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सियासत

दिलीप मंडल ने कुबूल कर लिया- ‘मैं झूठ बोलने की फैक्ट्री हूँ’!

दिलीप मंडल-

मुझे माफ़ कीजिए। दरअसल फ़ातिमा शेख कोई थी ही नहीं। यह ऐतिहासिक चरित्र नहीं है। ये मेरी निर्मिती है। मेरा कारनामा।

ये मेरा अपराध या गलती है कि मैंने एक ख़ास दौर में शून्य से यानी हवा से इस नाम को खड़ा किया था।

इसके लिए किसी को कोसना है तो मुझे कोसिए। आंबेडकरवादी वर्षों से इस बात के लिए मुझसे नाराज़ हैं। माननीय अनिता भारती से लेकर डॉक्टर अरविंद कुमार खुलकर मेरे प्रति नाराज़गी जता चुके हैं।

मत पूछिए कि मैंने ये क्यों किया था। वक्त वक्त की बात है। एक मूर्ति गढ़नी थी सो मैंने गढ़ डाली। हज़ारों लोग गवाह हैं। ज़्यादातर लोगों में ये नाम पहली बार मुझसे जाना है।

मैं जानता हूँ कि यह कैसे करते हैं, छवि कैसे बनाते हैं। मैं इसी विधा का मास्टर हूँ तो मेरे लिए मुश्किल भी नहीं था। मैं मूर्तियाँ बनाता हूँ। मेरा काम है।

भारत में फ़ातिमा शेख की पहली जयंती मेरी पहल पर मनाई गई। मैंने ही पहली बार ये नाम लिया। एक काल्पनिक स्केच बनाया गया क्योंकि कोई पुरानी फ़ोटो तो थी नहीं। क़िस्से गढ़े मैंने। तो इस तरह बन गई फ़ातिमा शेख।

बात फैलती चली गई। क्योंकि फैलाई गई। मैंने किया।

जिनको ये समीकरण चाहिए था, उन्होंने आग की तरह बात फैला ली। आप समझ सकते हैं कि सावित्री बाई फुले के साथ फ़ातिमा शेख नामक काल्पनिक चरित्र को जोड़ने में किनका फ़ायदा है।

ज्योतिबा फुले या सावित्रीबाई फुले का पूरा लेखन प्रकाशित है। उनमें कहीं ये नाम नहीं है कि फ़ातिमा शेख पढ़ाती थीं। बाबा साहब ने भी यह नाम नहीं लिया है। जबकि ज्योतिबा फुले बाबा साहब के गुरु थे।

महात्मा फुले या सावित्रीबाई फुले के किसी जीवनीकार में नहीं लिखा फ़ातिमा शेख का नाम। न मराठी, न हिंदी, न इंग्लिश में।

मुसलमानों को तो पता भी नहीं था कि कोई फ़ातिमा शेख भी है।

मैं शर्त लगाता हूँ। 2006 से पहले इस नाम का कहीं भी कोई ज़िक्र दिखा दे!

किसी मुस्लिम स्कॉलर ने भी 15 साल पहले तक इस नाम का ज़िक्र नहीं किया है। ब्रिटिश दस्तावेज़ों में फुले दंपत्ति के शिक्षा कार्यों का उल्लेख है। लेकिन फ़ातिमा शेख जैसा कोई नाम नहीं है।

कहीं नहीं है साहब। कहीं नहीं मिलेगा।

सबूत के तौर मेरे पुराने ट्वीट और फ़ेसबुक पोस्ट, लेख और वीडियो मत निकालिए। फ़ातिमा शेख का नाम सबसे ज़्यादा मैंने ही लिया है। मैं तो मान रहा हूँ। पर वो थीं नहीं।

लापता लेडी!

फ़ातिमा शेख की जो कथा बनाई गई उसके हिसाब से उनको 1900 में मरना बताया गया है। यानी बाबा साहब के स्कूल में एडमिशन के भी बाद।

अगर तथाकथित फ़ातिमा शेख का काम थोड़ी भी अहमियत रखता या वे सचमुच होतीं तो क्या बाबा साहब के 17 खंडों के विशाल रचना संसार में उनका नाम एक बार भी न आता?

