सुनते ही शासन प्रशासन तक का कान खड़े हो जाते थे लेकिन अब हालात कुछ वैसे नहीं है। चंद पैसे की लालच में शासन प्रशासन की चाटुकारिता,दलाली का बोलबाला कुछ ऐसा है जिसके सामने अच्छे जानकार का भी टिक पाना मुश्किल है। जिसके कारण धीरे धीरे पत्रकारिता अब बदनाम हो चुकी है। नतीजा यह है कि अब सवाल पूछना तो छोड़ दे गुनाह की जानकारी देने पर भी अधिकारियों द्वारा कुंडली खंगालने की बात कही जाती है। तो दूसरी तरफ आम लोगों का भी अब पत्रकार से भरोसा उठते जा रहा है ।पत्रकार का नाम सुनते ही लोगों के जेहन में सिर्फ एक ही बात उभर कर सामने आता है की ये सब भी तो…. हालांकि अभी भी कुछ ऐसे पत्रकार हैं जो सच्चाई के साथ डटे रहते हैं और शासन-प्रशासन के साथ साथ सरकार से सुलगते सवाल पूछते हैं पर उनकी संख्या कम हो गई है।

तानाशाह अधिकारी के सामने बौना होता पत्रकार…
ऐसा आज हम इसलिए कह रहे हैं कि आज अहले सुबह मेरे पास एक वीडियो आई जिसमें हमने देखा कि किस तरह एक पत्रकार पुलिस के आला अधिकारी को वहां चल रहे अवैध कारोबार की जानकारी दे रहा है और वह जानकारी सुनने की बात तो छोड़िए लगातार पत्रकार को अपशब्द कहते हुए गाली दे रहे हैं और तो और चोर कहते हुए उसकी कुंडली खंगालने की बात करते हैं। इस पूरी वीडियो को ध्यान से सुनने के बाद मुझे लगा कि फोन पर गाली दे रहे अधिकारी को इस पूरे मामले की जानकारी है और इसमें वह प्रशासन के अधिकारी के साथ-साथ सरकार में शामिल नेता और विधायक तक का भी नाम ले रहे हैं पर उनके खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की । यह कोई पहला मामला नहीं है जब उनके कानों में इस बात की जानकारी गई हो , कई बार इस अवैध गैरकानूनी काम को लेकर गोलीबारी भी हुई और हत्या भी फिर भी वहां के माफिया के सामने पुलिस प्रशासन और सरकार ने अपने घुटने टेक दिए हैं। खैर इसमें गलती पत्रकार का ही है क्योंकि उन्हें इतना नहीं पता की पुलिस से भी अलग कोई विभाग होता है । जिसक मामले की शिकायत उन्होंने पुलिस अधिकारी से कि उसकी शिकायत खनन विभाग के अधिकारी को करना चाहिए था ।अब यह उन्हें कौन बताए। हलांकि मैं ना तो उस पत्रकार को जानता हूं और ना ही उस न्यूज़ चैनल के प्रोपेगैंडा के बारे में फिर भी पत्रकार होने के नाते पत्रकारिता और उसके गिरते स्तर पर सोचना और अध्ययन करना मजबूरी बन जाता है।

पत्रकारिता के गिरते स्तर का जिम्मेदार कौन?…
क्या से क्या हो गया देखते देखते … एक वह भी पत्रकारिता का दौर था जब पत्रकार के आने की सूचना मिलते ही अधिकारियों के कान खड़े हो जाते थे और वह डिसीप्लिन से बातचीत करते थे। और तो और देहाती क्षेत्र में अगर कोई पत्रकार पहुंच जाता था तो उन्हें देखने के लिए लोगों का मेला लग जाता था अब हालात वैसे नहीं है… इसका जिम्मेदार मीडिया कंपनी के साथ-साथ सरकार भी है ।जो पैसे की बचत को लेकर ऐसे लोगों को अपने संस्थान में काम पर रख लेती है जिनके पास ना तो मास कम्युनिकेशन का डिग्री होता है और ना ही अच्छा अनुभव फिर भी वह क्षेत्र में माइक उठाकर चल पड़ते हैं और सवाल जवाब करना शुरू कर देते हैं। नतीजा ऐसा होता है कि जानकारी के अभाव में या तो वह चुप रहते हैं या फिर उनके द्वारा बताए गए जवाबों का गुणगान करते रहते हैं। क्रॉस क्वेश्चन पूछने की समझ उनके दिमाग से ऊपर होता है। जब इंटरव्यू के दौरान क्रॉस क्वेश्चन नहीं पूछे जाएंगे तो अधिकारी और नेताओं का मनोबल दिन पर दिन बढ़ता जाएगा और मीडिया का खौफ उनके मन से निकलता चला जाएगा। कुछ ऐसे ही हालात आजकल है। जहां इंटरव्यू दे रहा व्यक्ति अपने आप को परम ज्ञानी समझता है और उनसे क्रॉस क्वेश्चन पूछने के बाद वह या तो ऑपोजिट पार्टी के पत्रकार या फिर कुंडली खंगालने की बात करने लगते हैं। इन्हीं सब बातों को देखते देखते बड़े चैनल भी अब वही सवाल पूछते हैं जो सामने वाले को अच्छा लगता है। अगर कोई दिल को चुभ जाने वाला सवाल किसी पत्रकार के द्वारा पूछ लिया गया तो फिर या तो उन्हें नौकरी से निकलवा दिया जाता है या फिर उनका विरोध शुरू हो जाता है।

तो दूसरी तरफ सरकार के द्वारा पत्रकारिता क्षेत्र में आने का कड़ा नियम नहीं लागू किया गया है ।जिससे जिसे भी मन करता है वह न्यूज़ चैनल का माइक उठाकर क्षेत्र में चला जाता है और अपने आप को पत्रकार कहता है। और तो और मीडिया कंपनी चलाने वाले कई ऐसे माफिया भी है जो मीडिया की आड़ में गैरकानूनी काम करते हैं और दिनभर सरकार का गुणगान करते रहते हैं। गुणगान करना उनकी मजबूरी है और गुणगान करने वाले मीडिया के मालिक की संख्या लगभग 50% से अधिक है । नतीजा ऐसा हुआ कि आम लोगों के साथ-साथ सरकार के नजर से भी अब मीडिया गिर चुकी है। इसको लेकर कड़े कदम उठाने की जरूरत है पर किन्हे फुर्सत है जो इस मामले पर ध्यान दें…

हद है ऐसी ‘पत्रकारिता पर मजबूरी’ भी …
इस वीडियो को देखने के बाद मेरा मन भीतर से विचलित हो गया और काफी देर सोचने के बाद मन में एक विचार आया कि पत्रकारिता छोड़ गांव जाकर खेती करते हैं… फिर दूसरे ही क्षण वह दिन भी याद आ गया जब ग्रेजुएशन करने के बाद गार्जियन ने पूछा था अब क्या करना है तो हमने बड़े ही बुलंद आवाज में कहा था पत्रकारिता… फिर बिना कुछ सोचे समझे परिवार वालों ने पत्रकारिता के कॉलेज में फीस भरते हुए नामांकन करवाया । अब वापस जाने के बाद क्या जवाब दूंगा…. मेरी पत्रकारिता चाटुकार लोगों और भ्रष्ट सिस्टम के आगे हार गई। चलो आगे आगे देखते हैं और क्या होना बाकी है । क्योंकि इस चाटुकारिता दलाली और भ्रष्ट अधिकारियों की गुलामी वाली पत्रकारिता से हम कोसों दूर है। जब पूरी तरह सिस्टम खत्म हो जाएगा तो हम भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेक कर वापस चले जाएंगे अभी कुछ परसेंट सच्चाई बाकी है।

(ये मेरे सोचने के तरीके हैं अगर किन्ही भाई बुरा लगा हो तो माफ करिएगा)

मुकुंद सिंह
[email protected]
7903583964

मूल खबर-

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4 Comments

4 Comments

  1. Madan Tiwary

    July 23, 2020 at 12:24 pm

    कमीशन नही मिला था क्या आपके तथाकथित मित्र पत्रकार को ?उसकी कुंडली निकाल कर देखिये श्रीमान

  2. पंकज चतुर्वेदी

    July 23, 2020 at 2:59 pm

    एक बात है पत्रकार ने सुबह 4 बजे सीधे डीजीपी को फोन कर कोई समझदारी नहीं की थी

  3. जी पी पांडेय

    July 24, 2020 at 11:02 am

    पत्रकार का डीजीपी को सुबह 4 बजे रिपोर्टिग का आइडिया गलत था ! सारे सबूत के साथ उसे सभी अधिकारियों को ईमेल करना था और अखबार में छपवा देना था।

  4. मोहन कुमार

    July 24, 2020 at 6:29 pm

    नये पत्रकार खुद ही अपनी मर्यादा को तार तार कर रहे हैं।नहीं तो कोई अधिकारी ऐसे वर्ताव नहीं करता।रही बात डी जी पी साहब की तो वो जब आधी रात को किसी थाना का निरीक्षण, या किसी पेट्रोलिंग गस्ती का निरीक्षण करें औऱ उस समय कोई पत्रकार उनकी फोटो लेकर खबर बनाये तो बहुत अच्छा।पर किसी अवैध कारोबार जो कि अक्सर रात के अंधेरे में ही होता है।उसकी जानकारी लोकल सभी अधिकारियों के नहीं प्रतिक्रिया न देने पर उच्चाधिकारि को फोन करें तो उसे सुसज्जित शब्दों से सम्मानित होना पड़े यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए दुर्भाग्य का विषय है।जबकि सस्ती लोकप्रियता के लिए अधिकारियों द्वारा 24 घण्टे उपलब्ध रहने का दावा किया जाता रहा है।उस स्थिति में जब एक पत्रकार को ऐसा जबाब मिलता हो तो आम लोगों का …….

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