सत्येंद्र पीएस-
अम्बेडकरवादी, बामसेफ जैसे संगठनों के लोग अमूमन दिलीप मण्डल जी से नाराज़ हैं। उनको, लगता है कि दिलीप मंडल बिक गए। एकमात्र शिकायत यही रहती है कि दिलीप मंडल बिक गए। आज एक मित्र पार्क में मिले। उन्होंने भी यही दोहरा दिया।
मेरे ज्यादातर मित्र जानते हैं कि दिलीप मंडल जी मेरे अत्यंत घनिष्ठ मित्र हैं। ऐसे में वह बड़ी शिद्दत से दोहराते हैं कि दिलीप मंडल बिक गए। साथ ही वह जानना चाहते हैं कि आपके क्या विचार हैं उनके प्रति?
तो मसला यह है कि दिलीप जी कट्टर अम्बेडकराट हैं। उन्होंने कोई ऐसी घोषणा नहीं की है कि अम्बेडकर को छोड़कर उन्होंने हेडगेवार धर्म एक्सेप्ट कर लिया है। मुझे भी लगता है कि वह अम्बेडक्राइट हैं।
अम्बेडकरवादी होने का फार्मूला ही यही है कि आप सत्ता के साथ जाने का मौका मिलते ही लपक लें। अम्बेडकर का पूंजीवाद से कोई झगड़ा नहीं है, जातिवाद से कोई झगड़ा नहीं है। हू वेयर शूद्राज में उनकी तकलीफ यही है कि शूद्र पहले ठाकुर थे, बाद में उनको कूट पीटकर नीच बना दिया गया। फिर से वो ठाकुर बन जाएं तो समस्या सॉल्व। पूंजी के साथ भी यही है कि पूंजीवाद आपको एकोमोडेट कर ले। सत्ता आपको एकोमोडेट कर ले, अछूत न रखे।
अम्बेडकर ने यही किया, हमेशा सत्ता के साथ रहे, जब सत्ता ने उनको जगह दी। काशीराम ने यही किया। काशीराम के 100 बयान मिल जाएंगे कि सत्ता चाहिए, उसके लिए गठजोड़ किसी से करना पड़े। उसके बाद की भी पूरी लिस्ट और श्रृंखला है मेरे पास। अम्बेडकर वाद के मूल में यह है कि सत्ता को तब तक गरियाइये, जब तक वह आपको एकोमोडेट न कर ले। गरियाने का मकसद केवल इतना सा बदलाव की इच्छा है कि एकोमोडेशन हो जाए। अम्बेडकरवाद में लड़ाई झगड़ा संघर्ष नहीं है, पतली गली से सत्ता में घुसना होता है।
अब इस फार्मूले में बुनियादी खराबी यह है कि अम्बेडकर या काशीराम या अम्बेडकर महासभा के हेड तो एडजेस्ट हो जाते हैं, उनके पीछे लिहो लिहो करने वाले ढक्कन हो जाते हैं।
अगर आप चाहते हैं कि नेता आपके साथ रहे तो गांधी को अपनाना होगा। गांधी ने अहमदाबाद में जब पहला डेरा जमाया और एक अछूत को आश्रम से निकालने की नौबत आ गई तो उन्होंने फैसला कर लिया कि यह अछूत आदमी या तो मेरे साथ रहेगा या मैं सब कुछ छोड़कर अछूत बस्ती में रहूंगा। आखिरकार मामला सलट गया। वह दलित परिवार कोई मंत्री नहीं बना गांधी के मरने के बाद, लेकिन उनके नाती पोते बड़े बड़े पद पर हैं, गैर राजनीतिक हैं, गांधीवादी हैं।
मामला यह है कि दिलीप जी जो पहले थे, वही अब भी हैं। उनके भीतर कोई बदलाव नहीं आया है। जहां तक मेरा पसर्नल मामला है, वह मेरी नज़र में जैसे पहले थे, वैसे अब भी हैं और भविष्य में भी वैसे ही बने रहेंगे। जब आप फैक्ट पर बात करेंगे तो आपका दिलीप मंडल के प्रति प्रेम वैसा ही बना रहेगा, जैसे पहले था। बिल्कुल ही लुटे पिटे महसूस नहीं करेंगे।