बाबा साहब के पूरे संकलन में तमाम महान लोगों के नाम हैं। ये नाम नहीं है।

बाबा साहब पुणे के पास मुंबई, सातारा वग़ैरह में ही रहे। क्या वे “फ़ातिमा शेख” को नहीं जानते थे?

महात्मा फुले को तो बाबा साहब अपना गुरु मानते हैं। शूद्र कौन थे किताब महात्मा फुले को ही समर्पित है।

पर फ़ातिमा शेख? पूरी तरह ग़ायब। लापता।

फ़ातिमा शेख का नाम बाबा साहब के लेखन या भाषण में क्यों नहीं है?

क्योंकि इस नाम की कोई टीचर थी ही नहीं।

फ़ोटो- तथागत लाइव से


Himanshu Kumar– पूरे सामाजिक न्याय और बहुजन विमर्श को विकृत करने उसे गाली गलौज में बदलने वाला ब्राह्मणवादी भाजपा की शरण में जाकर लोट लगाने वाला दिलीप मंडल अब कह रहा है कि फातिमा शेख नाम की कोई महिला कभी थी ही नहीं इसका निर्माण मैंने किया ၊

जबकि फातिमा शेख का जिक्र 1991 में ही बहु प्रसिद्ध पुस्तक Susie J. Tharu और K. Lalita की 1991 की लिखी किताब ‘Women writing in India: 600 B.C. to the early Twentieth Century’ में हो चुका था ၊

दिलीप मंडल फातिमा शेख के बारे में न सिर्फ झूठ बोल रहे हैं, बल्कि माई सावित्रीबाई फुले को भी झूठा ठहरा रहे हैं। फातिमा शेख एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं ना कि दिलीप मंडल की कोई कल्पना।

दिलीप मंडल ने आज अपने एक पोस्ट में लिखा है कि फ़ातिमा शेख़ उनके द्वारा गढ़ी गई, काल्पनिक पात्र हैं । वह न केवल तथ्यात्मक झूठ बोल रहे है, बल्कि सावित्री बाई फुले को भी झूठा ठहरा रहे हैं, जिन्होंने फ़ातिमा शेख़ के बारे में लिखा है ।

अपने मायका नायगांव पेठ खंडाला में बीमारी के दौरान आराम करने गईं सावित्रीबाई फुले ज़ोतिराव फुले को तीन पत्र लिखती पहले पत्र में ही वह फ़ातिमा शेख और उनकी भूमिका और व्यक्तित्व के बारे में लिखती हैं।

पहला पत्र 10 अक्तूबर, 1856 नायगांव पेठ खंडाला, (सावित्रीबाई फुले का मायका) जिला सतारा से लिखा गया है। इस पत्र के पहले पैराग्राफ में सावित्रीबाई फुले अपनी बीमारी का जिक्र करती हैं, साथ ही जोतीराव फुले को इस बात की सूचना देती हैं कि इस बीमारी के दौरान उनके भाई ने कैसे उनकी सेवा की। भाई के प्रेम और लगाव का जिक्र करती हैं। अगले पैराग्राफ में वे फातिमा शेख की चर्चा करती हैं, उनकी अनुपस्थिति में पुणे में शिक्षण और अन्य सामाजिक जिम्मेदारियां वे संभाल रही थीं। फातिमा शेख के साथ उनके कितने गहरे रिश्ते थे और वे उन पर कितना विश्वास करती थीं, इसका भी संकेत इस पत्र में मिलता है। वे लिखती हैं कि– “मैं जानती हूं कि मेरे पुणे में न होने के कारण फातिमा शेख पर काम का बोझ बढ़ गया होगा। उनको सभी काम संभालने में तकलीफ हो रही होगी, परंतु फातिमा शेख काम करने में कभी भी ना-नुकुर नहीं करती, इस बात की खुशी है और विश्वास है कि वो काम ठीक से संभाल लेगी।”

(सावित्रीबाई फुले रचना समग्र)

सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले, डॉ. सिद्धार्थ, दास पब्लिकेशन, पेज – 58

लेकिन यह धूर्त इंसान मंडल खुद को फातिमा शेख का निर्माता बता रहा है၊

मुस्लिम और दलित अगर मिल गए तो भाजपा का गेम एन्ड हो जाएगा၊ मुस्लिम और दलित में फूट डालने की सुपारी भाजपा ने मंडल को दी है၊ यह नाली में से गेंद निकाल कर लाने वाला फील्डर है ၊


अभिषेक श्रीवास्तव- 2025 का पहला चुटकुला। जब से पढ़ा, जमीन पर लोटे हुए हूँ कि चूतिया कौन बना? दलित? या मुसलमान? या सेकुलर-लिबरल? या नीला-लाल-हरा के गंगा-जमुनी वाले तमाम लोग? ओबीसी तो नादान है। वो अब भी नहीं मानेगा। जाने दीजिए।


Sunil Yadav- आज दिलीप मंडल कह रहे हैं कि फातिमा शेख उनकी दिमाग की उपज चरित्र है। इसका ज़िक्र मैं दिखाता हूँ आपको! फ़ातिमा शेख़ का ज़िक्र मंडल से बहुत पहले Susie J. Tharu; K. Lalita ने अपनी किताब Women Writing in India: 600 B.C. to the early twentieth century. के पेज नम्बर 162. पर किया है। सावित्री बाई फुले ने ज्योतिबा फुले को लिखे एक पत्र में फातिमा शेख का जिक्र किया है।

Devesh Chaudhari- जी हम भी सहमत हैं आपकी बातों से मंडलजी, आखिर गलती इंसान से ही होती है. हमसे भी गलती हुई आपको पहचानने में कि आप बहुजन हितैषी पत्रकार हैं जो दरअसल आप थे भी नहीं. मात्र एक भ्रम था. उस भ्रमजाल मे 2006 से ही हम गिरफ्त में थे। अच्छा हुआ उबर गये अब। कोई आश्चर्य नहीं कि यदि पतन की यही गति रही तो कल को आप बाबा साहब अम्बेडकर को संविधान निर्माता मानने से इन्कार कर दें।


नवनीत चतुर्वेदी- २०२४ में मैंने भी एक किरदार को बनाया है वो है विद्वान इंटेलिजेंट दिलीप मंडल. हालांकि बहुसंख्यक आबादी इस देश की आपको बदमाश लीचड़ पलटू इत्यादि ही कहती समझती है लेकिन मैं अकेला वो आदमी हूँ जो जौहरी की तरह आपके अंदर एक हीरा देख रहा हूँ. ढाई लाख रुपया महीना बहुत कम है. यदि आज जनता पार्टी की सरकार होती तो हम आपको ढाई करोड़ रुपया महीना देते.


Anil Bhokal- कल को आप कह सकते है कि मैने दबाव और पैसे के लालच में साहब का महिमा मंडन किया था, क्योंकि आप इसमें माहिर है। तो फिर लोग कहां जाएंगे जो आपको सच्चा मान रहे है। आज सबको ये कहके चलो की मैं मक्कार और दोगला हूं और कुछ भी कहूं तो विश्वास करके नहीं चले


Kaushik Parmar- दिलीप मंडल पहले हिंदुओं से गद्दारी करके बाते बनाते थे, अब आंबेडकरवादीओ से गद्दारी कर के बाते बना रहे है। आपकी इस पोस्ट से यह सिद्ध होता है कि आपकी कोई भी बात भरोसे लायक नहीं है। आप अपने लाभ के लिए कभी भी पलट सकते है।


Ramadheer Singh- मंडल जी को प्रणाम! ये किताब 1991 में छपी है इसके अलावा सावित्री बाई फुले की चिट्ठी में भी फातिमा शेख का ज़िक्र मिलता है, आप उल्लेखित पुस्तक मंगा कर तस्दीक कर सकते है। आपका दावा 2006 से पहले कोई नहीं जानता था…लेकिन ये किताब 1991 में छपी है.


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