Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

उत्तराखंड

उत्तराखंड के ‘धराली’ में पत्रकारों के जाने पर रोक लगाकर सरकार क्या छुपा रही है?

राहुल कोटियाल-

पत्रकारिता के बीते एक दशक से लंबे अपने सफ़र में मैंने दंडकारण्य (बस्तर) में नक्सली इलाक़ों से लेकर कश्मीर में आतंकवादियों के ठिकानों तक से रिपोर्टिंग की है.

कभी किसी सरकार ने मुझे वहाँ जाने से नहीं रोका, बल्कि उन रिपोर्ट्स को पत्रकारिता के सर्वोच्च सम्मान मिले. लेकिन आज अपने ही घर में, अपने ही पहाड़ में, ‘अपनी’ ही सरकार ने मुझे घटना स्थल पर जाने से रोका है.

आपदा अपडेट: पत्रकारों को पैदल भी आगे जाने से रोका जा रहा है. गंगनानी पुल से आगे हमें नहीं जाने दिया जा रहा.

ऑफ-रिकॉर्ड पुलिस कह रही है कि ‘स्थानीय लोगों को आगे भेजने की अनुमति है, आप लोगों को नहीं.’ अब संदेह और गहरा हो रहा है कि सरकार क्या छिपा रही है.

संबंधित अधिकारियों के फ़ोन ऑफ आ रहे हैं. आप लोगों से अपील है कि पोस्ट को शेयर करें, संबंधित अधिकारियों पर दबाव बनाएं, उन्हें टैग करें.

अगर ये सरकार के इशारे पर हो रहा है तो सरकार आधिकारिक तौर पर घोषित करे कि पत्रकार घटना स्थल तक नहीं पहुँचाए जाएँगे.

इस लिंक पर वीडियो देखें…

https://www.facebook.com/kotiyal/videos/635426605790555/?rdid=01LKLcWvAVzREEkA#


उमाकांत लखेड़ा-

उत्तरकाशी के आपदाग्रस्त धराली तक जाने में कई पत्रकारों व यू ट्यूब चैनल के प्रतिनिधियों के जाने पर अवरोध पैदा किए जा रहे हैं। उत्तराखंड सरकार का यह कृत्य संवेदनहीन, जनविरोधी व अलोकतांत्रिक है। इस तरह का कदम पत्रकारों पर सेंसरशिप की श्रेणी में आता है!

सत्ता के नशे की यह प्रवृत्ति न केवल मीडिया और सूचनाओं की स्वतंत्रता पर कुठाराघात है बल्कि देशवासियों को सूचना पाने के मौलिक अधिकार से वंचित करना है। कई स्वतंत्र पत्रकार दिन रात बहुत मुश्किलों को पार करते हुए प्रभावित इलाकों में जानमाल के नुकसान का आकलन करने वहां जाने की मिन्नते करते रहे। लेकिन उन्हें उपलब्ध रास्ते से नहीं जाने दिया गया। उन्हें बाध्य किया गया कि वे या तो वे चुपचाप वापस चले जाएं या कई घंटे की पहाड़ी चढ़कर व विपरीत मौसम का जोखिम उठाकर प्रभावित इलाके में जाएं।

सरकारी तंत्र की ये कुटिल चालें वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी, राहुल कोटियाल या उनके साथ अन्य पत्रकारों को अपमानित व हतोत्साहित करने के लिए रची गई लगती हैं।

मैं गारंटी दे सकता हूं कि ये पत्रकार कोई पुरस्कार या ताज पाने के मोहताज नहीं हैं। उनका एक मात्र उद्देश्य है कि वे आपदा प्रभावित इलाके के जमीनी हालात और पीड़ित लोगों का दुख दर्द जानें और हालात समझने की कोशिश करें।

ये पत्रकार अपने निजी खर्चे पर वहां गए हैं। ये जांबाज पत्रकार पिछले कई दिनों से ठीक से सोए बिना, भूखे- प्यासे आगे जाने की जद्दोजहद करते रहे। उम्मीद करता हूं कि राज्य सरकार के सिपहसालार स्थिति संज्ञान लेंगे।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन