सुजाता-
दिलीप मंडल को कोई एहसास-ए-कमतरी ज़रूर है तभी इसे बताना होता है कि दुनिया मूर्ख है और यह इतना विद्वान और महान है कि फ़ातिमा शेख़ जैसा काल्पनिक चरित्र इसने गढ़ा जिसका 2006 से पहले कोई ज़िक्र भी नहीं था. मैं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से 1986 में छपी किताब “क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले” से कुछ पेज लगा रही हूँ आप उस फ़र्ज़ी आदमी के मुँह से समाने फेंक आना क्या है कि मैंने तो उसे ब्लॉक किया है.



Ashok Kumar Pandey-
दिलीप मंडल के तीन घंटे से कम चले झूठ के पीछे तीस साल से अधिक का फ्रॉड है! दो कौड़ी के दलाल जब खुद को ज़्यादा महत्त्वपूर्ण समझने लगते हैं तो ऐसी ही हरकतें करते हैं। दिलीप जैसों की कुछ स्थापित करने की कभी कोई औक़ात नहीं रही।
1986 में छपी किताब में फातिमा शेख की तस्वीर है और यह कह रहा है कि इसकी कल्पना है! तुमने दलाली के अलावा कुछ नहीं किया दिलीप.
1986 में छपी किताब की तस्वीर Sujata Chokherbali के यहाँ ऊपर देखें और 1992 में छपी किताब की तस्वीर गूगल से नीचे!

दिलीप मंडल ने दावा किया कि 2006 में उन्होंने फातिमा शेख की निर्मिति की, उनका चरित्र/चित्र गढ़ा, यह भी शर्त लगाई कि उसके पहले उनका कोई जिक्र दिखा दो।
तीन घंटे से कम समय में Sujata सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से 1986 में छपी किताब “क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले” में उनका ज़िक्र ढूंढ लाईं। 1992 में छपी सूसी जे थारु तथा के ललिता द्वारा संपादित किताब ‘वीमन राइटिंग्स इन इंडिया’ में भी फातिमा शेख का ज़िक्र आया है। इससे पहले की कई किताबों और दस्तावेजों में भी उनका ज़िक्र है। सावित्रीबा फुले के समग्र में एक पत्र संकलित है जो उन्होंने ज्योतिबा को लिखा है, उसमें भी फातिमा शेख का ज़िक्र है।
ज़ाहिर है दिलीप झूठ बोल रहे हैं लेकिन बात सिर्फ़ इतनी नहीं है। कुछ और सवाल उठते हैं।
1- 2006 में अगर उन्होंने झूठ बोला तो क्यों बोला था? किसे खुश करने के लिए? क्या उस समय की सरकार या किसी पार्टी विशेष को खुश करने के लिए यह झूठ चलाया था?
2-क्या वह इतने अनपढ़ हैं कि सच में उन्हें पहले लिखी किताबों के बारे में कुछ पता नहीं था?
3- जिन अम्बेडकरवादियों के नाम उन्होंने लिए हैं वे फातिमा शेख का नाम आने से परेशान क्यों थे? क्या वे भी इतने ही अनपढ़ थे कि उन्होंने यह नाम सुना ही नहीं था? क्या उन्हें एक मुस्लिम महिला से परेशानी थी?
4- इंडिया टुडे का संपादक बनने पर अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल उड़ा देने से लेकर मोदी सरकार में नौकरी के बदले मुसलमानों से नफरत फैलाने तक क्या दिलीप हमेशा ही बौद्धिक रूप से बेईमान रहे हैं?
क्या वह हमेशा सच बोलने की जगह फ़ायदे को ध्यान में रखकर लिखते रहे हैं?
5-अगर 2006 में वह झूठ बोल रहे थे तो आज जो कुछ लिख रहे हैं उसे सच क्यों माना जाना चाहिए?
6-दलित विमर्श के नाम पर भीड़ जुटाकर क्या वह इसी फ़र्ज़ी तरीक़े से लोगों को धोखा देते रहे हैं? अगर हाँ तो फिर उसकी माफ़ी कब माँगेंगे?
सोचिएगा और बताइएगा!
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